शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला-सोनभद्र


जनपद-सोनभद्र भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला है। इस जिले का मुख्यालय राबर्ट्सगंज है। सोनभद्र जिला, मूल मिर्जापुर जिले से 4 मार्च 1989 को अलग किया गया था। 7,388 वर्ग किमी क्षेत्रफल के साथ यह उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है। यह 23.52 तथा 25.32 अंश उत्तरी अक्षांश तथा 82.72 एवं 93.33 अंश पूर्वी देशान्तर के बीच स्थित है। जिले की सीमा पश्चिम में मध्य प्रदेश, दक्षिण में छत्तीसगढ़, पूर्व में झारखण्ड तथा बिहार एवं उत्तर में उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जिला है। रार्बट्सगंज जिले का प्रमुख नगर तथा जिला मुख्यालय है। जिले की जनसंख्या 14,63,519 है तथा इसका जनसंख्या घनत्व उत्तर प्रदेश में सबसे कम 198 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। जनपद की कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 664522 हेक्टेयर है जिसमें 3,69,973.3 है भूमि वन भूमि जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 61.2ः है। कुल वन क्षेत्रफल का 40ः भू-भाग वन क्षेत्र सर्वें प्राक्रियो के बाद वन क्षेत्र से अलग हो जाने की सम्भावना है।

जिले में दो भौगोलिक क्षेत्र हैं जिनमें से क्षेत्रफल में हर एक लगभग 50 प्रतिशत है। पहला पठार है जो विंध्य पहाड़ियों से कैमूर पहाड़ियों तक होते हुए सोन नदी तक फैला हुआ है। यह क्षेत्र गंगा घाटी से 400 से 1,100 फिट ऊंचा है। दूसरा भाग सोन नदी के दक्षिण में सोन घाटी है जिसमें सिंगरौली तथा दुध्दी आते हैं। यह अपने प्राकृतिक संसाधनों एवं उपजाऊ भूमि के कारण विख्यात हैं। इस जनपद का अधिकाषः भाग विन्ध्यपर्वत श्रृखलाओं का एक भाग हैं। उत्तरी भारत में भूमि काली व कुछ गहरायी लिये है तथा अन्य भागों में भूमि छिछली स्तर की षेल्स व क्वार्टज युक्त है। मुख्य षैैल प्रकार सैण्ड स्टोन, डोलोमाइट एवं लाइम स्टोन है। यहाॅ की मुख्य भौगोलिक सरचना उत्तर में पोस्ट विन्ध्यम् तथा दक्षिण में गोडवाना संरचना युक्त है। जो स्वयं में कोयले का विपुल भण्डार अपने गर्भ स्थल में संजोये हुए है। 

जिले में बहने वाली सोन नदी जिले में पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। इसकी सहायक नदी रिहन्द जो छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश के पठार से निकलती है सोन में जिले के केन्द्र में मिल जाती है। रिहन्द नदी पर बना गोवन्दि वल्लभ पंत सागर आंशिक रूप से जिले में तथा आंशिक रूप से मध्य प्रदेश में आता है।

स्वतंत्रता मिलने के लगभग 10 वर्षों तक यह क्षेत्र (तब मिर्जापुर जिले का भाग) अलग-थलग था तथा यहां यातायात या संचार के कोई साधन नहीं थे। पहाड़ियों में चूना पत्थर तथा कोयला मिलने के साथ तथा क्षेत्र में पानी की बहुतायत होने के कारण यह औद्योगिक स्वर्ग बन गया। यहां पर देश की सबसे बड़ी सीमेन्ट फैक्ट्रियां, बिजली घर (थर्मल तथा हाइड्रो), एलुमिनियम एवं रासायनिक इकाइयां स्थित हैं। साथ ही कई सारी सहायक इकाइयां एवं असंगठित उत्पादन केन्द्र, विशेष रूप से स्टोन क्रशर इकाइयां, भी स्थापित हुई हैं। 

जनसंख्या की आधे से ज्यादा जनसंख्या वनों पर आधारित है। तथा बड़ती जनसंख्या के दबाव, क्षेत्र में हो रहे अनियमित, अनियमित विकाष कार्यो व सर्वे प्रक्रिया के नाम पर, एक बडे़ पैमाने पर वनों व वन क्षेत्र का विनाष हुआ है। तथा पर्यावरण प्रदुषण के रूप में जनपद एक गम्भीर चुनौती की त्रासदी से त्रस्त है।


नार्दल कोल्डफिल्ड लि. एन.सी.एल की खुले मँुह की नौ परियोजनाए चलता है। जिसमें से प्रमुख चार परियोजनाए जनपद की सीमा के अन्दर स्थित है। तथा 5 अन्य म.प्र. राज्य में जनपद सीमा पर स्थित है। इसके अतरिक्त पावर जनरेषन के रूप में नेषनल थर्मल पावर कापोरेषन (एन.टी.पी.सी.) उत्तर प्रदेष राज्य विद्युत परिषर तथा नीजि क्षेत्र को मिला 6 प्रमुख तापीय परियोजना विद्युत केन्द्रों मे इस समय लगभग 6800 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। इसके अतरिक्त अन्य प्रमुख औद्योगिक इकायों में हिन्डालकों इण्डस्ट्रीज लि., कनौरिया केमिकल्स, हाईटेक कार्बन, विकास गैसेज, जे.पी. सीमेन्ट डाला व चुर्क सीमेन्ट फैक्ट्रीया, कार्बन, चुना भट्ठा, क्रेसर अद्योग, बारूद के कारखाने गैस तथा रसायनों के उत्पादन हेतु स्थापित है।

इस क्षेत्र मेें विकास कर अन्य सम्भावनाओं के रूप में क्षेत्र में निहीत कोयला निवेष के अनुसार लगभग हजारों  मेगावाट विद्युत उत्पादन के अतिरिक्त उत्पादन विस्तार की कल्पना विद्युत क्षेत्र के लिए अनुमोदित योजनाओं के आधार पर कि जा सकती है। इसके अतिरिक्त क्षेत्र में सोना व यूरेनियम स्त्रोतों की जानकारी मिलने के उपरान्त क्षेत्र मेें वनों की सीमा के अतिरिक्त सिमटने व अन्य खनन की सम्भावनाए अतिरिक्त बलवती हुयी है। जो क्षेत्र के पर्यावरण के असंतुलन की प्रमुख स्त्रोत होगे। इस सम्पूर्ण क्षेत्र एक मात्र जल श्रोत गोविन्द बल्लभ पंत सागर ही है। जिसमे 458 वर्ग किमी का जल भराव क्षेत्र है तथा इस महत्वपूर्ण कोयला व विद्युत परियोजनाए इस भराव क्षेत्र के किनारों पर स्थित है। तथा इस सम्पूर्ण परियोजनाओं को जल आपूर्ति का एक मात्र साधन हैै। 

यद्यपि जनपद सोनभद्र देष ही नहीं अपितु विष्व के एक मूल्यवान तथा अपेक्षाकृत सस्ते श्रोत के रूप में निर्मित हुआ है। यद्यपि कोयला खनन, विद्युत उत्पादन और आधूतिक उद्योगों के परिणाम स्वरूप जीवन यापन के पारम्परिक तैर-तरीके में आये परिर्वतनों का क्षेत्र की अधिकाष जनसंख्या के लाभकारी नहीं रहे है तथा कथित विकास के नाम पर अनियमित विकास की आधी ने राजस्व बटोरने की बहुयामी श्रोत को जरूर उपलब्ध कराया है। परन्तु क्षेत्र की जनता के स्वास्थ व बड़ते पर्यावरण प्रदुषण की निष्चित उपेक्षा ही की है। 


समय-समय पर क्षेत्रीय नागरिकों एंव प्रबुध जनों द्वारा पर्यावरण परिस्थितियों के प्रति अनेक विरोध भी प्रगट किये गये है। जो कही भी सार्थक प्रयास तो नही कहे जा सकते हैं। जनपद सोनभद्र के पर्यावरण का प्रदुषण जनपद की सिमाओं तक ही सिमित तो नहीं है। अतः आवष्कता है कि इस क्षेत्र की पर्यावरण समस्यों का उच्चस्तरीय अध्ययन समिक्षा का सुझाव की तथा पर्यावरण जागरूकता की जिससे परियोजनाओं द्वारा किये जा रहे विकास को जनता के स्वास्थ की किमत पर आने देने से रोका जाय। जनपद के समस्त वायु जल व ध्वनी प्रदुषण एक चुनौती के रूप में सामने खड़ा है। तथा आवष्यक हो गया है यह कि विचार करना की इसी प्रकार एक स्वस्थ वातावरण बनाये रखा जाय तो हमारे जीवन की परम आवष्यकता है। 

इस विचार के पूर्व यदि जनपद के पर्यावर्णिय आवरण के संदर्भ में प्रदुषण की चर्चा की जाय। जनपद के बड़े भू-भाग में वन क्षेत्र थे तथा इन वन क्षेत्रों के विकास के नाम पर अंधा-धून कटाइ्र्र तथा सर्वें प्रक्रिया के दौरान एक बड़े भू-भाग को नियमितिकरण की समस्यों में जनपद सोनभद्र की प्राकृतिक धरोहर को विदीर्ण कर दिया है। सम्पूर्ण सोनभद्र वैसे तो पहले से ही अपने जल के प्रदुषण के लिए बदनाम था रही सही कसर औद्योगिक प्रतिष्ठानों के तेल मोबील कोयले की राख तथा चुपके से रातो के अंधेरे में छोड़े गये रसायन युक्त पानी ने तो सारे रिकार्ड ही तोड़ दिये है। जनपद के एक मात्र विषाल जल भण्डार रिहन्द जलासय तो अब अपने प्रदुषित जल के विभीषिता का प्रयाय बनता जा रहा है। 

वनों के क्षरण से अवनत वन भूमि के तल के सिधे सम्पर्क में आकर अपनी प्राकृतिक मृदा स्वरूप व उसकी उत्पादकता तो खोती ही जा रही है। साथ ही साथ जल में मृदा कड़ोे की प्रचुरता में रिहन्द जलाषय की धारक क्षमता पर ही प्रष्न चिन्ह लगा दिया है। बाकी रही-सही कसर विभिन्न परियोजनाओं से निकले कुड़ा-करकट प्रदुषित जल बड़ी मात्रा में प्रदुषण की गजर से ही स्थापित ऐस बन्धों की राख अपनी उत्पादक क्षमता बनाये रखने के लिए जलासय में बहा दी जाने वाली कारक को बेपनाह मात्रा में जलासय की धारक क्षमता के अतिरिक्त जल की प्राकृतिक कड़ों पर भी कफी असर पड़ा तथा अग्रहाय होता जा रहा है। जल में फ्लोराइड, वराकेडियम, अरगनी तथा पार्टिकुलेट आडिपरार्थी का भारी मात्रा में प्रदुषण हैं। फ्लोराईड के कारण काफी मात्रा में लोग हड्डी सम्बन्धि रोगों से ग्रस्त है । पारा की मात्रा रिहन्द जलाषय में इस हद तक है कि जलाषय की मछलीयों तक मे पारा विद्यमान है जो यहा के निवासीयों पाचन तंत्र को विकृत करने में काफी सहायक है क्यों की इसी जलाषय का जल यहा के बहुसंख्य लोगों को पीने के लिए प्रयोग करने हेतुु वितरित किया जाता है। वायु प्रदुषण के सम्बन्ध में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार वायु मण्डल में सल्फर डाई-आॅक्साईड की एक स्तर की मात्रा जमती जा रही है जो सूर्य की रोषनी अट्रावायलेट बिकीरण से स्वाभाविक है तथा वर्षां काल में राषानियक प्रतिक्रिया से गंधक व तेजाब की बारीस से इंनकार नहीं किया जा सकता। कारखानों से निकले धुए जहरीली गैसों से वायु प्रदुषण तेजी से फैलता जा रहा है कुछ डाॅक्टरों के अनुसार यहा निवासरत/कार्यरत श्रमिकेां व्यक्त्यिों में फालिस की बिमारी तरल कार्बन के कारण फेफड़े की बिमारीया हो रही है इसके अलावा इन कारखानांे से दमें, छय आदि रोगों से ग्रसीत हो चुके है।चारों ओर की फसल व पेड़ पैधों भी रोग ग्रस्त है तथा उनकी फल देने की क्षमता लुप्त प्रायः होती जा रही है।

कुल मिलाकर इस क्षेत्र में इंधन इतना जलाया जा रहा है कि वायु मण्डल में निष्क्रिय गैसों का मात्रा खास तौर से कार्बन-डाक्साईड की मात्रा इस कदर बढ़ती जा रही है कि आक्सीजन की कमी दिन प्रतिदिन होती जा रही है। सीमेन्ट कारखानों की धूल में उपस्थित सिलिका की मात्रा से फेफड़े चलनी होती जा रही है। पर्यावरण विज्ञानिक, पर्यावरण विभाग केन्द्र का भी विष्वविद्यालय के निदेषक डाॅ. वी.डी. त्रिपाठी के अनुसार ऊर्जांन्चज में लोग ष्ष्वांस, उच्च रक्तचाप, सीलीकोषिया, प्लम्बोसिस दातों के प्लोरोसिस एवं स्वेक्षण आंखों के रोषनी का कम होना, बच्चो की आई क्यू में कमी, अपराध पवृत्ति में वृद्धि तथा हृदय रोग व केंसर की षिकार मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है।

इस समय तक 1.5 लाख टन धूल, सीेमेन्ट, कोयला, राख प्रतिदिन पूरे ऊर्जांचल के वातावरण में छोड़ा जा रहा है। यहा परियोजनाओं में खदानों से धूल कड़ों के अलावा सल्फर-डाई-आक्साईड, नाईट्रोजन आक्साईड, कार्बन मोनों आक्साईड, हाइड्रोजन फ्लोराइड इत्यादि गैस रोजाना वातावरण में निकाली जा रही है। ध्वनि प्रदुषण की समस्या भी इस क्षेत्र में काफी बढ़ गई है। मषीनों की गड़गड़ाहट, विष्फोंटो वाहनों के षोरगुल ने व्यक्तियों की ध्वनि श्रव्य सीमा को इस कदर प्रभावित किया है कि बहराइन की समस्या, चिड़चिड़ापन तथा लोगों को बातचीत का लहजा भी ऊॅचा होता जा रहा है तथा स्वास्थ्य समस्याओं के अतिक्ति व्यक्ति की कर्मक्षमता तथा सामाजिक परिवार सम्बन्धों में निरन्तर हा्रस होता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार इस क्षेत्र में षोर का स्तर 75 से 92 डेसिबल तक बढ़ा है जो क्षेत्रीय जनता स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती ही है। इस प्रकार कुल मिलाकर क्षेत्र प्रदुषण की समस्या से बुरी तरह प्रभावित हो गया है यद्यपि इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के नाम काफी कुछ करने का प्रयास किया जा रहा है परन्तु यदि समय रहते इस समस्या के प्रति गंभीर उपायात्मक कदम नहीं उठाये गये तो इस क्षेत्र का विकास मानव जाति के लिए एक अभिषाप के अतिरिक्त कुछ और नहीं बन पायेगा।

भारतीय वन संरक्षण अधिनियम, 1980 यद्यपि पर्यावरण की इन्हीं समस्यों को दृष्टिगत रखकर बनाया गया तथा क्षेत्रीय वनों में विनाष को बचाते हुए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कुछ इस तरह से किया जाय की प्रदुषण की समस्या न्यूनतम हो तथा परियोजना की स्थापनाओं के साथ ही प्रदुषण के विरूद्ध कारगर कदम उठाये जाए परन्तु षासन स्तर की अनुमति प्राप्त होते ही विकास के नाम की जा रही प्रगति में लगातार पर्यावरण की उपेक्षा की जा रही है अतः आवष्यकता है इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के लिए एक स्थानिय प्रकोष्ठ की स्थापना की जो समय-समय पर परियोजनाओं के विकास के क्रम में प्रदुषण सम्बन्धी समस्यों का अध्ययन करते हुए सुझावात्मक उपाय कराता रहे तथा परियोजनाओं को प्रदुषण की समस्या एक मानक  स्तर तक कम करने हेतु विवष करे। दुर बैठा यह विभाग मात्र कोरम पूरा कर के कुछ नहीं कर पाता आवष्यकता हेै इस संगठन को और मजबूत करने की, साथ एक ऐसा  ढ़ाचा तैयार करने की जिसमें स्थानीय वन विभाग क्षेत्रीय स्वंयसेवी संगठनों, पर्यावरणविदों व पर्यावरण विभाग की मदद ली जाय तथा मासिक स्तर पर सुझाये गये उपायों की समीक्षा की कि किस स्तर तक परियोजनओं द्वारा न्यूनतम प्रदूषण किये जा रहे है। एक ऐसी सामाजिक चेतना की आवष्यकता है कि विकास-उत्पादन -प्रदूषण में सामंजस्य बनाने वाली दीर्घकालीन योजना के अनुसार ही कर्म किये जाय क्योकि प्रदूषण मुक्त समाज की कल्पना में ही किसी समाज के द्वारा किये जा रहे किसी विकास का महत्व उपयोग किया जा सकता है।

ट्रेनों में सिसकता बचपन सरकार लापरवाह


बचपन बचाओ अभियान में हाल में सुप्रीम कोर्ट ने यह कह कर उत्प्रेरक का काम किया है कि सरकार बच्चों को मजदूरी करने पर रोक लगाने के लिए आवश्यक कदम उठाये। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में सरकार कागजों पर बालश्रम रोकने के प्रयास में लग चुकी है। पर हकीकत ये है कि केन्द्र सरकार इसे अपने ही रेलवे के अंदर रोक पाने का कोई प्रयास करती नजर नहीं आ रही है। देश भर के ट्रेनों में आज भी बचपन सिसकता हुआ नजर आता है। ट्रेनों में झाड़ू लगाते बच्चे काम के एवज में खुशनामा मांगते ये बताने का प्रयास करते हैं कि हम शौक से ये काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि हमारी भी कुछ पारिवारिक मजबूरियां हैं। इन बच्चों का ये काम कई तरह से केन्द्र व राज्य सरकार की योजनाओं की पोल खोल रहा है। पहली बात तो ये भीख नहीं मांग रहे बल्कि दिखा रहे हैं कि हम गंदगी साफ कर आपको स्वच्छ जगह बैठा देखना चाहते हैं। बात साफ है रेल मंत्रालय ट्रेनों को हमेशा स्वच्छ रखने में सक्षम नहीं है। दूसरी कि अभी भी केन्द्र व राज्य की सरकारी योजनाएं इनके परिवार का पेट नहीं चला पा रही हैं। बचपन बचाने में पूरी तरह नाकामयाब सरकार के पास कोई ऐसा उपाय नहीं दीख पड़ता है जिसके द्वारा पढ़ने और खेलने की उम्र में इन बच्चों को ऐसे काम करने से रोका जा सके। एक तरफ जहाँ देश का अरबों रूपये काला धन विदेशों में जमा है वहीं एक-दो रूपये के लिए मुंहताज ये बच्चे सरकार के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है। 

खतरनाक साबित हो रहे ऊर्जांचल के कबाड़चोर


ऊर्जांचल में कबाड़चोरी एक संगठित अपराध का रूप लेता जा रहा है। कबाड़ चोरों का दहशत इतना अधिक है कि एनसीएल की सुरक्षा का बागडोर देख रहे पूर्व सैनिक भी उनके आतंक से भयभीत हो चले हैं। अभी कुछ माह पूर्व बीना और उसके बाद एनसीएल ककरी में कबाड़ चोरों ने सुरक्षा गार्डों को लहूलुहान करते हुए उनसे बंदूकें भी छीन ली थी। जिसका आज तक सुराग नहीं लग सका है। एक वर्ष पूर्व एनटीपीसी रिहंद में कबाड़ चोरों का पीछा कर रहे सीआईएसएफ के एक उपनिरीक्षक एसपी सिंह को चोरों ने अपनी गाड़ी से रौंद दिया था। यहीं नहीं दो वर्ष पूर्व खड़िया परियोजना में एक गनमैन को कबाड़ चोरों ने मौत के घाट उतार दिया था। कोयला से लेकर तमाम कीमती सामानों और डीजल को चट कर जाना इनके चुटकी का खेल है। स्थानीय लोग नक्सलियों के खौंफ से उतने भयाक्रांत नहीं है जितने कि कबाड़ चोरों के आतंक से। पत्थरबाजी करते हुए परियोजनाओं में घुसना तथा अपने मंसूबों में काययाब होकर वापिस लौटना इनकी आदत में शुमार हो गया है।

कबाड़चोरी से सबसे अधिक नुकसान एनसीएल परियोजना को हो रहा है। इसमें लगी अनेक कीमती समानों को दर्जनों की संख्या में हल्लाबोल कर कबाड़चोर बेच देते है। बाद में चोरी के इन सामानों को एनसीएल सहित तमाम परियोजनाओं में इनसे जुड़े सफेद पोश लोग घपाकर इसके एवज में बड़ी रकम प्राप्त कर लेते है। कहने का आशय है कि चोरी की सामानों का बाजार भी कबाड़ से जुड़े लोगों को यहीं मिल जाता है। परियोजना प्रबंधन इस बावत कुछ भी कहने से परहेज की स्थिति में खड़ा रहता है। ऊर्जांचल के लोगों ने सीबीआई सहित अन्य केन्द्रीय जांच एजेंसियों से यहां धड़ल्ले से चल रहे करोड़ों के अवैध करोबार को उजागर करने के लिए जांच की गुहार भी लगाई है।

वनाधिकार का लाभ नहीं मिल रहा


ऽ तहसील मुख्यालय पर प्रदर्शन की तैयारी
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वनाधिकार कानून के तहत धारा 20 पर काबिज लोगों को भौमिक अधिकार देने की मंशा पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। वनाधिकार समितियों के पास फिर से फाइल को पटक दिए जाने से लोगों की धुकधुकी बढ़ गई है। दावेदार इसके तहत आंदोलन की रणनीति पर भी विचार कर रहे हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर दावे की फाइलें आने से एक बार फिर दावेदार हैरान हो गए हैं। उपजिलाधिकारी ने दावों को पूर्ण कर पुनः भेजने की बात कही है। 

वन भूमि धारा 20 से आच्छादित जमीनों पर काबिज लोगों को औद्यौगिक अधिकार देने के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर वनाधिकार समितियों का गठन करके काबिज लोगों को अधिकार दिए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान काबिज लोगों के अलावा धारा 20 की ऐसी जमीनों पर भी लोगों ने दावा कर दिया, जो जंगल था। इसके अलावा बड़े पैमाने पर जंगलों का सफाया करके भी लोगों ने दावा कर दिया। इससे हट कर कई ऐसे लोगों ने भी दावा किया, जो धारा 20 पर काबिज है और उसका बाग, बगीचा, खेत आदि भी उसमें सम्मिलित हैं। समितियों ने लोगों के दावे को लेकर उपखंडीय समिति के सामने प्रस्तुत कर दिया। उपजिलाधिकारी ने कहा कि जो दावे ग्राम समितियों ने निरस्त कर दिए थे, उनको तहसील तक आने की जरूरत ही नहीं थी।

खोती जिंदगियों का पूछनहार कोई नहीं


जहरीले पानी से मौतें होने के बावजूद प्रशासन खामोश, अब तक डडिहरा तथा नेमना को मिलाकर तीन दर्जन ग्रामीण आदिवासियों की मौत हो चुकी है, अनपरा। देश की आधे से अधिक ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति करने वाले ऊर्जांचल के विकास खंड म्योरपुर में जीवन के लिए खतरा उत्पन्न होते जा रहा है। गोविंद बल्लभ पंत बांध का जहरीला हो रहा पानी हर साल सैकड़ों जिंदगियों को खामोश कर दे रहा है। कमरीड़ाह में दो वर्ष में हुई मौतों को लेकर मानवाधिकार आयोग के आलाधिकारी क्षेत्र का दौरा कर इस क्षेत्र को रहने के लिए खतरनाक बता चुके हैं। लेकिन रिहंद बांध के किनारे सदियों से रहने वाले आदिवासियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए जमीनी तौर पर कुछ नहीं किया जा सका। इस वर्ष अब तक डडिहरा तथा नेमना को मिलाकर तीन दर्जन ग्रामीण आदिवासियों की मौत हो चुकी है, मानवाधिकार आयोग जन संघर्ष मोर्चा तथा अन्य गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा दिए गए सूचना को गंभीरता से लेते हुए प्रदेश तथा जिला प्रशासन को इस क्षेत्र में विशेष सतर्कता बरतने तथा जन हानि रोकने का दो बार फरमान दे चुका है। लेकिन आदिवासियों की रोजाना स्वाहा हो रही जिंदगियों को बचाने के लिए विशेष ब्लू प्रिंट तैयार कर इस क्षेत्र के लोगोें के लिए कुछ नहीं किया जा सका। जानकार बताते हैं कि इस क्षेत्र में मौतें तो बहुत हुईं लेकिन अब तक प्रकाश में आधा-अधूरे की ही मामले सामने आ सके हैं। मानवाधिकार आयोग में इस क्षेत्र के लोगों की दुर्दशा को लेकर शिकायत दर्ज कराने वाले जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता दिनकर कपूर ने बताया कि शुद्ध पेय जल की पूर्ति सहित प्राथमिक स्वास्थ्य के लिए प्रशासन द्वारा कुछ नहीं किया गया जो कि घोर मानवीय अधिकारों का हनन है।

प्रदूषण नियंत्रण विभाग का परियोजनाओं से कैसा संबंध।


अधिकारी परियोजनाओं पर नकेल कसने में है असक्षम। 
चिमनियों से निकल रहा धुआं बीमारियों का बन रहा कारण। 
चिमनियों की उड़ती राख सेे जीना दुश्वार।
घर के बाहर कपड़े तथा गेहूं आदि सूखना भी हुआ मुश्किल।
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अनपरा में लगातार प्रदूषण से आजिज आम लोगों का कहना है कि चिमनियों से निकल रहे धुएं से लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। कोई ऐसा घर नहीं है जिसमें एक दो लोग दमा अथवा टीबी के रोगी न हो गए हो। कहा गया कि अगर शीघ्र प्रदूषण पर रोक नहीं लगाया जाता तो वह दिन दूर नहीं जब आम जनता सड़क पर उतर कर चिमनियों को ही बंद करने पर बाध्य होंगी। लोगों ने प्रश्न उठाया कि प्रदूषण नियंत्रण विभाग का आखिर परियोजनाओं से कौन सा संबंध है जिसकी एवज में अधिकारी इन परियोजनाओं पर नकेल नहीं कस रहे है। उनका कहना है कि प्रदूषण की वजह से उनकी दुकानें रसातल में मिलती जा रही है, प्रदूषण की वजह से अनपरा कालोनी से लेते हुए बाजार, गांव तथा दूरदराज के जंगल भी तबाह होते जा रहे है। लोगों ने मांग किया कि प्रदूषण से बीमार लोगों के चिकित्सा की व्यवस्था वातावरण को जहरीला बनाने वाली इन परियोजनाओं द्वारा किया जाना चाहिए। विस्थापितों ने देश के विकास के लिए अपनी संपत्ति देश को दे दिया लेकिन हम लोगों को विकास के नाम पर जहरीला वातावरण दिया जा रहा है जिसमें सांस लेने के लिए शुद्ध हवा, पीने के लिए शुद्ध पानी भी दुर्लभ हो गया है। 


पिछले दो दिसंबर, 2012 को अनपरा परियोजना के वीआईपी गेस्ट हाउस मेें विभिन्न परियोजनाओं के आलाधिकारियों तथा जिला प्रशासन तथा क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रक अधिकारी के साथ प्रदूषण को रोकने के लिए व्यापक स्तर पर बातचीत हुई थी। उसमें परियोजनाओें के अधिकारियों ने अपनी चिमनियों में लगी ईएसपी सिस्टम को अत्याधुनिक बताया था। लेकिन अनपरा में पिछले कुछ दिनों से आकाश से बरस रहे राख के बारीक कणों से लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। सड़क के किनारे रहने वाले तो परेशान है ही कालोनीवासी भी अजिज आ गए है। गंदे कपड़े को साफ करने के बाद बाहर सूखाने पर वे चिमनियों से आ रहे राख से और गंदे हो जा रहे है। दिन भर घर की सफाई करने के बाद सुबह उठने के बाद घरों पर गंदगी का सैलाब उमड़ा हुआ दिखता है। 

महत्वपूर्ण है कि सभी परियोजनाएं अपने सिस्टम को प्रदूषण मुक्त होने की दावा कर रही है जबकि प्रदूषण रुकने का नाम नहीं ले रहा है। इसकी जांच कौन करेगा कि प्रदूषण किस परियोजना से फैल रही है। दो दिसंबर को प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी ने भी तमाम वायदे किए तथा परियोजनाओं से क्रमिक रूप से प्रदूषण नियंत्रण की बात कहीं लेकिन सब हवा-हवाई साबित हो रहा है। परियोजनाओं से लेकर प्रदूषण पर लगाम लगाने वाली संस्थाएं खामोश है। 

प्रदेश सरकार अपने गुड वर्क को दिखाने के लिए जिस तरीके से पिछले दिनों आनन-फानन में बिजली परियोजनाओं को बिना तैयार हुए ही लोकार्पण की है इससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा है। चिमनियों की राख से छत पर कपड़े तथा गेहूं सूखाना दुश्वार हो गया है। कोई भी घरेलू वस्तु बाहर रखी जाती है तो सुबह तक वह धुंए के गर्द की वजह से गन्दी व पुरानी नजर आने लगती है। प्रदूषण की वजह से लगातार ऊर्जांचल खतरनाक स्थिति में पहुंचता जा रहा है। प्रतिवर्ष देश में प्रदूषण की भयावहता वाले औद्योगिक परिक्षेत्र सही होते जा रहे है जबकि ऊर्जांचल अब तो नौंवे से आठवें स्थान पर पहुंच चुका है।

प्रदूषण नियंत्रण की बेबुनियाद कवायद


उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए ईंधन के तौर पर कोयला, केरोसिन और लकड़ी के इस्तेमाल पर रोक लगाने का निर्णय लिया है। इसके लिए प्रदेश सरकार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पेट्रोलियम मंत्रालय से बातचीत कर रही है। दोनों से हरी झंडी मिलने के बाद तीनों पदार्थों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लग जाएगी। राज्य सरकार के इस कदम को सही ठहराया भी जा सकता है और नहीं भी। प्रश्न यह उठता है कि क्या ईंधन के तौर पर उपरोक्त तीनों पदार्थों के इस्तेमाल पर रोक लगने मात्र से प्रदूषण पर नियंत्रण हो जाएगा? क्या वास्तव में राज्य सरकार प्रदूषण नियंत्रण के लिए इतना प्रतिबद्ध है कि वह आम आदमी द्वारा ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने वाले अवयवों पर नियंत्रण लगाने की जरूरत महसूस कर रही है? अब बात करते हैं प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश नियंत्रण बोर्ड द्वारा पूर्व में उठाए गए कदमों के बारे में। 

वास्तव में प्रदूषण नियंत्रण के प्रति बोर्ड एवं राज्य सरकार पूरी तरह विफल रही है। चाहे मामला गंगा एवं यमुना नदी के प्रदूषण का हो या सुदूर सोनभद्र में रेणु नदी और रिहंद बांध का। वायु प्रदूषण और पर्यावरण के मामले में तो राज्य सरकार और राज्य प्रदूषण बोर्ड ने प्रदूषण फैलाने वाले अवैध औद्योगिक इकाइयों और क्रशर प्लांटों के संचालन के लिए खुलेआम पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के नियमों का उल्लंघन किया है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सोनभद्र में करीब सवा सौ अवैध क्रशर प्लांटों को नियमों के विरुद्ध अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ायीं। वहीं राज्य सरकार ने समाजसेवियों और पर्यावरणविदों की शिकायतों को कूड़े के छेर में डाल दिया और दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। 

जय प्रकाश एसोसिएट्स के मामले में तो राज्य सरकार और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड दोनों ने ही सुप्रीम कोर्ट के आदेशों समेत पर्यावरण संरक्षण के नियमों की धज्जियां उडाई हैं। गंगा प्रदूषण के मामले में तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अलग अपनी कार्ययोजना को अंजाम देने का मन बना लिया है, क्योंकि बोर्ड को बार-बार उच्चतम न्यायालय की फटकार सहनी पड़ रही है। कहने के लिए प्रदेश सरकार ने नई राज्य पर्यावरण नीति-2010 तैयार की है, जिसे कैबिनेट की मजूरी के बाद अमल में लाया जाएगा। लेकिन इसकी भी संभावना कागजों तक ही सीमित रहने की है, धरातल पर अमल की नहीं। राज्य सरकार गरीबों के पेट पर लात मारने की जुगत में लगी है। 

कोयला, केरोसिन और लकड़ी का ईंधन के रूप में उपयोग खासतौर पर गरीबों द्वारा किया जाता है। इनके इस्तेमाल पर रोक से इस वर्ग पर बड़े पैमाने पर प्रभाव पड़ेगा। राज्य सरकार रियायती दर पर एलपीजी कनेक्शन को उपलब्ध कराने की मांग कर रही है लेकिन भ्रष्टाचार के रूप में जकड़े तंत्र में यह संभव नहीं दिखाई देता है। गरीबी रेखा के नीचे जावन यापन करने वाले लाखों फर्जी राशन कार्डों के आगे गरीबों को इसका लाभ मिल पाएगा। यह दिखाई नहीं देता है। ईंधन के तौर पर कोयला, केरोसिन और लकड़ी के इस्तेमाल पर रोक से भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र द्वारा गरीबों का शोषण ही बढ़ेगा, प्रदूषण नियंत्रण की सही कवायद नहीं। गरीब तबके में इस्तेमाल होने वाले तीनों अवयवों पर रोक लगाने से पहले राज्य सरकार को सभी गरीबों को रियायती दर पर एलपीजी कनेक्शन उपलब्ध कराने की जरूरत है। राज्य सरकार पहले इसे अंजाम दे। फिर ईंधन के तौर पर कोयला, केरोसिन और लकड़ी के इस्तेमाल पर रोक लगाए।     

रिहंद बांध के बाद भी गांवों में जल संकट: नगर पंचायत पिपरी


पेयजल के लिए 3.5 करोड़ रुपये की है जरूरत।
अहम मुद्दा पीपी एक्ट का बना हुआ है।
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ऊर्जांचल का गौरव यानी पिपरी नगर पंचायत जिले और प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। ऊर्जांचल की जननी रिहंद बांध भी यहीं बना हुआ है। इसके बाद भी पूरे नगर पंचायत में समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। यहां सबसे बड़ी समस्या पेयजल की दिखती है। सड़कें तो हैं ही नहीं, अहम मुद्दा पीपी एक्ट का बना हुआ है, जो यहां के रहवासियों के लिए गले का फंदा बना हुआ है। करीब तीस हजार की आबादी वाले नगर पंचायत में कुल 11 हजार मतदाता हैं। इस नगर पंचायत में विश्व का सबसे बड़ा कृत्रिम सागर पंडित गोविंद बल्लभ पंत सागर स्थापित है। इसके बाद भी यहां के रहवासियों को पेयजल के लिए किल्लत उठानी पड़ती है।

नगर में पांच करोड़ की लागत से अजगरी मुंह वाली पेयजल योजना आरओ सिस्टम बन कर तैयार तो हो गया, परंतु हस्तांतरण विवाद एवं संचालन को लेकर जल निगम एवं नगर पंचायत में खींचा-तानी लगी हुई है। आरओ सिस्टम बिना चलाए ही लाखों का बिजली बिल बकाया विभाग द्वारा भेज दिया गया है। वहीं पूरे नगर में सड़कों का हाल खस्ताहाल है। गड्ढायुक्त सड़कें स्वयं नगर की दुर्व्यवस्था को बयंा कर रही हैं। नगर के कई वार्डो में सड़क, नाली एवं स्ट्रीट लाइटें अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही हैं। सिंचाई विभाग ने अब तक नगर के 15 सौ लोगों के ऊपर पीपी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर रखा है। इससे निजात दिला कर यहां के रहवासियों को मौमिक अधिकार दिलाना भी सबसे बड़ी समस्या है। वहीं नगर में सफाई व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। आलम यह है कि सड़कों पर जगह जगह कूड़ों का अंबार लगा हुआ है। पेयजल, स्ट्रीट लाईट, सड़क, नाली, सफाई आदि यहां की मुख्य समस्या मुंह बाए नगर प्रशासन का बाट जोह रही हैं।

नगर के विकास के संदर्भ में नव निर्वाचित अध्यक्ष सावित्री सिंह का कहना है कि पीपी एक्ट राज्य सरकार के अधीन का मामला है। यहां के रहवासियों को इससे निजात दिलाने के लिए पूर्व में भी काफी प्रयास किए गए हैं, बस उसी को आगे बढ़ाना है। यहां के लोगों को पीपी एक्ट से निजात दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करूंगी। इसी क्रम में श्रीमती सिंह ने कहा कि नगर की जर्जर सड़कें तीन माह के अंदर बननी शुरू हो जाएंगी। पेयजल योजना को पूर्ण रुप से संचालित करने में 3.5 करोड़ की और आवश्यकता है। इसके लिए शासन को अवगत करा कर विकास कार्य किया जाएगा। इसके साथ ही साथ पेयजल संचालन करने के लिए कर्मचारियों की जरूरत है, क्योंकि पूरे नगर में अभी पाइप लाइन नहीं बिछ पाई है। ऐसे में पुरानी व्यवस्था को नयी परियोजना को जोड़ कर उन्हीं कर्मचारियों से आरओ प्लांट का संचालन कराने का प्रयास किया जाएगा। सभासदों के सहयोग से सफाई का कार्य कराया जाएगा। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त सफाई कर्मियों को भी लगाया जाएगा। बरसात में संक्रामक रोगों के पनपने का भय बना रहता है। ऐसे में नगर की जल्द से जल्द सफाई की जाएंगी। स्ट्रीट लाइट के लिए जलविद्युत निगम से सहयोग लेकर साडा के मार्फत स्ट्रीट लाइट लगाने का प्रयास किया जाएगा। मेरे ससुर स्वर्गीय काशीनाथ सिंह, जो नगर के पूर्व चेयरमैन रह चुके हैं उनके सपनों को साकार करूंगी।

जन वितरण प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाया आरोप


 जन वितरण प्रणाली
विकासखण्ड म्योरपुर के ग्राम पंचायत औड़ी में जन वितरण प्रणाली (सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों) को बी.पी.एल. एवं अन्त्योदय कार्डधारियों को शासन द्वारा आदेषित अतिरिक्त खाद्यान्न जो जनवरी से मई माह तक बाटना था। उसमें कोटेदारों द्वारा धांधली की जा रही है। उक्त जानकारी एवं अरोप औड़ी के  ने अपने ग्राम के दो कोटेदारों पर लगया है। उनका कहना है कि-
शक्ति आनन्द
ग्राम पंचायत सदस्य

ग्राम पंचायत औड़ी
वि० ख०- म्योरपुर  सोनभद्र 
"कोटेदारों द्वारा अतिरिक्त खाद्यान्न सिर्फ एक-दो माह ही बाटा गया है तथा इसकी सूचना सभी कार्ड धारको को ना होने का लाभ कोटेदार उठा रहे है। जिससे सरकार द्वारा संचालित जन वितरण प्रणाली में धांधली एवं भ्रष्टाचार हो रही है। उन्होंने यह भी बताया कि ग्राम पंचायत औड़ी के दो कोटेदारों द्वारा ना ही अपने कोटे पर खाद्यान्न के रेट और ना ही उनके स्टाक से सम्बन्धित कोई सूचना पट्ट पर अंकित नहीं किया जाता है। जो घोर अनियमितता दर्षाता है। जिससे बी.पी.एल. एवं अन्त्योदय कार्डधारी परिवार निराष है। "


वहीं ऊर्जांचल परिक्षेत्रों में ग्रामीणों के साथ क्षेत्र के कोटेदारों द्वारा की जा रही आंख मिचैली नें लोगेां के सब्र का बाधं आखिकार तोड़ ही दिया, कुलडोमरी ग्राम सभा के वैरपान, सिदहवां के कोटेदार के उपर ग्रामीणों ने समानों को कम वितरित करने, तथा निर्धारित धनराषी से अधिक से षुल्क की वसुली का आरोप लगाकर जिला प्रषासन को यथाषिघ्र कोटेदार के उपर कार्यवाही की मांग की है। सम्बन्धित षिकायत केा बार-बार दोहराये जाने का आरेाप लगाते हुए ग्रामीणांे ने बताया कि कोटेदार की षिकायत मनमाने लुट-खसेाट को कई बार सम्बन्धित अधिकरीयों से की जा चुकी है, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है, इस संदर्भ में उन्होनें मांग किया है कि, यदि उनके समस्याअेां का समाधान नहीं किया जाता है तो समस्त ग्रामीण इकठ्ठा होकर कभी भी कोटेदार के दरवाजे पर ताला जड़ सकते हैं। सुत्रों से जानकारी मिला है कि एक ड्रम तेल 150 से 200 रूपये सुविधा षुल्क के नाम से  लिये जाते है व गेहूँ चावल 50 रूपये कुंतल लिये जाने की बात कहीं जा रही है, कोटेदार करे भी तो क्या करे, जाहिर है यहां यही कहावत चरितार्थ होगी ‘‘अंधेर नगरी है, राजा यहां का चैपट है’’। 

पहाड़ियों के अस्तित्व पर अत्यधिक खनन से खतरा


पहाड़ियों पर आज भी अंकित है आदि मानवों द्वारा उकेरे चित्र।
खनन में अवैध तरीके से हो रहा है विस्फोटकों का प्रयोग। 
विकास के नाम पर पहाड़ियों पर हो रहा प्रहार।
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सोनभद्र जिले में स्थित पंचमुखी और चनाइमान जैसी पहाड़यों पर प्रागैतिहासिक कालीन चित्र गुफाए आज भी मौजूद हैं जो जिले में प्राचीन समय की धरोहर हैं। इनके संरक्षण के लिए शासन द्वारा समय-समय पर आदेश जारी किए जा चुके हैं, बावजूद इसके इन पहाड़ीयों पर हथौड़े और घन ही नहीं बल्कि पत्थरों के खनन कार्यो में विस्फोटकों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। अवैध रूप से हो रहे खनन को सही ठहराने के लिए जिला प्रषासन द्वारा विकास के नाम का सहारा लिया जा रहा है। बीते पंचमुखी पहाड़ी पर प्राचीन पंचमुखी महादेव का मंदिर स्थित है, जिसके पीछे ही आदि मानवों के हाथों से उकेरी गई चित्र शृंखलाएं अनमोल धरोहर के रूप में विद्यमान है। इसी प्रकार दुद्धी, बभनी, म्योरपुर और रेणुकापार इलाकों में विकास के लिए बनाई जा रही सड़कों में भी प्राचीन पहाड़ियों के पत्थरों को तोड़ कर खपाया जा रहा है। ठेकेदारों से इस संबंध में बात की गई तो वे इसके लिए विकास विभाग से जुड़े अधिकारियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कहते हैं कि यदि 52 फीसदी हिस्सेदारी अधिकारी लेंगे तो ठेकेदारों की मजबूरी हो जाएगी कि वे स्थानीय पहाड़ियों की गिट्टी-पत्थर और नदियों से बालू लेकर विकास के कार्यों में उसका प्रयोग करें।

पहाड़ों को तोड़ बिछाया जा रहा सीसी रोड पर


दलित मोहल्लों को चमकाने की कवायद हो रही पंचर
सड़क बनाने में पहाडों का चूरा हो रहा इस्तेमाल।
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प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना अंबेडकर ग्राम में सीसी रोड का निर्माण भ्रष्टाचार की भेट चढ़ गया है। ऊर्जांचल के कई अंबेडकर गांवों में दलित मोहल्लों को चमकाने की कवायद पंचर होती नजर आ रही है। सीसी रोड निर्माण में घटिया और लोकल बालू, बोल्डर से लेकर सीमेंट तक की खस्ताहाल सामग्री के प्रयोग से सीसी रोड बनने से पूर्व ही उखड़ रही है। अगर कायदे से जांच कराई जाय तो जनपद में मनरेगा के बाद सीसी रोड निर्माण में भी व्यापक भ्रष्टाचार मिल सकता है। बता दें कि अभी एक पखवारे पूर्व रणहोर में जिलाधिकारी वीवी पंत ने दौराकर निर्माण कार्यों का जायजा लिया था। इक्तफाक से जिलाधिकारी मौके पर नहीं गए नहीं तो हरिजन बस्ती में बन रहे सीसी रोड निर्माण की पोल खुल सकती थी। इसके बाद भी आरईएस विभाग के अधिकारी नहीं चेते तथा भारी भरकम स्थानीय पहाड़ों के बोल्डरों को लाकर रोड पर ही घन तथा हथौड़ा से तोड़कर चूरा बनाया जाता है जबकि पेमेेंट खदानों के भाव से होता है। रणहोर के हरिजन बस्ती में तो अति हो गई है यहां सीसी रोड बनाने मेें जिस कदर सारे गुणवत्ता तथा मानकों की धज्जियां उड़ाई जा रही है उसे देखने वाले भी आश्चर्य चकित हो जाते है कि आखिर इन लोगों पर कार्रवाई क्यो नहीं हो रही है। इसके अलावा वन कर्मियों के सहयोग से ऊर्जांचल के कीमती पहाड़ों को भी स्वाहा कर इन निर्माणाधीन सीसी रोड़ को बनाने में लगा दिया जा रहा है।

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

करोड़ों खर्च के बाद भी समस्याएं जस की तस: नगर पंचायत ओबरा


नगर के विकास के मद में नगर पंचायत प्रबंधन द्वारा पिछले वर्षों में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाया, लेकिन नगर में मूलभूत समस्याएं आज भी जस की तस बनी हैं। राजनीतिक गोटी सेकने की आड़ में मुख्य बाजारों सहित अन्य बस्तियों में नालों पर हुए अतिक्रमण से पानी निकासी बड़ी समस्या बनी हुई है। नगर पंचायत कर्मचारियों की शिथिलता के कारण साफ सफाई की व्यवस्था नदारत है। 

नगर पंचायत क्षेत्र में जगह-जगह कूड़ों का अंबार बारिश के पानी के साथ सड़कर बजबजाने का दृष्य आम है। हालांकि नगर पंचायत क्षेत्र का दो तिहाई हिस्सा परियोजना कालोनी के अंतर्गत आता है, जिसकी साफ सफाई एवं जल निकासी की व्यवस्था सिविल प्रबंधन द्वारा समय समय पर दिया जाता रहा है। लेकिन सिर्फ एक तिहाई हिस्से में बसे वीआईपी रोड, चोपन रोड, चूड़ीगली, सिनेमा रोड, राम मंदिर कालोनी एवं झुग्गी झोपड़ियों का हाल आज भी बेहाल बना हुआ है। 

सबसे ज्यादा वीआईपी रोड व चोपन रोड पर स्थित नगर का सिविल लाइन का दर्जा प्राप्त कर चुका हनुमान मंदिर तिराहे से सभी बाजारों में नालों पर अतिक्रमण किए जाने से नालों की सफाई नहीं हो पा रही है। जिससे पहली ही बारिश में नाले उफान मारकर व्यवसायियों के प्रतिष्ठानों एवं घरों में नाले का गंदा पानी घुस जाना हर वर्ष की समस्या है। जिसे लेकर व्यवसायी कई बार हलाकान भी हो चुके है। 

इसके अलावा नगर की सबसे बड़ी समस्या पेयजल की किल्लत है। कई हैंड पाइपों के खराब होने की स्थिति में आज भी टैंकरों से पानी सप्लाई किया जा रहा है। हालांकि प्रकाश की व्यवस्था कालोनी क्षेत्र के अपेक्षा अन्य क्षेत्रों में नाकाफी है। लेकिन यह समस्या उतनी बड़ी नहीं है, जितनी पेयजल व अतिक्रमण तथा साफ सफाई का है। 
वर्तमान नगर पंचायत अध्यक्ष दुर्गावती देवी ने कहा कि नगर की समस्याओं से हम भलीभांति अवगत हैं। नगर की साफ-सफाई, पेयजल के लिए टंकी निर्माण व अन्य जटिल समस्याओं को दूर करने का हर संभव प्रयास किया जाएगा। चूंकि नालों की साफ सफाई पिछले कई वर्षों से नहीं हुई हैं, जिससे नालों से बारिश के पानी का निकासी नहीं हो पा रही है। व्यवसायियों को विश्वास में लेकर नालों की सफाई का काम जल्द कराया जाएगा।

नीम-हकीम बेधड़क बेच रहे दवा


झोलाछाप चिकित्सकों पर नहीं हो रही कार्रवाई
मुख्यालय पर नीम-हकीमों की भरमार
स्वास्थ्य विभाग कार्रवाई में हीलाहवाली कर रहा
राबर्ट्सगंज में सजी जड़ी बूटी की दुकान।

जनपद-सोनभद्र में लगातार झोलाछाप चिकित्सकों की लापरवाही से हो रही मौतों के बाद भी स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी नीम-हकीमों के ऊपर कार्रवाई करने में हीलाहवाली कर रहे हैं। राबर्ट्सगंज नगर में नीम हकीमों द्वारा अस्थायी कैंप लगा कर विभिन्न रोगों की दवाइयां खुलेआम बेची जा रही हैं। बावजूद इसके संबंधित अधिकारियों की उनके ऊपर नजर नही पड़ रही है। बता दें कि एक दशक में जिले में छोलाछाप चिकित्सकों, वैद्यों एवं शोखाओं के झांसे में आकर करीब सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। विगत वर्षो में झोलाछाप चिकित्सक एवं ओझाओं के चक्कर में म्योरपुर विकास खंड के डडिहरा, सोढ़ा के अलावा रेणुका पार के भाठ इलाकों में दर्जन भर से अधिक लोग काल के गाल में समा गए। लगातार मौत होेने से जिला प्रशासन हिल गया था। स्वास्थ्य टीमों को कई दिनों तक गांवों में कैंप करना पड़ा था। सीएमओ डा. जीके कुरील के निर्देश पर एक अधिकारी ने कुछ झोलाछाप चिकित्सकों के ऊपर मुकदमा भी दर्ज कराया है। पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर उन्हें जेल भेजा। अधिकारियों द्वारा दक्षिणांचल में लगातार घर बैठे वैद्य बने लोगों एवं प्राइवेट चिकित्सकों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है लेकिन दूसरे प्रांत से नीम-हकीम आकर मुख्यालय पर कैंप लगाकर लाउड स्पीकर से प्रचार कर सांडा के तेल समेत अन्य दवाइयां खुलेआम बेेच रहे हैं। नीम-हकीमों के पास दवा लेने वालों की भीड़ लग रही है। बावजूद इसके इन महानुभावों के ऊपर संबंधित अधिकारियों की नजर नही पड़ रही है।

मोबाईल व टावर कई भयानक बिमारियों को भी जन्म दे रहा है।


क्षेत्र मंे लगे विभिन्न कम्पनीयों के मोबाईल टावर अपने प्रारम्भिक समय में बेहतर सेवा प्रदान कर अब लोगों को रूलाने लगी है। महंगा होने के चलते प्रारम्भीक वर्षों मंे मोबाईल सेवा सुलभ नहीं थी मगर टेलीकाम कम्पनियों द्वारा ग्राहको को लुभाने की दौड़ में व दर कम करने से यह सबके जीवन का अभिन्न अंग बन गया है स्थिती यह है हम इसके बगैर जीवन के बारे में सोच भी नहीं सकते विभिन्न टावरों के छमता से ज्यादा कनेक्सन धारक होने के चलते फोन मिलना मुस्किल होता जा रहा है। जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका मोबाईल व उसका टावर कई भयानक बिमारियों को भी जन्म दे रहा है। वैज्ञानिकों की रिसर्च बताती है कि मोबाईल टावर व बिजली परियोजना के आस-पास का वातावरण तेजी से विद्युत चुम्बीय प्रदूषण की चपेट में आ रहा है। अन्य प्रदूषण की तरह यह दिखाई तो नहीं पड़ता मगर यह मानव षरीर के नाजुक व प्राकृतिक ऊर्जां तंत्र को अस्त-व्यस्त कर षरीर की प्रतिरोधक क्षमता को क्षीण करता है इतना ही नहीं हाई बोल्टेज के तारों के गुजरने वाले रास्तें के बस्तीयों पर भी इसका प्रतिकुल असर पड़ने की बात बतायी गयी है।

विद्युत चुम्बीय प्रदूषण को जन्म देने वाले महत्वपूर्ण कारकों की खोज में लगे वैज्ञानिकों ने बताया कि ‘‘हाई बोल्टेज के तार, मोबाईल टावर, मोबाईल पर लम्बी बातचीत, फ्रिज, माईक्रोवेव, ओवन, वेक्यूम क्लीनर, बाल सुखाने का यंत्र, खदानों से पानी फेकने की बड़ी मोटर, फूड प्रोसेसर, कम्प्यूटर, टेजीविजन, विडियों गेम, फोटो कापी मषीन, हीटर, इलेक्ट्रानिक वायर व अन्य विद्युत संचालित यंत्र है।’’ चूंकि यह प्रदूषण कुछ दषकों में ही फला-फूला है लेकिन इसके लम्बे परिणाम काफी घातक हो सकते है। हालाकि वैज्ञानिक मोबाईल फोन से मस्तिक कैंसर की बात को नकार रहे है जबकि कुछ खोज इस सम्भावना पर ही चल रही है। बताया जाता है कि जब पहली बार ‘‘सिगरेट पीने से फेफड़ों के कैंसर की बात आयी थी तो बवाल मच गया था। सिगरेट कम्पनियाँ पैसों के दम पर इस मामले को दबाना चाहती थी परन्तु असफल रही। लोगों का अनुमान है कि वह समय दूर नहीं जब मोबाईल पर वैधानिक चेतावनी लिखी जाने लगी कि ‘‘पाॅच मिनट से अधिक मोबाईल पर बात करना हानिकारक हैं। आज मोबाईल का इस्तेमाल न करने वालों का क्लब अमेरिका में चल रहा है। विष्व में न्यूजीलैंड पहला देष है जिसनें स्कूल के विकलांगों व उसके आस-पास मोबाईल टावर को प्रतिबंधित कर रखा हैं। मोबाईल फोन से वाहन दुर्घटना मंे जबजस्त बढ़ोत्तरी हुई। भारत सहित कई देषों ने वाहन चलाते समय मोबाईल प्रयोग पर प्रतिबंध लगा चुका हैं। क्योकि वाहन चलाते समय मोबाईल का प्रयोग करने से मस्तिक्स पर विद्युत चुम्बीय प्रभाव दस गुना अधिक रहता है। न्यूजीलैंड के विष्वविद्यालय ने मोबाईल इस्तेमाल से षरीर में मिनरल, हार्माेन, कैल्षियम आदि तत्वों के असंतुलन की बात कहीं। 

विद्युत चुम्बीय क्षेत्र से होने वाली बिमारी व लक्षण
थकान, सिरदर्द, तनाव, बालों का झड़ना, बेचैनी, थापराईड ग्रंथी की समस्या, असमय बुढ़ाता, अल्जाइमर, पार्किसन्स, कोषकीय क्षरण, इत्यादि इसके प्रमुख लक्षण है इसके अलावा यादाष्त, अनिद्रा, मुहं व मस्तिक का कैंसर, हृदय रोग, किडनी की समस्या, स्थायी रूप से ले सकती हैं। इस नये प्रदूषण से मुक्ति के लिए हमंे मोबाईल फोन से सम्पर्क कम रखना होगा। छः मिटन से ज्यादा बात नहीं करनी होगी। अगर मोबाईल मे सिग्नल कम हो तो बात नहीं करनी चाहिए क्याकि ऐसे समय फोन के विद्युत चुम्बीय क्षेत्र का घनत्व सबसे अधिक होता है। बस, ट्रेन में चलते समय फोन पर सिंग्नल सबसे अधिक होता है। खड़ी गाड़ी में चुम्बकीय क्षेत्र सबसे अधिक होता है जो आस-पास के लोगों केा भी प्रभावित करता है। वैज्ञानिक भाषा में ‘‘फराडे केज’’ प्रभाव कहते है। हाई टेंषन तार के निचे बात करना मौत को दावत देना है, मुम्बई के बाद्रां स्टेषन पर एक लड़के की मौत ने इसे साबित भी कर दिया है।

मिठाई संग डिब्बे का भी दाम


  • मिठाई के साथ डिब्बे की भी कीमत वसूल रहे विक्रेता।
  • बाट माप मानक की उड़ाई जा रही है धज्जियां।

सोनांचल में मिठाई विक्रेता मिठाई के साथ डिब्बे की भी कीमत वसूल रहे हैं। यही नहीं सब्जी विक्रेता से लेकर सोनारों की दुकानों तक घटतौली पहुंच गई है। पेट्रोल पंपों पर कम पेट्रोलियम देने को लेकर प्रायः किचकिच होती है बावजूद इसके जिले का बाट माप विभाग मौन है। इससे प्रतिदिन सैकड़ों ग्राहकों को चूना लग रहा है। एक तरफ तो शासन द्वारा व्यापक प्रचार प्रसार के माध्यम से लोगों को जागरुक करने का प्रयास किया जा रहा है और जागों ग्राहक-जागों के कषीदे पढ़े जा रहें है। लोगों को घटतौली से सावधान रहने, कैसे कैसे घटतौली होती है इसको बताया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ घटतौली को लेकर बाट माप विभाग लापरवाह बना हुआ है। विभागीय लापरवाही की वजह से ही सोनांचल में घटतौली आम बात हो गई है। मिठाई की दुकानों पर मिठाई के संग डिब्बों को तौला जा रहा है, वहीं सब्जी विक्रेता अभी भी पत्थरों की बाट बना कर सब्जियां तौल रहे हैं। अंतिम बार दुकानदारों के बाट की जांच कब की गई थी यह दुकानदारों को भी नहीं मालूम है। घटतौली की शिकायत पर दुकानदार सीधे पैसे देने की बात कह देते हैं। पेट्रोल पंपों पर भी कम पेट्रोल और डीजल की माप की जा रही है। बावजूद इसके लोगों की सुनने वाला कोई नहीं रह गया है। जनपद में तीनों तहसील हैं सभी के लिए अलग अलग कार्यालय होने का प्रावधान है लेकिन जनपद में घोरावल और राबर्ट्सगंज तहसील में बाट की माप करने की जिम्मेदारी एक कार्यालय पर है। राबर्ट्सगंज स्थित कार्यालय पर तैनात निरीक्षक पूरे सप्ताह क्षेत्र भ्रमण पर रहते हैं। कार्यालय पहुंचने पर उपस्थित कर्मचारियों द्वारा सिर्फ बुधवार को निरीक्षक के बैठने की बात की जाती है। ऐसे में लोगों को समझ में नहीं आता है कि वे अपनी शिकायत कहां करें। एक कार्यालय दुद्धी में भी है। यहां भी कमोबेश यही स्थिति है। विभाग का प्रधान कार्यालय वाराणसी में हैं। यहां से अत्यंत दूरी होने की वजह से ही जनपद के अधिकारी मनमानी पर उतारू हैं। इसका खामियाजा उपभोक्ताओं का भुगतना पड़ रहा है। 

मनरेगा में सीबीआइ जाँच की परवाह नहीं !


विकासखण्ड-म्योरपुर के ग्राम पंचायत औड़ी में मनरेगा के तहत बन्धी निर्माण के कार्य में मजदूरों की बजाय जेसीबी मसीन एवं ट्रैक्टर का प्रयोग किया जाना मनरेगा में भ्रष्टाचार की बात सही साबित कर रही है। यह सुचना सुभाष चन्द्र, क्षेत्र पंचायत सदस्य एवं शक्ति आनन्द, ग्राम पंचायत सदस्य ने दी। उन्होंने बताया की ग्राम पंचायत औड़ी के प्रधान द्वारा स्व. रामप्यारे के खेत में कराये जा रहे बन्धी निर्माण के कार्य में मजदूरों की बजाय जेसीबी मसीन एवं ट्रैक्टर का प्रयोग कर मनरेगा में कार्य पिछले एक स्प्ताह से सम्पादित किया जा रहा है तो हमने मौके पर स्थल पर पहुँचकर कार्य को देखा एवं वहा कार्य में लगे हुए लोगों से कार्य के विषय में पूछ-ताछ की तो पता चला कि बन्धी निर्माण का कार्य कराया जा रहा है तथा उक्त कार्य पिछले एक सप्ताह से प्रगति पर है। पंचायत मि़त्र अनिल यादव व ग्राम प्रधान द्वारा यह कार्य कराया जा रहा है, उक्त जेसीबी मषीन ग्राम प्रधान की ही है। ज्ञात हो कि मनरेगा अधिनियम के तहत मनरेगा के कार्यो में मशीनों का प्रयोग वर्जित है। जो अधिनियम में निहित है। उक्त की लिखित षिकायत जिलाधिकारी, सोनभद्र को फैक्स द्वारा प्रेषित की जा चुकी है। 

क्यों कम्पनियाँ कतराती है मेडिकल सूविधा उपलब्ध कराने से


कम्पनियों में काम करने वाला मजदूर अपना खुन पसीना एक कर कम्पनी को हर माह करोड़ों का लाभ कमा कर देता है, इस बाबत कम्पनी खुस होकर दावा करती है कि कम्पनी हर मजदूर के लिए हर सुविधाए उपलब्ध करायी जायेगी। लेकिन जब मजदूर कार्य के दौरान घायल हो जाता है, तब वहीं मजदूर कम्पनी के लिए बोझ बना जाता है इस स्थिति में कम्पनी किसी भी तरीके से अपना पीछा छुड़ाने में लगी रही है। कम्पनियों के द्वारा मजदूरों का उपेक्षा इतनी हद तक बढ़ गयी है कि कम्पनियों में लगातार स्थिति बिगड़ती जा रही है। मजदूरों को अपने हक के लिए दर-दर की ठोकरे खानी पड़ रही है। 

ज्ञात हो कि लैंकों परियोजना के अधिनस्त कार्य करा रही टेप्रो सिस्टम में कार्य कर रहे मजदूर राम सजीवन चैबे कार्य के दौरान गढ़ढा में उतर रहे थे तभी अचानक से पैर फिसलने से गिर पड़े और हल्की सी खरोच लग गयी कार्य समाप्त होने के बाद जब वह अपने घर आये तो उनके एक पैर में सूजन हो गयी थी। अपने इस सूजन एवं लेगे चोट को दिखाने के लिए अपने पड़ोस के छोला-छाप डाॅक्टर के पास गये डाॅक्टर ने कार्य के दौरान लगे चोट को देखा और कहा ये एक फोड़ा है यह एक-दो दिन मंे ठीक हो जायेगा। डाॅक्टर ने उन्हे कुछ दवाये लिखी और इंजेक्सन लगाते कहा कि आप ठीक हो जायेगें। दूसरे दिन जब स्थिति ज्यादा खराब होने लगी तो इस उम्मीद में वे स्थानीय सरकारी चिकित्साल मंे इलाज के लिए गये, अच्छे डाॅक्टर उनका इलाज कर जल्द ही कर देगें, सरकारी अस्पताल के डाॅक्टर ने घाव को देखते ही कहा कि यह तो सेप्टीक है मैं आप को कुछ दवाये व इंजेक्सन लिख देता हूँ इसे आप किसी डाॅक्टर से लगवा लेना जो दवाये आप को दी जा रही हैं उनकों आप ठीक टाईम से खा लिजीएगाँ। तीसरे दिन जब घाव में काफी ज्यादा मात्रा में सूजन के साथ ही उनके पेट और गले में भी सूजन दिखने लगी इस कारण से उनको सांस लेने में परेषानी आने लगी तो रात में 12 बजे गाड़ी बुक कर वाराणसी के लिए रवाना हुए। 

जानकारी के अनुसार वाराणसी में लगभग एक माह से अपना ईलाज करा रहे राम सजीव चैबे को काफी आर्थिक एंव षारिरिक छती उठानी पड़ी, इस बिमारी के दौरान हुए घाव ने उनको लगभग पूरी तरह अपाहिज बना दिया है। परिवार का बड़ा पुत्र अपने पिता के इलाज के लिए वाराणसी के कई अस्तपालों का चक्कर काटने के बाद एक निजी अस्पताल में अपने पिता का इलाज करा रहे संदीप चैबे अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए एक छोटी सी दुकान चलाते है लेकिन पिता की बिमारी ने इस दुकान को भी बन्द करा दिया है। जिससे उनके सामने भूखों मरने की स्थिति बन चुकी है। चैबे जी जिस कम्पनी के अन्दरगत् कार्य कर रहे थे उस कम्पनी द्वारा हाथ खड़ा कर लिए जाने के बाद स्थिति और भी चिन्ताजनक हो गयी है। जब कि उनका इलाज लगातार जारी है डाॅक्टरों के द्वारा काफी पैसों की मांग आये दिन होती ही रही है। उनके साथ काम करने वाले अन्य मजदूरों द्वारा कम्पनी के पीएम के पास इस बात की सूचना दे दी गयी है कि चैबे जी कार्य के दौरान चोट लगने से काफी दिनों से बिमार चल रहे इस कारण से अपने कार्य पर नहीं आ पा रहे, लेकिन कम्पनी के आलाधिकारी इस बात को मानने लिए तैयार नहीं है। इसी क्रम में अनपरा परियोजना में कार्य करने वाले मजदूर सोनू कुमार निवासी डिबुलगंज कार्य के दौरान गम्भीर रूप से घायल हो गया संविदा कम्पनी द्वारा तत्काल किसी निजी चिकित्सालय में भर्ती कराया लेकिन भर्ती कराने साथ ही कम्पनी अपने जिम्मेदारियों से भागने लगी। 

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

ग्रामीणों ने किया रोजगार के लिए आवेदन


 ग्राम पंचायत औड़ी में ग्राम पंचायत सदस्य शक्ति आनन्द द्वारा मनरेगा के तहत बकाया मजदूरी, रोजगार आवेदन, एवं नये जाॅब कार्ड बनाने के सम्बन्ध में ग्रामवासियों के बीच ग्राम औड़ी के सुभाषनगर में एक बैठक की गई। जिसमें मनरेगा के तहत कराये गये विभिन्न कार्यों में मजदूरों की बकाया मजदूरी के आकड़े एवं उनके द्वारा मौखिक बयान एकत्रित किए गए एवं उक्त बकाया मजदूरी को शीघ्र ही भुगतान कराने के लिए प्रयास करने का आष्वासन मजदूरों को दिया। 

शक्ति आनन्द
शक्ति आनन्द द्वारा सभा में सैकड़ो मजदूरों का मनरेगा के तहत कराये जाने वाले कार्यो में रोजगार के लिए रोजगार आवेदन फार्म भरे गये व 15 दिन के भीतर मजदूरों को काम दिलवाने की बात कही गई। उन्होंने बताया की ज्यादातर मनरेगा मजदूर अषिक्षित होने के कारण कागज पर रोजगार आवेदन नही करते, जिससे उन्हें इस योजना का केन्द्र सरकार की मंषा के अनुरूप सही लाभ नहीं मिल पाता है, और वे बेराजगारी भत्ता के पात्र होने से भी वंचित हो जाते है। उन्होंने आष्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि पुरे सोनभद्र में पिछले पंचवर्षीय में न तो कही बेरोजगारी भत्ता मजदूरों को प्राप्त हुआ है और ना ही ज्यादातर मजदूरों ने रोजगार आवेदन फार्म भरकर रोजगार मांगा है, जबकि मनरेगा के कार्यो में मजदूर कभी भी रोजगार के लिए रोजगार आवेदन फार्म भरकर रोजगार मांग सकता है। इस सभा में नये जाॅब कार्ड बनाने के लिए आवेदन फार्म भी भरे गए एवं उन्हे भी जल्द ही पंचीकृत कराकर पात्रों को देने की बात कही गई।

आदिम युग सा जीवन जीने के लिए मजबूर कई गाँव के लोग।


जनपद-सोनभद्र के जिला मुख्यालय से सैकड़ों किमी दूर पहाड़ों पर स्थित कई गाँव हाईटेक प्रगति के दौर में भी आदिम युग सा जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। इन गांवों के कई बड़े बच्चों ने अब तक पक्का रोड नही देखा है। गांव के घरों तक आज भी बिजली नहीं पहुंची है, जिसके कारण ये गांव आदिम युग में है, पीने व नहाने के पानी के लिए नालों व चुआडत्रों का सहारा है। गाँव के लोगों का कहना है कि कई परिवारों के पास राशन कार्ड ही नही है तथा राशन लेने के लिए भी उन्हें दस-ग्यारह किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, जहां से अपने पीठ पर या साईकिल पर लादकर राशन लाना पड़ता है। गांव में स्वास्थ सुविधा के नाम पर कोई प्र्याप्त व्यवस्था भी प्रशासन द्वारा नहीं की गई है। 

हर ओर से छले जा रहे हैं किसान


विगत साल मानसून के देर से आने की वजह से किसान धान की रोपाई हीं कर पाए। मानसून आया तो अब किसानों को समितियों से खाद और बीज नहीं मिल रहा है। ऐसे में किसानों को बाजार से ऊंचे दामों में खाद और बीच खरीदना पड़ रहा है। कुछ समितियों पर यदि खाद और बीज मिल भी रहा है तो वह भी चयनित कुछ ही किसानों को। छोटे किसानों को तो कोई पूछने वाला ही नहीं है। हकीकत यह है कि समितियों का गोदाम खाली न होने की वजह से खाद और बीज नहीं मंगाया जा रहा है। जिले में 72 सहकारी समितियां हैं। इसमें 67 समितियां काम कर रही हैं। कुछ समितियों पर खाद-बीज उपलब्ध है। ज्यादातर समितियों के गोदाम खाली ही नहीं है। ऐसे में खाद रखने के लिए जगह ही नहीं है। किसानों को समय पर खाद और बीज नहीं मिलना कोई नई बात नहीं है। समय बीत जाने के बाद समितियों पर खाद आती है। सिर्फ समिति पर चयनित किसानों को ही खाद-बीज मिल रहा है। जो किसान समिति से नहीं जुड़े हैं, उनकी बाजार से खाद-बीज खरीदना मजबूरी है। दुद्धी क्षेत्र में आधा दर्जन समितियां हैं, यहां खाद आई लेकिन कुछ लोगों को ही मिला, किसान समितियों का चक्कर लगाकर वापस चले जा रहे हैं, खाद-बीज की समस्या पर किसानोें से बात करने पर उनका दर्द झलकने लगा। एक सवाल पर ही कई समस्या गिना गए, बताया कि प्रशासन का भी सहयोग नहीं मिल रहा है, दस बोरी खाद की जगह एक बारी मिल रही है। नहर भी चालू नहीं की गई है, किसानों को सुविधाएं नहीं मिलने से परेशान हैं, जरूरत भर की खाद और पानी ही नहीं मिल रहा है, जब जरूरत होती है तब खाद नहीं मिलती है, समिति केवल दिखाने के लिए बनी है। नहर में पानी नहीं आने से नर्सरी सूख रही है। विभाग की मनमानी भी किसानों पर भारी पड़ती है, अधिकारी समय से खाद-बीज की व्यवस्था नहीं कर पाते। बाजार के बीज में मिलावट की संभावना बनी रहती है, कुछ बीजों में कलर डालकर उसकी किस्म बदल दी जा रही है। बीज केंद्रों पर पर्याप्त बीज नहीं है, इसके साथ ही जो किस्म किसानों को चाहिए वह नहीं मिल पा रहा। 

किलर रोड़

किलर रोड़ के नाम विख्यात वाराणसी-षक्तिनगर मार्ग पर सैकडों दुर्घटनाओं में लोगो की जान जाने के बाद अनपरा मेें पुलिस द्वारा लगाये गये सड़क सुरक्षा की दृष्टि से जगह-जगह लगाये गये गति अवरोधकों को वाहन चालकों ने कही भी सुरक्षा के लिए लगे ड्रमों को सुरक्षित नहीं रहने दिया है। ज्ञात हो कि पुलिस एंव नागरिकों की पहल पर बार-बार हो रही दुर्घटना रोकने के लिए जनसहयोग से हर 500 मीटर पर गति अवरोधक लगाकर दुर्घटना पर अंकुष निष्चित तौर से लगाया गया, परन्तु कोयला से लदें ओवर लोड वाहन ज्यादा ट्रीप लगाने के चक्कर में लगाये गये गतिअवरोधकों की धज्जिया उड़ाकर पुलिस व आम जनता के सड़क सुरक्षा के मंसूबों पर पानी फेर रही है। स्थानीय लोगो ने मांग किया है कि जिस वाहन से सुरक्षा के लिए लगे गति अवरोधकों को ध्वस्त किया जायेगा उसे पता कर दण्डित किया जाना चाहिए। 

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

खनन क्षेत्र में मजदूरों की मौत के मामले में प्रशासन की भूमिका


विंध्य क्षेत्र खासकर सोनभद्र के खनन क्षेत्र में हो रही मजदूरों की मौत के लिए प्रशासन की भूमिका संतोषजनक नहीं हैं। सोनभद्र के जिला खान अधिकारी कार्यालय के आंकड़ों की मानें तो उत्तर प्रदेश उप खनिज (परिहार) नियमावली 1963 के प्रावधानों के तहत कुल 269 खनन पट्टे स्वीकृकृत हैं। बुनियादी तौर पर खान विभाग के आंकड़े वास्तविकता से कोसों दूर हैं। 

बिल्ली, मारकुंडी, डाला, चोपन, बारी, रासपहाड़ी, सलखन, खैराही, सुकृत, घोरावल, पकरहट, बहुअरा आदि खनन क्षेत्र का निरीक्षण करने पर इनकी तादात हजारों में है जो पूरी तरह अवैध हैं। खनिज पदार्थों के परिवहन में भी खनन माफियाओं द्वारा बड़े पैमाने पर राजस्व चोरी की जा रही है, फिर भी प्रशासन मौन है। अवैध परिवहन की बात कई बार जिला प्रशासन के छापे में सामने आ चुकी हैं। खनन क्षेत्र में अवैध खनन की पुष्टि जिला खान अधिकारी भी कर चुके हैं। इतना ही नहीं, खनन क्षेत्र में हो रही ताबड़तोड़ मौतों और अवैध खनन के बाद भी जिला प्रशासन राबर्ट्सगंज तहसील के अन्तर्गत खनन के लिए बकायदा टेंडर जारी कर पट्टा आवंटन को अंजाम दे रहा हैं। 

वैध खदानों की आड़ में अवैध खनन व परिवहन कर रहे खनन माफियाओं पर अंकुश लगाने में असफल प्रशासन की कारगुजारियों के कारण खनन क्षेत्र में मजदूरों की मौतों में इजाफा हो रहा है। विंध्य क्षेत्र में अवैध खनन और परिवहन पर यथाशीघ्र अंकुश लगाने की जरूरत है। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब आदिवासियों की लोक संस्कृति इतिहास के पन्नों में ही पढ़ने की मिलेगी।

पत्थर की खदानों में क्यों जान गंवाते हैं मजदूर ?


विंध्य क्षेत्र का सोनभद्र, मिर्जापुर, चन्दौली, सिंगरौली (म0प्र0), गढ़वा (झारखंड), भभुआ (बिहार) आदि जनपद आदिवासी बहुल जनपद है। विंध्य क्षेत्र में निवास करने वाले ज्यदातर आदिवासी-दलित परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। इन परिवारों में शिक्षा और सरकारी योजनाओं के प्रति जागरुकता का घोर अभाव है। साथ ही क्षेत्र में कल-कारखानों की स्थापना के बाद विस्थापन और भूमिहीनता का दंश झेल रहे आदिवासियों, परंपरागत वन निवासियों, दलितों समेत मजलूमों के सामने रोजगार का सबसे बड़ा संकट खड़ा है। 

तकनीकी क्षेत्र में कुशलता का अभाव, सरकार की वादा खिलाफी और भ्रष्टाचार में डूबी नौकरशाही के चलते विंध्य क्षेत्र के निवासियों के सामने रोटी की जुगाढ़ की समस्या, सुरसा के मुह की तरह खड़ी है। बेरोजगारी, जिम्मेदारी और लाचारी से बेहाल विंध्य क्षेत्र बाशिदों के लिए मौत का कूआं बन चुकी पत्थर, बालू, मोरम आदि की अवैध खदानें अपने और अपने परिवार के पेट में लगी आग को शांत करने के जुगाड़ के रूप में सहायक सिद्ध हो रही है। 

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना समेत केन्द्र और राज्य सरकार की अन्य योजनाएं भ्रष्ट नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों की वादाखिलाफी के कारण विंध्य क्षेत्र के परिवारों को राहत नहीं दे पा रही हैं। इन कारणों के चलते बेबश एवं लाचार विंध्य क्षेत्र के गरीब पत्थर, मोरम और बालू की खदानों में दम तोड़ने को मजबूर हैं।

पत्थर की खदानों में काम करते समय परिवार के दोनों व्यक्तियों की कब मौत हो जाए और पूरा परिवार दाने-दाने को मोहताज हो जाए, इस बात का भय पूरे परिवार को हमेशा सालता रहता है। खनन माफिया पुलिस की मिलीभगत से पूरे मामले को ही रफा-दफा कर देते हैं। पत्थर की खदानों में मरने वाले सैकड़ों मजदूरों के परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गये हैं और भूखमरी की कगार पर हैं। अगर समय पर इन परिवार के सदस्यों को रोजगार और सरकारी योजनाओं की सहायता नहीं मिली तो विंध्य क्षेत्र में भूखमरी और कुपोषण से मरने वाली संख्या में इजाफा हो सकता है ।

क्यों होती हैं अक्सर ये दर्दनाक मौतें ?


यह एक पहेली है, फिर भी पूर्व में हुई मौतों के कारणों पर गौर करें तो तीन बातें प्रमुख रूप से सामने आती हैं-

पहलाः-विंध्य क्षेत्र की पत्थर की खदानों में काम करने वाले अधिकतर मजदूर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के उन परिवारों के होते हैं जो गरीबी का दंश झेल रहे होते हैं। जंगलों में निवास करने वाले भूमिहीन आदिवासी एवं पारंपरिक वन निवासी मजदूर पत्थर, मोरम, मिट्टी, बालू, कोयला आदि की खतरनाक खदानों में विस्फोटक पदार्थों के इस्तेमाल और खनन के लिए प्रशिक्षित नहीं होने के कारण मौत का कूआँ बन चुकी पत्थर की खदानों में जरा-सी चूक पर अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठते हैं। विंध्य क्षेत्र की पत्थर की कई खदानें 50 मीटर से लेकर 200 मीटर तक गहरी हो चुकी हैं। इन खदानों में काम करना अप्रशिक्षित मजदूरों के लिए शेर की माद में घुसने के बराबर है।

दूसराः-विंध्य क्षेत्र में डोलो स्टोन, सैंड स्टोन, लाइम स्टोन, कोयला, बालू, मोरम आदि का अकूत भंडार है। इन खनिज पदार्थों के दोहन के लिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के माफियाओं और सफेदपोशों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। सत्ताधारी पार्टियों के नुमाइंदे बनकर मलाईदार मंत्रालयों की कुर्सी सम्भाल रहे कुछ सफेदपोशों ने विंध्य क्षेत्र से धन उगाही के लिए बकायदा अपने एजेंटों को तैनात कर दिया है और शासन के मानकों की धज्जियां उड़ाकर अवैध खनन एवं परिवहन को बढ़ावा दे रहे हैं। 

भ्रष्टाचार के आंकठ में डूबी नौकरशाही और सफेदपोशों के चलते खनन माफियाओं ने पूरे विंध्य क्षेत्र में अराजकता का माहौल पैदा कर दिया है। खनन माफिया विंध्य की पहाडयिों पर खुलेआम अवैध खनन करवा रहे हैं। साथ ही खनन विभाग द्वारा जारी एमएम 11 परमिट के बिना मिट्टी, मोरम, बालू, बोल्डर आदि का परिवहन करवा रहे हैं। इन बातों की पुष्टि जिला प्रशासन द्वारा गठित टीम के छापेमारी में भी आए दिन होती रहती है।

पत्थर की खदानों के लिए शासन द्वारा निर्धारित मानक को खनन क्षेत्र में कोई भी खदान संचालक पूरा नहीं करता है। खनन क्षेत्र में मौत का कूआं बन चुकी पत्थर की गहरी खदानों में सुरक्षा के कोई भी इंतजाम नहीं है। खदान अथवा क्रशर प्लांट को जाने वाले रास्ते तारकोल और खड़ंजा युक्त नहीं है। ना ही किसी पत्थर की गहरी खदान के चारों ओर बाउंड्री वाल बनाया जाता है। सुरक्षा के इन इंतजामों के अभाव में मजदूरों की मौत बड़े पैमाने पर हो रही है। 

तीसराः-अवैध खनन और परिवहन को रोकने के लिए जिला प्रशासन ने टास्क फोर्स की टीमें गठित की है, लेकिन ये टीमें औपचारिकता मात्र बन कर रह गयी है। समाज सेवियों की बार-बार शिकायत पर कभी कभार ये टीमें खनन क्षेत्रों में छापा मारती है तो बड़ी मात्रा में अवैध खनन और परिवहन का मामला प्रकाश में आता है। टीम द्वारा औपचारिकता पूरा करते हुए अवैध क्रशर प्लांट व बिना एमएम 11 की परमिट वाले वाहनों को सीज किया जाता है। इसके कुछ ही घंटों बाद खनन व परिवहन माफियाओं के प्रभाव के चलते सीज वाहन सड़कों पर दौड़ने लगते है और क्रशर प्लांट क्षेत्र में शोर मचाते हुए जहर उगलने लगते हैं। इतना ही नहीं जिला प्रशासन की उदासीनता और सत्ता में बैठे सफेदपोशों की शह के चलते खनन माफिया अब खान विभाग की टीम पर हमला भी बोलने से नहीं डरते हैं। 

विंध्य क्षेत्र खासकर सोनभद्र जनपद के खनन क्षेत्रों में पूर्वांचल के माफियाओं की दखलदांजी ने मजदूरों समेत अन्य मजलूमों की मौतों में इजाफा कर दिया है। जनपद में हो रही हत्याओं के प्रति जिला प्रशासन की उदासीनता और खनन माफियाओं के डर से खनन क्षेत्र में हो रही मौतों की सच्चाई बोलने में हर व्यक्ति खतरा महसूस कर रहा है। इसके चलते पुलिस महकमा खनन क्षेत्र में हो रही हत्याओं को दुर्घटना करार देकर सच्चाई का दम घोट रहा है।