शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

हर ओर से छले जा रहे हैं किसान


विगत साल मानसून के देर से आने की वजह से किसान धान की रोपाई हीं कर पाए। मानसून आया तो अब किसानों को समितियों से खाद और बीज नहीं मिल रहा है। ऐसे में किसानों को बाजार से ऊंचे दामों में खाद और बीच खरीदना पड़ रहा है। कुछ समितियों पर यदि खाद और बीज मिल भी रहा है तो वह भी चयनित कुछ ही किसानों को। छोटे किसानों को तो कोई पूछने वाला ही नहीं है। हकीकत यह है कि समितियों का गोदाम खाली न होने की वजह से खाद और बीज नहीं मंगाया जा रहा है। जिले में 72 सहकारी समितियां हैं। इसमें 67 समितियां काम कर रही हैं। कुछ समितियों पर खाद-बीज उपलब्ध है। ज्यादातर समितियों के गोदाम खाली ही नहीं है। ऐसे में खाद रखने के लिए जगह ही नहीं है। किसानों को समय पर खाद और बीज नहीं मिलना कोई नई बात नहीं है। समय बीत जाने के बाद समितियों पर खाद आती है। सिर्फ समिति पर चयनित किसानों को ही खाद-बीज मिल रहा है। जो किसान समिति से नहीं जुड़े हैं, उनकी बाजार से खाद-बीज खरीदना मजबूरी है। दुद्धी क्षेत्र में आधा दर्जन समितियां हैं, यहां खाद आई लेकिन कुछ लोगों को ही मिला, किसान समितियों का चक्कर लगाकर वापस चले जा रहे हैं, खाद-बीज की समस्या पर किसानोें से बात करने पर उनका दर्द झलकने लगा। एक सवाल पर ही कई समस्या गिना गए, बताया कि प्रशासन का भी सहयोग नहीं मिल रहा है, दस बोरी खाद की जगह एक बारी मिल रही है। नहर भी चालू नहीं की गई है, किसानों को सुविधाएं नहीं मिलने से परेशान हैं, जरूरत भर की खाद और पानी ही नहीं मिल रहा है, जब जरूरत होती है तब खाद नहीं मिलती है, समिति केवल दिखाने के लिए बनी है। नहर में पानी नहीं आने से नर्सरी सूख रही है। विभाग की मनमानी भी किसानों पर भारी पड़ती है, अधिकारी समय से खाद-बीज की व्यवस्था नहीं कर पाते। बाजार के बीज में मिलावट की संभावना बनी रहती है, कुछ बीजों में कलर डालकर उसकी किस्म बदल दी जा रही है। बीज केंद्रों पर पर्याप्त बीज नहीं है, इसके साथ ही जो किस्म किसानों को चाहिए वह नहीं मिल पा रहा। 

किलर रोड़

किलर रोड़ के नाम विख्यात वाराणसी-षक्तिनगर मार्ग पर सैकडों दुर्घटनाओं में लोगो की जान जाने के बाद अनपरा मेें पुलिस द्वारा लगाये गये सड़क सुरक्षा की दृष्टि से जगह-जगह लगाये गये गति अवरोधकों को वाहन चालकों ने कही भी सुरक्षा के लिए लगे ड्रमों को सुरक्षित नहीं रहने दिया है। ज्ञात हो कि पुलिस एंव नागरिकों की पहल पर बार-बार हो रही दुर्घटना रोकने के लिए जनसहयोग से हर 500 मीटर पर गति अवरोधक लगाकर दुर्घटना पर अंकुष निष्चित तौर से लगाया गया, परन्तु कोयला से लदें ओवर लोड वाहन ज्यादा ट्रीप लगाने के चक्कर में लगाये गये गतिअवरोधकों की धज्जिया उड़ाकर पुलिस व आम जनता के सड़क सुरक्षा के मंसूबों पर पानी फेर रही है। स्थानीय लोगो ने मांग किया है कि जिस वाहन से सुरक्षा के लिए लगे गति अवरोधकों को ध्वस्त किया जायेगा उसे पता कर दण्डित किया जाना चाहिए। 

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

खनन क्षेत्र में मजदूरों की मौत के मामले में प्रशासन की भूमिका


विंध्य क्षेत्र खासकर सोनभद्र के खनन क्षेत्र में हो रही मजदूरों की मौत के लिए प्रशासन की भूमिका संतोषजनक नहीं हैं। सोनभद्र के जिला खान अधिकारी कार्यालय के आंकड़ों की मानें तो उत्तर प्रदेश उप खनिज (परिहार) नियमावली 1963 के प्रावधानों के तहत कुल 269 खनन पट्टे स्वीकृकृत हैं। बुनियादी तौर पर खान विभाग के आंकड़े वास्तविकता से कोसों दूर हैं। 

बिल्ली, मारकुंडी, डाला, चोपन, बारी, रासपहाड़ी, सलखन, खैराही, सुकृत, घोरावल, पकरहट, बहुअरा आदि खनन क्षेत्र का निरीक्षण करने पर इनकी तादात हजारों में है जो पूरी तरह अवैध हैं। खनिज पदार्थों के परिवहन में भी खनन माफियाओं द्वारा बड़े पैमाने पर राजस्व चोरी की जा रही है, फिर भी प्रशासन मौन है। अवैध परिवहन की बात कई बार जिला प्रशासन के छापे में सामने आ चुकी हैं। खनन क्षेत्र में अवैध खनन की पुष्टि जिला खान अधिकारी भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं, खनन क्षेत्र में हो रही ताबड़तोड़ मौतों और अवैध खनन के बाद भी जिला प्रशासन राबर्ट्सगंज तहसील के अन्तर्गत खनन के लिए बकायदा टेंडर जारी कर पट्टा आवंटन को अंजाम दे रहा हैं। 

वैध खदानों की आड़ में अवैध खनन व परिवहन कर रहे खनन माफियाओं पर अंकुश लगाने में असफल प्रशासन की कारगुजारियों के कारण खनन क्षेत्र में मजदूरों की मौतों में इजाफा हो रहा है। विंध्य क्षेत्र में अवैध खनन और परिवहन पर यथाशीघ्र अंकुश लगाने की जरूरत है। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब आदिवासियों की लोक संस्कृति इतिहास के पन्नों में ही पढ़ने की मिलेगी।

पत्थर की खदानों में क्यों जान गंवाते हैं मजदूर ?


विंध्य क्षेत्र का सोनभद्र, मिर्जापुर, चन्दौली, सिंगरौली (म0प्र0), गढ़वा (झारखंड), भभुआ (बिहार) आदि जनपद आदिवासी बहुल जनपद है। विंध्य क्षेत्र में निवास करने वाले ज्यदातर आदिवासी-दलित परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। इन परिवारों में शिक्षा और सरकारी योजनाओं के प्रति जागरुकता का घोर अभाव है। साथ ही क्षेत्र में कल-कारखानों की स्थापना के बाद विस्थापन और भूमिहीनता का दंश झेल रहे आदिवासियों, परंपरागत वन निवासियों, दलितों समेत मजलूमों के सामने रोजगार का सबसे बड़ा संकट खड़ा है। 

तकनीकी क्षेत्र में कुशलता का अभाव, सरकार की वादा खिलाफी और भ्रष्टाचार में डूबी नौकरशाही के चलते विंध्य क्षेत्र के निवासियों के सामने रोटी की जुगाढ़ की समस्या, सुरसा के मुह की तरह खड़ी है। बेरोजगारी, जिम्मेदारी और लाचारी से बेहाल विंध्य क्षेत्र बाशिदों के लिए मौत का कूआं बन चुकी पत्थर, बालू, मोरम आदि की अवैध खदानें अपने और अपने परिवार के पेट में लगी आग को शांत करने के जुगाड़ के रूप में सहायक सिद्ध हो रही है। 

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना समेत केन्द्र और राज्य सरकार की अन्य योजनाएं भ्रष्ट नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों की वादाखिलाफी के कारण विंध्य क्षेत्र के परिवारों को राहत नहीं दे पा रही हैं। इन कारणों के चलते बेबश एवं लाचार विंध्य क्षेत्र के गरीब पत्थर, मोरम और बालू की खदानों में दम तोड़ने को मजबूर हैं।

पत्थर की खदानों में काम करते समय परिवार के दोनों व्यक्तियों की कब मौत हो जाए और पूरा परिवार दाने-दाने को मोहताज हो जाए, इस बात का भय पूरे परिवार को हमेशा सालता रहता है। खनन माफिया पुलिस की मिलीभगत से पूरे मामले को ही रफा-दफा कर देते हैं। पत्थर की खदानों में मरने वाले सैकड़ों मजदूरों के परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गये हैं और भूखमरी की कगार पर हैं। अगर समय पर इन परिवार के सदस्यों को रोजगार और सरकारी योजनाओं की सहायता नहीं मिली तो विंध्य क्षेत्र में भूखमरी और कुपोषण से मरने वाली संख्या में इजाफा हो सकता है ।

क्यों होती हैं अक्सर ये दर्दनाक मौतें ?


यह एक पहेली है, फिर भी पूर्व में हुई मौतों के कारणों पर गौर करें तो तीन बातें प्रमुख रूप से सामने आती हैं-

पहलाः-विंध्य क्षेत्र की पत्थर की खदानों में काम करने वाले अधिकतर मजदूर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के उन परिवारों के होते हैं जो गरीबी का दंश झेल रहे होते हैं। जंगलों में निवास करने वाले भूमिहीन आदिवासी एवं पारंपरिक वन निवासी मजदूर पत्थर, मोरम, मिट्टी, बालू, कोयला आदि की खतरनाक खदानों में विस्फोटक पदार्थों के इस्तेमाल और खनन के लिए प्रशिक्षित नहीं होने के कारण मौत का कूआँ बन चुकी पत्थर की खदानों में जरा-सी चूक पर अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठते हैं। विंध्य क्षेत्र की पत्थर की कई खदानें 50 मीटर से लेकर 200 मीटर तक गहरी हो चुकी हैं। इन खदानों में काम करना अप्रशिक्षित मजदूरों के लिए शेर की माद में घुसने के बराबर है।

दूसराः-विंध्य क्षेत्र में डोलो स्टोन, सैंड स्टोन, लाइम स्टोन, कोयला, बालू, मोरम आदि का अकूत भंडार है। इन खनिज पदार्थों के दोहन के लिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के माफियाओं और सफेदपोशों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। सत्ताधारी पार्टियों के नुमाइंदे बनकर मलाईदार मंत्रालयों की कुर्सी सम्भाल रहे कुछ सफेदपोशों ने विंध्य क्षेत्र से धन उगाही के लिए बकायदा अपने एजेंटों को तैनात कर दिया है और शासन के मानकों की धज्जियां उड़ाकर अवैध खनन एवं परिवहन को बढ़ावा दे रहे हैं। 

भ्रष्टाचार के आंकठ में डूबी नौकरशाही और सफेदपोशों के चलते खनन माफियाओं ने पूरे विंध्य क्षेत्र में अराजकता का माहौल पैदा कर दिया है। खनन माफिया विंध्य की पहाडयिों पर खुलेआम अवैध खनन करवा रहे हैं। साथ ही खनन विभाग द्वारा जारी एमएम 11 परमिट के बिना मिट्टी, मोरम, बालू, बोल्डर आदि का परिवहन करवा रहे हैं। इन बातों की पुष्टि जिला प्रशासन द्वारा गठित टीम के छापेमारी में भी आए दिन होती रहती है।

पत्थर की खदानों के लिए शासन द्वारा निर्धारित मानक को खनन क्षेत्र में कोई भी खदान संचालक पूरा नहीं करता है। खनन क्षेत्र में मौत का कूआं बन चुकी पत्थर की गहरी खदानों में सुरक्षा के कोई भी इंतजाम नहीं है। खदान अथवा क्रशर प्लांट को जाने वाले रास्ते तारकोल और खड़ंजा युक्त नहीं है। ना ही किसी पत्थर की गहरी खदान के चारों ओर बाउंड्री वाल बनाया जाता है। सुरक्षा के इन इंतजामों के अभाव में मजदूरों की मौत बड़े पैमाने पर हो रही है। 

तीसराः-अवैध खनन और परिवहन को रोकने के लिए जिला प्रशासन ने टास्क फोर्स की टीमें गठित की है, लेकिन ये टीमें औपचारिकता मात्र बन कर रह गयी है। समाज सेवियों की बार-बार शिकायत पर कभी कभार ये टीमें खनन क्षेत्रों में छापा मारती है तो बड़ी मात्रा में अवैध खनन और परिवहन का मामला प्रकाश में आता है। टीम द्वारा औपचारिकता पूरा करते हुए अवैध क्रशर प्लांट व बिना एमएम 11 की परमिट वाले वाहनों को सीज किया जाता है। इसके कुछ ही घंटों बाद खनन व परिवहन माफियाओं के प्रभाव के चलते सीज वाहन सड़कों पर दौड़ने लगते है और क्रशर प्लांट क्षेत्र में शोर मचाते हुए जहर उगलने लगते हैं। इतना ही नहीं जिला प्रशासन की उदासीनता और सत्ता में बैठे सफेदपोशों की शह के चलते खनन माफिया अब खान विभाग की टीम पर हमला भी बोलने से नहीं डरते हैं। 

विंध्य क्षेत्र खासकर सोनभद्र जनपद के खनन क्षेत्रों में पूर्वांचल के माफियाओं की दखलदांजी ने मजदूरों समेत अन्य मजलूमों की मौतों में इजाफा कर दिया है। जनपद में हो रही हत्याओं के प्रति जिला प्रशासन की उदासीनता और खनन माफियाओं के डर से खनन क्षेत्र में हो रही मौतों की सच्चाई बोलने में हर व्यक्ति खतरा महसूस कर रहा है। इसके चलते पुलिस महकमा खनन क्षेत्र में हो रही हत्याओं को दुर्घटना करार देकर सच्चाई का दम घोट रहा है।

मौत का कुआं बन चुकी पत्थर की अवैध खदानों में दम तोड़ रहे आदिवासी


हर दिन एक मौत, फिर भी प्रशासन मौन

गरीबी, बेरोजगारी, जिम्मेदारी और लाचारी से बेहाल विंध्य क्षेत्र के आदिवासियों का अस्तित्व खतरे में है। लाल किले पर अपनी अनोखी लोकनृत्य कला ’करमा’, ‘झूमर’ आदि का लोहा मनवा चुके आदिवासियों की मौत का कूआँ बन चुकी पत्थर की खदानों में दम तोड़ रही है। विंध्य पर्वत श्रृंखला की गोद में आबाद सोनभद्र, मिर्जापुर, चन्दौली और सिंगरौली (मध्य प्रदेश) जनपद की पत्थर की खदानों में हर दिन एक व्यक्ति की औसत दर से मौत हो रही है। मरने वालों में अधिकतर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के होते है। उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल जनपद सोनभद्र में ही आदिवासियों एवं परंपरागत वन निवासियों के आकड़े चैकाने वाले है। इस पिछड़े एवं अति नक्सल प्रभावित जनपद के खनन क्षेत्रों में हर माह एक दर्जन की औसत दर से आदिवासियों एवं परंपरागत वन निवासियों की मौत हो रही हैं। अगर इन आकड़ों में दलितों और मजलूमों की मौत की संख्या जोड़ दें तो खनन क्षेत्र में ही मौतों का आकड़ा हर दिन एक व्यक्ति की मौत के आकड़े को पार कर जाएगा ।

सिर्फ मीडिया रिपोर्टों की बात करें तो सोनभद्र के विभिन्न खनन क्षेत्रों में  साल में एक सप्ताह के दौरान आधा दर्जन लोग काल के गाल में समा चुके होते है। विदित कुछ साल पहले ओबरा थाना क्षेत्र के रासपहाड़ी स्थित एक अवैध पत्थर की खदान में टीपर पलट गया, इस घटना में 24 वर्षीय टीपर चालक की मौत हो गई। उसी दिन चोपन थाना अन्तर्गत डाला स्थित पत्थर की एक खदान में दो दिन पूर्व घायल हुए 27 वर्षीय मजदूर की भी मौत हो गई, वह राबर्ट्सगंज कोतवाली क्षेत्र के रघुनाथपुर का निवासी था। ओबरा थाना अन्तर्गत बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र की एक पत्थर की खदान में काम करते समय एक मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गया, उसे खदान संचालक घायल अवस्था में लेकर गायब हो गए। भदोही जनपद के कपसेठी निवासी 42 वर्षीय पेटी ठेकेदार डाला पुलिस चैकी क्षेत्र के काशी मोड़ स्थित खनन क्षेत्र की पहाड़ी पर पैर फिसल गया और वह मौत का कूआं बन चुकी पत्थर की खदान में गिर गया, इससे उसकी मौत हो गयी। मध्य प्रदेश के बैढ़न थाना अन्तर्गत पवर गांव निवासी 30 वर्षीय एक व्यक्ति ट्रक पर खलासी का काम करता था। वह ट्रक के साथ डाला खनन क्षेत्र स्थित एक क्रशर प्लांट में गिट्टी लोड करने गया। ट्रक के डाला में सोते समय उसके ऊपर पोकलैन से गिट्टी लोड कर दी गई। इससे उसकी मौके पर ही मौत हो गयी। खनन क्षेत्र में ताबड़तोड़ हुई मौतों के बाद भी अवैध खदान संचालकों के प्रति जिला प्रशासन का रवैया उदासीन बना हुआ है। 

जिला प्रशासन की इसी रवैये के कारण पूर्व में भी कई मौतें हो चुकी है। ओबरा थाना अन्तर्गत बिल्ली- मारकुंडी खनन क्षेत्र में 11,000 वाट के विद्युत तार की चपेट में आकर एक मजदूर की मौत हो गयी। मिर्जापुर के लालगंज थाना अन्तर्गत पंतनगर निवासी ट्रैक्टर चालक राबर्ट्ससगंज कोतवाली क्षेत्र के सकृत खनन क्षेत्र में बोल्डर लदे ट्रैक्टर को लेकर गन्तव्य को जा रहा था। अचानक ट्रैक्टर-ट्राली बेकाबू होकर एक पत्थर की खदान में पलट गया, इसमें चालक की मौत हो गयी। दुद्धी कोतवाली अन्तर्गत रन्नो गांव निवासी 32 वर्षीय मजदूर चोपन थाना क्षेत्र के बारी स्थित एक पत्थर की खदान में ड्रिलिंग का काम कर रहा था। अचानक एक बड़ा पत्थर उसके ऊपर गिर गया जिससे उसकी मौत हो गयी। ओबरा थाना अन्तर्गत बैरपुर निवासी 30 वर्षीय मजदूर और राबर्ट्सगंज कोतवाली क्षेत्र के खैराही गांव निवासी अपने कुनबे का खर्च चलाने के लिए मौत का कूआं बन चुकी पत्थर की खदान में काम करने बिल्ली-मारकंडी खनन क्षेत्र में गया। बिल्ली-मारकुंडी स्थित एक पत्थर की खदान में वह अपने भाई के साथ काम कर रहा था। अचानक दोनों पैलोडर की चपेट में आ गए, दोनों की मौके पर ही मौत हो गयी। घोरावल थाना क्षेत्र के मझली-हिनौती गांव निवासी अपने माता पिता के बुढ़ापे का सहारा 24 वर्षीय पुत्र अमिलौधा गांव स्थित एक अवैध मोरम की खदान में भगवान को प्यारा हो गया। उसके ऊपर मोरम का ढुहा गिर गया और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया। चोपन थाना क्षेत्र के पटवध गांव के पास बोल्डर लदा ट्रैक्टर-ट्राली पलट गयी। इस दुर्घटना में भटवा टोला निवासी 20 वर्षीय युवक की मौत हो गयी। अन्य दो मजदूर भी गम्भीर रूप से घायल हो गये। पन्नूगंज थाना अन्तर्गत किरहुलिया ग्राम सभा के कटरी टोला निवासी दो सगे भाइयों समेत एक और व्यक्ति कटरी टोला के पास जंगल वन विभाग की जमीन पर बन रहे चेकडैम में खुदाई करते समय उनके ऊपर मिट्टी का टीला गिर गया, इससे उनकी मौत हो गयी। डाला पुलिस चैकी क्षेत्र के बारी स्थित एक अवैध पत्थर की खदान में ट्रैक्टर-ट्राली पलटने से ट्रैक्टर चालक की मौत हो गयी। इस घटना के कुछ दिनों पहले बारी खनन क्षेत्र के ही अन्य पत्थर की खदान पत्थर का टीला गिरने से दो मजदूरों की भी मौत हुई थी। डाला पुलिस चैकी क्षेत्र के ही काशी मोड़ स्थित एक अवैध पत्थर की खदान में पत्थर की टीला गिरने से पन्नूगंज थाना क्षेत्र के दिनारे गांव निवासी व चोपन थाना अन्तर्गत मारकुंडी ग्राम सभा के कुशहिया टोला निवासी की मौत हो गयी। साथ ही अन्य पांच मजदूर गम्भीर रूप से घायल हो गये। 

इस हादसा के पूर्व भी चालू वर्ष में अवैध पत्थर की खदानों में दर्जनों दुर्घटनाएं हुई हैं जिसमें सैकड़ों मजदूरों के सांस की डोर टूट गयी। काशी मोड़ स्थित पत्थर की खदान में हुआ विस्फोट इनमें से प्रमुख घटना है जिसमें तीन मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गयी और दर्जनों मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गये थे। इस घटना के कुछ दिनों पूर्व ही बारी स्थित पत्थर की एक खदान में संदिग्धावस्था में महिला का शव मिला था। इसके अतिरिक्त बारी स्थित स्टोन क्रशर प्लांट के डग में ट्रैक्टर-ट्राली पलटने से मुस्लिम युवक की मौत, कोठा टोला स्थित क्रशर प्लांट के डग की दीवार ढहने से तीन मजदूरों की मौत, काशी मोड़ स्थित की खदान में ट्रैक्टर-ट्राली पलटने से चालक की मौत हो गई। 

इस सरीखी दर्जनों घटनाएं खनन क्षेत्र में घट चुकी हैं। ये वे घटनाएं हैं जो मीडिया के माध्यम से आम जन तक पहुंची। इसके अलावा खनन क्षेत्र में अन्य सैकड़ों मौतें होती है जिनका पता मीडिया प्रतिनिधियों को नहीं हो पाता है। कुछ का पता हो भी पाता है तो पुलिस इन मौतों का अन्य कारण बताकर मामले को रफा-दफा कर देती है। भ्रष्टाचार के आंकठ में डूबे जिला प्रशासन की उदासीनता और जनप्रतिनिधियों की वादा खिलाफी ने मजदूरों में भय पैदा कर दिया है । एक के बाद एक हो रही आदिवासियों समेत मजलूमों की मौतों की सच्चाई कोई भी बोलने को तैयार नहीं है
(घटनाओं में मृतकों के नाम नहीं दर्षाये गये है। )

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

खूनी खदाने-लाषों के ढेर पर हो रहा सोनभद्र में खनन।


सोनभद्र स्थित लगभग 300 खदानों में मृत्यु और दुर्घटनाओं का ताण्डव चल रहा है, परन्तु प्रषासन सिर्फ इसकी लीपापोती और सौदेबाजी में व्यस्त है। इस बात का पता इसी बात से चलता है कि जहाँ समाचार पत्र विगत तीन सालों में मृत्यु की संख्या दर्जनों में दर्षाते है वही आरटीआई द्वारा मांगे जाने पर शासन सिर्फ 3 ही मौत की पुष्टि करता है। सोनभद्र के खनन क्षेत्रों में जहाँ आधी अवैध खदानें है वही डीजीएमएस के नियमों की धज्जियाँ उड़ायी जा रही है। गैर कानूनी रूप से कृषि क्षेत्र में प्रयोग लाये जाने वाली ट्रैक्टर जो कि डीजीएमएस के वाहन चार्ट में नहीं आता और अमोनियम नाइट्रेट हजारों टनों में प्रयोग किया जा रहा है। विदित हो कि आमेनियम नाइट्रेट राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबन्धित बारूद है परन्तु यह टनों की मात्रा किसी भी क्रषर प्लोट पर देखा जा सकता है। जो गाहे-बगाहे नक्सलियों के हाथ भी लग जाता है। नियमों की यह अनदेखी नक्सलवाद और ज्यादातर मौत की वजह है। 

बिड़ला प्रबन्धतंत्र द्वारा षिक्षालयों पर सरकारी आदेष लागू नहीं होते।


बिड़ला प्रबन्धतंत्र अपने तानाषाही रवैये के लिए, वैसे ही जनमानस के बिच विख्यात है। जहाँ हिण्डालकों इण्डस्ट्रीज एवं उससे सम्बद्ध रेणुपावर कं. रेणुसागर वर्षो से कर्मचारियों की हितों की सदैव अनदेखी करती रही है। सूत्रों कि माने तो प्रतिष्ठान में कार्यरत कर्मचारी रोजी-रोटी छिन जाने के भय से ना कभी अपनी आवाज उठा पाये, और ना प्रबन्धतंत्र के तानाषाही रवैयें के खिलाफ अपने मूल अधिकार के प्रयोग करने का दुस्साहस जुटा पाये। जिसने भी कभी ऐसा कदम उठाया उसे कम्पनी के उत्पीड़न का षिकार होना पड़ा। दि पायनियर की कलम के सामने एक नजारा प्रस्तुत हुआ। जो बाल-हित में केन्द्र सरकार द्वारा चलाये जा रहे महत्वाकांक्षी योजना मध्यान्ह भोजन (मिड-डे-मिल) जैसे अभियान को हिण्डालकों प्रबन्धन द्वारा  खुले आम षिक्षा विभाग के आदेषों का उलंघन कर चुनौती दी है। बेसिक विद्यालयों के तर्ज पर सरकार द्वारा माध्यमिक विद्यालयों में कक्षा 6 से 8 तक के बच्चों के लिए विद्यालय में ही मध्यान्ह भोजन (मिड-डे-मिल) योजना का प्रवधान किया है। इस सम्बन्ध में आज से चार माह पूर्व जिला विद्यालय निरीक्षक, सोनभद्र द्वारा सोनभद्र के बारह राजकीय इण्टर कालेजों एवं तेरह वित्तपोषित इण्टर कालेजों के प्रधानाचार्यो को योजना का अक्षरषः पालन करने के लिए आदेषित किया गया था। जिला विद्यालय निरीक्षक, सोनभद्र के आदेष का पालन करते हुए सारे विद्यालयों ने बैंकों में मध्यान्ह भोजन (मिड-डे-मिल) के लिए खाता खोल दिया है। परन्तु अब तक आदित्या बिड़ला इण्टर कालेज, रेणुकूट एवं आदित्या बिड़ला इण्टर कालेज, रेणुसागर ने अपना खाता में मध्यान्ह भोजन (मिड-डे-मिल) के लिए अब तक नहीं खोला है, और ना ही षिक्षा विभाग के अधिकारी के आदेष पर भी इस अभियान में कोई दिलचस्पी दिखाई। एक बात का खुलासा और कर देना मुनासिब है कि दोनों विद्यालयों में आयोग द्वारा चयनित प्राधानाचार्य है, जो हिण्डालकों प्रबन्धतंत्र की उपेक्षा के षिकार है और जिनका वजूद रबर की मोहर तक ही सीमित है। कलम पकड़ी हुई कलाई प्रबन्धतंत्र की फौलादी उगंलियों में कैद है। क्या षिक्षा विभाग इन षिक्षालयों को प्रबन्धतंत्र के तानाषाही रवैयंें से कभी निजात दिला पायेगा ? आवम को इन्तजार है। 

महिला सुलभ काम्पलेक्स की मांग तेज


उर्जान्चल के सबसे बड़े व्यस्ततम एवं भीड़-भाड़ वाले चैराहों में से एक ग्राम सभा-औड़ी के नेहरू चैक पर आज तक किसी भी प्रषासनिक संस्था द्वारा कोई भी सार्वजनिक महिला शौचालय/मुत्रालय के निर्माण न कराये जाने के सम्बन्ध में ग्राम पंचायत सदस्य औड़ी के शक्ति आनन्द ने उपरोक्त समस्या को दृष्टिगत रखते हुए, ग्रामीणों एवं क्षेत्रवासियों की हित के लिए श्रीमान जिलाधिकारी, सोनभद्र को पंजीकृत डाक द्वारा प्रेषित कर ग्राम सभा औड़ी में स्थित तिराहे (नेहरू चैक पर एक महिला शौचालय/मुत्रालय के निर्माण की आवष्यकता के लिए पाँच बिन्दूवार कारकों से अवगत कराया है। 

शक्ति आनन्द ने बताया कि नेहरू चैक वाराणसी-षक्तिनगर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 75 ई पर स्थित है जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों पैदल यात्रीयों रोडवेज बसों, सवारी वाहनों एवं स्कुल, महाविद्यालय के बच्चों के साथ-साथ स्थानीय निवासियों का आवागमन होता है। जिसमें महिलाओं बच्चों वृद्धों की संख्या अधिक होने के कारण उन्हें इस तिराहे पर शौचालय मुत्रालय न होने की स्थिति में काफी समस्या, असुविधा व परेषानी का सामना करना पड़ता है, साथ ही उपरोक्त चैराहे पर उर्जान्चल का सबसे बड़ा साप्ताहिक बाजार जो प्रत्येक सप्ताह के गुरूवार को लगता है उसमें हजारों क्षेत्रवासी व ग्रामीण अपने निज उपयोग की वस्तुएँ यहाँ खरीदारी करने आते है। जिसमें महिलाओं की संख्या अधिक होती है। 

साथ-साथ प्रतिदिन इस तिराहे से क्षेत्र के दो महाविद्यालय व दो षिक्षण संस्थानों के आवागम का मुख्य मार्ग होने के कारण इस तिराहे से महाविद्यालय विद्यालय के छात्र-छात्राओं का आवागमन प्रतिदिन होता है। इस तिराहे पर ग्राम सभा औड़ी का मुख्य स्थायी बाजार मार्केट होने के कारण वयस्तता व लोगों की आवाजाही अधिक होती है जिसके लिए इस तिराहे पर एक महिला शौचालय/मुत्रालय के निर्माण आवष्यक है। अन्यथा कि स्थिति में किसी महिला/परूष को लघुषंका/दिर्घषंका की स्थिति में इस तिराहे पर कोई भी सर्वाजनिक शौचालय/स्थल की उचित व्यवस्था व साधन नहीं होने की स्थिति में बहुत असुविधा दिक्कत व परेषानी उठानी पड़ती है। पहले कभी उक्त के विषय में किसी भी जनप्रतिनिधि द्वारा कोई पहल नहीं की गई है। अतः इस पहल से शक्ति आनन्द युवा समाज सेवी पंकज मिश्रा सतीष दूबे प्रिन्स शर्मा एवं ग्रामीण क्षेत्रवासी जनता श्रीमान जिलाधिकारी, सोनभद्र से सहयोग के लिए अपेक्षित कार्यवाही की आषा कर रहे है।

साफ-सफाई न के बराबर, तहबाजारी वसूली जोरो पर

शक्ति आनन्द

औड़ी मोड़ पर लगने वाले सप्ताहिक बाजार की साफ-सफाई एवं गन्दगी को लेकर लोग खासें नाराज है। ग्राम पंचायत सदस्य, ग्राम पंचायत औड़ी के शक्ति आनन्द ने आरोप लगाया जिला पंचायत द्वारा तहबाजारी के नाम पर लाखों रूपये की राजस्व वसूली की जाती है। परन्तु साफ-सफाई के नाम पर वसूली करने वाला एवं विभाग को सांप सूंघ जाता है। बार-बार आग्रह करने पर भी उनके कान पर जूँ नहीं रेंग रहा है। आनन्द ने यह भी धमकी दिया कि समय रहते जिला पंचायत के द्वारा वैद्य या अवैद्य वसूली करने वाला नहीं चेता तो औड़ी बाजार से तहबजारी की वसूली नहीं करने दी जायेगी।

इस सम्बन्ध में शासन प्रषासन से लेकर तहबाजारी वसूलने वाले को कई बार लागो ने ध्यान आकर्षित कराया पर वह सूनने को तैयार नहीं। इतना ही नहीं जिला पंचायत द्वारा निर्धारित रेट पर न तो वसूली की जाती है ना ही बाजार में कही रेट के सम्बन्ध में बोर्ड लगाया गया है। जिसके कारण वसूलीकर्ता व्यापारियों से दबंगई के बदौलत मनमाना रेट से वसूली करते है। जबकि शासन का निर्देष है कि हर जिला पंचायत के बाजार में रेट-वसूली बोर्ड लगाया जाय। 

बारह किमी की यात्रा के लिये लगते है एक घण्टे


औड़ी मोड़ से मध्य प्रदेष के सिंगरौली सीमा को जोड़ने वाली मार्ग पर इन दिनों चलना दुलर्भ हो गया हैं। पहले जहां लोगों को वाहन से सिंगरौली जाने में दस से पन्द्रह मिटन का समय लगता था वही आज एक घण्टे से ज्यादा समय लग रहा है। ज्ञात हो कि औड़ी से मध्य प्रदेष को जोड़ने वाला मार्ग जेा निमार्ण कार्य से पूर्व एक दम अच्छी हालत में था लेकिन सरकारी महकमें द्वारा एक निजी ठेकेदार को लाभ पहुचाने के उद्देष्य से इस मार्ग का कार्य सौप दिया गया जो अच्छे भले रोड को तोड़ कर उसे नया बनाने की जिम्मेदारी थी लेकिन सरकारी महकमें की  उदासिनता के चलते इस मार्ग का कार्य पूरा नहीं हो पाया जिससे औड़ी से सिंगरौली जाने में जो समय 10 से 15 मिनट था आज बढ़कर एक घण्टे का हो गया है। जिस ठेकेदार के द्वारा इस मार्ग का कार्य कराया जा रहा था उसने एक किमी रोड का निर्माण भी कराया लेकिन जैसे-जैसे उसका कार्य आगे बढ़ा वैसे ही पिछे बनी रोड टुट कर बिखरने लगी तथा जगह-जगह बड़े-बड़े गढ्ढे बन गये जिस पर ठेकेदार के द्वारा मिट्टी तथा बालू डालकर इन गढ्ढों को भरा गया लेकिन बरसात आते ही ये गढ्ढे पुनः रोड से बाहर निकल कर झाकने लगे जिससे आये दिन लोग गिरकर चोटिल हो रहे है तथा बड़े वाहन जो सिंगरौली से कोयला आदि सामनों की आपूर्ति करते है इस मार्ग पर बने गढ्ढों की वजह से समय की देरी तो होती है साथ ही उनके कल-पूर्जे आये दिन खराब हो रहे है। यह मार्ग दो राज्यों की सीमाओं केा जोड़ता है साथ ही औद्यागिक राजधानी मुम्बई के साथ-साथ दक्षिण भारत को जोड़ने का काम करता है एक मात्र सिंगरौली स्टेषन ही ऐसा है जहां से मुम्बई, जबलपुर, भोपाल, अजमेर सहित वाराणसी जाने के लिए रेल की सुविधा उपलब्ध है ऐसे मेें इस मार्ग की दयनीय हालत यहां के नागरिकों के लिए एक बड़ी समस्या बन गयी है परन्तु ना ही काई जनप्रतिनिधि न ही विभाग इस ओर ध्यान दे रहा है। इस रास्ते से गुजर कर आने-जाने वाले लोगों की हालत ऐसी हो जाती है कि एक बार लोग उन्हे पहचान भी न पाये तथा षरीर की हालत इतनी खराब हो जाती है कि लोग रीढ़ की हड्डी के दर्द से ग्रसित होते जा रहे हैं वही  इस मार्ग पर दो पहिया वाहन चालक जहां तहां अनियंत्रित होकर गिरते पड़ते नजर आते है वहीं गर्भवती महिलाआंे के लिए यह मार्ग अन्य पिड़ादायक सिद्ध हो रहा है जिससे इस मार्ग पर अब लोग चलने से भी कतराने लगे है। इस मार्ग को लगभग 10 किमी तक तोड़ा गया लेकिन निर्माण कार्य सिर्फ एक किमी तक ही हो पाया और जोे कार्य हुआ भी है उसकी हालत पुराने रोड से भी बदतर है जबकि सम्पूर्ण नौ किमी मार्ग वैसी ही पड़ा है जिससे लोगों को काफी परेषानियों का सामना करना पड़ रहा है।

जिले के आस-पास के जंगल बना तस्करों का ठिकाना

रास्ते में पड़ने वाले गांवों के लोग तस्करों से करते हैं वसूली
सिंगरौली के सीमावर्ती प्रदेशों के जंगल पशु तस्कर गिरोहों के लिए मुफीद ठिकाना बनता जा रहा है। जंगलों के रास्ते हर माह कई सौ पशुओं को यूपी के रास्ते बिहार और झारखंड में प्रवेश कराया जा रहा है। इस धंधे में रास्ते में पड़ने वाले गांवों के चंद लोग भी तस्करों से उगाही करते हैं। मध्य प्रदेश के सीमांचल इलाके से पशुओं की तस्करी कोई नई बात नहीं है। कई बार जागरूक लोगों की सूचना पर पुलिस ने कई सौ पशुओं के साथ दर्जनों लोगों को पकड़ा लेकिन बाद में सब रफा दफा कर दिया गया। बताते हैं कि सिंगरौली का देवसर इलाका फिलहाल तस्करों के लिए सबसे मुफीद ठिकाना है। इलाके के गाय, बैल, भैंस, पड़वा व बछड़े एक सुरक्षित जगह पर इकट्ठा किए जाते हैं। इसके बाद पशुओं के झुंड को इलाके के डल्ला, पड़रियां, खोखवा होते हुए सिलफोरी के रास्ते सोन नदी पार करा उत्तर प्रदेष के सोनभद्र जिले में दाखिल करा दिया जाता है। इसके बाद पशुओं को बिहार व झारखंड के बार्डर में तय स्थान पर पहुंचा दिया जाता है जहां से बड़े कारोबारी तय रकम देकर ट्रकों से पशुओं को बंगाल (कोलकाता) के विभिन्न हिस्सों में पहुंचा देते हैं। इस तस्करी में पकड़े गए लोगों ने स्वीकार भी किया है कि वह पशुओं को बताए हुए स्थान पर इकठ्ठा करते हैं जबकि इनको जंगल के रास्ते ले जाने वाली टीम दूसरी है और उस टीम को जंगल के रास्ता की जानकारी है।

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

प्रदुषण से अजीज हो चुके है उर्जांचल के निवासी


ः-स्थानीय विस्थापित प्रतिनिधियों ने बनाई आन्दोलन की रणनीति। 
ः-जिला पंचायत सदस्य, प्रधान  व ग्राम पंचायत सदस्य एवं प्रबुध वर्ग  भी खुलकर आये सामने। 
ः-परियोजनाओं के विरूद्ध बनाई जा रही है कड़ी रणनिती। 
ः-प्रदुषण व ओबर लोड वाहनों से राजमार्ग पर चलना हुआ दुश्वार। 
ः-राख-कोयले की धुल से पट रहे है उर्जान्चल की सड़क। 
ः-रिहन्द डैम बना जहरीले पानी का प्याला। 

उर्जान्चल परिक्षेत्र में स्थित विस्थापित बस्तियों व इससे सटे आस-पास के गाँवो में प्रदुषण का प्रकोप तेजी से बढ़ता जा रहा है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि अनपरा तापीय परियोजना के विभिन्न ईकाईयों के लिये किये गये भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवार अधिकतर अनपरा तापीय परियोजना से सटे ग्रामों में बसे है, जिन्होंने अपनी पुस्तैनी जमीन देशहित में समर्पित कर दिया। आज उन्हें इसके बदले इन परियोजनाओं से निकलने वाली फ्लाई ऐश (राख) एवं परियोजनाओं की वजह से बढ़ते औद्योगिक यातायात के कारण सड़कों पर धुल-मिट्टी के गुबार से सामना करना पड रहा है। आने वाले कुछ दिनों में स्थानीय जनों के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक संगठनों व राजनितिक नेताओं ने इसके विरूद्ध रणनीति बनाकर एक साथ आन्दोलन करने की बात कही है,

पंकज मिश्रा
इस सन्दर्भ में कांग्रेसी नेता पंकज मिश्रा का कहना है कि सड़क पर बढ़ते प्रदुषण को रोकने के लिये परियोजनाओं द्वारा अपने निगमिय सामाजिक दायित्यों के तहत लाखों रूपये के खर्चे का बजट तो दिखाया जाता है, परन्तु वास्तव में इसके पीछे सच्चाई क्या है, ये तो उर्जान्चल के वातावरण से ही पता चल जाता है।

ओंकार केशरी
भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष ओंकार केशरी का कहना है कि परियोजनाओं द्वारा रिहन्द बाँध में बहाये जा रहे राख से यह डैम एक जहरीला प्याला बन गया है, जिसके जल से आस-पास के ज्यादातर गाँवों के लोग अपनी दैनिक कार्यो व पीने के प्रयोग में लाते है, प्रदुषित जल पीने से तरह-तरह के अज्ञात रोगों से ग्रसित यहा की ग्रामीण जनता प्रत्येक वर्ष सैकड़ों की संख्या में काल कवलित होते जा रहे रहे है। 

बालकेश्वर सिंह
बालकेश्वर सिंह, जिला पंचायत सदस्य- कुलडोमरी का कहना है कि परियोजना अपने द्वारा उत्सर्जित राख व कोयले को खुले में उडाना बन्द नहीं करती है तो जल्द ही उनके विरूद्ध बड़ा जन आन्दोलन खड़ा किया जायेगा। 

रामचन्द्र जायसवाल
कुलडोमरी ग्राम प्रधान प्रतिनिधि रामचन्द्र जायसवाल का कहना है कि ये परियोजनायें विस्थापित बस्तियों में जन सुविधा तो देने से रहे, बल्कि उन्हें प्रदुषण से हो रहे तरह-तरह के गम्भीर रोग देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे है।

शक्ति आनन्द
ग्राम पंचायत औड़ी के सदस्य शक्ति आनन्द का कहना है कि परियोजनाओं के आस-पास सटे गाँवों के साथ-साथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर शक्तिनगर से डिबुलगंज विस्थपित बस्ती तक परियोजनाओं से निकलने वाले राख व कोयले के अभिवहन में उपयोग की जाने वाली मालवाहकों से राख व कोयले की धुल उड़कर मार्ग से सटे गाँवों के वातावरण को इतना प्रदुषित कर दे रही है की लोगों को छोटी उम्र में ही सांस, ब्लड प्रेशर जैसे गम्भीर रोग होते जा रहे है, जो असमय मौत का कारण भी बनते जा रहे है। 

 रामदुलारे पनिका 
मूल निवासी संविदा श्रमिक यूनियन के नेता रामदुलारे पनिका का कहना है कि परियोजनाओं की वजह से बढ़ते प्रदुषण के कारण लोगों का राह में चलना दुश्वार हो गया है। 

हरदेव सिंह
हरदेव सिंह, ग्राम प्रधान-बेलवादह ने आरोप लगाया कि परियोजना द्वारा ग्राम बेलवादह में ऐश डाईक बनाकर उसमें व्यापक रूप से परियोजना से निकलने वाली राख को पानी के साथ लगातार बहाया जा रहा है। जिससे कुछ वर्षो में इस ग्राम का नामों-निशा मिट जायेगा। 

 विजय कुमार सिंह 
एलगी कम्पनी के ईन्जीनियर विजय कुमार सिंह का कहना है कि प्रदुषण का मुख्य कारण मालवाहकों द्वारा ओवर-लोड कर राख व कोयले को ढ़ोने की वजह से हो रहा है। जिसके कारण रोड़ पर उनके द्वारा गिराये जा रहे राख व कोयले की धुल की परत सारे आवोहवा को प्रदुषित कर देती है। जिसके रोकथाम के लिये प्रशासन के साथ-साथ परियोजनाओं को भी ठोस कदम उठाने चाहिए। 

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही दाने-दाने के लिए तरस रहा है अपंग


शासन के विभिन्न जन हितकारी शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन में शासकीय मिशनरी किस हद तक लापरवाही बरत सकती है इसका जीता जागता उदाहरण भाठ क्षेत्र के ग्रामीणों के बिच जाने पर पता चलता है, जहाँ के ग्रामीण जो जीवन जीने को मजबूर, जहाँ कई लोग वृद्ध एवं बेसहारा है, कई दाने-दाने के लिए तरस रहे है, एवं सैकड़ो अपंग है। किन्तु प्रदेश शासन की निराश्रित पेंशन योजना, सामाजिक सुरक्षा योजना, विकलांग सहायता कार्यक्रम, गरीबी रेखा कार्ड, वृद्धों के लिए सहायता कार्यक्रम के विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के हितग्राहियों के लिस्ट में कई लाभार्थीयों का नाम अभी तक दर्ज नहीं हो पाया है। घास-फूस से बनी झोपडी में कई दिनों भूखे रहकर घुट-घुट कर जिदगी बिताने को मजबूर यहा के आदिवासी एवं ग्रामीण आदिम जीवन जीने के लिये बाध्य है। 

मुख्यालय से 100 किलोमीटर दूर भाठ के ग्रामों के निवासी जंगल में घास-फूस से बनी झोपडी में रहते है। फिलहाल इस जिले में यहा से दुरूह क्षेत्र कोई नहीं है। यहा के लोग शासन के रोजगार गारंटी योजना का फायदा मिले बिना छुट-फुट मजदूरी से जीवन तो चला रहे है, किन्तु बकाया मजदूरी एवं अधिकारियो, कर्मचारियों तथा भ्रष्टाचार के चलते उनकी मजदूरी भी मार ली जाती है। हां शासन की किताबों में गरीबी रेखा कार्ड, स्मार्ट कार्ड, इंदिरा आवास, बेसहारा पेंशन, विकलांग सहायता, सामाजिक सुूरक्षा, ये सभी योजनाएं इन्हीं लोगों के लिए ही है। शासन की सभी योजनाएं जरूरत मंदो के लिए ही है। परन्तु शायद शासन की नजर यहा पड़ती ही नहीं। राजनैतिक कार्यकर्ताओं को भी शायद यहाँ के लोगों के घुट-घुट के मर जाने चिन्ता नहीं है। 

घटने की बजाय बढ़ती गईं समस्याएं


जनसंख्या में कम, लेकिन राजनीति में अहम स्थान रखने वाले प्रदेश के सबसे पुराने टाउन एरिया के रूप में घोरावल नगर पंचायत को जाना जाता है। इसके बाद भी यहां समस्याएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। कम होने की बजाय समस्याएं बढ़ती ही जा रही हैं। साढ़े सात हजार की आबादी वाले घोरावल नगर पंचायत में पिछले कार्यकाल में कार्य तो जरूर हुए, लेकिन नाकाफी रहे। नगर का विकास तो दूर की बात पहले तो समस्याओं को दूर करना है। ऐसे में नगर का विकास कराने का जिम्मा नगर अध्यक्ष को ही उठाना होगा। दस वार्डों में फैले इस नगर पंचायत में सबसे ज्यादा पानी की समस्या बनी हुई है। हर वार्ड में पानी नहीं पहुंच पा रहा है और जल निकासी का समुचित प्रबंध भी नहीं किया गया है।

नई बस्तियों में तो पानी की सप्लाई के लिए पाइप अभी बिछाई ही नहीं गई है। कुछ वार्डों में नालियां बनी ही नहीं हैं और जिन वार्डों में बनी भी हैं, तो वह या तो टूटी हुई हैं या फिर कूड़ों के ढेर से पट चुकी हैं। सफाई कर्मियों की कमी के चलते नगर पंचायत में साफ सफाई का कार्य भी ठप है। वहीं नगर में जहां खड़ंजा लगाया गया है, वह आधे से अधिक निकल कर इधर उधर बिखर गए हैं। उनकी मरम्मत कराना भी अध्यक्ष के लिए बड़ी चुनौती होगी। नगर में कुछ ऐसी बस्तियां बाकी हैं, जहां बरसात के दिनों में यहां के रहवासियों को आने जाने के लिए कीचड़ से जंग लड़ना पड़ता है। ऐसे में इन बस्तियों में खड़ंजा लगाने की तत्काल आवश्यकता है।वहीं नगर के हैंडपंपों की स्थिति दयनीय है। जलस्तर इतना गिर चुका है कि वे पानी देना तो दूर की बात मरम्मत के अभाव में शो पीस बन कर रह गए हैं। ऐसे में सबमर्सिबल से पानी की आपूर्ति कराने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं बचता। व

नगर पंचायत के विकास के संदर्भ में नगर के अध्यक्ष संजय कुमार जायसवाल का कहना है कि नगर की समस्याओं को मैंने बहुत नजदीक से देखा है। समस्याओं के क्रम में पानी की आपूर्ति व जल निकासी की समस्या सबसे अहम मुद्दा है। उन्होंने कहा कि नगर में पानी की आपूर्ति के लिए सबमर्सिबल की व्यवस्था की जायेगी। जहां तक पानी की निकासी की बात है, तो इसके लिए 56 लाख का प्रोजेक्ट बनाकर भेजा गया था। वह पैसा जैसे ही मिलता है, पानी निकासी की समस्या दूर कर दी जाएगी। नालियों की साफ सफाई पर अधिक ध्यान दिया जाएगा। जरूरत पड़ने पर सफाईकर्मी को भी रखा जाएगा। सुलभ शौचालय की बात करते हुए उन्होंने कहा कि नगर में कम से कम दो सुलभ शौचालय का निर्माण कराया जाएगा। जो भी कार्य अधूरे रह गए हैं, उसे पूरा करने का यथासंभव प्रयास किया जाएगा।

आबादी बढ़ने के साथ सुरसा होती गईं समस्याएं


तीन प्रदेशों के बीच बसा दुद्धी नगर पंचायत जनपद में अपना एक अहम स्थान रखता है। यहां तहसील मुख्यालय होने के बाद भी नगर पंचायत में समस्याओं का अंबार लगा है। जिले में इसे पुरानी तहसील के रूप में जाना जाता है। नगर की आबादी जैसे-जैसे बढ़ती गई वैसे-वैसे वह समस्याओं से ग्रसित होता चला गया। करीब दस हजार छह सौ अड़सठ की आबादी वाले दुद्धी नगर पंचायत में पिछले कार्यकाल में कार्य तो हुए जरूर, लेकिन वह नाली, गली, खड़ंजा, इंटर लाकिंग तक ही सीमित रह गया। आज भी नगर पंचायत के रहवासियों को तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। नगर के विकास की बात तो दूर पहले समस्याओं से ग्रसित नगर को समस्याओं से उबारना होगा। 11 वार्डों में फैले इस नगर पंचायत में आज तक सबसे बड़ी समस्या पेयजल की बनी हुई है। नगर की इस समस्या को दूर करने की दिशा में आज तक किसी चेयरमैन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। गर्मी के दिनों में तो यह समस्या और गंभीर हो जाती है। परिणामस्वरूप नगरवासियों को पानी के दर दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। स्थिति ऐसी है कि आज भी कई क्षेत्रों में पानी नहीं पहुंच पा रहा है। वहीं जल निकासी की व्यवस्था को दूर की बात है।

नगर की नालियों का यह हाल है कि वह टूटी-फूटी तो हैं ही साथ ही पूरी तरह जाम हो गई हैं। जाम नालियों में जगह-जगह कूड़ों का अंबार लगा है। नगर के महत्वपूर्ण स्थानों में बस स्टैंड की भी गिनती की जाती है, लेकिन नगर स्थित बस स्टैंड कूड़ों और कीचड़ों का ढेर बन चुका है। ऐसी जगहों से लोगों को आने-जाने के लिए कीचड़ में से होकर जाना पड़ता है। वहीं नगर के घनी बस्तियों में खड़ंजा, नालियों की सफाई आदि का टोटा दिख रहा है। नगर में बने शौचालय, पेशाब घर सफाई के अभाव में बास मार रहे हैं। ऐसे में नगर वासियों का कहना है कि नगर में पहले तो पेयजल की व्यवस्था करनी होगी। इसके बाद आधुनिक परिवेश को ध्यान में रख कर नगर का विकास करना होगा। नगर के गरीबों के विकास के लिए ठोस प्रयास की जरूरत है।

नगर पंचायत के विकास एवं समस्याओं के संदर्भ में नगर की अध्यक्ष सुनीता कमल का कहना है कि वह नगर के विकास के लिए समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए विकासशील कार्य करेंगी। मैंने नगर की गलियों की हालत अपनी आंखों से देखा है। जहां तक पेयजल, जल निकासी और सफाई की बात है तो यह सब मेरे ध्यान में हैं। इन समस्याओं को दूर करने के लिए यथासंभव प्रयास किया जाएगा। वहीं नगर के बंद पड़े शौचालयों और गलियों की टूटी नालियों, जाम नालियों की बात करते हुए श्रीमती कमल ने कहा कि समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए कार्य किया जाएगा। नगर को एक अच्छे और विकसित नगर के रूप में संवारने की, मेरी भी दिली इच्छा है। ऐसे में पुराने कार्यकाल में जो भी कार्य अधूरे रह गए हैं, उसे पूरा किया जाएगा।

बाजार में जाने से भी लोग कतराने लगे हैं


ऊर्जांचल के सबसे बड़े बाजार के रूप से विख्यात अनपरा बाजार का मेन आने जाने का तिराहा कूड़ा घर के रूप में तब्दील नजर आ रहा है। अनपरा बाजार तथा साप्ताहिक बाजार के अवशिष्ट पदार्थों से पटे अनपरा तिराहे से भयंकर बदबू के चलते वहा से गुजरने वालों के शरीर से सिहरन पैदा हो जाती है। रुमाल अथवा हथेलियों से नाक बंद करने के बाद भी सड़े मांस की मानिंद कूड़े से उठती बदबू के चलते लोगों ने बाजार में आना ही बंद कर दिया है।
अनपरा व्यापार मंडल के अध्यक्ष गोपाल गुप्ता ने आक्रोश जताते हुए कहा कि जिला पंचायत विभाग पर अनपरा बाजार से तहबाजारी वसूलने तथा साफ सफाई कराने की जिम्मेदारी है लेकिन पिछले कई माह से अनपरा बाजार में सफाई के रूप में एक धेला भी इधर से उधर नहीं किया गया है। बाजार निवासीयों ने कहा कि अगर अनपरा तिराहे के अलावा भी पूरे बाजार में दर्जनों स्थान कूड़े से पट गए है, आलम यह है कि लोगों को खुद अपने आसपास के सड़क की सफाई करनी पड़ती है। अनपरा बाजार में ही व्यवसाय करने वाले व्यापारियों ने गंदगी से नाक भौं सिकोड़ते हुए कहा कि बाजार का मेन तिराहा सहित अधिकांश भाग गंदगी से पट गया है। इसके चलते व्यापार भी प्रभावित हो रहा है। बाजार में दुकान चलाने वाले व्यक्ति ने कहा कि जिला पंचायत अधिकारी को खुद आकर अनपरा बाजार का हाल देखना चाहिए। कहा कि राजस्व की वसूली ही जिला पंचायत की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि साफ-सफाई कराना भी जिला पंचायत का दायित्व है। लोगों ने चेताया कि अगर शीघ्र गंदगी से पट चुके अनपरा बाजार की सफाई नहीं कराई गई तो गंदगी से पट चुकी नालियों का पानी ओवर फ्लो होकर लोगों के दुकानों तथा घरों में प्रवेश कर जाएगा।

अवैद्य खननकर्ताओं पर लगेगा गैंगेस्टर


  • पुलिस प्रशासन ने खननकर्ताओं की उड़ाई नींद।
  • दोषियों को चिह्नित करने में जुटी पुलिस।

पुलिस अधीक्षक ने क्षेत्राधिकारियों व प्रभारियों को खननकर्ताओं के खिलाफ गैंगेस्टर की कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। पुलिस प्रशासन का कड़ा रुख अख्तियार होने के बाद संबंधित लोगों में हड़कंप मच गया है। जिले में गत माह पूर्व हुए खनन हादसे के बाद से वैध-अवैध पत्थर और बालू की खदानें पूरी तरह से बंद रहीं। जिला प्रशासन अवैध तरीके से खदान संचालित करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह से सक्रिय है। बभनी थाना क्षेत्र के पांगन नदी में कुछ दबंगों द्वारा बालू का अवैध खनन किए जाने की सुचना पर पुलिस ने खननकर्ताओं की तलाश शुरू कर दी। मामले को गंभीरता से लेते हुए एसपी, सोनभद्र ने सभी सीओ, थाना व चैकी प्रभारियों को बिना अनुमति के खनन कराने की चेष्टा रखने वालों के खिलाफ गैंगेस्टर की कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। 

आलाधिकारी का कड़ा रुख अख्तियार होने के बाद प्रभारियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में होने वाले खनन का पता लगाने के साथ ही कार्रवाई के लिए दोषियों को चिह्नित करना शुरू कर दिया है। अचानक पुलिस की कार्यशौली में बदलाव आने से वर्षों से खनन करा रहे खननकर्ताओं में अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया है। एसपी का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने में मातहतों द्वारा जरा भी कोताही बरती गई, तो उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। पुलिस अधीक्षक ने ओबरा एसओ को तत्काल खनन हादसे में नामजद अभियुक्तों को गिरफ्तार करने का निर्देश दिया है। पुलिस अधीक्षक का कहना है कि कुछ अभियुक्त अरेस्टिंग स्टे लेकर घूम रहे हैं। दोषियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होगी। कहा कि कानून के साथ खिलवाड़ करने वाले तनिक भी बख्शे नहीं जाएंगे।

रविवार, 2 दिसंबर 2012

निजाम बदलने के साथ थानों पर दिखा असर


सूबे में बीएसपी के शासन के बाद अस्तित्व में आई सपा की सरकार में कई तरह के फेरबदल के साथ ही थानों के साइनबोर्ड पर हिंदी के साथ ही उर्दू लब्जों में थाने का नाम तथा सत्यमेव जयते लिखने का आदेश मिलते ही ऊर्जांचल के थानों पर ऊर्दू पेंटर की खोजबीन शुरू हो गई। मंगलवार को चमचमाते साइनबोर्ड पर उर्दू तथा हिंदी में थाने का नाम लिखा गया। स्थानीय लोगों में यह दिनभर चर्चा का विषय बना रहा।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

ब्रेकर निर्माण में सोनभद्र अव्वल


विगत वर्ष से ‘‘किलर रोड‘‘ की संज्ञा प्राप्त वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग पर  सड़क दुर्घटना रोकने के लिए ताषड़ तोड़ बनाए जा रहे ब्रेकरों की संज्ञा दिन दुनी रात चैगुनी रफ्तार से बढ़ने लगी है। एक सप्ताह के अन्दर जिला मुख्यालय से गुजरने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग पर आठ नये ब्रेकर बनाये जा रहे है अधिकांश कार्य भी पूरा हो चुका है। दैनिक पात्रियों की माने तो भारत में सर्वाधिक ब्रेकरों वाला नेशनल हाईवे वाराणसी-षक्तिनगर मार्ग बन चुका है। अकेले अनपरा थाना क्षेत्र में करहिया से लेकर ककरी खादान मोड़ तक कुल 10 किमी में 29 ब्रेकर बना दिये गये है। 

रोडवेज चालकों की माने तो राबट्र्सगंज के नव निर्मित ब्रेकरों को छोड़कर पूर्व में वाराणसी से बैठ़न तक 116 ब्रेकर थे। रोडवेज चालकों व कर्मचारियों की माने तो नेशनल हाईवे के नियमावली के मुताबिक ब्रेकर का स्लोप सही नहीं है। ब्रेकरों पर किसी प्रकार का निशान न होना भी दुर्घटना का कारण होता है। जानकारों के मुताबिक राष्ट्रीय राज्यमार्ग पर गति अवरोधकों का निर्माण राज्य सरकार की संस्तुति पर की जाती है। किसी भी ब्रेकर से 50 मीटर पूर्व संकेतकों के जरिए चालकों को सचेत करने के लिए बोर्ड गाड़ा जाता हैै। वाराणसी-शक्त्निगर मार्ग रेलवे क्रासिंग के अलावा कही भी ब्रेकर संकेतक बोर्ड नहीं लगाया गया है। दुर्घटना रोकने के लिए बनाए गये ब्रेकर दूसरी तरह के दुर्घटनाओें का सबब बनते जा रहे है। इसमे किसी अन्य को नहीं बल्कि वाहन चालकों को स्वनुकसान ज्यादा हो रहा है। रोडवेज चालक तो इतने खिन्न हो चुके है के वे इस रोड पर चलना ही नहीं चाहते। 

ऊर्जांचल में तेल की हेराफेरी



ऊर्जांचल में मिट्टी तेल व जन वितरण प्रणाली में उपलब्ध होने वाली राशन के गोलमाल का मामला उजागर होने के बाद जहाँ हेराफेरी करने वाले के पैरों तले जमीन खीसक गयी है वहीं इस मामले में लिप्त अधिकारियों की नीद हराम हो गयी है। राष्ट्रीय सहारा के मजबूत पहल के बाद तेल में हो रही हेराफेरी के बाद कई लोगों द्वारा जिलें में यह भी पता किया जा रहा है कि सालवेन्ट का थोक एवं फुटकर विक्री कहा और कितनी मात्रा में की जाती है। ऊर्जांचल में बड़े पैमाने पर केरोसिन तेल का कालाबाजारी की बात समाने आने पर इस मुद्दे पर कई कोटेदारो से जानकारी ली गयी पहले तो कोटेदार आना-कानी एवं इधर-उधर की बात बतायी जब उनसे यह पूछा गया कि विभिन्न परियोजनाओं में जारी किया गया राशन कार्ड पर मिलने वाले मिट्टी तेल एवं खाद्यय सामाग्री कितनी मात्रा में मिल रही है तो इस बाबत नाम न छापने की शर्त पर बताया पूरे मामले की जानकारी जिले स्तर के अधिकारी से मांगे। जब परियोजना कर्मी तेल व खाद्यान नहीं लेगें तो कोटेदार क्या उनके घर को पहुचा दिया करेगा? अगर सरकारी कोटे से मिलने वाली सामाग्री को कालोनी के रहवासी नहीं लेते है तो क्या मैं सामाग्रीयों को फेक दूँ? कई परियोजनाओं के सोसाइटी के लोगों द्वारा विभाग से पहले ही आग्रह कर इस पर रोक लगाने की मांग की थी। फिर न जाने यह तेल का खेल कब से होते चला आ रहा है। ज्ञात हो तेल को खपाने का काम अधिकांशतः पेट्रोल टंकियांे में किये जाने की चर्चा आम हो चली है। अनपरा व शक्तिनगर थाने में इस तरह के मामले कई बार सामने आये आपूर्ति विभाग द्वारा जांच एवं सेम्पेल लेकर लेब्रोटी में भेजा गया पर नतीजा क्या निकाला इसके बारे में कोइ बताने का तैयार नहीं है। आने वाले दिनो में मामले की जांच को लेकर कई राजनीतिक दल कसरत शुरू कर दी है। अब तो समय ही बतायेगा इस तेल के खेल में हो रही हेराफेरी को बन्द कराकर गरीब व नक्सल क्षेत्र में जनप्रतिनिधि कितना लाभ दिला पाता है।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

कौन लेगा इन रास्तों की सुध


काषी मोड़ तिराहा गंदगी से पटे होने के कारण आने-जाने वाले लोगों के लिए सिरदर्द बन गया है। आलम यह है कि सड़क के दोनों तरफ नाली का गंदा पानी रोड पर जमा होने से जहाँ राहगीरों को काफी समस्याआंे का सामना करना पड़ रहा है वही जनप्रतिनिधियों को ये गंदगी दिखाई नहीं देती। बरसात के समय में ये रास्ते और भी ज्यादा बजबजाने लगते है। वाराणसी से षक्तिनगर मुख्य मार्ग से होकर वाहनंे और आम नागरिक तक गुजरते है लेकिन इस मार्ग का सुध लेने वाला कोई नहीं है जिसके कारण इस मार्ग पर साईकिल एवं पैदल यात्रियांे को भी काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। प्रतिदिन सैकड़ों वाहन व पैदल यात्री अनपरा (काषीमोड़) से ही गुजरते है एवं अधिकाष जनप्रतिनिधि व नेता इसी अनपरा, काषीमोड़ पर ही रहते है लेकिन इन नेताओं की अनदेखी की वजह से  इस मार्ग पर पड़ी गंदगी की सफाई नहीं हो पा रही है। जिला पंचायत की तरफ से बाजार तथा अन्य जगहों पर पैसे की वसुली तो होती रहती है लेकिन साफ-सफाई पर इन लोगों के द्वारा ध्यान नहीं दिया जाता जिससे आम जनता को कुछ राहत पहुचाई जा सके। स्थानीय लोगांे ने काषीमोड़ तिराहे के पास साफ-सफाई व गड्डे को मिट्टी से पाटने के लिए अनपरा परियोजना प्रबंधन एवं जिला प्रषासन से मांग की हैं। 

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

कहुआ नाला श्मशान ओबी से पटा, शव फूंकने में दिक्कत


ऊर्जांचल का सर्वाधिक दाह-संस्कार वाला कहुआ नाला श्मशान की भूमि एनसीएल की ओबी (ओवर बर्डेन) से पटकर अपना वजूद खो चुका है। स्थानीय सम्भ्रान्त नागरिको की समिति ने इस शमशान की भूमि पर एक मंडप तथा शवदाह करने वाले स्थल के पक्के निर्माण कार्य पर लाखों खर्च किया था। आम लोगों के सहयोग से बने इस श्मशान भूमि का ओबी के विशालकाय सिल्ट आदि क्षेत्र में पड़ने से इसका अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। स्थानीय लोगों ने एनसीएल प्रबन्धन सहित जिला प्रशासन को पत्र लिखकर यहां के निवासियों के लिए शमशान को बचाने की गुहार लगाई थी। इस शमशान का अस्तित्व ओबी के सिल्ट से पटती जा रही है। आलम यह है कि लगभग दो वर्ष से यहां से बहने वाला कहुआ नाला पट गया इस वजह से यहां शव जलाना भी स्थानीय निवासियों ने बंद कर दिया। शव रखने का मंडप भी भारी-भरकम ओबी सिल्ट की चपेट में आने से धराशायी हो गया है। वर्तमान में भारी-भरकम चट्टानों के बीच से शमशान भूमि में कदम रखना ही जोखिम भरा हो गया है। एनसीएल ककरी परियोजना के महाप्रबंधक एसके झा ने बताया कि श्मशान वाली भूमि रेलवे की सरकारी भूमि है अभी इस मसले पर विभागीय जांच चल रही है शीघ्र ही जांच पूरी कर इस बारे में कोई निर्णय लिया जाएगा। लेकिन क्या पत्रा जब तक कोई सार्थक पहली की जायेगी तब तक शायद इस शमषान का अन्तिम संस्कार ओबी की बड़ी-बड़ी चट्टानों के हाथों हो चुका होगा। 

मनरेगा के कार्यों में गड़बड़ी


गांव में मनरेगा के कार्यों में कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। रही मृतकों को काम देने की बात तथा हिंदू जाबकार्ड पर मुसलमानों के नाम होने की तो यह सब कंप्यूटर फीडिंग में गड़बड़ी की वजह से हुई है। कागज में सब कुछ ओके है। मामले की जांच कराने के बाद ही सच्चाई का पता लगाया जा सकता है। शीघ्र ही पूरे मामले की जांच कर सच्चाई को उजागर किया जाएगा। रही बात हिंदू के जॉबकार्ड पर मुसलमान सदस्यों के नाम की तो यह वन विभाग द्वारा कराए गए कार्यों में गड़बड़ी की वजह से हुआ था। वन विभाग ने ही इन नामों का जोड़ा था। हिंदू के जाबकार्ड में मुसलिम भी, गांव में नहीं रहता है कोई भी मुसलिम परिवार। चोपन विकास खंड में मनरेगा कार्यों में बड़े पैमाने पर धांधली की जा रही है। यहां तक कि वर्षों पहले मर चुके लोगों से मनरेगा के तहत काम कराए जा रहे हैं। यही नहीं जाब कार्ड पर सदस्यों के नाम में भी हेराफेरी की जा रही है। विकास खंड के पिपरखाड़ गांव की यही स्थिति है। यहां हिंदू धर्मावलंबी ग्रामीण के जाबकार्ड पर सदस्यों में मुस्लिम नाम डाले गए हैं, जबकि गांव में मुस्लिम परिवार ही नहीं हैं। गांव में मृतकों से भी काम लिया गया है। प्रधान इसे कंप्यूटर की गड़बड़ी मान रहे हैं। ग्रामीण गरीबों को सौ दिनों का सुनिश्चित रोजगार मुहैया कराने के लिए चल रही मनरेगा योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। गांव में तेजू के नाम से जाब कार्ड संख्या यूपी 63-005-001-626 बनाया गया है। इनका इलाहाबाद बैंक में खाता संख्या 38055 है। इन्होंने आठ दिसंबर 2008, चैदह फरवरी 2009 को काम भी मांगा है, जबकि तेजू की तीन चार वर्ष पूर्व मौत हो चुकी है। इसी तरह मोतीलाल के नाम से जाब कार्ड संख्या यूपी 63-005-005-001ध्26 बनाया गया। इन्होंने नौ जून, 29 दिसंबर 2008, पांच जनवरी, बारह जनवरी, चैदह फरवरी को काम मांगा है, जबकि इनकी मृत्यु भी कई वर्ष पूर्व हो चुकी है। जाबकार्ड की अनियमितताओं की बात करें तो गांव के बहादुर के नाम से जाबकार्ड संख्या यूपी 63-005-005-001ध्664 बना है। इनके सदस्यों में गुलशन, इरफान, जाकिर आदि के नाम डाले गए हैं। इसी तरह उषा के नाम से जाबकार्ड संख्या 737 बना है। जाब कार्ड पर रामकेश, जितेन्द्र, कलावती के अलावा आज मुहम्मद, खुशबिंसी, नौराएकुद्दीन, हरीश आदि के नाम हैं। आज मुहम्मद ने काम भी मांगा है। गांव के ही अवध बिहारी के नाम से जाबकार्ड संख्या 774 बना है। इसमें अवध बिहारी के अलावा सदस्यों में अब्दुल कलाम, शामोहम्मद, अफसाना, फातमा आदि के नाम दिए गए हैं। अब्दुल कलाम, अफसाना, शामोहम्मद ने काम भी मांगा है। हिंदू घर में मुसलमान सदस्य हो सकता है लेकिन जब गांव में मुस्लिम परिवार ही नहीं हैं, तो कहां से सदस्य हुए यह समझ के परे है। यह पूरी लिस्ट इंटरनेट पर उपलब्ध है। बावजूद अधिकारियों की नजर इस ओर नहीं गई है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इसकी विस्तृत जांच कराई जाए तो बड़ी गड़बड़ी मिल सकती है।

विस्थापित काम न मिलने पर भड़के


सिंगरौली जिले के नौगढ़ इलाके में निर्माणाधीन अनिल धीरू भाई अंबानी ग्रुप (एडीएजी) के रिलायंस पावर प्रोजेक्ट के लिए बन रहे कन्वेयर बेल्ट का काम नहीं मिलने से नाराज विस्थापितों ने बुधवार की सुबह रास्ता रोकते हुए अन्य काम ठप करा दिया। विस्थापितों द्वारा आंदोलनात्मक कदम उठाए जाने की जानकारी के बाद कंपनी प्रबंधन के लोगों में खलबली मच गई। इसकी सूचना जिला प्रशासन के अधिकारियों के साथ पुलिस को दी गई। दोपहर 12 बजे के करीब पहुंचे सिंगरौली के तहसीलदार ने नाराज लोगों को भरोसा दिलाया की उनकी जायज मांगों को पखवारे भर के अंदर पूरा कर दिया जाएगा तब जाकर बात बनी और कंपनी का कार्य शुरू हो पाया। बताते हैं कि रिलायंस पावर अपने आवंटित कोल ब्लाक से पावर प्रोजेक्ट तक कोयला ले जाने के लिए कन्वेयर बेल्ट का फाउंडेशन आदि तैयार करा रहा है। इस कार्य को को संविदा कंपनी आईटीबी अंजाम दे रही है। इस बीच पड़ने वाले गांव अमलोरी, नौगढ़ व भकुआर के लोगों का कहना है कि कंपनी के लोग उनकी जमीन अधिग्रहण आदि से मसले को अभी तक नहीं सुलझा सकी है। ऊपर से विस्थापितों को कार्य नहीं देकर बाहरी लोगों को कार्य पर लगाया गया है। इन्हीं मुद्दों को लेकर पार्षद रामगोपाल पाल की अगुवाई में बुधवार की सुबह कई सौ विस्थापित कंपनी कार्यालय की तरफ जाने वाले मार्ग को जाम कर दिया और कंपनी के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। इसकी जानकारी होने के बाद तहसीलदार विकास सिंह मौके पर पहुंचे और लोगों को समझाना शुरू किया। काफी मशक्कत के बाद इस बात पर सहमति बनी पखवारे भर के अंदर विस्थापितों से जुड़ी सभी समस्याओं का हल निकाल लिया जाएगा। इस मौके पर रिलायंस व संविदा कंपनी के अधिकारी भी मौके पर मौजूद थे। बताया गया कि तहसीलदार विकास सिंह ने कंपनी के लोगों को दो टूक आदेश दे दिया है कि इनकी जायज समस्याओं का निस्तारण समयबद्व तरीके से किया जाए। आंदोलन की अगुवाई कर रहे रामगोपाल पाल से भी विस्थापित बेरोजगारों की सूची मांगी गई है ताकि सूची और वरीयता के हिसाब से लोगों को कार्य दिया जा सके। इस मौके पर जगप्रसाद, रामरक्षा, प्रहलाद व विजय पांडेय प्रमुख रूप से मौजूद थे।

चुनार किला

उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर मिर्जापुर जिले में विंध्याचल की पहाड़ियों में गंगा तट पर चुनार किला स्थित है। इसका प्राचीन नाम चरणाद्रि था। चैदहवीं शताब्दी में यह दुर्ग चंदेलों के अधिकार में था। सोलहवीं शताब्दी में चुनार को बिहार तथा बंगाल को जीतने के किए पहला बड़ा पढ़ाव समझा जाता था। शेरशाह सूरी ने 1530 ई. में चुनार किले को ताज खाँ की विधवा श्लाड मलिका से विवाह करके इस शाक्तिशाली किले पर अधिकार कर लिया। 1532 ई. में हुमायूँ ने चुनार किले पर कब्जे के इरादे से घेरा डाला परंतु चार महीने तक कडे़ प्रयास एवं घेरे के बाद भी सफलता हाथ न लगी। अंत में हुमायूँ ने शेरशाह सूरी से सन्धि कर ली और चुनार का किला शेरशाह के पास ही रहने दिया। 1538 ई. में हुमायूँ ने अपने चालाकी तथा तोपखाने की सहायता से छह महीनों के प्रयास के बाद चुनारगढ़ एवं उसके किले पर अधिकार कर लिया। अगस्त, 1561 ई. में अकबर ने चुनार को अफ्गानों से जीता और इसके बाद यह दुर्ग मुगल साम्राज्य का पूर्व दिषा में रक्षक दुर्ग बन गया। 

चुनार का दुर्ग सातवीं सदी के काल का निर्मित बताया जाता है। यह एक विशाल और सुदृढ़ दुर्ग है, इसके दो ओर गंगा बहती है तथा एक गहरी खाई है। यह दुर्ग चुनार के प्रसिद्ध बलुआ पत्थर का बना हुआ है और भूमि तल से काफी ऊँची पहाड़ी पर बना है। इसका मुख्य द्वार लाल रंग के पत्थर का है, जिस पर काफी कलात्मक नक्काशी की गयी है। किले के अन्दर गहरे तहखाने एवं रहस्यमय सुरंगें बनी हुई हैं। इस किले में कई स्मारक आज भी उसी दषा में है जैसे कि पूर्व में थी। इनमें कामाक्षा मन्दिर, भर्तहरि का मन्दिर, दुर्गाकुण्ड आदि प्रमुख रूप से प्रसिद्ध हैं। यहाँ की ज्यादातर प्रसिद्ध मस्जिद मुअज्जिन है, जिसमें मुगल सम्राट फर्रुखसियर के समय में मक्का से लाये हसन-हुसैन के पहने हुए वस्त्र सुरक्षित हैं। गुप्तकाल से लेकर अठारहवीं सदी तक के अनेक अभिलेख यहाँ से प्राप्त हुए हैं। मौर्यकालीन स्तम्भ चुनार के भूरे बलुआ पत्थर को तराशकर बनाये गये थे। अनुमान किया जाता है कि चुनार के आस-पास मौर्यकाल में एक बड़ा कला केन्द्र स्थापित था, जो मौर्य सरकार के सरंक्षण में काम करता था। चुनार में लकड़ी, चीनी मिट्टी, पत्थर एवं मिट्टी की सुन्दर कलात्मक वस्तुएँ उस समय बनती थीं। जो आज लगभग विलुप्त होती जा रही है।