शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

प्रदूषण नियंत्रण विभाग का परियोजनाओं से कैसा संबंध।


अधिकारी परियोजनाओं पर नकेल कसने में है असक्षम। 
चिमनियों से निकल रहा धुआं बीमारियों का बन रहा कारण। 
चिमनियों की उड़ती राख सेे जीना दुश्वार।
घर के बाहर कपड़े तथा गेहूं आदि सूखना भी हुआ मुश्किल।
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अनपरा में लगातार प्रदूषण से आजिज आम लोगों का कहना है कि चिमनियों से निकल रहे धुएं से लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। कोई ऐसा घर नहीं है जिसमें एक दो लोग दमा अथवा टीबी के रोगी न हो गए हो। कहा गया कि अगर शीघ्र प्रदूषण पर रोक नहीं लगाया जाता तो वह दिन दूर नहीं जब आम जनता सड़क पर उतर कर चिमनियों को ही बंद करने पर बाध्य होंगी। लोगों ने प्रश्न उठाया कि प्रदूषण नियंत्रण विभाग का आखिर परियोजनाओं से कौन सा संबंध है जिसकी एवज में अधिकारी इन परियोजनाओं पर नकेल नहीं कस रहे है। उनका कहना है कि प्रदूषण की वजह से उनकी दुकानें रसातल में मिलती जा रही है, प्रदूषण की वजह से अनपरा कालोनी से लेते हुए बाजार, गांव तथा दूरदराज के जंगल भी तबाह होते जा रहे है। लोगों ने मांग किया कि प्रदूषण से बीमार लोगों के चिकित्सा की व्यवस्था वातावरण को जहरीला बनाने वाली इन परियोजनाओं द्वारा किया जाना चाहिए। विस्थापितों ने देश के विकास के लिए अपनी संपत्ति देश को दे दिया लेकिन हम लोगों को विकास के नाम पर जहरीला वातावरण दिया जा रहा है जिसमें सांस लेने के लिए शुद्ध हवा, पीने के लिए शुद्ध पानी भी दुर्लभ हो गया है। 


पिछले दो दिसंबर, 2012 को अनपरा परियोजना के वीआईपी गेस्ट हाउस मेें विभिन्न परियोजनाओं के आलाधिकारियों तथा जिला प्रशासन तथा क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रक अधिकारी के साथ प्रदूषण को रोकने के लिए व्यापक स्तर पर बातचीत हुई थी। उसमें परियोजनाओें के अधिकारियों ने अपनी चिमनियों में लगी ईएसपी सिस्टम को अत्याधुनिक बताया था। लेकिन अनपरा में पिछले कुछ दिनों से आकाश से बरस रहे राख के बारीक कणों से लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। सड़क के किनारे रहने वाले तो परेशान है ही कालोनीवासी भी अजिज आ गए है। गंदे कपड़े को साफ करने के बाद बाहर सूखाने पर वे चिमनियों से आ रहे राख से और गंदे हो जा रहे है। दिन भर घर की सफाई करने के बाद सुबह उठने के बाद घरों पर गंदगी का सैलाब उमड़ा हुआ दिखता है। 

महत्वपूर्ण है कि सभी परियोजनाएं अपने सिस्टम को प्रदूषण मुक्त होने की दावा कर रही है जबकि प्रदूषण रुकने का नाम नहीं ले रहा है। इसकी जांच कौन करेगा कि प्रदूषण किस परियोजना से फैल रही है। दो दिसंबर को प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी ने भी तमाम वायदे किए तथा परियोजनाओं से क्रमिक रूप से प्रदूषण नियंत्रण की बात कहीं लेकिन सब हवा-हवाई साबित हो रहा है। परियोजनाओं से लेकर प्रदूषण पर लगाम लगाने वाली संस्थाएं खामोश है। 

प्रदेश सरकार अपने गुड वर्क को दिखाने के लिए जिस तरीके से पिछले दिनों आनन-फानन में बिजली परियोजनाओं को बिना तैयार हुए ही लोकार्पण की है इससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा है। चिमनियों की राख से छत पर कपड़े तथा गेहूं सूखाना दुश्वार हो गया है। कोई भी घरेलू वस्तु बाहर रखी जाती है तो सुबह तक वह धुंए के गर्द की वजह से गन्दी व पुरानी नजर आने लगती है। प्रदूषण की वजह से लगातार ऊर्जांचल खतरनाक स्थिति में पहुंचता जा रहा है। प्रतिवर्ष देश में प्रदूषण की भयावहता वाले औद्योगिक परिक्षेत्र सही होते जा रहे है जबकि ऊर्जांचल अब तो नौंवे से आठवें स्थान पर पहुंच चुका है।

प्रदूषण नियंत्रण की बेबुनियाद कवायद


उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए ईंधन के तौर पर कोयला, केरोसिन और लकड़ी के इस्तेमाल पर रोक लगाने का निर्णय लिया है। इसके लिए प्रदेश सरकार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पेट्रोलियम मंत्रालय से बातचीत कर रही है। दोनों से हरी झंडी मिलने के बाद तीनों पदार्थों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लग जाएगी। राज्य सरकार के इस कदम को सही ठहराया भी जा सकता है और नहीं भी। प्रश्न यह उठता है कि क्या ईंधन के तौर पर उपरोक्त तीनों पदार्थों के इस्तेमाल पर रोक लगने मात्र से प्रदूषण पर नियंत्रण हो जाएगा? क्या वास्तव में राज्य सरकार प्रदूषण नियंत्रण के लिए इतना प्रतिबद्ध है कि वह आम आदमी द्वारा ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने वाले अवयवों पर नियंत्रण लगाने की जरूरत महसूस कर रही है? अब बात करते हैं प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश नियंत्रण बोर्ड द्वारा पूर्व में उठाए गए कदमों के बारे में। 

वास्तव में प्रदूषण नियंत्रण के प्रति बोर्ड एवं राज्य सरकार पूरी तरह विफल रही है। चाहे मामला गंगा एवं यमुना नदी के प्रदूषण का हो या सुदूर सोनभद्र में रेणु नदी और रिहंद बांध का। वायु प्रदूषण और पर्यावरण के मामले में तो राज्य सरकार और राज्य प्रदूषण बोर्ड ने प्रदूषण फैलाने वाले अवैध औद्योगिक इकाइयों और क्रशर प्लांटों के संचालन के लिए खुलेआम पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के नियमों का उल्लंघन किया है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सोनभद्र में करीब सवा सौ अवैध क्रशर प्लांटों को नियमों के विरुद्ध अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ायीं। वहीं राज्य सरकार ने समाजसेवियों और पर्यावरणविदों की शिकायतों को कूड़े के छेर में डाल दिया और दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। 

जय प्रकाश एसोसिएट्स के मामले में तो राज्य सरकार और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड दोनों ने ही सुप्रीम कोर्ट के आदेशों समेत पर्यावरण संरक्षण के नियमों की धज्जियां उडाई हैं। गंगा प्रदूषण के मामले में तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अलग अपनी कार्ययोजना को अंजाम देने का मन बना लिया है, क्योंकि बोर्ड को बार-बार उच्चतम न्यायालय की फटकार सहनी पड़ रही है। कहने के लिए प्रदेश सरकार ने नई राज्य पर्यावरण नीति-2010 तैयार की है, जिसे कैबिनेट की मजूरी के बाद अमल में लाया जाएगा। लेकिन इसकी भी संभावना कागजों तक ही सीमित रहने की है, धरातल पर अमल की नहीं। राज्य सरकार गरीबों के पेट पर लात मारने की जुगत में लगी है। 

कोयला, केरोसिन और लकड़ी का ईंधन के रूप में उपयोग खासतौर पर गरीबों द्वारा किया जाता है। इनके इस्तेमाल पर रोक से इस वर्ग पर बड़े पैमाने पर प्रभाव पड़ेगा। राज्य सरकार रियायती दर पर एलपीजी कनेक्शन को उपलब्ध कराने की मांग कर रही है लेकिन भ्रष्टाचार के रूप में जकड़े तंत्र में यह संभव नहीं दिखाई देता है। गरीबी रेखा के नीचे जावन यापन करने वाले लाखों फर्जी राशन कार्डों के आगे गरीबों को इसका लाभ मिल पाएगा। यह दिखाई नहीं देता है। ईंधन के तौर पर कोयला, केरोसिन और लकड़ी के इस्तेमाल पर रोक से भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र द्वारा गरीबों का शोषण ही बढ़ेगा, प्रदूषण नियंत्रण की सही कवायद नहीं। गरीब तबके में इस्तेमाल होने वाले तीनों अवयवों पर रोक लगाने से पहले राज्य सरकार को सभी गरीबों को रियायती दर पर एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराने की जरूरत है। राज्य सरकार पहले इसे अंजाम दे। फिर ईंधन के तौर पर कोयला, केरोसिन और लकड़ी के इस्तेमाल पर रोक लगाए।     

रिहंद बांध के बाद भी गांवों में जल संकट: नगर पंचायत पिपरी


पेयजल के लिए 3.5 करोड़ रुपये की है जरूरत।
अहम मुद्दा पीपी एक्ट का बना हुआ है।
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ऊर्जांचल का गौरव यानी पिपरी नगर पंचायत जिले और प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। ऊर्जांचल की जननी रिहंद बांध भी यहीं बना हुआ है। इसके बाद भी पूरे नगर पंचायत में समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। यहां सबसे बड़ी समस्या पेयजल की दिखती है। सड़कें तो हैं ही नहीं, अहम मुद्दा पीपी एक्ट का बना हुआ है, जो यहां के रहवासियों के लिए गले का फंदा बना हुआ है। करीब तीस हजार की आबादी वाले नगर पंचायत में कुल 11 हजार मतदाता हैं। इस नगर पंचायत में विश्व का सबसे बड़ा कृत्रिम सागर पंडित गोविंद बल्लभ पंत सागर स्थापित है। इसके बाद भी यहां के रहवासियों को पेयजल के लिए किल्लत उठानी पड़ती है।

नगर में पांच करोड़ की लागत से अजगरी मुंह वाली पेयजल योजना आरओ सिस्टम बन कर तैयार तो हो गया, परंतु हस्तांतरण विवाद एवं संचालन को लेकर जल निगम एवं नगर पंचायत में खींचा-तानी लगी हुई है। आरओ सिस्टम बिना चलाए ही लाखों का बिजली बिल बकाया विभाग द्वारा भेज दिया गया है। वहीं पूरे नगर में सड़कों का हाल खस्ताहाल है। गड्ढायुक्त सड़कें स्वयं नगर की दुर्व्यवस्था को बयंा कर रही हैं। नगर के कई वार्डो में सड़क, नाली एवं स्ट्रीट लाइटें अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही हैं। सिंचाई विभाग ने अब तक नगर के 15 सौ लोगों के ऊपर पीपी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर रखा है। इससे निजात दिला कर यहां के रहवासियों को मौमिक अधिकार दिलाना भी सबसे बड़ी समस्या है। वहीं नगर में सफाई व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। आलम यह है कि सड़कों पर जगह जगह कूड़ों का अंबार लगा हुआ है। पेयजल, स्ट्रीट लाईट, सड़क, नाली, सफाई आदि यहां की मुख्य समस्या मुंह बाए नगर प्रशासन का बाट जोह रही हैं।

नगर के विकास के संदर्भ में नव निर्वाचित अध्यक्ष सावित्री सिंह का कहना है कि पीपी एक्ट राज्य सरकार के अधीन का मामला है। यहां के रहवासियों को इससे निजात दिलाने के लिए पूर्व में भी काफी प्रयास किए गए हैं, बस उसी को आगे बढ़ाना है। यहां के लोगों को पीपी एक्ट से निजात दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करूंगी। इसी क्रम में श्रीमती सिंह ने कहा कि नगर की जर्जर सड़कें तीन माह के अंदर बननी शुरू हो जाएंगी। पेयजल योजना को पूर्ण रुप से संचालित करने में 3.5 करोड़ की और आवश्यकता है। इसके लिए शासन को अवगत करा कर विकास कार्य किया जाएगा। इसके साथ ही साथ पेयजल संचालन करने के लिए कर्मचारियों की जरूरत है, क्योंकि पूरे नगर में अभी पाइप लाइन नहीं बिछ पाई है। ऐसे में पुरानी व्यवस्था को नयी परियोजना को जोड़ कर उन्हीं कर्मचारियों से आरओ प्लांट का संचालन कराने का प्रयास किया जाएगा। सभासदों के सहयोग से सफाई का कार्य कराया जाएगा। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त सफाई कर्मियों को भी लगाया जाएगा। बरसात में संक्रामक रोगों के पनपने का भय बना रहता है। ऐसे में नगर की जल्द से जल्द सफाई की जाएंगी। स्ट्रीट लाइट के लिए जलविद्युत निगम से सहयोग लेकर साडा के मार्फत स्ट्रीट लाइट लगाने का प्रयास किया जाएगा। मेरे ससुर स्वर्गीय काशीनाथ सिंह, जो नगर के पूर्व चेयरमैन रह चुके हैं उनके सपनों को साकार करूंगी।

जन वितरण प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाया आरोप


 जन वितरण प्रणाली
विकासखण्ड म्योरपुर के ग्राम पंचायत औड़ी में जन वितरण प्रणाली (सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों) को बी.पी.एल. एवं अन्त्योदय कार्डधारियों को शासन द्वारा आदेषित अतिरिक्त खाद्यान्न जो जनवरी से मई माह तक बाटना था। उसमें कोटेदारों द्वारा धांधली की जा रही है। उक्त जानकारी एवं अरोप औड़ी के  ने अपने ग्राम के दो कोटेदारों पर लगया है। उनका कहना है कि-
शक्ति आनन्द
ग्राम पंचायत सदस्य

ग्राम पंचायत औड़ी
वि० ख०- म्योरपुर  सोनभद्र 
"कोटेदारों द्वारा अतिरिक्त खाद्यान्न सिर्फ एक-दो माह ही बाटा गया है तथा इसकी सूचना सभी कार्ड धारको को ना होने का लाभ कोटेदार उठा रहे है। जिससे सरकार द्वारा संचालित जन वितरण प्रणाली में धांधली एवं भ्रष्टाचार हो रही है। उन्होंने यह भी बताया कि ग्राम पंचायत औड़ी के दो कोटेदारों द्वारा ना ही अपने कोटे पर खाद्यान्न के रेट और ना ही उनके स्टाक से सम्बन्धित कोई सूचना पट्ट पर अंकित नहीं किया जाता है। जो घोर अनियमितता दर्षाता है। जिससे बी.पी.एल. एवं अन्त्योदय कार्डधारी परिवार निराष है। "


वहीं ऊर्जांचल परिक्षेत्रों में ग्रामीणों के साथ क्षेत्र के कोटेदारों द्वारा की जा रही आंख मिचैली नें लोगेां के सब्र का बाधं आखिकार तोड़ ही दिया, कुलडोमरी ग्राम सभा के वैरपान, सिदहवां के कोटेदार के उपर ग्रामीणों ने समानों को कम वितरित करने, तथा निर्धारित धनराषी से अधिक से षुल्क की वसुली का आरोप लगाकर जिला प्रषासन को यथाषिघ्र कोटेदार के उपर कार्यवाही की मांग की है। सम्बन्धित षिकायत केा बार-बार दोहराये जाने का आरेाप लगाते हुए ग्रामीणांे ने बताया कि कोटेदार की षिकायत मनमाने लुट-खसेाट को कई बार सम्बन्धित अधिकरीयों से की जा चुकी है, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है, इस संदर्भ में उन्होनें मांग किया है कि, यदि उनके समस्याअेां का समाधान नहीं किया जाता है तो समस्त ग्रामीण इकठ्ठा होकर कभी भी कोटेदार के दरवाजे पर ताला जड़ सकते हैं। सुत्रों से जानकारी मिला है कि एक ड्रम तेल 150 से 200 रूपये सुविधा षुल्क के नाम से  लिये जाते है व गेहूँ चावल 50 रूपये कुंतल लिये जाने की बात कहीं जा रही है, कोटेदार करे भी तो क्या करे, जाहिर है यहां यही कहावत चरितार्थ होगी ‘‘अंधेर नगरी है, राजा यहां का चैपट है’’। 

पहाड़ियों के अस्तित्व पर अत्यधिक खनन से खतरा


पहाड़ियों पर आज भी अंकित है आदि मानवों द्वारा उकेरे चित्र।
खनन में अवैध तरीके से हो रहा है विस्फोटकों का प्रयोग। 
विकास के नाम पर पहाड़ियों पर हो रहा प्रहार।
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सोनभद्र जिले में स्थित पंचमुखी और चनाइमान जैसी पहाड़यों पर प्रागैतिहासिक कालीन चित्र गुफाए आज भी मौजूद हैं जो जिले में प्राचीन समय की धरोहर हैं। इनके संरक्षण के लिए शासन द्वारा समय-समय पर आदेश जारी किए जा चुके हैं, बावजूद इसके इन पहाड़ीयों पर हथौड़े और घन ही नहीं बल्कि पत्थरों के खनन कार्यो में विस्फोटकों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। अवैध रूप से हो रहे खनन को सही ठहराने के लिए जिला प्रषासन द्वारा विकास के नाम का सहारा लिया जा रहा है। बीते पंचमुखी पहाड़ी पर प्राचीन पंचमुखी महादेव का मंदिर स्थित है, जिसके पीछे ही आदि मानवों के हाथों से उकेरी गई चित्र शृंखलाएं अनमोल धरोहर के रूप में विद्यमान है। इसी प्रकार दुद्धी, बभनी, म्योरपुर और रेणुकापार इलाकों में विकास के लिए बनाई जा रही सड़कों में भी प्राचीन पहाड़ियों के पत्थरों को तोड़ कर खपाया जा रहा है। ठेकेदारों से इस संबंध में बात की गई तो वे इसके लिए विकास विभाग से जुड़े अधिकारियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कहते हैं कि यदि 52 फीसदी हिस्सेदारी अधिकारी लेंगे तो ठेकेदारों की मजबूरी हो जाएगी कि वे स्थानीय पहाड़ियों की गिट्टी-पत्थर और नदियों से बालू लेकर विकास के कार्यों में उसका प्रयोग करें।

पहाड़ों को तोड़ बिछाया जा रहा सीसी रोड पर


दलित मोहल्लों को चमकाने की कवायद हो रही पंचर
सड़क बनाने में पहाडों का चूरा हो रहा इस्तेमाल।
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प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना अंबेडकर ग्राम में सीसी रोड का निर्माण भ्रष्टाचार की भेट चढ़ गया है। ऊर्जांचल के कई अंबेडकर गांवों में दलित मोहल्लों को चमकाने की कवायद पंचर होती नजर आ रही है। सीसी रोड निर्माण में घटिया और लोकल बालू, बोल्डर से लेकर सीमेंट तक की खस्ताहाल सामग्री के प्रयोग से सीसी रोड बनने से पूर्व ही उखड़ रही है। अगर कायदे से जांच कराई जाय तो जनपद में मनरेगा के बाद सीसी रोड निर्माण में भी व्यापक भ्रष्टाचार मिल सकता है। बता दें कि अभी एक पखवारे पूर्व रणहोर में जिलाधिकारी वीवी पंत ने दौराकर निर्माण कार्यों का जायजा लिया था। इक्तफाक से जिलाधिकारी मौके पर नहीं गए नहीं तो हरिजन बस्ती में बन रहे सीसी रोड निर्माण की पोल खुल सकती थी। इसके बाद भी आरईएस विभाग के अधिकारी नहीं चेते तथा भारी भरकम स्थानीय पहाड़ों के बोल्डरों को लाकर रोड पर ही घन तथा हथौड़ा से तोड़कर चूरा बनाया जाता है जबकि पेमेेंट खदानों के भाव से होता है। रणहोर के हरिजन बस्ती में तो अति हो गई है यहां सीसी रोड बनाने मेें जिस कदर सारे गुणवत्ता तथा मानकों की धज्जियां उड़ाई जा रही है उसे देखने वाले भी आश्चर्य चकित हो जाते है कि आखिर इन लोगों पर कार्रवाई क्यो नहीं हो रही है। इसके अलावा वन कर्मियों के सहयोग से ऊर्जांचल के कीमती पहाड़ों को भी स्वाहा कर इन निर्माणाधीन सीसी रोड़ को बनाने में लगा दिया जा रहा है।

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

करोड़ों खर्च के बाद भी समस्याएं जस की तस: नगर पंचायत ओबरा


नगर के विकास के मद में नगर पंचायत प्रबंधन द्वारा पिछले वर्षों में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाया, लेकिन नगर में मूलभूत समस्याएं आज भी जस की तस बनी हैं। राजनीतिक गोटी सेकने की आड़ में मुख्य बाजारों सहित अन्य बस्तियों में नालों पर हुए अतिक्रमण से पानी निकासी बड़ी समस्या बनी हुई है। नगर पंचायत कर्मचारियों की शिथिलता के कारण साफ सफाई की व्यवस्था नदारत है। 

नगर पंचायत क्षेत्र में जगह-जगह कूड़ों का अंबार बारिश के पानी के साथ सड़कर बजबजाने का दृष्य आम है। हालांकि नगर पंचायत क्षेत्र का दो तिहाई हिस्सा परियोजना कालोनी के अंतर्गत आता है, जिसकी साफ सफाई एवं जल निकासी की व्यवस्था सिविल प्रबंधन द्वारा समय समय पर दिया जाता रहा है। लेकिन सिर्फ एक तिहाई हिस्से में बसे वीआईपी रोड, चोपन रोड, चूड़ीगली, सिनेमा रोड, राम मंदिर कालोनी एवं झुग्गी झोपड़ियों का हाल आज भी बेहाल बना हुआ है। 

सबसे ज्यादा वीआईपी रोड व चोपन रोड पर स्थित नगर का सिविल लाइन का दर्जा प्राप्त कर चुका हनुमान मंदिर तिराहे से सभी बाजारों में नालों पर अतिक्रमण किए जाने से नालों की सफाई नहीं हो पा रही है। जिससे पहली ही बारिश में नाले उफान मारकर व्यवसायियों के प्रतिष्ठानों एवं घरों में नाले का गंदा पानी घुस जाना हर वर्ष की समस्या है। जिसे लेकर व्यवसायी कई बार हलाकान भी हो चुके है। 

इसके अलावा नगर की सबसे बड़ी समस्या पेयजल की किल्लत है। कई हैंड पाइपों के खराब होने की स्थिति में आज भी टैंकरों से पानी सप्लाई किया जा रहा है। हालांकि प्रकाश की व्यवस्था कालोनी क्षेत्र के अपेक्षा अन्य क्षेत्रों में नाकाफी है। लेकिन यह समस्या उतनी बड़ी नहीं है, जितनी पेयजल व अतिक्रमण तथा साफ सफाई का है। 
वर्तमान नगर पंचायत अध्यक्ष दुर्गावती देवी ने कहा कि नगर की समस्याओं से हम भलीभांति अवगत हैं। नगर की साफ-सफाई, पेयजल के लिए टंकी निर्माण व अन्य जटिल समस्याओं को दूर करने का हर संभव प्रयास किया जाएगा। चूंकि नालों की साफ सफाई पिछले कई वर्षों से नहीं हुई हैं, जिससे नालों से बारिश के पानी का निकासी नहीं हो पा रही है। व्यवसायियों को विश्वास में लेकर नालों की सफाई का काम जल्द कराया जाएगा।

नीम-हकीम बेधड़क बेच रहे दवा


झोलाछाप चिकित्सकों पर नहीं हो रही कार्रवाई
मुख्यालय पर नीम-हकीमों की भरमार
स्वास्थ्य विभाग कार्रवाई में हीलाहवाली कर रहा
राबर्ट्सगंज में सजी जड़ी बूटी की दुकान।

जनपद-सोनभद्र में लगातार झोलाछाप चिकित्सकों की लापरवाही से हो रही मौतों के बाद भी स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी नीम-हकीमों के ऊपर कार्रवाई करने में हीलाहवाली कर रहे हैं। राबर्ट्सगंज नगर में नीम हकीमों द्वारा अस्थायी कैंप लगा कर विभिन्न रोगों की दवाइयां खुलेआम बेची जा रही हैं। बावजूद इसके संबंधित अधिकारियों की उनके ऊपर नजर नही पड़ रही है। बता दें कि एक दशक में जिले में छोलाछाप चिकित्सकों, वैद्यों एवं शोखाओं के झांसे में आकर करीब सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। विगत वर्षो में झोलाछाप चिकित्सक एवं ओझाओं के चक्कर में म्योरपुर विकास खंड के डडिहरा, सोढ़ा के अलावा रेणुका पार के भाठ इलाकों में दर्जन भर से अधिक लोग काल के गाल में समा गए। लगातार मौत होेने से जिला प्रशासन हिल गया था। स्वास्थ्य टीमों को कई दिनों तक गांवों में कैंप करना पड़ा था। सीएमओ डा. जीके कुरील के निर्देश पर एक अधिकारी ने कुछ झोलाछाप चिकित्सकों के ऊपर मुकदमा भी दर्ज कराया है। पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर उन्हें जेल भेजा। अधिकारियों द्वारा दक्षिणांचल में लगातार घर बैठे वैद्य बने लोगों एवं प्राइवेट चिकित्सकों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है लेकिन दूसरे प्रांत से नीम-हकीम आकर मुख्यालय पर कैंप लगाकर लाउड स्पीकर से प्रचार कर सांडा के तेल समेत अन्य दवाइयां खुलेआम बेेच रहे हैं। नीम-हकीमों के पास दवा लेने वालों की भीड़ लग रही है। बावजूद इसके इन महानुभावों के ऊपर संबंधित अधिकारियों की नजर नही पड़ रही है।

मोबाईल व टावर कई भयानक बिमारियों को भी जन्म दे रहा है।


क्षेत्र मंे लगे विभिन्न कम्पनीयों के मोबाईल टावर अपने प्रारम्भिक समय में बेहतर सेवा प्रदान कर अब लोगों को रूलाने लगी है। महंगा होने के चलते प्रारम्भीक वर्षों मंे मोबाईल सेवा सुलभ नहीं थी मगर टेलीकाम कम्पनियों द्वारा ग्राहको को लुभाने की दौड़ में व दर कम करने से यह सबके जीवन का अभिन्न अंग बन गया है स्थिती यह है हम इसके बगैर जीवन के बारे में सोच भी नहीं सकते विभिन्न टावरों के छमता से ज्यादा कनेक्सन धारक होने के चलते फोन मिलना मुस्किल होता जा रहा है। जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका मोबाईल व उसका टावर कई भयानक बिमारियों को भी जन्म दे रहा है। वैज्ञानिकों की रिसर्च बताती है कि मोबाईल टावर व बिजली परियोजना के आस-पास का वातावरण तेजी से विद्युत चुम्बीय प्रदूषण की चपेट में आ रहा है। अन्य प्रदूषण की तरह यह दिखाई तो नहीं पड़ता मगर यह मानव षरीर के नाजुक व प्राकृतिक ऊर्जां तंत्र को अस्त-व्यस्त कर षरीर की प्रतिरोधक क्षमता को क्षीण करता है इतना ही नहीं हाई बोल्टेज के तारों के गुजरने वाले रास्तें के बस्तीयों पर भी इसका प्रतिकुल असर पड़ने की बात बतायी गयी है।

विद्युत चुम्बीय प्रदूषण को जन्म देने वाले महत्वपूर्ण कारकों की खोज में लगे वैज्ञानिकों ने बताया कि ‘‘हाई बोल्टेज के तार, मोबाईल टावर, मोबाईल पर लम्बी बातचीत, फ्रिज, माईक्रोवेव, ओवन, वेक्यूम क्लीनर, बाल सुखाने का यंत्र, खदानों से पानी फेकने की बड़ी मोटर, फूड प्रोसेसर, कम्प्यूटर, टेजीविजन, विडियों गेम, फोटो कापी मषीन, हीटर, इलेक्ट्रानिक वायर व अन्य विद्युत संचालित यंत्र है।’’ चूंकि यह प्रदूषण कुछ दषकों में ही फला-फूला है लेकिन इसके लम्बे परिणाम काफी घातक हो सकते है। हालाकि वैज्ञानिक मोबाईल फोन से मस्तिक कैंसर की बात को नकार रहे है जबकि कुछ खोज इस सम्भावना पर ही चल रही है। बताया जाता है कि जब पहली बार ‘‘सिगरेट पीने से फेफड़ों के कैंसर की बात आयी थी तो बवाल मच गया था। सिगरेट कम्पनियाँ पैसों के दम पर इस मामले को दबाना चाहती थी परन्तु असफल रही। लोगों का अनुमान है कि वह समय दूर नहीं जब मोबाईल पर वैधानिक चेतावनी लिखी जाने लगी कि ‘‘पाॅच मिनट से अधिक मोबाईल पर बात करना हानिकारक हैं। आज मोबाईल का इस्तेमाल न करने वालों का क्लब अमेरिका में चल रहा है। विष्व में न्यूजीलैंड पहला देष है जिसनें स्कूल के विकलांगों व उसके आस-पास मोबाईल टावर को प्रतिबंधित कर रखा हैं। मोबाईल फोन से वाहन दुर्घटना मंे जबजस्त बढ़ोत्तरी हुई। भारत सहित कई देषों ने वाहन चलाते समय मोबाईल प्रयोग पर प्रतिबंध लगा चुका हैं। क्योकि वाहन चलाते समय मोबाईल का प्रयोग करने से मस्तिक्स पर विद्युत चुम्बीय प्रभाव दस गुना अधिक रहता है। न्यूजीलैंड के विष्वविद्यालय ने मोबाईल इस्तेमाल से षरीर में मिनरल, हार्माेन, कैल्षियम आदि तत्वों के असंतुलन की बात कहीं। 

विद्युत चुम्बीय क्षेत्र से होने वाली बिमारी व लक्षण
थकान, सिरदर्द, तनाव, बालों का झड़ना, बेचैनी, थापराईड ग्रंथी की समस्या, असमय बुढ़ाता, अल्जाइमर, पार्किसन्स, कोषकीय क्षरण, इत्यादि इसके प्रमुख लक्षण है इसके अलावा यादाष्त, अनिद्रा, मुहं व मस्तिक का कैंसर, हृदय रोग, किडनी की समस्या, स्थायी रूप से ले सकती हैं। इस नये प्रदूषण से मुक्ति के लिए हमंे मोबाईल फोन से सम्पर्क कम रखना होगा। छः मिटन से ज्यादा बात नहीं करनी होगी। अगर मोबाईल मे सिग्नल कम हो तो बात नहीं करनी चाहिए क्याकि ऐसे समय फोन के विद्युत चुम्बीय क्षेत्र का घनत्व सबसे अधिक होता है। बस, ट्रेन में चलते समय फोन पर सिंग्नल सबसे अधिक होता है। खड़ी गाड़ी में चुम्बकीय क्षेत्र सबसे अधिक होता है जो आस-पास के लोगों केा भी प्रभावित करता है। वैज्ञानिक भाषा में ‘‘फराडे केज’’ प्रभाव कहते है। हाई टेंषन तार के निचे बात करना मौत को दावत देना है, मुम्बई के बाद्रां स्टेषन पर एक लड़के की मौत ने इसे साबित भी कर दिया है।

मिठाई संग डिब्बे का भी दाम


  • मिठाई के साथ डिब्बे की भी कीमत वसूल रहे विक्रेता।
  • बाट माप मानक की उड़ाई जा रही है धज्जियां।

सोनांचल में मिठाई विक्रेता मिठाई के साथ डिब्बे की भी कीमत वसूल रहे हैं। यही नहीं सब्जी विक्रेता से लेकर सोनारों की दुकानों तक घटतौली पहुंच गई है। पेट्रोल पंपों पर कम पेट्रोलियम देने को लेकर प्रायः किचकिच होती है बावजूद इसके जिले का बाट माप विभाग मौन है। इससे प्रतिदिन सैकड़ों ग्राहकों को चूना लग रहा है। एक तरफ तो शासन द्वारा व्यापक प्रचार प्रसार के माध्यम से लोगों को जागरुक करने का प्रयास किया जा रहा है और जागों ग्राहक-जागों के कषीदे पढ़े जा रहें है। लोगों को घटतौली से सावधान रहने, कैसे कैसे घटतौली होती है इसको बताया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ घटतौली को लेकर बाट माप विभाग लापरवाह बना हुआ है। विभागीय लापरवाही की वजह से ही सोनांचल में घटतौली आम बात हो गई है। मिठाई की दुकानों पर मिठाई के संग डिब्बों को तौला जा रहा है, वहीं सब्जी विक्रेता अभी भी पत्थरों की बाट बना कर सब्जियां तौल रहे हैं। अंतिम बार दुकानदारों के बाट की जांच कब की गई थी यह दुकानदारों को भी नहीं मालूम है। घटतौली की शिकायत पर दुकानदार सीधे पैसे देने की बात कह देते हैं। पेट्रोल पंपों पर भी कम पेट्रोल और डीजल की माप की जा रही है। बावजूद इसके लोगों की सुनने वाला कोई नहीं रह गया है। जनपद में तीनों तहसील हैं सभी के लिए अलग अलग कार्यालय होने का प्रावधान है लेकिन जनपद में घोरावल और राबर्ट्सगंज तहसील में बाट की माप करने की जिम्मेदारी एक कार्यालय पर है। राबर्ट्सगंज स्थित कार्यालय पर तैनात निरीक्षक पूरे सप्ताह क्षेत्र भ्रमण पर रहते हैं। कार्यालय पहुंचने पर उपस्थित कर्मचारियों द्वारा सिर्फ बुधवार को निरीक्षक के बैठने की बात की जाती है। ऐसे में लोगों को समझ में नहीं आता है कि वे अपनी शिकायत कहां करें। एक कार्यालय दुद्धी में भी है। यहां भी कमोबेश यही स्थिति है। विभाग का प्रधान कार्यालय वाराणसी में हैं। यहां से अत्यंत दूरी होने की वजह से ही जनपद के अधिकारी मनमानी पर उतारू हैं। इसका खामियाजा उपभोक्ताओं का भुगतना पड़ रहा है। 

मनरेगा में सीबीआइ जाँच की परवाह नहीं !


विकासखण्ड-म्योरपुर के ग्राम पंचायत औड़ी में मनरेगा के तहत बन्धी निर्माण के कार्य में मजदूरों की बजाय जेसीबी मसीन एवं ट्रैक्टर का प्रयोग किया जाना मनरेगा में भ्रष्टाचार की बात सही साबित कर रही है। यह सुचना सुभाष चन्द्र, क्षेत्र पंचायत सदस्य एवं शक्ति आनन्द, ग्राम पंचायत सदस्य ने दी। उन्होंने बताया की ग्राम पंचायत औड़ी के प्रधान द्वारा स्व. रामप्यारे के खेत में कराये जा रहे बन्धी निर्माण के कार्य में मजदूरों की बजाय जेसीबी मसीन एवं ट्रैक्टर का प्रयोग कर मनरेगा में कार्य पिछले एक स्प्ताह से सम्पादित किया जा रहा है तो हमने मौके पर स्थल पर पहुँचकर कार्य को देखा एवं वहा कार्य में लगे हुए लोगों से कार्य के विषय में पूछ-ताछ की तो पता चला कि बन्धी निर्माण का कार्य कराया जा रहा है तथा उक्त कार्य पिछले एक सप्ताह से प्रगति पर है। पंचायत मि़त्र अनिल यादव व ग्राम प्रधान द्वारा यह कार्य कराया जा रहा है, उक्त जेसीबी मषीन ग्राम प्रधान की ही है। ज्ञात हो कि मनरेगा अधिनियम के तहत मनरेगा के कार्यो में मशीनों का प्रयोग वर्जित है। जो अधिनियम में निहित है। उक्त की लिखित षिकायत जिलाधिकारी, सोनभद्र को फैक्स द्वारा प्रेषित की जा चुकी है। 

क्यों कम्पनियाँ कतराती है मेडिकल सूविधा उपलब्ध कराने से


कम्पनियों में काम करने वाला मजदूर अपना खुन पसीना एक कर कम्पनी को हर माह करोड़ों का लाभ कमा कर देता है, इस बाबत कम्पनी खुस होकर दावा करती है कि कम्पनी हर मजदूर के लिए हर सुविधाए उपलब्ध करायी जायेगी। लेकिन जब मजदूर कार्य के दौरान घायल हो जाता है, तब वहीं मजदूर कम्पनी के लिए बोझ बना जाता है इस स्थिति में कम्पनी किसी भी तरीके से अपना पीछा छुड़ाने में लगी रही है। कम्पनियों के द्वारा मजदूरों का उपेक्षा इतनी हद तक बढ़ गयी है कि कम्पनियों में लगातार स्थिति बिगड़ती जा रही है। मजदूरों को अपने हक के लिए दर-दर की ठोकरे खानी पड़ रही है। 

ज्ञात हो कि लैंकों परियोजना के अधिनस्त कार्य करा रही टेप्रो सिस्टम में कार्य कर रहे मजदूर राम सजीवन चैबे कार्य के दौरान गढ़ढा में उतर रहे थे तभी अचानक से पैर फिसलने से गिर पड़े और हल्की सी खरोच लग गयी कार्य समाप्त होने के बाद जब वह अपने घर आये तो उनके एक पैर में सूजन हो गयी थी। अपने इस सूजन एवं लेगे चोट को दिखाने के लिए अपने पड़ोस के छोला-छाप डाॅक्टर के पास गये डाॅक्टर ने कार्य के दौरान लगे चोट को देखा और कहा ये एक फोड़ा है यह एक-दो दिन मंे ठीक हो जायेगा। डाॅक्टर ने उन्हे कुछ दवाये लिखी और इंजेक्सन लगाते कहा कि आप ठीक हो जायेगें। दूसरे दिन जब स्थिति ज्यादा खराब होने लगी तो इस उम्मीद में वे स्थानीय सरकारी चिकित्साल मंे इलाज के लिए गये, अच्छे डाॅक्टर उनका इलाज कर जल्द ही कर देगें, सरकारी अस्पताल के डाॅक्टर ने घाव को देखते ही कहा कि यह तो सेप्टीक है मैं आप को कुछ दवाये व इंजेक्सन लिख देता हूँ इसे आप किसी डाॅक्टर से लगवा लेना जो दवाये आप को दी जा रही हैं उनकों आप ठीक टाईम से खा लिजीएगाँ। तीसरे दिन जब घाव में काफी ज्यादा मात्रा में सूजन के साथ ही उनके पेट और गले में भी सूजन दिखने लगी इस कारण से उनको सांस लेने में परेषानी आने लगी तो रात में 12 बजे गाड़ी बुक कर वाराणसी के लिए रवाना हुए। 

जानकारी के अनुसार वाराणसी में लगभग एक माह से अपना ईलाज करा रहे राम सजीव चैबे को काफी आर्थिक एंव षारिरिक छती उठानी पड़ी, इस बिमारी के दौरान हुए घाव ने उनको लगभग पूरी तरह अपाहिज बना दिया है। परिवार का बड़ा पुत्र अपने पिता के इलाज के लिए वाराणसी के कई अस्तपालों का चक्कर काटने के बाद एक निजी अस्पताल में अपने पिता का इलाज करा रहे संदीप चैबे अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए एक छोटी सी दुकान चलाते है लेकिन पिता की बिमारी ने इस दुकान को भी बन्द करा दिया है। जिससे उनके सामने भूखों मरने की स्थिति बन चुकी है। चैबे जी जिस कम्पनी के अन्दरगत् कार्य कर रहे थे उस कम्पनी द्वारा हाथ खड़ा कर लिए जाने के बाद स्थिति और भी चिन्ताजनक हो गयी है। जब कि उनका इलाज लगातार जारी है डाॅक्टरों के द्वारा काफी पैसों की मांग आये दिन होती ही रही है। उनके साथ काम करने वाले अन्य मजदूरों द्वारा कम्पनी के पीएम के पास इस बात की सूचना दे दी गयी है कि चैबे जी कार्य के दौरान चोट लगने से काफी दिनों से बिमार चल रहे इस कारण से अपने कार्य पर नहीं आ पा रहे, लेकिन कम्पनी के आलाधिकारी इस बात को मानने लिए तैयार नहीं है। इसी क्रम में अनपरा परियोजना में कार्य करने वाले मजदूर सोनू कुमार निवासी डिबुलगंज कार्य के दौरान गम्भीर रूप से घायल हो गया संविदा कम्पनी द्वारा तत्काल किसी निजी चिकित्सालय में भर्ती कराया लेकिन भर्ती कराने साथ ही कम्पनी अपने जिम्मेदारियों से भागने लगी। 

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

ग्रामीणों ने किया रोजगार के लिए आवेदन


 ग्राम पंचायत औड़ी में ग्राम पंचायत सदस्य शक्ति आनन्द द्वारा मनरेगा के तहत बकाया मजदूरी, रोजगार आवेदन, एवं नये जाॅब कार्ड बनाने के सम्बन्ध में ग्रामवासियों के बीच ग्राम औड़ी के सुभाषनगर में एक बैठक की गई। जिसमें मनरेगा के तहत कराये गये विभिन्न कार्यों में मजदूरों की बकाया मजदूरी के आकड़े एवं उनके द्वारा मौखिक बयान एकत्रित किए गए एवं उक्त बकाया मजदूरी को शीघ्र ही भुगतान कराने के लिए प्रयास करने का आष्वासन मजदूरों को दिया। 

शक्ति आनन्द
शक्ति आनन्द द्वारा सभा में सैकड़ो मजदूरों का मनरेगा के तहत कराये जाने वाले कार्यो में रोजगार के लिए रोजगार आवेदन फार्म भरे गये व 15 दिन के भीतर मजदूरों को काम दिलवाने की बात कही गई। उन्होंने बताया की ज्यादातर मनरेगा मजदूर अषिक्षित होने के कारण कागज पर रोजगार आवेदन नही करते, जिससे उन्हें इस योजना का केन्द्र सरकार की मंषा के अनुरूप सही लाभ नहीं मिल पाता है, और वे बेराजगारी भत्ता के पात्र होने से भी वंचित हो जाते है। उन्होंने आष्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि पुरे सोनभद्र में पिछले पंचवर्षीय में न तो कही बेरोजगारी भत्ता मजदूरों को प्राप्त हुआ है और ना ही ज्यादातर मजदूरों ने रोजगार आवेदन फार्म भरकर रोजगार मांगा है, जबकि मनरेगा के कार्यो में मजदूर कभी भी रोजगार के लिए रोजगार आवेदन फार्म भरकर रोजगार मांग सकता है। इस सभा में नये जाॅब कार्ड बनाने के लिए आवेदन फार्म भी भरे गए एवं उन्हे भी जल्द ही पंचीकृत कराकर पात्रों को देने की बात कही गई।

आदिम युग सा जीवन जीने के लिए मजबूर कई गाँव के लोग।


जनपद-सोनभद्र के जिला मुख्यालय से सैकड़ों किमी दूर पहाड़ों पर स्थित कई गाँव हाईटेक प्रगति के दौर में भी आदिम युग सा जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। इन गांवों के कई बड़े बच्चों ने अब तक पक्का रोड नही देखा है। गांव के घरों तक आज भी बिजली नहीं पहुंची है, जिसके कारण ये गांव आदिम युग में है, पीने व नहाने के पानी के लिए नालों व चुआडत्रों का सहारा है। गाँव के लोगों का कहना है कि कई परिवारों के पास राशन कार्ड ही नही है तथा राशन लेने के लिए भी उन्हें दस-ग्यारह किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, जहां से अपने पीठ पर या साईकिल पर लादकर राशन लाना पड़ता है। गांव में स्वास्थ सुविधा के नाम पर कोई प्र्याप्त व्यवस्था भी प्रशासन द्वारा नहीं की गई है। 

हर ओर से छले जा रहे हैं किसान


विगत साल मानसून के देर से आने की वजह से किसान धान की रोपाई हीं कर पाए। मानसून आया तो अब किसानों को समितियों से खाद और बीज नहीं मिल रहा है। ऐसे में किसानों को बाजार से ऊंचे दामों में खाद और बीच खरीदना पड़ रहा है। कुछ समितियों पर यदि खाद और बीज मिल भी रहा है तो वह भी चयनित कुछ ही किसानों को। छोटे किसानों को तो कोई पूछने वाला ही नहीं है। हकीकत यह है कि समितियों का गोदाम खाली न होने की वजह से खाद और बीज नहीं मंगाया जा रहा है। जिले में 72 सहकारी समितियां हैं। इसमें 67 समितियां काम कर रही हैं। कुछ समितियों पर खाद-बीज उपलब्ध है। ज्यादातर समितियों के गोदाम खाली ही नहीं है। ऐसे में खाद रखने के लिए जगह ही नहीं है। किसानों को समय पर खाद और बीज नहीं मिलना कोई नई बात नहीं है। समय बीत जाने के बाद समितियों पर खाद आती है। सिर्फ समिति पर चयनित किसानों को ही खाद-बीज मिल रहा है। जो किसान समिति से नहीं जुड़े हैं, उनकी बाजार से खाद-बीज खरीदना मजबूरी है। दुद्धी क्षेत्र में आधा दर्जन समितियां हैं, यहां खाद आई लेकिन कुछ लोगों को ही मिला, किसान समितियों का चक्कर लगाकर वापस चले जा रहे हैं, खाद-बीज की समस्या पर किसानोें से बात करने पर उनका दर्द झलकने लगा। एक सवाल पर ही कई समस्या गिना गए, बताया कि प्रशासन का भी सहयोग नहीं मिल रहा है, दस बोरी खाद की जगह एक बारी मिल रही है। नहर भी चालू नहीं की गई है, किसानों को सुविधाएं नहीं मिलने से परेशान हैं, जरूरत भर की खाद और पानी ही नहीं मिल रहा है, जब जरूरत होती है तब खाद नहीं मिलती है, समिति केवल दिखाने के लिए बनी है। नहर में पानी नहीं आने से नर्सरी सूख रही है। विभाग की मनमानी भी किसानों पर भारी पड़ती है, अधिकारी समय से खाद-बीज की व्यवस्था नहीं कर पाते। बाजार के बीज में मिलावट की संभावना बनी रहती है, कुछ बीजों में कलर डालकर उसकी किस्म बदल दी जा रही है। बीज केंद्रों पर पर्याप्त बीज नहीं है, इसके साथ ही जो किस्म किसानों को चाहिए वह नहीं मिल पा रहा। 

किलर रोड़

किलर रोड़ के नाम विख्यात वाराणसी-षक्तिनगर मार्ग पर सैकडों दुर्घटनाओं में लोगो की जान जाने के बाद अनपरा मेें पुलिस द्वारा लगाये गये सड़क सुरक्षा की दृष्टि से जगह-जगह लगाये गये गति अवरोधकों को वाहन चालकों ने कही भी सुरक्षा के लिए लगे ड्रमों को सुरक्षित नहीं रहने दिया है। ज्ञात हो कि पुलिस एंव नागरिकों की पहल पर बार-बार हो रही दुर्घटना रोकने के लिए जनसहयोग से हर 500 मीटर पर गति अवरोधक लगाकर दुर्घटना पर अंकुष निष्चित तौर से लगाया गया, परन्तु कोयला से लदें ओवर लोड वाहन ज्यादा ट्रीप लगाने के चक्कर में लगाये गये गतिअवरोधकों की धज्जिया उड़ाकर पुलिस व आम जनता के सड़क सुरक्षा के मंसूबों पर पानी फेर रही है। स्थानीय लोगो ने मांग किया है कि जिस वाहन से सुरक्षा के लिए लगे गति अवरोधकों को ध्वस्त किया जायेगा उसे पता कर दण्डित किया जाना चाहिए। 

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

खनन क्षेत्र में मजदूरों की मौत के मामले में प्रशासन की भूमिका


विंध्य क्षेत्र खासकर सोनभद्र के खनन क्षेत्र में हो रही मजदूरों की मौत के लिए प्रशासन की भूमिका संतोषजनक नहीं हैं। सोनभद्र के जिला खान अधिकारी कार्यालय के आंकड़ों की मानें तो उत्तर प्रदेश उप खनिज (परिहार) नियमावली 1963 के प्रावधानों के तहत कुल 269 खनन पट्टे स्वीकृकृत हैं। बुनियादी तौर पर खान विभाग के आंकड़े वास्तविकता से कोसों दूर हैं। 

बिल्ली, मारकुंडी, डाला, चोपन, बारी, रासपहाड़ी, सलखन, खैराही, सुकृत, घोरावल, पकरहट, बहुअरा आदि खनन क्षेत्र का निरीक्षण करने पर इनकी तादात हजारों में है जो पूरी तरह अवैध हैं। खनिज पदार्थों के परिवहन में भी खनन माफियाओं द्वारा बड़े पैमाने पर राजस्व चोरी की जा रही है, फिर भी प्रशासन मौन है। अवैध परिवहन की बात कई बार जिला प्रशासन के छापे में सामने आ चुकी हैं। खनन क्षेत्र में अवैध खनन की पुष्टि जिला खान अधिकारी भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं, खनन क्षेत्र में हो रही ताबड़तोड़ मौतों और अवैध खनन के बाद भी जिला प्रशासन राबर्ट्सगंज तहसील के अन्तर्गत खनन के लिए बकायदा टेंडर जारी कर पट्टा आवंटन को अंजाम दे रहा हैं। 

वैध खदानों की आड़ में अवैध खनन व परिवहन कर रहे खनन माफियाओं पर अंकुश लगाने में असफल प्रशासन की कारगुजारियों के कारण खनन क्षेत्र में मजदूरों की मौतों में इजाफा हो रहा है। विंध्य क्षेत्र में अवैध खनन और परिवहन पर यथाशीघ्र अंकुश लगाने की जरूरत है। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब आदिवासियों की लोक संस्कृति इतिहास के पन्नों में ही पढ़ने की मिलेगी।

पत्थर की खदानों में क्यों जान गंवाते हैं मजदूर ?


विंध्य क्षेत्र का सोनभद्र, मिर्जापुर, चन्दौली, सिंगरौली (म0प्र0), गढ़वा (झारखंड), भभुआ (बिहार) आदि जनपद आदिवासी बहुल जनपद है। विंध्य क्षेत्र में निवास करने वाले ज्यदातर आदिवासी-दलित परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। इन परिवारों में शिक्षा और सरकारी योजनाओं के प्रति जागरुकता का घोर अभाव है। साथ ही क्षेत्र में कल-कारखानों की स्थापना के बाद विस्थापन और भूमिहीनता का दंश झेल रहे आदिवासियों, परंपरागत वन निवासियों, दलितों समेत मजलूमों के सामने रोजगार का सबसे बड़ा संकट खड़ा है। 

तकनीकी क्षेत्र में कुशलता का अभाव, सरकार की वादा खिलाफी और भ्रष्टाचार में डूबी नौकरशाही के चलते विंध्य क्षेत्र के निवासियों के सामने रोटी की जुगाढ़ की समस्या, सुरसा के मुह की तरह खड़ी है। बेरोजगारी, जिम्मेदारी और लाचारी से बेहाल विंध्य क्षेत्र बाशिदों के लिए मौत का कूआं बन चुकी पत्थर, बालू, मोरम आदि की अवैध खदानें अपने और अपने परिवार के पेट में लगी आग को शांत करने के जुगाड़ के रूप में सहायक सिद्ध हो रही है। 

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना समेत केन्द्र और राज्य सरकार की अन्य योजनाएं भ्रष्ट नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों की वादाखिलाफी के कारण विंध्य क्षेत्र के परिवारों को राहत नहीं दे पा रही हैं। इन कारणों के चलते बेबश एवं लाचार विंध्य क्षेत्र के गरीब पत्थर, मोरम और बालू की खदानों में दम तोड़ने को मजबूर हैं।

पत्थर की खदानों में काम करते समय परिवार के दोनों व्यक्तियों की कब मौत हो जाए और पूरा परिवार दाने-दाने को मोहताज हो जाए, इस बात का भय पूरे परिवार को हमेशा सालता रहता है। खनन माफिया पुलिस की मिलीभगत से पूरे मामले को ही रफा-दफा कर देते हैं। पत्थर की खदानों में मरने वाले सैकड़ों मजदूरों के परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गये हैं और भूखमरी की कगार पर हैं। अगर समय पर इन परिवार के सदस्यों को रोजगार और सरकारी योजनाओं की सहायता नहीं मिली तो विंध्य क्षेत्र में भूखमरी और कुपोषण से मरने वाली संख्या में इजाफा हो सकता है ।

क्यों होती हैं अक्सर ये दर्दनाक मौतें ?


यह एक पहेली है, फिर भी पूर्व में हुई मौतों के कारणों पर गौर करें तो तीन बातें प्रमुख रूप से सामने आती हैं-

पहलाः-विंध्य क्षेत्र की पत्थर की खदानों में काम करने वाले अधिकतर मजदूर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के उन परिवारों के होते हैं जो गरीबी का दंश झेल रहे होते हैं। जंगलों में निवास करने वाले भूमिहीन आदिवासी एवं पारंपरिक वन निवासी मजदूर पत्थर, मोरम, मिट्टी, बालू, कोयला आदि की खतरनाक खदानों में विस्फोटक पदार्थों के इस्तेमाल और खनन के लिए प्रशिक्षित नहीं होने के कारण मौत का कूआँ बन चुकी पत्थर की खदानों में जरा-सी चूक पर अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठते हैं। विंध्य क्षेत्र की पत्थर की कई खदानें 50 मीटर से लेकर 200 मीटर तक गहरी हो चुकी हैं। इन खदानों में काम करना अप्रशिक्षित मजदूरों के लिए शेर की माद में घुसने के बराबर है।

दूसराः-विंध्य क्षेत्र में डोलो स्टोन, सैंड स्टोन, लाइम स्टोन, कोयला, बालू, मोरम आदि का अकूत भंडार है। इन खनिज पदार्थों के दोहन के लिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के माफियाओं और सफेदपोशों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। सत्ताधारी पार्टियों के नुमाइंदे बनकर मलाईदार मंत्रालयों की कुर्सी सम्भाल रहे कुछ सफेदपोशों ने विंध्य क्षेत्र से धन उगाही के लिए बकायदा अपने एजेंटों को तैनात कर दिया है और शासन के मानकों की धज्जियां उड़ाकर अवैध खनन एवं परिवहन को बढ़ावा दे रहे हैं। 

भ्रष्टाचार के आंकठ में डूबी नौकरशाही और सफेदपोशों के चलते खनन माफियाओं ने पूरे विंध्य क्षेत्र में अराजकता का माहौल पैदा कर दिया है। खनन माफिया विंध्य की पहाडयिों पर खुलेआम अवैध खनन करवा रहे हैं। साथ ही खनन विभाग द्वारा जारी एमएम 11 परमिट के बिना मिट्टी, मोरम, बालू, बोल्डर आदि का परिवहन करवा रहे हैं। इन बातों की पुष्टि जिला प्रशासन द्वारा गठित टीम के छापेमारी में भी आए दिन होती रहती है।

पत्थर की खदानों के लिए शासन द्वारा निर्धारित मानक को खनन क्षेत्र में कोई भी खदान संचालक पूरा नहीं करता है। खनन क्षेत्र में मौत का कूआं बन चुकी पत्थर की गहरी खदानों में सुरक्षा के कोई भी इंतजाम नहीं है। खदान अथवा क्रशर प्लांट को जाने वाले रास्ते तारकोल और खड़ंजा युक्त नहीं है। ना ही किसी पत्थर की गहरी खदान के चारों ओर बाउंड्री वाल बनाया जाता है। सुरक्षा के इन इंतजामों के अभाव में मजदूरों की मौत बड़े पैमाने पर हो रही है। 

तीसराः-अवैध खनन और परिवहन को रोकने के लिए जिला प्रशासन ने टास्क फोर्स की टीमें गठित की है, लेकिन ये टीमें औपचारिकता मात्र बन कर रह गयी है। समाज सेवियों की बार-बार शिकायत पर कभी कभार ये टीमें खनन क्षेत्रों में छापा मारती है तो बड़ी मात्रा में अवैध खनन और परिवहन का मामला प्रकाश में आता है। टीम द्वारा औपचारिकता पूरा करते हुए अवैध क्रशर प्लांट व बिना एमएम 11 की परमिट वाले वाहनों को सीज किया जाता है। इसके कुछ ही घंटों बाद खनन व परिवहन माफियाओं के प्रभाव के चलते सीज वाहन सड़कों पर दौड़ने लगते है और क्रशर प्लांट क्षेत्र में शोर मचाते हुए जहर उगलने लगते हैं। इतना ही नहीं जिला प्रशासन की उदासीनता और सत्ता में बैठे सफेदपोशों की शह के चलते खनन माफिया अब खान विभाग की टीम पर हमला भी बोलने से नहीं डरते हैं। 

विंध्य क्षेत्र खासकर सोनभद्र जनपद के खनन क्षेत्रों में पूर्वांचल के माफियाओं की दखलदांजी ने मजदूरों समेत अन्य मजलूमों की मौतों में इजाफा कर दिया है। जनपद में हो रही हत्याओं के प्रति जिला प्रशासन की उदासीनता और खनन माफियाओं के डर से खनन क्षेत्र में हो रही मौतों की सच्चाई बोलने में हर व्यक्ति खतरा महसूस कर रहा है। इसके चलते पुलिस महकमा खनन क्षेत्र में हो रही हत्याओं को दुर्घटना करार देकर सच्चाई का दम घोट रहा है।

मौत का कुआं बन चुकी पत्थर की अवैध खदानों में दम तोड़ रहे आदिवासी


हर दिन एक मौत, फिर भी प्रशासन मौन

गरीबी, बेरोजगारी, जिम्मेदारी और लाचारी से बेहाल विंध्य क्षेत्र के आदिवासियों का अस्तित्व खतरे में है। लाल किले पर अपनी अनोखी लोकनृत्य कला ’करमा’, ‘झूमर’ आदि का लोहा मनवा चुके आदिवासियों की मौत का कूआँ बन चुकी पत्थर की खदानों में दम तोड़ रही है। विंध्य पर्वत श्रृंखला की गोद में आबाद सोनभद्र, मिर्जापुर, चन्दौली और सिंगरौली (मध्य प्रदेश) जनपद की पत्थर की खदानों में हर दिन एक व्यक्ति की औसत दर से मौत हो रही है। मरने वालों में अधिकतर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के होते है। उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल जनपद सोनभद्र में ही आदिवासियों एवं परंपरागत वन निवासियों के आकड़े चैकाने वाले है। इस पिछड़े एवं अति नक्सल प्रभावित जनपद के खनन क्षेत्रों में हर माह एक दर्जन की औसत दर से आदिवासियों एवं परंपरागत वन निवासियों की मौत हो रही हैं। अगर इन आकड़ों में दलितों और मजलूमों की मौत की संख्या जोड़ दें तो खनन क्षेत्र में ही मौतों का आकड़ा हर दिन एक व्यक्ति की मौत के आकड़े को पार कर जाएगा ।

सिर्फ मीडिया रिपोर्टों की बात करें तो सोनभद्र के विभिन्न खनन क्षेत्रों में  साल में एक सप्ताह के दौरान आधा दर्जन लोग काल के गाल में समा चुके होते है। विदित कुछ साल पहले ओबरा थाना क्षेत्र के रासपहाड़ी स्थित एक अवैध पत्थर की खदान में टीपर पलट गया, इस घटना में 24 वर्षीय टीपर चालक की मौत हो गई। उसी दिन चोपन थाना अन्तर्गत डाला स्थित पत्थर की एक खदान में दो दिन पूर्व घायल हुए 27 वर्षीय मजदूर की भी मौत हो गई, वह राबर्ट्सगंज कोतवाली क्षेत्र के रघुनाथपुर का निवासी था। ओबरा थाना अन्तर्गत बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र की एक पत्थर की खदान में काम करते समय एक मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गया, उसे खदान संचालक घायल अवस्था में लेकर गायब हो गए। भदोही जनपद के कपसेठी निवासी 42 वर्षीय पेटी ठेकेदार डाला पुलिस चैकी क्षेत्र के काशी मोड़ स्थित खनन क्षेत्र की पहाड़ी पर पैर फिसल गया और वह मौत का कूआं बन चुकी पत्थर की खदान में गिर गया, इससे उसकी मौत हो गयी। मध्य प्रदेश के बैढ़न थाना अन्तर्गत पवर गांव निवासी 30 वर्षीय एक व्यक्ति ट्रक पर खलासी का काम करता था। वह ट्रक के साथ डाला खनन क्षेत्र स्थित एक क्रशर प्लांट में गिट्टी लोड करने गया। ट्रक के डाला में सोते समय उसके ऊपर पोकलैन से गिट्टी लोड कर दी गई। इससे उसकी मौके पर ही मौत हो गयी। खनन क्षेत्र में ताबड़तोड़ हुई मौतों के बाद भी अवैध खदान संचालकों के प्रति जिला प्रशासन का रवैया उदासीन बना हुआ है। 

जिला प्रशासन की इसी रवैये के कारण पूर्व में भी कई मौतें हो चुकी है। ओबरा थाना अन्तर्गत बिल्ली- मारकुंडी खनन क्षेत्र में 11,000 वाट के विद्युत तार की चपेट में आकर एक मजदूर की मौत हो गयी। मिर्जापुर के लालगंज थाना अन्तर्गत पंतनगर निवासी ट्रैक्टर चालक राबर्ट्ससगंज कोतवाली क्षेत्र के सकृत खनन क्षेत्र में बोल्डर लदे ट्रैक्टर को लेकर गन्तव्य को जा रहा था। अचानक ट्रैक्टर-ट्राली बेकाबू होकर एक पत्थर की खदान में पलट गया, इसमें चालक की मौत हो गयी। दुद्धी कोतवाली अन्तर्गत रन्नो गांव निवासी 32 वर्षीय मजदूर चोपन थाना क्षेत्र के बारी स्थित एक पत्थर की खदान में ड्रिलिंग का काम कर रहा था। अचानक एक बड़ा पत्थर उसके ऊपर गिर गया जिससे उसकी मौत हो गयी। ओबरा थाना अन्तर्गत बैरपुर निवासी 30 वर्षीय मजदूर और राबर्ट्सगंज कोतवाली क्षेत्र के खैराही गांव निवासी अपने कुनबे का खर्च चलाने के लिए मौत का कूआं बन चुकी पत्थर की खदान में काम करने बिल्ली-मारकंडी खनन क्षेत्र में गया। बिल्ली-मारकुंडी स्थित एक पत्थर की खदान में वह अपने भाई के साथ काम कर रहा था। अचानक दोनों पैलोडर की चपेट में आ गए, दोनों की मौके पर ही मौत हो गयी। घोरावल थाना क्षेत्र के मझली-हिनौती गांव निवासी अपने माता पिता के बुढ़ापे का सहारा 24 वर्षीय पुत्र अमिलौधा गांव स्थित एक अवैध मोरम की खदान में भगवान को प्यारा हो गया। उसके ऊपर मोरम का ढुहा गिर गया और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया। चोपन थाना क्षेत्र के पटवध गांव के पास बोल्डर लदा ट्रैक्टर-ट्राली पलट गयी। इस दुर्घटना में भटवा टोला निवासी 20 वर्षीय युवक की मौत हो गयी। अन्य दो मजदूर भी गम्भीर रूप से घायल हो गये। पन्नूगंज थाना अन्तर्गत किरहुलिया ग्राम सभा के कटरी टोला निवासी दो सगे भाइयों समेत एक और व्यक्ति कटरी टोला के पास जंगल वन विभाग की जमीन पर बन रहे चेकडैम में खुदाई करते समय उनके ऊपर मिट्टी का टीला गिर गया, इससे उनकी मौत हो गयी। डाला पुलिस चैकी क्षेत्र के बारी स्थित एक अवैध पत्थर की खदान में ट्रैक्टर-ट्राली पलटने से ट्रैक्टर चालक की मौत हो गयी। इस घटना के कुछ दिनों पहले बारी खनन क्षेत्र के ही अन्य पत्थर की खदान पत्थर का टीला गिरने से दो मजदूरों की भी मौत हुई थी। डाला पुलिस चैकी क्षेत्र के ही काशी मोड़ स्थित एक अवैध पत्थर की खदान में पत्थर की टीला गिरने से पन्नूगंज थाना क्षेत्र के दिनारे गांव निवासी व चोपन थाना अन्तर्गत मारकुंडी ग्राम सभा के कुशहिया टोला निवासी की मौत हो गयी। साथ ही अन्य पांच मजदूर गम्भीर रूप से घायल हो गये। 

इस हादसा के पूर्व भी चालू वर्ष में अवैध पत्थर की खदानों में दर्जनों दुर्घटनाएं हुई हैं जिसमें सैकड़ों मजदूरों के सांस की डोर टूट गयी। काशी मोड़ स्थित पत्थर की खदान में हुआ विस्फोट इनमें से प्रमुख घटना है जिसमें तीन मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गयी और दर्जनों मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गये थे। इस घटना के कुछ दिनों पूर्व ही बारी स्थित पत्थर की एक खदान में संदिग्धावस्था में महिला का शव मिला था। इसके अतिरिक्त बारी स्थित स्टोन क्रशर प्लांट के डग में ट्रैक्टर-ट्राली पलटने से मुस्लिम युवक की मौत, कोठा टोला स्थित क्रशर प्लांट के डग की दीवार ढहने से तीन मजदूरों की मौत, काशी मोड़ स्थित की खदान में ट्रैक्टर-ट्राली पलटने से चालक की मौत हो गई। 

इस सरीखी दर्जनों घटनाएं खनन क्षेत्र में घट चुकी हैं। ये वे घटनाएं हैं जो मीडिया के माध्यम से आम जन तक पहुंची। इसके अलावा खनन क्षेत्र में अन्य सैकड़ों मौतें होती है जिनका पता मीडिया प्रतिनिधियों को नहीं हो पाता है। कुछ का पता हो भी पाता है तो पुलिस इन मौतों का अन्य कारण बताकर मामले को रफा-दफा कर देती है। भ्रष्टाचार के आंकठ में डूबे जिला प्रशासन की उदासीनता और जनप्रतिनिधियों की वादा खिलाफी ने मजदूरों में भय पैदा कर दिया है । एक के बाद एक हो रही आदिवासियों समेत मजलूमों की मौतों की सच्चाई कोई भी बोलने को तैयार नहीं है
(घटनाओं में मृतकों के नाम नहीं दर्षाये गये है। )

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

खूनी खदाने-लाषों के ढेर पर हो रहा सोनभद्र में खनन।


सोनभद्र स्थित लगभग 300 खदानों में मृत्यु और दुर्घटनाओं का ताण्डव चल रहा है, परन्तु प्रषासन सिर्फ इसकी लीपापोती और सौदेबाजी में व्यस्त है। इस बात का पता इसी बात से चलता है कि जहाँ समाचार पत्र विगत तीन सालों में मृत्यु की संख्या दर्जनों में दर्षाते है वही आरटीआई द्वारा मांगे जाने पर शासन सिर्फ 3 ही मौत की पुष्टि करता है। सोनभद्र के खनन क्षेत्रों में जहाँ आधी अवैध खदानें है वही डीजीएमएस के नियमों की धज्जियाँ उड़ायी जा रही है। गैर कानूनी रूप से कृषि क्षेत्र में प्रयोग लाये जाने वाली ट्रैक्टर जो कि डीजीएमएस के वाहन चार्ट में नहीं आता और अमोनियम नाइट्रेट हजारों टनों में प्रयोग किया जा रहा है। विदित हो कि आमेनियम नाइट्रेट राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबन्धित बारूद है परन्तु यह टनों की मात्रा किसी भी क्रषर प्लोट पर देखा जा सकता है। जो गाहे-बगाहे नक्सलियों के हाथ भी लग जाता है। नियमों की यह अनदेखी नक्सलवाद और ज्यादातर मौत की वजह है। 

बिड़ला प्रबन्धतंत्र द्वारा षिक्षालयों पर सरकारी आदेष लागू नहीं होते।


बिड़ला प्रबन्धतंत्र अपने तानाषाही रवैये के लिए, वैसे ही जनमानस के बिच विख्यात है। जहाँ हिण्डालकों इण्डस्ट्रीज एवं उससे सम्बद्ध रेणुपावर कं. रेणुसागर वर्षो से कर्मचारियों की हितों की सदैव अनदेखी करती रही है। सूत्रों कि माने तो प्रतिष्ठान में कार्यरत कर्मचारी रोजी-रोटी छिन जाने के भय से ना कभी अपनी आवाज उठा पाये, और ना प्रबन्धतंत्र के तानाषाही रवैयें के खिलाफ अपने मूल अधिकार के प्रयोग करने का दुस्साहस जुटा पाये। जिसने भी कभी ऐसा कदम उठाया उसे कम्पनी के उत्पीड़न का षिकार होना पड़ा। दि पायनियर की कलम के सामने एक नजारा प्रस्तुत हुआ। जो बाल-हित में केन्द्र सरकार द्वारा चलाये जा रहे महत्वाकांक्षी योजना मध्यान्ह भोजन (मिड-डे-मिल) जैसे अभियान को हिण्डालकों प्रबन्धन द्वारा  खुले आम षिक्षा विभाग के आदेषों का उलंघन कर चुनौती दी है। बेसिक विद्यालयों के तर्ज पर सरकार द्वारा माध्यमिक विद्यालयों में कक्षा 6 से 8 तक के बच्चों के लिए विद्यालय में ही मध्यान्ह भोजन (मिड-डे-मिल) योजना का प्रवधान किया है। इस सम्बन्ध में आज से चार माह पूर्व जिला विद्यालय निरीक्षक, सोनभद्र द्वारा सोनभद्र के बारह राजकीय इण्टर कालेजों एवं तेरह वित्तपोषित इण्टर कालेजों के प्रधानाचार्यो को योजना का अक्षरषः पालन करने के लिए आदेषित किया गया था। जिला विद्यालय निरीक्षक, सोनभद्र के आदेष का पालन करते हुए सारे विद्यालयों ने बैंकों में मध्यान्ह भोजन (मिड-डे-मिल) के लिए खाता खोल दिया है। परन्तु अब तक आदित्या बिड़ला इण्टर कालेज, रेणुकूट एवं आदित्या बिड़ला इण्टर कालेज, रेणुसागर ने अपना खाता में मध्यान्ह भोजन (मिड-डे-मिल) के लिए अब तक नहीं खोला है, और ना ही षिक्षा विभाग के अधिकारी के आदेष पर भी इस अभियान में कोई दिलचस्पी दिखाई। एक बात का खुलासा और कर देना मुनासिब है कि दोनों विद्यालयों में आयोग द्वारा चयनित प्राधानाचार्य है, जो हिण्डालकों प्रबन्धतंत्र की उपेक्षा के षिकार है और जिनका वजूद रबर की मोहर तक ही सीमित है। कलम पकड़ी हुई कलाई प्रबन्धतंत्र की फौलादी उगंलियों में कैद है। क्या षिक्षा विभाग इन षिक्षालयों को प्रबन्धतंत्र के तानाषाही रवैयंें से कभी निजात दिला पायेगा ? आवम को इन्तजार है। 

महिला सुलभ काम्पलेक्स की मांग तेज


उर्जान्चल के सबसे बड़े व्यस्ततम एवं भीड़-भाड़ वाले चैराहों में से एक ग्राम सभा-औड़ी के नेहरू चैक पर आज तक किसी भी प्रषासनिक संस्था द्वारा कोई भी सार्वजनिक महिला शौचालय/मुत्रालय के निर्माण न कराये जाने के सम्बन्ध में ग्राम पंचायत सदस्य औड़ी के शक्ति आनन्द ने उपरोक्त समस्या को दृष्टिगत रखते हुए, ग्रामीणों एवं क्षेत्रवासियों की हित के लिए श्रीमान जिलाधिकारी, सोनभद्र को पंजीकृत डाक द्वारा प्रेषित कर ग्राम सभा औड़ी में स्थित तिराहे (नेहरू चैक पर एक महिला शौचालय/मुत्रालय के निर्माण की आवष्यकता के लिए पाँच बिन्दूवार कारकों से अवगत कराया है। 

शक्ति आनन्द ने बताया कि नेहरू चैक वाराणसी-षक्तिनगर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 75 ई पर स्थित है जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों पैदल यात्रीयों रोडवेज बसों, सवारी वाहनों एवं स्कुल, महाविद्यालय के बच्चों के साथ-साथ स्थानीय निवासियों का आवागमन होता है। जिसमें महिलाओं बच्चों वृद्धों की संख्या अधिक होने के कारण उन्हें इस तिराहे पर शौचालय मुत्रालय न होने की स्थिति में काफी समस्या, असुविधा व परेषानी का सामना करना पड़ता है, साथ ही उपरोक्त चैराहे पर उर्जान्चल का सबसे बड़ा साप्ताहिक बाजार जो प्रत्येक सप्ताह के गुरूवार को लगता है उसमें हजारों क्षेत्रवासी व ग्रामीण अपने निज उपयोग की वस्तुएँ यहाँ खरीदारी करने आते है। जिसमें महिलाओं की संख्या अधिक होती है। 

साथ-साथ प्रतिदिन इस तिराहे से क्षेत्र के दो महाविद्यालय व दो षिक्षण संस्थानों के आवागम का मुख्य मार्ग होने के कारण इस तिराहे से महाविद्यालय विद्यालय के छात्र-छात्राओं का आवागमन प्रतिदिन होता है। इस तिराहे पर ग्राम सभा औड़ी का मुख्य स्थायी बाजार मार्केट होने के कारण वयस्तता व लोगों की आवाजाही अधिक होती है जिसके लिए इस तिराहे पर एक महिला शौचालय/मुत्रालय के निर्माण आवष्यक है। अन्यथा कि स्थिति में किसी महिला/परूष को लघुषंका/दिर्घषंका की स्थिति में इस तिराहे पर कोई भी सर्वाजनिक शौचालय/स्थल की उचित व्यवस्था व साधन नहीं होने की स्थिति में बहुत असुविधा दिक्कत व परेषानी उठानी पड़ती है। पहले कभी उक्त के विषय में किसी भी जनप्रतिनिधि द्वारा कोई पहल नहीं की गई है। अतः इस पहल से शक्ति आनन्द युवा समाज सेवी पंकज मिश्रा सतीष दूबे प्रिन्स शर्मा एवं ग्रामीण क्षेत्रवासी जनता श्रीमान जिलाधिकारी, सोनभद्र से सहयोग के लिए अपेक्षित कार्यवाही की आषा कर रहे है।

साफ-सफाई न के बराबर, तहबाजारी वसूली जोरो पर

शक्ति आनन्द

औड़ी मोड़ पर लगने वाले सप्ताहिक बाजार की साफ-सफाई एवं गन्दगी को लेकर लोग खासें नाराज है। ग्राम पंचायत सदस्य, ग्राम पंचायत औड़ी के शक्ति आनन्द ने आरोप लगाया जिला पंचायत द्वारा तहबाजारी के नाम पर लाखों रूपये की राजस्व वसूली की जाती है। परन्तु साफ-सफाई के नाम पर वसूली करने वाला एवं विभाग को सांप सूंघ जाता है। बार-बार आग्रह करने पर भी उनके कान पर जूँ नहीं रेंग रहा है। आनन्द ने यह भी धमकी दिया कि समय रहते जिला पंचायत के द्वारा वैद्य या अवैद्य वसूली करने वाला नहीं चेता तो औड़ी बाजार से तहबजारी की वसूली नहीं करने दी जायेगी।

इस सम्बन्ध में शासन प्रषासन से लेकर तहबाजारी वसूलने वाले को कई बार लागो ने ध्यान आकर्षित कराया पर वह सूनने को तैयार नहीं। इतना ही नहीं जिला पंचायत द्वारा निर्धारित रेट पर न तो वसूली की जाती है ना ही बाजार में कही रेट के सम्बन्ध में बोर्ड लगाया गया है। जिसके कारण वसूलीकर्ता व्यापारियों से दबंगई के बदौलत मनमाना रेट से वसूली करते है। जबकि शासन का निर्देष है कि हर जिला पंचायत के बाजार में रेट-वसूली बोर्ड लगाया जाय। 

बारह किमी की यात्रा के लिये लगते है एक घण्टे


औड़ी मोड़ से मध्य प्रदेष के सिंगरौली सीमा को जोड़ने वाली मार्ग पर इन दिनों चलना दुलर्भ हो गया हैं। पहले जहां लोगों को वाहन से सिंगरौली जाने में दस से पन्द्रह मिटन का समय लगता था वही आज एक घण्टे से ज्यादा समय लग रहा है। ज्ञात हो कि औड़ी से मध्य प्रदेष को जोड़ने वाला मार्ग जेा निमार्ण कार्य से पूर्व एक दम अच्छी हालत में था लेकिन सरकारी महकमें द्वारा एक निजी ठेकेदार को लाभ पहुचाने के उद्देष्य से इस मार्ग का कार्य सौप दिया गया जो अच्छे भले रोड को तोड़ कर उसे नया बनाने की जिम्मेदारी थी लेकिन सरकारी महकमें की  उदासिनता के चलते इस मार्ग का कार्य पूरा नहीं हो पाया जिससे औड़ी से सिंगरौली जाने में जो समय 10 से 15 मिनट था आज बढ़कर एक घण्टे का हो गया है। जिस ठेकेदार के द्वारा इस मार्ग का कार्य कराया जा रहा था उसने एक किमी रोड का निर्माण भी कराया लेकिन जैसे-जैसे उसका कार्य आगे बढ़ा वैसे ही पिछे बनी रोड टुट कर बिखरने लगी तथा जगह-जगह बड़े-बड़े गढ्ढे बन गये जिस पर ठेकेदार के द्वारा मिट्टी तथा बालू डालकर इन गढ्ढों को भरा गया लेकिन बरसात आते ही ये गढ्ढे पुनः रोड से बाहर निकल कर झाकने लगे जिससे आये दिन लोग गिरकर चोटिल हो रहे है तथा बड़े वाहन जो सिंगरौली से कोयला आदि सामनों की आपूर्ति करते है इस मार्ग पर बने गढ्ढों की वजह से समय की देरी तो होती है साथ ही उनके कल-पूर्जे आये दिन खराब हो रहे है। यह मार्ग दो राज्यों की सीमाओं केा जोड़ता है साथ ही औद्यागिक राजधानी मुम्बई के साथ-साथ दक्षिण भारत को जोड़ने का काम करता है एक मात्र सिंगरौली स्टेषन ही ऐसा है जहां से मुम्बई, जबलपुर, भोपाल, अजमेर सहित वाराणसी जाने के लिए रेल की सुविधा उपलब्ध है ऐसे मेें इस मार्ग की दयनीय हालत यहां के नागरिकों के लिए एक बड़ी समस्या बन गयी है परन्तु ना ही काई जनप्रतिनिधि न ही विभाग इस ओर ध्यान दे रहा है। इस रास्ते से गुजर कर आने-जाने वाले लोगों की हालत ऐसी हो जाती है कि एक बार लोग उन्हे पहचान भी न पाये तथा षरीर की हालत इतनी खराब हो जाती है कि लोग रीढ़ की हड्डी के दर्द से ग्रसित होते जा रहे हैं वही  इस मार्ग पर दो पहिया वाहन चालक जहां तहां अनियंत्रित होकर गिरते पड़ते नजर आते है वहीं गर्भवती महिलाआंे के लिए यह मार्ग अन्य पिड़ादायक सिद्ध हो रहा है जिससे इस मार्ग पर अब लोग चलने से भी कतराने लगे है। इस मार्ग को लगभग 10 किमी तक तोड़ा गया लेकिन निर्माण कार्य सिर्फ एक किमी तक ही हो पाया और जोे कार्य हुआ भी है उसकी हालत पुराने रोड से भी बदतर है जबकि सम्पूर्ण नौ किमी मार्ग वैसी ही पड़ा है जिससे लोगों को काफी परेषानियों का सामना करना पड़ रहा है।

जिले के आस-पास के जंगल बना तस्करों का ठिकाना

रास्ते में पड़ने वाले गांवों के लोग तस्करों से करते हैं वसूली
सिंगरौली के सीमावर्ती प्रदेशों के जंगल पशु तस्कर गिरोहों के लिए मुफीद ठिकाना बनता जा रहा है। जंगलों के रास्ते हर माह कई सौ पशुओं को यूपी के रास्ते बिहार और झारखंड में प्रवेश कराया जा रहा है। इस धंधे में रास्ते में पड़ने वाले गांवों के चंद लोग भी तस्करों से उगाही करते हैं। मध्य प्रदेश के सीमांचल इलाके से पशुओं की तस्करी कोई नई बात नहीं है। कई बार जागरूक लोगों की सूचना पर पुलिस ने कई सौ पशुओं के साथ दर्जनों लोगों को पकड़ा लेकिन बाद में सब रफा दफा कर दिया गया। बताते हैं कि सिंगरौली का देवसर इलाका फिलहाल तस्करों के लिए सबसे मुफीद ठिकाना है। इलाके के गाय, बैल, भैंस, पड़वा व बछड़े एक सुरक्षित जगह पर इकट्ठा किए जाते हैं। इसके बाद पशुओं के झुंड को इलाके के डल्ला, पड़रियां, खोखवा होते हुए सिलफोरी के रास्ते सोन नदी पार करा उत्तर प्रदेष के सोनभद्र जिले में दाखिल करा दिया जाता है। इसके बाद पशुओं को बिहार व झारखंड के बार्डर में तय स्थान पर पहुंचा दिया जाता है जहां से बड़े कारोबारी तय रकम देकर ट्रकों से पशुओं को बंगाल (कोलकाता) के विभिन्न हिस्सों में पहुंचा देते हैं। इस तस्करी में पकड़े गए लोगों ने स्वीकार भी किया है कि वह पशुओं को बताए हुए स्थान पर इकठ्ठा करते हैं जबकि इनको जंगल के रास्ते ले जाने वाली टीम दूसरी है और उस टीम को जंगल के रास्ता की जानकारी है।