लैंको अनपरा पावर परियोजना द्वारा विस्थापितो के साथ हुये समझौते का अनुपालन न किये जाने से रोष व्याप्त है। कार्यकर्ताओ ने लैंको को चेतावनी देते हुए कहा अगर स्थानीय विस्थापितो के साथ वादा खिलाफी की गयी तो परिणाम गम्भीर होगें। बुधवार केा समाजवादी पार्टी के महासचिव सईद कुरैषी ने बताया अनपरा के विस्थापित प्रतिनिधि के नेतृत्व मे मुख्यमंत्री अखिलेष यादव से मिलकर स्थानिय विस्थापितो के समस्या से लैंको पावर के स्थानीय प्रबंधन द्वारा किये जा रहे खिलवाड के बारे मे बताया। पत्र मे उन्होने 9 फरवरी 2009 के समझौता के अनुपालन के अलावे जिलाधिकारी के पत्र 3 दिसम्बर 2012 के आदेष का पालन नही करने का जिक्र किया है। कुरैषी ने मुख्यमंत्री को जनपद सोनभद्र के नक्सल प्रभावित जिले मंे युवको को लैंको द्वारा रोजगार न दिये जाने का जिक्र करते हुये असहयोग की बात कही है। वही सपा नेता पंकज जायसवाल ने मुख्यमंत्री से लैंको की कई खामियां के बारे मे विस्तृत जानकारी दी। उन्होने कहा लैंको जान बूझकर परियोजना को नही चलाना चाह रही है। 1200 मेगावाट क्षमता के विद्युत गृह से 500 मेगावाट से ज्यादा कभी उत्पादन नही हो पा रहा है। लैंको के अधिकारी को रैक से कोयला चोरी करवाने व कीमती सामान को कबाडि़यो के हाथ बेचे जाने का भी आरोप लगाया।
इस ब्लाग की के किसी भी लेख से कोई व्यवसायीक लेन-देन नहीं है। यह सारे लेख सोनभद्र की समस्याओं एवं सामाजिक पहलुओं से जुड़े है। हमारा मानना है की ज्ञान समाज के विकास के लिए होता है यदि कहीं से ली गयी किसी सामाग्री पर किसी कों आपत्ति है तो हमें सूचित करे हम उसे हटा देंगे। ---धन्यवाद!---- सम्पर्क करेः shakti.anpara@gmail.com Mob: 07398337266, PH: 05446-272012
सोमवार, 21 जुलाई 2014
ऊर्जांचल में प्रदूषण की समस्या हुई बेकाबू
ऽ मुख्य हाइवे पर क¨यले की मोटी पर्त जमा
ऽ उप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित परियोजनाए प्रदूषण से निपटने में फ्लाप
ऽ प्रदूषण के चलते ल¨ग गंभीर बीमारिय¨ की चपेट में
ऽ मजबूरी में लोग फांक रहे है धूल
केंद्रीय पर्यावण एवं वन मंत्रालय तथा प्रदूषण नियंत्रण ब¨र्ड की दिशा-निर्देश की धज्जिया उ़ाते हुए क्ष्¨त्र में प्रदूषण लगातार विकराल रूप धारण करता जा रहा है। आलम यह है कि वाराणसी-शक्तिनगर मुख्य हाइवे सहित एनएच 75 ई पर कोयले तथा राख की मोटी परत जम गई है। सड़क पर लगातार चल रहे वाहनों से निकल रहे धूल एवं धुए की धुंध-कोहरे की मानिंद वातावरण क¨ जहरीला बना रहे है। जिसके लते सड़क किनारे रहने वाले लोगो को कई तरह की गंभीर बीमारियां चपेट में ले रही है। विकराल प्रदूषण के चलते कई ल¨ग त¨ चिकित्सको की सलाह पर महफूज स्थानों की अ¨र पलायन तक कर चुेे
उत्तर प्रदेश की लगातार बिगड़ती जा रही कानून-व्यवस्था-शक्ति आनन्द
शक्ति आनन्द
उत्तर प्रदेश की लगातार बिगड़ती जा रही कानून-व्यवस्था और बेकाबू होते अपराध के सवाल पर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर गैर जिम्मेदराना और विवादित बयान जारी किया है। लखनऊ में हुए निर्भया कांड जैसे दुर्ष्कम पर मुलायम सिंह यादव कहा कि उत्तर प्रदेश की आबादी 21 करोड़ है। इतने बड़े प्रदेश में हर अपराध रोका नहीं जा सकता है। युवा कांग्रेसी व समाजसेवी शक्ति आनन्द ने इस बयान की कड़ी निन्दा करते हुए कहा कि लखनऊ के मोहनलालगंज इलाके में 30 साल की महिला से दुष्कर्म और हत्या की दिल दहला देने वाली घटना सामने आने के 60 घंटों बाद भी पुलिस खोखले दावे कर रही है, लेकिन आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर पाई है। श्री आनन्द ने कहा कि पिछले दो वर्षो से यूपी में अपराध व महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनायें ज्यादा हो रही है। अब तो इस सरकार से क्राइम पर नियंत्रण की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। जिसके सन्दर्भ में शनिवार को युवा कांग्रेस ने अपनी एक सप्ताहिक बैठक में यह योजना बनाई है कि सोनभद्र युवा कांग्रेस के पदाधिकारी जल्द ही महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों पर उत्तर प्रदेष में प्रभावी कानून व्यवस्था बनाये जाने हेतु वृहद पैमाने पर आन्दोलन किये जाने हेतु अपने प्रदेष कार्यकारिणी समिति से आग्रह करेगी। बैठक में ओम प्रकाष दूबे, उपाध्यक्ष, ओबरा विधान सभा, हरिनाथ खरवार, लक्ष्मीकान्त दूबे, मुकेष पाण्डेय, मोहम्मद सद्दाम, अंकुर मेहता आदि उपस्थित रहे।
बुधवार, 16 जुलाई 2014
आश्चर्य का विषय बनी 160 वर्षीय बुटली देवी
ः- बन सकता था सबसे लम्बी उम्र तक जीवित रहने का रिकार्ड
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| बुटली देवी |
| बुटली देवी के साथ सत्तन राम |
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| अखबारों में छपि खबर |
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| अखबारों में छपि खबर |
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कभी गुमनामी की जिन्दगी बसर कर रही बुटुली देवी आज ऊर्जांचल के जन-जन में चर्चा की विषय बन गयी है। गुमनाम बुटुली देवी को खोज के बाद जहाँ लोगों में उत्सुक्ता का विषय बनी वृद्धा हर दिल अजीज बन चुकी है। कुछ स्थानीय लोगों ने तो उन्हें ऊर्जांचल की माँ के नाम से सम्बोधित करना प्रारम्भ कर दिया है। वहीं उनके जानने वाले गाँव व पास-पड़ोष के लोगों ने तो उन्हें रहस्य की पोटली कहा है।
पंकज मिश्रा
"कांग्रेसी नेता पंकज मिश्रा ने बुटुली देवी की अवस्था पर कहा कि हम केन्द्र सरकार से इस सम्बंध में अनुरोध करेगें की बयोवृद्ध बुटुली देवी को हर सम्भवद मदद एवं सुविधा मुहैया करायी जाय। जिससे अपेक्षा की शिकार वृद्धा का जीवनकाल और लम्बा हो सकें और सोनभद्र की धरती का नाम इतिहास के पन्नों में हमेषा-हमेषा के लिए दर्ज हो जाये और किसी परिचय के लिए मोहताज न होना पडे़े।"
शक्ति आनन्द
"बुटली देवी की समाज के नजरों तक लाने में अहम भूमिका निभाने वाले शक्ति आनन्द और संजय कुमार ने मांग की है कि सोनभद्र सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में 100 बसंत देख चुके कई ऐसे वृद्ध है जो अच्छे स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में लम्बी उम्र नहीं जी पाते है। जिसकी जीता जागता सबुत बुटुली देवी है। जिनकी अवस्था 135 वर्ष है यदि उन्हें अच्छी बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल जाये तो वे 150 वर्ष से अधिक जी सकती है। उन्होनंे मांग किया कि जिला प्रषासन उन्हें स्वास्थ्य सेवाएं निःषुल्क उपलब्ध करायें एवं सोनभद्र में ग्रामीण क्षेत्रों ऐसे जितने भी वृद्ध हो 100 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हो उन्हें चिंहित कर सूची बद्ध किया जाय। जबकि स्वास्थ्य विभाग के ऊर्जांचल परिक्षेत्र में उदासीन रवैये के कारण कई लोग बगैर अपनी पूरी उम्र जिये ही चल बसते है। जिसके कारण आज कल 100 वर्ष की उम्र के व्यक्तियोें का मिलना लगभग नहीं सा लगता है। बुटुली देवी एक चमत्कार के रूप में ऊर्जांचल में सामने आयी है।"
शिवशंकर तिवारी
भाठ क्षेत्र निवासी शिवशंकर तिवारी का कहना है कि भाठ क्षेत्रों में चिकित्सा के नाम विभाग द्वारा केवल कोरम पूर्ति की जाती है। जगह-जगह प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तो खुले है परन्तु वहाँ मामली सी बुखार की दवाएं भी मिलना टेढ़ी खीर हो जाती है। जिसके चलते लम्बा उम्र सपना हो गयी। बुटुली देवी भाठ क्षेत्र की रहने वाली है। उनकी इतनी लम्बी अवस्था इतने दिनों तक जीवन के साथ उनके संघर्ष को बयान करता है।
रामचन्द्र जायसवाल
ग्राम पंचायत कुलडोमरी के प्रधान पति रामचन्द्र जायसवाल का कहना कि सोनभद्र में उद्योगों के कारण प्रदूषण के बढ़ते विकराल रूप के कारण लम्बी बिमारियों की एक श्रृखला बन गयी है। जिसके चलते लोग कम उम्र में ही घातक बिमारियों के षिकार हो जा रहे है। उन्होनें मांग किया कि बुटुली देवी को शासन की ओर निःषुल्क स्वास्थ्य सेवाएं एवं हर सम्भव मदद देनी चाहिए।
जगदीष वैसवार
विश्राम वैसवार
पूर्व जिला पंचायत सदस्य जगदीष वैसवार व विश्राम वैसवार ग्राम प्रधान परासी का कहना है कि नारी दुर्गा का रूप है और सोनभद्र में बुटुली देवी इस लम्बी अवस्था में आज भी जीवन से लड़ती चली आ रही है। हम सभी क्षेत्रवासी उनकी स्वस्थ्य रहने एवं विश्व में सबसे ज्यादा उम्र जीने की कामना करते है। साथ ही क्षेत्रवासियों ने मांग किया कि शासन को सर्वें करा कर बुटुली देवी का नाम वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज कराया जाय।
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बुटुली को देखने के लिये दिन भर लगा रहता लोगो का ताता
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| बुटुली को देखने के लिये लगी लोगो भीड़ |
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135 की उम्र में भी बुटुली खाती है कठोर खाद्य पदार्थ
गुमनामी का वनवास काट रही बुटुली देवी की लम्बी उम्र की चर्चा जन-जन में व्याप्त है। बुटुली की उम्र की प्रमाणिकता के लिए वास्तविक रूप में प्रमाण पत्र उपलब्ध कराने की जरूरत है। जिससे कुलडोमरी की बुटुली का नाम पूरे विष्व में अपनी पहचान बना सके। वहीं पिपरी सोनवानी के प्रधान अर्जून भारती ने भी हर सम्भव मदद देने की बात कहीं। मूल निवासी संविदा श्रमिक के नेता राम दुलारे पनिका ने भी जानकारी के बाद मौके पर पहँुचकर हर तरह का सहयोग देने की बात कही। अखबार की खबर से प्रकाष में आयी बुटुली देवी को देखने वालों का ताता लगा है वहीं उनकी लम्बी उम्र का राज जानने की दिलचस्पी लोगों के सर चढ़ बोल रही है। लोगों के बुटुली के लम्बे उम्र का राज अपने-अपने तर्क से दे रहे कुछ ने उनकी लम्बी उम्र का राज आज तक प्रदूषण से दूर रहने को दिया जबकि कुछ इसे भगवान का वरदान मान रहें। उपस्थित भीड़ ने जब उनके दातों को सुरक्षित देखा तो उन्हें विष्वास नहीं हो रहा था कि 135 वर्षीय वृद्धा के दात आज भी सही सलामत एवं सुरक्षित है। परिवार के सदस्यों ने बताया कि बुटुली देवी चना और अन्य कठोर सामग्रियाँ खाने में सक्षम है। कुछ ने उनकी लम्बी उम्र का राज उनके दातों को दे डाला। और कहा कि जबतक लोगों के दात सुरक्षित होते है उन्हें खाने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती है। और उनकी उम्र लम्बी होती है।
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"ऊपर लिखे गये सभी लेख दिसम्बर, 2013 के समय के है, जब बुटली देवी के जीवित होने की दशा में यह प्रकरण ऊर्जान्चल में चर्चा का विषय बन गया था। "
नोटः-
" बुटली देवी को सर्वप्रथम ढुढ़ने व अखबार में प्रकाषित कर लोगों के सामने लाने वाले संजय कुमार व शक्ति आनन्द की जानकारी के अनुषार वर्ष 2014 में बुटली देवी की मुत्यु हो गई है और बुटली देवी का नाम इतिहास के पन्नों में कही गुम हो गया। उनका कहना है कि सरकारी उपेक्षा की षिकार होने व सही समय पर उन्हें समाज के सामने न लाने की वजह से उन्हें सबसे ज्यादा उम्र की जीवित महिला होने का सम्मान नहीं मिल सका और उनकी मुत्यु के बाद उनके लम्बे जीवन का अध्याय समाप्त हो गया है। "
सूचना का अधिकार कानून की अभी भी समझ नही है जिले के अधिकारी को
सोनभद्र जिले में सूचना का अधिकार कानून के लागू हुए छः वर्ष से अधिक का समय बीत जाने के बावजूद जिले के आलाधिकारी इस कानून से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। यही कारण है कि अति महत्वपूर्ण माना जाने वाला यह कानून अभी भी सही मायने में असली जामा नहीं पहन पाया है। जब जिले के आला अधिकारी को इस कानून का ज्ञान नहीं है तो अन्य के बारे में कुछ कहना लफ्फाजी होगा.बात साफ है सरकार कहती है कि सूचना का अधिकार विकास का आधार है,पर जब अधिकारी ही इसके बारे में नहीं जानेंगे तो फिर कैसे हो जिले का विकास?
हिण्डालको प्रबंधन के उत्पीड़न का शिकार संविदा श्रमिकों ने काम ठप कराने की दी चेतावनी
एशिया की सबसे बड़ी एल्युमीनियम उत्पादक कंपनी हिंडाल्को का कहर संविदा श्रमिकों पर निरंतर जारी है। कंपनी के जुर्म से आजीज आकर रेणकूट इकाई के हजारों मजदूर आए दिन धरना प्रदर्शन करते रहते हैं। बीती चार अक्टूबर को कंपनी प्रवंधन के उत्पीड़न के खिलाफ प्रदर्शन कर मजदूरों पर कंपनी के सुरक्षाकर्मियों समेत जिला प्रशासन ने लाठी चार्ज किया। साथ ही जिला प्रशासन ने कंपनी प्रबंधन और कुछ तथाकथित पत्रकारों की सह पर मजदूर नेताओं पर फर्जी मुकदमा लादकर लोकतंत्र का आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है। हिण्डालको प्रबंधन और जिला प्रशासन की इस कार्रवाई से जनपद की राजनीति गरमा गई है। जन संघर्ष मोर्चा समेत कई मजदूर संगठनों एवं राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनीधियों ने औद्योगिक क्षेत्र में काम को ठप कराने की चेतावनी जिला प्रशासन एवं कंपनी प्रबंधन को दिया है।
गौरतलब है कि हिण्डालको कंपनी प्रबंधन के उत्पीड़न एवं शोषण के खिलाफ बीते दिनों संविदा मजदूर रेणुकूट में धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। जिलाधिकारी पनधारी यादव की अपील पर बीती चार अक्टूबर को हिण्डालको के संविदा मजदूरों ने अपने आन्दोलन को स्थगित कर दिया था। मजदूरों के साथ वार्ता में जिलाधिकारी पनधारी यादव ने आश्वासन दिया था कि दो दिन के अन्दर उपश्रमायुक्त पिपरी के साथ वार्ता कर संविदा मजदूरों की लम्बित समस्याओं का समाधान करा दिया जायेगा। साथ ही उन्होंने किसी भी मजदूर का उत्पीड़न, छंटनी, मजदूरों पर लादे गये फर्जी मुकदमों को वापस लेने, बीती चार अक्टूबर को हुयी घटना की जांच पुलिस से कराकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही थी। उन्होंने यह भी कहा था कि वर्तमान समय में जारी पंचायत चुनाव को देखते हुए हम लोग आन्दोलन को स्थगित कर दें। आगे उन्होंने कहा कि पंचायत चुनाव के बाद वह पूरे औद्योगिक क्षेत्र के संविदा श्रमिकों की समस्याओं के निस्तारण के लिए विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के प्रबन्ध तंत्र व संविदा मजदूरों के प्रतिनिधियों के बीच वार्ता की पहल करेंगे। जिलाधिकारी के आश्वासन के बाद राष्ट्रहित, प्रदेशहित एवं औद्योगिकहित को देखते हुए मजदूरों ने आन्दोलन को स्थगित कर दिया। लेकिन आन्दोलन समाप्ति के बाद प्रबन्ध तंत्र ने संविदा मजदूरों का जबरदस्त उत्पीड़न करना शुरु कर दिया है। लगभग 200 से भी ज्यादा मजदूरों को काम से निकाल दिया गया। संचार क्रांति के इस युग में संविदा मजदूरों के मोबाइल को फैक्ट्री के अन्दर ले जाने पर रोक लगा दी गयी। मजदूरों से हिण्डालको सुरक्षा कर्मियों द्वारा जबरन गेट पास छीना जा रहा है। मजदूर नेताओं और उनके प्रतिनिधियों की घेराबंदी शुरु कर दी गयी है। जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता दिनकर कपूर ने आरोप लगाया है कि हिण्डालको के इशारे पर कुछ तथाकथित पत्रकारों ने प्रशासन व पुलिस से मिलकर संविदा श्रमिकों के नेताओं पर मुकदमा कायम कराया है। उन्होंने आगे कहा कि मोर्चा ने प्रशासन एवं प्रबन्ध तंत्र को घटना की स्थिति से बार-बार अवगत कराया, लेकिन मजदूरों के उत्पीड़न को रोकने के लिए जिला प्रशासन ने कोई विधिक कार्रवाई नहीं की। प्रशासन का इस गैरजिम्मेदाराना एवं लापरवाही भरे रुख से मजदूरों में गहरा आक्रोश है, जो रेणुकूट में बहुत बड़ी विषम स्थित को जन्म दे सकता है। जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता दिनकर कपूर, श्रम संविदा संघर्ष समिति के अध्यक्ष व नगर पंचायत अध्यक्ष अनिल सिंह, प्रगतिशील मजदूर सभा के अध्यक्ष द्वारिका सिंह, मजदूर मोर्चा के संयोजक राजेष सचान, कांग्रेस पीसीसी सदस्य बिन्दू गिरि, ठेका मजदूर यूनियन के अध्यक्ष सुरेन्द्र पाल ने जिला प्रशासन एवं कंपनी के प्रबंधन तंत्र को चेतावनी दी है कि वे मजदूरों का उत्पीड़न बंद करे नहीं तो पूरे औद्योगिक क्षेत्र में काम को ठप करा दिया जाएगा।
मजदूर नेताओं ने कहा कि हिण्डालको से लेकर अनपरा, ओबरा, रेनूसागर, लैंको, सीमेन्ट, कोयला व बिजली की औद्योगिक इकाईयों में हजारों की संख्या में काम कर रहे संविदा श्रमिक निर्मम शोषण के शिकार एक ही कार्यस्थल पर बीस-पचीस वर्षों से कार्यरत रहने के बावजूद उन्हें नियमित नहीं किया जाता है। उन्हें न्यूनतम मजदूरी तक नहीं दी जाती है। कानूनी प्रावधान होने के बाद भी हाजरी कार्ड, वेतन पर्ची, रोजगार कार्ड, बोनस, डबल ओवर टाइम, सार्वजनिक अवकाश नहीं दिया जाता है। यहां तक कि इपीएफ की कटौती के बावजूद उसकी कोई रसीद नहीं दी जाती है। यदि कोई मजदूर अपनी जायज मांग को उठाता है तो उसे बिना किसी नियम कानून के काम से ही निकाल दिया जाता है। इसके बाद भी हिण्डालको प्रबंधन कहता है कि हम उन्हे सुविधाएं दे रहे हैं। कंपनी के झुठे आश्वासनों और उत्पीड़न ने मजदूरों को आंदोलन करने पर मजबूर कर दिया है। मजदूर नेताओं की मानें तो जिला प्रशासन की वादाखिलाफी, गैर जबाबदेही के विरुद्ध मजदूरों ने हढ़ताल पर जाने की नोटिस जिलाधिकारी एवं उप श्रमायुक्त को दी हैं। आंदोलनकारीगण मेहंदी हसन, अजीम खाँ, चन्दन, नसीम, प्रदीप, मारी (सभासद गण), नौशाद, राजेश कुमार राय, राम अभिलाख, सुमन झा, रामजी वर्मा, धर्मेन्द्र, महेन्द्र सिंह ने भी प्राथमिकता के तौर पर कंपनी प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोलने की बात कही।
हर शाख पे एंडरसन बैठा है...................... उर्फ कथा सोनभद्र की!
ऽ बिके हुए हैं अखबार, कहीं कोई खबर नहीं
ये देश में हर जगह पैदा हो रहे भोपाल का किस्सा है। ये हिंदुस्तान के स्विट्जरलेंड की तबाही का किस्सा है। ये रिहंद बांध में अपने महल के साथ डूब गयी रानी रूपमती का किस्सा है। ये मंजरी के डोले का किस्सा है और ये लोरिक की बलशाली भुजाओं को आज तक महसूस कर रहे चट्टानों का किस्सा है। ये किस्सा इसलिए भी है क्योंकि हम एक ऐसे देश में जी रहे हैं, जहां मौजूद मीडिया को ये मुगालता है कि वो देश-काल को बदलने का दमखम रखता है। हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की! हम इसे देश की ऊर्जा राजधानी कहते हैं। ये देश का सबसे बड़ा एनर्जी पार्क है। सोनभद्र सिंगरौली पट्टी के लगभग 40 वर्ग किमी क्षेत्र में लगभग 18000 मेगावाट क्षमता के आधा दर्जन बिजलीघर मौजूद हैं, जो देश के एक बड़े हिस्से को बिजली मुहैया करते हैं। अगले पांच वर्षों में यहां रिलायंस और एस्सार समेत निजी और सार्वजानिक कंपनियों के लगभग 20 हजार मेगावाट के अतिरिक्त बिजलीघर लगाये जाएंगे। बिरला जी का अल्युमीनियम और कार्बन, जेपी का सीमेंट और कनोडिया का रसायन कारखाना यहां पहले से मौजूद है। यह इलाका स्टोन माइनिंग के लिए भी पूरे देश में मशहूर है। यहां पांच लाख आदिवासी भी मौजूद हैं, जिन्हें दो जून की रोटी भी आसानी से मयस्सर नहीं होती।
सोनभद्र की एक और पहचान भी है। यहां आठ नदियां हैं, जिनका पानी पूरी तरह से जहरीला हो चुका है। यह इलाका देश में कुल कार्बन डाइऑक्साइड के उत्स्सर्जन का 16 फीसदी अकेले उत्सर्जित करता है। सीधे सीधे कहें तो यहां चप्पे चप्पे पर यूनियन कार्बाइड जैसे दानव मौजूद हैं, इसके लिए सिर्फ सरकार और नौकरशाही तथा देश के उद्योगपतियों में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लिए मची होड़ ही जिम्मेदार नहीं है। सोनभद्र को ध्वंस के कगार पर पहुंचाने के लिए बड़े अखबारी घरानों और अखबारनवीसों का एक पूरा कुनबा भी जिम्मेदार है। कैसे पैदा होता है भोपाल, क्यों बेमौत मरते हैं लोग? अब तक वारेन एंडरसन के भागे जाने पर हो हल्ला मचाने वाला मीडिया कैसे नये नये भोपाल पैदा कर रहा है, आइए हम आपको इसकी एक बानगी दिखाते हैं।
मौत की चिमनियां..................
मरता हुआ रिहंद....................
यहां भी खामोश है मीडिया.......
कनोडिया कैमिकल देश में खतरनाक रसायनों का सबसे बड़ा उत्पादक है। कनोडिया के जहरीले कचरे से हर साल औसतन 40 से 50 मौतें होती हैं। हजारों की संख्या में लोग आंशिक या पूर्णकालिक विकलांगता के शिकार होते हैं, मगर खबर नहीं बनती, क्योंकि कनोडिया अखबारों की जुबान बंद करने का तरीका जनता है। पिछले वर्ष दिसंबर माह में उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा पर मौजूद सोनभद्र के कमारी डांड गांव में कनोडिया द्वारा रिहंद बांध में छोड़ा गया जहरीला पानी पीकर 20 जानें चली गयीं। उसके पहले विषैले पानी की वजह से हजारों पशुओं की मौत भी हुई थी, मगर जनसत्ता को छोड़कर किसी भी अखबार ने खबर प्रकाशित नहीं की। जबकि जांच में ये साबित हो चुका था मौतें प्रदूषित जल से हुई हैं। हां, ये जरूर हुआ कि इन मौतों के बाद सभी अखबारों ने कनोडिया के बड़े बड़े विज्ञापन प्रकाशित किये थे।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। इसके पहले 2005 जनवरी में भी कनोडिया के अधिकारियों की लापरवाही से हुए जहरीली गैस के रिसाव से पांच मौतें हुईं। मीडिया खामोश रहा। मीडिया अब भी खामोश है, जब सोनभद्र के गांव के गांव फ्लोरोसिस की चपेट में आकर विकलांग हो रहे हैं। यहां के पडवा कोद्वारी, कुसुम्हा इत्यादि गांवों में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जो फ्लोरोसिस का शिकार न हो। जांच से ये बात साबित हो चुकी है कि फ्लोराइड का ये प्रदूषण कनोडिया और आदित्य बिरला की हिंडाल्को द्वारा गैर जिम्मेदाराना तरीके से बहाये जा रहे अपशिष्टों की वजह से है। बिरला जी की इस बरजोरी के खिलाफ लिखने का साहस शायद किसी भी अखबार ने कभी नहीं किया। हां, वाराणसी से प्रकाशित “गांडीव” ने एक बार हिंडाल्को द्वारा रिहंद बांध में बहाये जा रहे कचरे पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी।
शायद ये विश्वास करना कठिन हो, मगर सच है कि आज तक हिंदी दैनिकों ने अपने सोनभद्र के कार्यालयों पर सालाना विज्ञापन का लक्ष्य एक से डेढ़ करोड़ निर्धारित कर रखा है। इनमें वो विज्ञापन शामिल नहीं हैं जो जेपी और हिंडाल्को समेत राज्य या केंद्र सरकार की कंपनियां सीधे या एजेंसियों के माध्यम से देती हैं। अगर इन सबको शामिल कर लिया जाए तो सोनभद्र से प्रत्येक अखबार को सालाना 8 से 10 करोड़ रुपये का विज्ञापन मिलता है। इन अतिरिक्त विज्ञापनों का लक्ष्य यहां के गिट्टी बालू के खनन क्षेत्रों से प्राप्त किया जाता है। ये खनन क्षेत्र जिन्हें “डेथ वेली” कहते हैं और जो सरकार प्रायोजित भ्रष्टाचार और वायु एवं मृदा प्रदूषण का पूरे देश में सबसे बड़ा उदाहरण बने हुए हैं। पर कोई भी अखबार कलम चलने का साहस नहीं करता। और तो और यहां की खदानों से निकलने वाली भस्सी ने हजारों एकड़ जमीन को बंजर बना डाला। खबरें न छापने की एक और वजह है। सोनभद्र में ज्यादातर पत्रकारों की अपनी खदानें और क्रशर्स हैं। जिनकी नहीं हैं, उनकी भी रोजी रोटी इन्हीं की वजह से चल रही है। खबरें न छापने की कीमत वसूलना अखबार भी जानते हैं, पत्रकार भी।
सोनभद्र के बिजलीघरों से प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ टन पारा निकलता है। हालत ये है कि यहां के लोगों के बालों, रक्त और यहां की फसलों तक में पारे के अंश पाये गये हैं। इसका असर भी आम जन मानस पर साफ दिखता है। उड़न चिमनियों की धूल से सूरज की रोशनी छुप जाती है और शाम होते ही चारों और कोहरा छा जाता है। इस भारी प्रदूषण से न सिर्फ आम इंसान मर रहे हैं बल्कि गर्भस्थ शिशुओं की मौत के मामले भी सामने आ रहे हैं। मगर खबरें नदारद हैं। वजह साफ है। सभी अखबारों के पन्ने दर पन्ने प्रदेश के ऊर्जा विभाग के विज्ञापनों से पटे रहते हैं। सैकड़ों की संख्या में मंझोले अखबार तो ऐसे हैं, जो बिजली विभाग के विज्ञापनों की बदौलत चल रहे हैं। ये एक कड़वा सच है कि उत्तर प्रदेश सरकार के ओबरा और अनपरा बिजलीघरों को पिछले एक दशक से केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनापत्ति प्रमाणपत्र के बिना चलाया जा रहा है। जबकि बोर्ड ने इन्हें बेहद खतरनाक बताते हुए बंद करने के आदेश दिये हैं। मगर खबर नदारद है। सिर्फ सोनभद्र में ही नहीं, देश के कोने-कोने में भोपाल पैदा हो रहे है, अखबार के पन्नों पर वारेन एंडरसन सुर्खियों में है। और हम, खुश हैं कि मीडिया अपना काम कर रहा है।
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लेखक - आवेश तिवारी लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आवेश से awesh29@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।
दूसरे भोपाल गैस त्रासदी की जमीन हो रही तैयार
भोपाल गैस त्रासदी में विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के तीनों स्तंभों कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका की कार्यवाही, मुंबई पोर्ट ट्रस्ट पर रखे सिलेंडर से क्लोरीन गैस का रिसाव। फिर वर्धमान (पश्चिम बंगाल) में दुर्गापुर स्टील प्लांट में गैस रिसाव से दर्जनों लोगों का झुलस जाना। ये सभी घटनाएं आम नागरिकों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों की कार्यकुशता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती हैं। भोपाल गैस त्रासदी की घटना में पीडि़त आज भी न्याय के लिए दर दर ठोकरे खा रहे हैं। इस मामले में देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका ने पीड़ितों को निराश ही किया है। इसके साथ ही इन तीनों स्तंभों ने देश के करोड़ों नागिरकों की भावनाओं को भी आहत किया है जो अपनी सुरक्षा के लिए राजनीतिक पार्टियों को देश की सत्ता चलाने के लिए बागडौर सौंपते हैं।
गौर करने वाली बात है कि पूंजीपतियों के मानकविहीन औद्योगिक इकाइयों की कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है। पीडि़त न्याय के लिए ठोकरे खाता है और घटना के जिम्मेदार व्यक्ति को कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका मिलकर देश से बाहर कर देते हैं। भोपाल गैस त्रासदी में करीब 26 साल बाद आए निचली अदालत के फैसले ने यहीं साबित किया है। आम नागिरकों की आशाओं पर देश का लोकतांत्रिक तंत्र खरा नहीं उतरा है। लोगों के दिल में आज भी अपनी सुरक्षा को लेकर भय बना हुआ है। मुंबई पोर्ट ट्रस्ट और दुर्गापुर स्टील प्लांट में गैस रिसाव की घटना ने इसे प्रबल कर दिया है। दोनों ही घटनाओं में घायल व्यक्तियों को कबतक न्याय मिलेगा यह कहना मुश्किल है, क्योंकि देश के सबसे विभत्स भोपाल गैस त्रासदी की घटना में निचली अदालत से फैसला आने में ही 26 साल लग गए। इसके बावजूद, मामले का मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन देश की कानून व्यवस्था से बाहर है।
गौर करने वाली बात है कि पूंजीपतियों के मानकविहीन औद्योगिक इकाइयों की कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है। पीडि़त न्याय के लिए ठोकरे खाता है और घटना के जिम्मेदार व्यक्ति को कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका मिलकर देश से बाहर कर देते हैं। भोपाल गैस त्रासदी में करीब 26 साल बाद आए निचली अदालत के फैसले ने यहीं साबित किया है। आम नागिरकों की आशाओं पर देश का लोकतांत्रिक तंत्र खरा नहीं उतरा है। लोगों के दिल में आज भी अपनी सुरक्षा को लेकर भय बना हुआ है। मुंबई पोर्ट ट्रस्ट और दुर्गापुर स्टील प्लांट में गैस रिसाव की घटना ने इसे प्रबल कर दिया है। दोनों ही घटनाओं में घायल व्यक्तियों को कबतक न्याय मिलेगा यह कहना मुश्किल है, क्योंकि देश के सबसे विभत्स भोपाल गैस त्रासदी की घटना में निचली अदालत से फैसला आने में ही 26 साल लग गए। इसके बावजूद, मामले का मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन देश की कानून व्यवस्था से बाहर है।
देश की इस लचर कानून व्यवस्था का फायदा सिर्फ विदेशी पूंजीपति ही नहीं उठा रहे, बल्कि देश के वे सभी पूंजीपती उठा रहे हैं जो अधिकाधिक लाभ कमाने के चक्कर में नौकरशाहों की मिलीभगत से मानकविहीन औद्योगिक इकाइयों की स्थापना और संचालन करते हैं। ठेकेदारी प्रथा और भ्रष्ट नौकरशाही के कारण सार्वजिनक क्षेत्रों की औद्योगिक इकाइयों में भी सुरक्षा मानकों की अनदेखी बड़े पैमाने पर मिल रही है। मुंबई पोर्ट ट्रस्ट और दुर्गापुर स्टील प्लांट की घटना इसकी बानगी मात्र है जहां आम आदमी के हितों के साथ खिलवाड़ किया गया था। निजी कंपनियों के मामले में सुरक्षा मानकों की अनदेखी और भी बड़े पैमाने पर है। आदिवासी बहुल पिछड़े एवं नक्सल प्रभावित इलाकों में कारपोरेट घरानों की औद्योगिक इकाइयों की स्थापना और संचालन में सुरक्षा मानकों की अनदेखी और भी बड़े पैमाने पर देखने को मिल रही है। भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से औद्योगिक इकाइयों को पर्यावरणीय सहमति अथवा अनापत्ति प्रमाण पत्र दिलाने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन जनसुनवाई करता है लेकिन जन सुनवाई के दौरान शासनादेशों की जमकर धज्जियां उड़ाई जाती हैं। इसका विरोध करने पूंजीपति और जिला प्रशासन आम जनता की आवाज को कानून के शिकंजे में जकड़कर दबा देते हैं। पूंजिपतियों के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने के लिए पूंजीपतियों की शह पर शासन के नुमाइंदों ने एक नई तरकीब इजात की है।
आदिवासी बहुल इलाकों, जहां पर कारपोरेट घरानों की औद्योगिक इकाइयां स्थापित हो रही हैं या होने वाली हैं, को नक्लप्रभावित घोषित कर दिया है,जिसके कारण प्रशासन के नुमाइंदों को पूंजीघरानों के खिलाफ उठाने वाली आवाज को दबाने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं होती। अपने को सभ्य समाज का प्रतिनिधि बताने वाले भी शासन-प्रशासन के इस करतूत को ठीक बताते हैं। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाके इसका ज्वलंत उदाहरण हैं, जहां सैकड़ों गरीब आदिवासियों को फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मार दिया गया। सैकड़ों को फर्जी मुकदमों में फंसाकर जेलों में ठूंस दिया गया। इन इलाकों की सच्ची तस्वीर जानने के लिए सबसे कम नक्सल प्रभावित राज्य उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल जनपद सोनभद्र पर गौर करते हैं। सोनभद्र उत्तर प्रदेश शासन की ओर से सबसे नक्सल प्रभावित जनपद घोषित है। सोनभद्र (4 मार्च 1989 से पहले मिर्जापुर) में औद्योगिक कल-कारखानों की शुरूआत 1950 के दशक में चुर्क सीमेंट फैक्ट्री की स्थापना के साथ हुई। 12 जुलाई 1954 को चुर्क सीमेंट फैक्ट्री के उद्घाटन अवसर पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि यह स्थान भारत का स्वीटजरलैंड बनेगा। नेहरू की घोषणा समय के साथ झूठी साबित होती गयी। यह स्थान स्वीटजरलैंड तो नहीं बन सका लेकिन मानकविहीन औद्योगिक इकाइयों की स्थापना से भोपाल बनने की ओर अग्रसर जरूर हो गया है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की मानें तो यह क्षेत्र देश के 42 सबसे अधिक प्रदूषित औद्योगिक इकाइयों में नौवें स्थान पर हैं। वहीं, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पर्यावरण की दृष्टि से देश का पांचवा समस्याग्रस्त औद्योगिक क्षेत्र है।
आदिवासी बहुल इलाकों, जहां पर कारपोरेट घरानों की औद्योगिक इकाइयां स्थापित हो रही हैं या होने वाली हैं, को नक्लप्रभावित घोषित कर दिया है,जिसके कारण प्रशासन के नुमाइंदों को पूंजीघरानों के खिलाफ उठाने वाली आवाज को दबाने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं होती। अपने को सभ्य समाज का प्रतिनिधि बताने वाले भी शासन-प्रशासन के इस करतूत को ठीक बताते हैं। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाके इसका ज्वलंत उदाहरण हैं, जहां सैकड़ों गरीब आदिवासियों को फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मार दिया गया। सैकड़ों को फर्जी मुकदमों में फंसाकर जेलों में ठूंस दिया गया। इन इलाकों की सच्ची तस्वीर जानने के लिए सबसे कम नक्सल प्रभावित राज्य उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल जनपद सोनभद्र पर गौर करते हैं। सोनभद्र उत्तर प्रदेश शासन की ओर से सबसे नक्सल प्रभावित जनपद घोषित है। सोनभद्र (4 मार्च 1989 से पहले मिर्जापुर) में औद्योगिक कल-कारखानों की शुरूआत 1950 के दशक में चुर्क सीमेंट फैक्ट्री की स्थापना के साथ हुई। 12 जुलाई 1954 को चुर्क सीमेंट फैक्ट्री के उद्घाटन अवसर पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि यह स्थान भारत का स्वीटजरलैंड बनेगा। नेहरू की घोषणा समय के साथ झूठी साबित होती गयी। यह स्थान स्वीटजरलैंड तो नहीं बन सका लेकिन मानकविहीन औद्योगिक इकाइयों की स्थापना से भोपाल बनने की ओर अग्रसर जरूर हो गया है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की मानें तो यह क्षेत्र देश के 42 सबसे अधिक प्रदूषित औद्योगिक इकाइयों में नौवें स्थान पर हैं। वहीं, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पर्यावरण की दृष्टि से देश का पांचवा समस्याग्रस्त औद्योगिक क्षेत्र है।
सोनभद्र में औद्योगिक इकाइयों की बात करें तो वर्तमान में सार्वजनिक क्षेत्र की एनटीपीसी, एनसीएल, ओबरा थर्मल पावर, रिहंद सुपर थर्मल पावर, निजी क्षेत्र की हिण्डालको एल्यूमिनियम,प्लांट, कानोरिया केमिकल्स एम्ड इंडस्ट्रीज लिमिटेड, रेणुसागर पावर प्लांट, जेपी सीमेंट फैक्ट्री, डाला एवं चुर्क आदि औद्योगिक इकाइयां संचालित हो रही हैं। इनके अलावा हजारों मानक विहीन स्टोन क्रशर प्लांट्स कैमूर की वादियों में जहर उगल रहे हैं। सोनभद्र के मूल वाशिंदों की विडंबना है कि इतनी औद्योगिक इकाइयों के बाद भी इनको दो वक्त की रोटी मयस्सर नहीं हो रही है। हर साल सैकड़ों लोग भूखमरी, कुपोषण और बीमारी की चपेट में आकर दम तोड़ रहे हैं। यहां के खनन क्षेत्र में हर दिन दो व्यक्ति की औसत दर से दम तोड़ रहे हैं। मरने वालों में अधिकतर आदिवासी एवं दलित मजदूर होते हैं। कैमूर की वादियों को जहरीली बना चुकी औद्योगिक इकाइयों में सोनभद्र के मूल बाशिंदों के रोजगार की बात करें तो अधिकतर लोग दिहाड़ी मजदूर हैं जिन्हें महीना में 20 दिन से ज्यादा का रोजगार मुहैया नहीं हो पाता है। शेष मौतका कुंआं बन चुकी पत्थर की खदानों में दम तोड़ने को मजबूर हैं। किसान पिछले छह सालसे पड़ रहे सूखे से बेहाल हैं और खेत बेचकर पलायन करने कोमजबूर हो रहे हैं। औद्योगिक इकाइयों की सुरक्षा मानकों की बात करें तो अधिकतर औद्योगिक इकाइयां पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के मानकों को पूरा नहीं करती हैं। खासकर खनन क्षेत्र में स्थापित स्टोन क्रशर प्लांट केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों को पूरा नहीं करते, लेकिन बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी की शह पर सभी मानकविहीन औद्योगिक इकाइयां धड़ल्ले से संचालित हो रही हैं।
उदाहरण के लिए निजी क्षेत्र की रेणुकूट स्थित कानोरिया केमिकल्स एंण्ड इंडस्ट्रीज लिमिटेड एवं सार्वजनिक क्षेत्र की ओबरा थर्मल पावर की "v" और "c" औद्योगिक इकाइयों को लेते हैं। दोनों ही इकाइयां केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सूची में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के मानकों को पूरा नहीं करती हैं। इसके बावजूद ये इकाइयां संचालित हो रही हैं। कानोरिया केमिकल्स एण्ड एंडस्ट्रीज लिमिटेड की भयावहता पर गौर करें तो यहकंपनी एसिटेल्डिहाइड, फार्मेल्डिहाइड, लिण्डेन, हेक्सामीन, इंडस्ट्रीयल एल्कोहल, एल्यूमिनियम क्लोराइड, एथिल एसिटेड, एसिटिक एसिड कामर्सियल हाइड्रोजन आदि घातक रसायनों का उत्पादन करती है। मानक विहीन सुरक्षा व्यवस्था के कारण कंपनीके प्रयोगशाला में आग भी लगती रहती है। आग की चपेट में आकर पूर्व में कई व्यक्ति झूलस भी चुके हैं। इसके बावजूद मानक विहीन यह कंपनी संचालित हो रही है। ओबरा थर्मल पावर कारपोरेशन की अ एवं ब इकाई केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से डिफाल्टरघोषित हो चुकी है। दोनों इकाइयां संचालित हो रही हैं। उधर, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय केमानकों को धता बताते हुए जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड एवं हिण्डालकों ने भी इस औद्योगिक इलाका में अपने औद्योगिक इकाइयों का विस्तार कर दिया है। शासन के निर्देशों की धज्जियां उड़ाते हुए इन कारपोरेट घरानों की औद्योगिक इकाइयों को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण-पत्र देने के लिए जनसुनवाइयां भी हो चुकी हैं। इन जन सुनवाइयों में करीब 60 फीसदी वक्ताओँ ने इन सुरक्षा मानक विहीन औद्योगिक इकाइयों को अनापत्ति प्रमाण-पत्र नहीं देने की वकालत की थी। इसके बावजूद जिला प्रशासन ने कारपोरेट घरानों के पक्ष में शासन को रिपोर्ट भेज दी। कुछ औद्योगिक इकाइयों को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलभी गया है। कुछ का मामला पेंडिंग हैं। जेपी समूह की डाला इकाई तो अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलने से पूर्व ही संचालित होने लगी थी।
लेखक - आवेश तिवारीलखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आवेश से awesh29@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।
गुरुवार, 10 जुलाई 2014
आम बजट 2014-2015 पर प्रतिक्रिया।
मोदी सरकार के आम बजट पर ऊर्जान्चल की जनता की भी प्रतिक्रिया आने लगी है। कोई मोदी सरकार के इस आम बजट को निराशाजनक बता रहा है तो कोई कह रहा है कि नई सरकार ने नया कुछ नहीं किया है।
पंकज कुमार मिश्रा
कांग्रेस नेता पंकज कुमार मिश्रा ने आम बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार का बजट बेहद निराशानजक है। बजट में जो घोषणाएं की गईं है उसमें में 90 फीसदी कार्य हमारी सरकार द्वारा किया हुआ है, नई सरकार ने कुछ भी नया नहीं किया है। सारे विचार हमारी सरकार के हैं। आम आदमी तो दुर इस बजट से उद्योगपतियों को फायदा पहुँचाने की कोषिष की गई है, सिर्फ हवाई बातों का पिटारा है ये बजट। इस बजट से उम्मीदें कम नजर आती हैं।
शक्ति आनन्द
कांग्रेस नेता व ग्राम पंचायत सदस्य शक्ति आनन्द ने कहा कि बजट बेहद निराशाजनक है। टैक्स में सिर्फ 50 हजार की राहत ना के बराबर है। आम आदमी को कोई राहत नहीं है। सोशल सेक्टर में कोई बढि़या निवेश नहीं है, विकास दर का लक्ष्य बेहद कम है। बीजेपी विपक्ष में बहुत चिल्लाती थी अब हकीकत क्या है उन्हें पता चल रही है। बजट में वित्त मंत्री ने ऐसा कुछ नहीं है जिससे आम आदमी को फायदा हो।
विजय कुमार सिंह
विजय कुमार सिंह ने कहा कि बजट में ना कोई विजन है और ना ही कोई रोडमेप है। आखिर सरकार देश को कहा ले जाना चाहती है। विडंबना है कि एफडीआई का विरोध करने के बाद वे आज इसके नियम आसान कर रहे हैं। इस बजट के बाद आम आदमी के ऊपर भार बढ़ने वाला है।
ओंकार केशरी
बीजेपी नेता ओंकार केशरी ने कहा कि चुनावी घोषणा पत्र में जनता से किए गए ज्यादातर वादों को बजट में शामिल किया गया है। इसमें मुद्रास्फीति को संभालते हुए विकास करने की कोशिश की है, मोदी सरकार का ये बहुत ही सकारात्मक बजट है। इसमें साफ दिखाई देता है कि अरुण जेटली इस बजट से भारतीय अर्थव्यवस्था को सही रास्ते पर लाएंगे।
के.सी. जैन
बीजेपी नेता के.सी. जैन ने कहा कि देश के सम्पत्ति और भंडार को पूर्व की सरकार ने बर्बाद किया गया है, उसको ध्यान में रखते हुए ही जेटली ने इस बार का बजट बनाया है। लेकिन कह सकता हूं कि ये नौकरियों का बजट है। नौकरियां आएंगी।
आशीष मिश्रा
समाजवादी पार्टी के नेता आशीष मिश्रा ने बजट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बजट में कोई बड़ा विचार दूर-दूर तक नहीं था। अगर आप अपनी आंखें बंद कर लें तो यह चिदंबरम का भाषण जैसा लग सकता है।
इनके साथ-साथ ऊर्जान्चल के लोगों ने बजट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि बजट में पिछड़ों, गरीबों, मजदूरों, किसानों और कर्मचारियों के लिए कुछ भी नहीं है। उन्हें सिर्फ सपने दिखाए गए हैं और जनहित की योजनाओं को नजरअंदाज किया गया है। बजट में मुख्यरूप से उद्योगपतियों का हित साधा गया है।
शनिवार, 14 जून 2014
उर्जांचल के विस्थापितों के दशकों का दर्द, आज भी नहीं मिला न्याय
ः पुर्नवास के नाम पर बेलवादह के परिवारों को मिलेमात्र एक लाख
ः कोर्ट के फैसले के बावजूद भी नहीं मिल प् रहा है शतप्रतिशत पुर्नवास लाभ
ः तीन वर्षों से चल रही है पुनर्वास लाभ वितरण की प्रक्रिया
नक्सल समस्या आज राष्ट्रीय समस्या है और इससे निपटने का कार्य सिर्फ क¢न्द्र सरकार का ही नहीं बल्कि प्रभावित राज्य सरकारो का भी है। कुछ राज्यों ने सुरक्षा और अन्य प्रभावी योजनाओं के लिए तमाम कदम उठाये हैं लेकिन उ.प्र. सरकार अपने राज्य के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित जिले सोनभद्र में ऐसी कोई कवायद शुरू करने के मूड में नहीं है। 1950 के बाद रिहन्द बांध बनने के उपरान्त सोनभद्र को उर्जांचल के रूप में विकसित किया जाने गा साथ ही औद्योगिक विकास को लेकर कदम भी उठाये गये।
ओबरा, अनपरा ताप विद्युत परियोजना तथा एनटीपीसी हिण्डाल्को इण्डस्ट्रीज, जे.पी.सिमेण्ट, लैंको पावर सहित तमाम औद्योगिक प्रतिष्ठान सोनभद्र में स्थापित हैं बावजूद इसके गरीब आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण करने के बाद भी उनसे किये गये वायदे के अनुसार कुछ भी नहीं मिला। लिहाजा विस्थापित/आदिवासी आज अपने हक के लिए किसी भी हद तक जाने की बात कर रहा है। उ.प्र. सरकार नक्स प्रभावित जिा सोनभद्र क¢ आदिवासियों को लेकर कितना संजीदा है इसका अन्दाजा इसी बात से गाया जा सकता है कि विद्युत इकाई सी बनने के लिए जिन आदिवासियों ने अपनी भूमि दी उन्हें नौकरी नहीं मिलि और उस जमीन को लैंको पावर प्राइवेट लिमिटेड को स्थानान्तरित कर दी गयी। जिस पर आज लैंको की चिमनियों से विस्थापितों की आहे निकल रही है। विस्थापित प्रतिनिधियों द्वारा इस बात पर सवा पुछे जाने पर उ.प्र.पावर कारपोरेशन के अधिकारी इसे शासनादेश बतातें हैं, और इस प्रकरण से अपना पल्ला झाड़ लेते है।
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| पंकज मिश्रा |
" विस्थापितों का प्रतिनिधित्व करने वो गैर सरकारी संगठन सयोग के सचिव पंकज मिश्रा द्वारा य बताया जाता है कि सार्वजनिक प्रयोजन हेतु किये गये भूमि अधिग्रण में जो भूमि अधिग्रति की जाती है से किसी नीजि कम्पनी को लीज पर देने का अधिकार उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत त्पादन निगम को नहीं है, तथा राज्य सरकार की नई भूमि अधिग्रण नीति के तहत यदि किसी नीजि कम्पनी को सार्वजनिक प्रयोजन हेतु अधिग्रहित की गयी भूमि दी जाती है तो से कम्पनी में शतप्रतिशत भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवार के एक सदस्य को स्थायी सेवा योजन प्रदान किया जायेगा। जबकि लैंको द्वारा इसे एक सिरे से नकार दिया जाता है। लैंको द्वारा बताया जाता है कि ऐसा कोई अनुबंध भूमि स्तानांतरण के अनुबंध पत्र में निगम द्वारा नीं रखा गया है। "
| शक्ति आनन्द |
" ग्राम पंचायत सदस्य ओढ़ी शक्ति आनन्द का कहना है कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र की समस्या सुझाने में यहाँ के स्थानीय जनप्रतिनिधियों की काफी जिम्मेदारी होती है और इस समस्या की बाबत क्षेत्रीय विधायक से स्तक्षेप करने का अनुरोध किया गया तो गया तो उन्होंने इस प्रकरण को सदन में उठाने की बात कह कर अपना पल्ला झाड लिया। जिम्मेदारी लेना तो दूर इस समस्या को सुझाने का उनके पास कोई विकल्प नहीं। श्री आनन्द ने यह भी बताया कि वर्तमान में जो पूर्नवास प्रस्ताव परियोजना द्वारा बनाकर पुर्नवास लाभ बाटा जा रहा है व सिर्फ विस्थापितों के साथ न्याय की एक खानापूर्ति है। क्योंकि इस पुर्नवास प्रस्ताव में ग्राम बेलवादह व बासी के प्रभावित परिवारों को सूचीबद्ध नहीं किया गया है तथा हजारो परिवारों को पुर्नवास लाभ प्रस्ताव से वंचित रखा गया है। जिनका नाम विभिन्न कारणों की वजह से परियोजना के प्रभावित परिवारों की सूची में दर्ज नहीं हो पाया है। "
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| हरदेव सिंह |
ग्राम सभा बेलवादह के ग्राम प्रधान हरदेव सिंह ने बताया कि वर्तमान में प्रस्तावित पूर्नवास लाभ सूची में बेलवादह के विस्थापितों को वंचित रखने की वजह से यहाँ के विस्थापितों में परियोजना के इस रवैये को लेकर बहुत आक्रोस त्पन्न हुआ है। जिससे कि परियोजना के कार्य को ग्रामीणों द्वारा रोककर विरोध दर्ज कराया गया था। जिस पर परियोजना कहती है कि यहाँ के विस्थापितों को वर्ष २००२ में ही पुर्नवास लाभ व प्रतिकर दिया जा चुका है। जबकि उस समय बाटी गयी राशि का पुर्नवास लाभ से कोई लेना देना नहीं है। जिसकी आ़ड में परियोजना हमें पुर्नवास लाभ सें वंचित रख रही है। इस विषय पर प्रभावित परिवार माननीय सर्वोंच्च न्यायाय के अगकी सुनवाई का इंतजार कर रे है।
कुल मिलाकर इस कहानी में कुछ ऐसे कटु आध्याय हैं जिसे देखकर देश के लोकतान्त्रिक स्वरूप को भी शर्म आयेगी। १९७८ में इस परियोजनाओं की शुरूआत के दौरान तत्कालीन सरकार ने आदिवासियों के पुर्नवास और नौकरी के लिए बड़े निर्णय लिए थे फिर बाद की सरकारों ने इन परियोजनाओं को पैसा बनाने की मशीन बना लिया। बीते दो दशकों से इन आदिवासियों का विष्य कागजों में दबा हुआ है और आदिवासियों के हित में आवाज उठाने वो लोगो को सत्याग्रह करने की वजह से जेल भी जाना पड़ा। तमाम सरकारी चक्रव्यू में फंसा यह मामाला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है। जिस पर कोर्ट ने बीते वर्ष २०१२ में अपना फैसा विस्थापितों के पक्ष में दे दिया है फिर भी कोर्ट के इस फैसेले का शतप्रतिशत अनुपान नहीं किया जा रहा है। जो हजारो आदिवासियों के विष्य को लेकर लोकतान्त्रिक स्वरूप में मांग कर रहे आदिवासी समुदाय के लोगो को राज्य सरकार अपना जवाब लाठी और डंडो से दे रही है।
रविवार, 1 जून 2014
कनहर परियोजनाओं में खुलेआम हो रही चोरी
कनहर परियोजना के पुराने भूखण्ड व उपकरणों की चोरी बदस्तूर जारी है। अमवार मंे परियोजना शुरू कराने के पूर्व विस्थापितों के लिए सड़क व आवास निर्माण की प्रक्रिया गति पकड़ रही है। इसके आड़ में कुछ लोग सफेदपोष व कर्मियों की मिलीभगत से पुराने भूखण्डों व गोदामों पर पड़े कीमती सामानों पर हाथ साफ करके अपनी जेब गरम करने में लगे हुए है। इतना ही नहीं हौसला बुलंद लोग मायाजाल में फंसा कर चोरी के सामानों को नीलाम मंे लेने की बात भी प्रचरित करा रहे है ताकि लोगों को किसी प्रकार का शक न होने पाये। सूत्रों की माने तो टीन व सीमेंट की शेडों के अलावा लाखों के सामान गुपचूप तरीके से परियोजना परिसर से हटाया जा चुका है।
दीमक की तरह परियोजना को पूरी तरह चाट चुके चोरों की करतूत का अंदाजा वहां की तस्वीरों को देख कर आसानी से लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं बेखौफ ढंग से कुछ श्रमिक एक ट्रैक्टर-ट्राली पर पुराने भवन से निकले पत्थरों को लोड करने मंे लगे हुए थे। ट्रैक्टर चालक ने एक व्यक्ति का नाम लेते हुए बताया कि उन्ही के निर्देष पर यहां का बोल्डर वह बाजार में बेचता है। इसी तरह परियोजना स्थल से गुपचूप ढंग से उजाड़ी गयी टीन शेड अब वहां के ग्रामीणों के चहारदिवारी का काम कर रही है। ऐसे कई मकान देखने को मिला जिसमें परियोजना स्थल व आवासीय कालोनी से निकला हुआ लोहे का सामान लगाया गया है। सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर कोई नहीं मिला। फिल्ड हास्टल में दो लोग मिले। वह अपने आप को श्रमिक बताकर किनारा कस लिये। वहां तैनात चैकीदारों के बाबत जानकारी लेने पर ग्रामीणों द्वारा कोई सटीक जानकारी नहीं दी गयी। प्रभारी निरीक्षक पीपी सिंह के मुताबिक इस तरह की कोई षिकायत उनके संज्ञान में नहीं आयी है।
फाइलों में कैद है जयन्त हादसे का सबूत
आई जी का निर्देष भी नहीं आया काम:- कोयला खदान में हुए हादसे के गरीब दो साल बाद सिंगरौली आये रीवां रेंज के आईजी गाजीराम मीणा के जनता दरबार में हादसे में हुई मौतों का मामला गूंजा। इस पर श्री मीणा ने मोरवा थाने के टीआई अनिल उपाध्याय को जांच करने और डीजीएमएस की रिपोर्ट प्राप्त कर चालान पेश करने का निर्देश देने के साथ यह भी माना था कि मामले में 304 ए और 304 बी के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन आईजी के निर्देश पर नतीजा भी सिफर है।
धारा-20 के पेच में फसे विद्यालय
ऽ वन विभाग नहीं बनने दे रहा अतिरिक्त कक्ष और बाउन्ड्री
धारा बीस के पेच में तमाम विद्यालयों का विकास कार्य प्रभावित है। विद्यालयों में बनने वाले अतिरिक्त कक्ष, किचन शेड और बाउन्ड्री के निर्माण के लिए आया धन जस का तस खाते में पड़ा है। वन विभाग के लोग काम शुरू होने के बाद रोक दे रहे है। उनका कहना है कि वे वन क्षेत्र में निर्माण नहीं होने देंगे। जबकि ग्रामीणों का कहना है कि वनाधिकार कानून के तहत सार्वजनिक दावे के रूप में जमीनों का दावा दाखिल हो चुका है। वनाधिकार कानून लागू होने के बावजूद धारा बीस की जमीन से वन कर्मियों का मोह भंग नहीं हो सका है। ग्रामीणों के कब्जे की भूमि के अलावा सार्वजनिक कार्यों के लिए किये गये दावे भी उनके गले नहीं उतर रहा है। धारा बीस की जमीनों में बने विद्यालयों को जहां वन कर्मियों द्वारा गिराने तक की धमकी दी जा रही है, वहीं निर्माण की सूचना पर पहुंचे वनकर्मी कार्य को भी रोक रहे है। वनाधिकार कानून के तहत समितियों के पास पड़े सार्वजनिक दावों को भी वन कर्मी नहीं मान रहे है। इस तरह के विद्यालयों पर ध्यान दे ंतो प्राथमिक विद्यालय छुरछुरिया, नकटू, लीलासी और पूर्व माध्यमिक विद्यालय लीलासी का भी काम धारा बीस की जमीन होने के कारण ठप हो गया है। इन विद्यालयों में किचन शेड, बाडन्ड्री नकटू, अतिरिक्त कक्षाकक्ष का निर्माण प्रभावित हुआ है। काचन ग्राम पंचायत के छुरछुरिया विद्यालय के निर्माण के बाद इसे गिराने के लिए भी वन कर्मियों द्वारा कहा जा रहा है।
इसी विद्यालय की बाउन्ड्रीवाल का निर्माण आधा अधूरा होकर पूरा होने का इंतजार कर रहा है। विद्यालय की बाउन्ड्री न होने के कारण यहां तैनात अध्यापिका एवं बच्चे असुरक्षित महसूस कर रहे है। कुक्ड मिल का भोजन करते मसय जहां कुत्ते और अन्य जीव जंतु पहुंच जा रहे है, वही अतिरिक्त कक्ष न बन पाने के कारण बच्चें बाहर पढ़ने के लिए मजबूर है। रविवार को विकास खण्ड मुख्यालय पर पहुंचे विन्ध्याचल मण्डल के आगमन पर ग्रामीणों ने इसकी षिकायत उनसे की है। इस सम्बन्ध में म्योरपुर षिक्षा क्षेत्र के खण्ड षिक्षा अधिकारी राजीव यादव ने कहा कि वन विभाग सरकारी प्रक्रिया के तहत ही जमीनों के हस्तान्तरण की बात कह रहा है, ऐसे में जब तक प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती तब तक कुछ भी नहीं किया जा सकता है।
खूबसूरत सरकारी भवनों को लावारिस छोड़ना एक पहेली
ऽ करमा का बंगला भुतहा, निसोगी व बेलौरी के भवन भी क्षतिग्रस्त
सरकारों की कार्य शैली हाल के वर्षों में कैसे जरूरत व कायदें की हदें लांघती-छलांगती हुई क्रमषः वोटखिंचू होती चलीगयी है, यह योजना-परियोजनाओं के जमीनी पंच वर्षीय शैली से लेपटाॅप-वितरण सरीखे वोटखिंचू वर्चूवल अंदाज तक में पहुंच जाने के नमूने से जगजाहिर हैं। ऐसे रवैये नजरिये का ही दुष्परिणाम है संरक्षण योग्य कई महत्वपूर्ण स्थलों या सरकारी उपक्रमों की घनघोर अनदेखी और ऐसे में उनका तीव्र गति से क्षरण। जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में लावारिस छोड़ दिये गये खूबसूरत सरकारी डाकघरों इसी की छोटी ही किन्तु सरकारी कार्य-दृष्टिकोण में बड़े क्षरण की दुखदायी मिशाल हैं।सबसे दर्दनाक हालत हो गयी है करमा के डाकबंगले की जो ढ़हता हुआ अब कंकाल जैसी हालत में जा पहुंचा है। इसे देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को हृदय-मन पर गहरे आघात का ही अनुभव हो सकता है। एकदम जैसे भुतहा खंडहर हो। यह वर्ष 1917 का बना बताया गया। जबकि निसोगी और रामगढ़ के डाकबंगले 1914 के। निसोगी व धंधरौल वाले डाकबंगले तो जरा-सा मरम्मत के बाद तत्काल उपयोग में लाये जाने के लायक हैं ऐसे में जबरन मिटाए जा रहे दोनों डाकबंगले जैसे अपने साथ जारी उपेक्षा अत्याचार की करूण स्वर में वजह पूछ रहे हों। कुछ इस अंदाज में हमारे तो हाथ-पांव से लेकर नाक-कान-मुंह तक सलामत हैं फिर क्यो किया गया हमारा परित्याग। क्या है हममे कमी? क्या बिना किसी वजह के यों त्याग देना उचित है? कोई क्यों नहीं दे रहा जवाब? बेशक ऐसे सवाल विचलित करने वाले हैं।
धंधरौल बांध के निकट स्थित निसोगी का डाकबंगला हो या रामगढ़ के पास बेलौरी का। दोनों का निर्माण अंग्रेजी शासन के दौरान 1914 में हुआ था। दोनों का निर्माण अग्रेजी साहिबी बंगले की है। बिलायती खपड़े की छप्पर वाले बरामदे सामने निकले हुए है जबकि भीतर ड्राइंग रूम जैसी चैकोर बैठक और इसके अगल-बगल शयन-कक्ष, रसोई भीतरी बरामदें खूबसूरत अंदाज में बने हुए है। इनके उपर है पक्की छत। कुल मिलाकर एक दिलकश और संपूर्ण यूनिट। दर्ज निर्माण काल के हिसाब से दोनों भवन इस साल अपनी शताब्दी का वर्ष देख रहे है। दोनों की छत-दिवारें सलामत है। लावारिस पाकर अराजक तत्वों ने जहां-तहां कुछ क्षति पहुंचायी है। इसके बावजूद कुल मिलाकर भवनों की हालत अब भी ज्यादा खराब नहीं हैं। यह समझना मुष्किल है कि ऐसे भवन आखिर क्यों लम्बे समय से परित्यक्त करके छोड़ हुए है। उन्हें क्यों एकदम लावारिस हालत में छोड़ दिया गया हैं, यह बताने वाला कोई नहीं है। सवाल पूछने पर विभागीय सूत्र बंगले झांकने लग रहे। कुछ इस अंदाज में जैसे, डाकबंगलों की गलत अनदेखी तो उन्हें खूब समझ में आ रही हो लेकिन मामला जब सरकारी पाॅलिसी का हो तो किया क्या जाय। निसोगी डाकबंगले के साथ देश के महान स्वतंत्रता सेनानी व समाजवादी चिंतक डाॅ. राममनोहर लोहिया की स्मृति जुड़ी हुई हैं। यहां उन्होंने 32 दिन बिताये थे और महत्वपूर्ण लेखन कार्य पूरा किया था। जाहिर है इस तथ्य के आलोक में यह स्थान राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा हुआ है। ऐसा महत्वपूर्ण स्थल कुछ इस तरह छोड़ दिया गया है कि सही सलामत होकर भी यह छुट्टी मवेशियों और आवारा नषेड़ियों-जुआरियों का अड्डा बना हुआ है। इसकी ऐसी हालत या इसके साथ ऐसा सलूक स्वयं में एक पहेली है। चैकाने वाली बात यह है कि प्रदेष में लोहिया नाम की माला खटखटाने वाले कई बार पहले भी सत्ता में आ चुके है और फिलहाल भी आसीन हैं, इसके बावजूद महान समाजवादी चिंतक की स्मृतियों से जुड़ा निसोगी डाकबंगला क्यों दशकों से लावारिस छोड़ा हुआ है? इसका अब तक उद्धार या सरक्षण क्यों नहीं किया गया?
आजादी के 65 साल के बाद भी पूरा गांव है षिक्षा से कोसों दूर
आजादी के 65 साल भी अगर पूरा गांव ही अनपढ़ हो तो अन्दाजा लगाया जा सकता है कि रेणुकापार के आदिवासी अंचलों को कालापानी क्यों कहा जाता है। दुर्गमता ऐसी कि दुर्गम शब्द की नई परिभाषा गढ़नी पड़े। आजादी के 65 वर्षो बाद भी रेणुकापार के पनारी ग्राम सभा के दुर्गम आदिवासी गांव पल्सों में अभी तक षिक्षा का दीपक नहीं जला है। जोर शोर के साथ प्रचरित सर्वषिक्षा अभियान की जमीनी हकीकत पल्सो गांव में दिखायी पड़ती है। गांव में 15 वर्षो से उपर के ग्रामीणों की बात छोड़े 4 से 14 वर्ष का कोई भी बच्चा विद्यालय का दर्षन कभी नहीं कर पाया हैं। इस गांव की दुर्गमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों बीते विधानसभा चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल का प्रत्याषी इस गांव तक नहीं पहुंच पाया। गांव से नजदीकी विद्यालय के 15 किमी से ज्यादा दूर होने के कारण कोई भी ग्रामीण अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दिला पाया। रेणुका नदी के तट पर बसे इस गाव तक पहुंचना भी काफी टेढ़ी खीर साबित है। दुर्गम खाड़र से 10 किमीदूर पल्सो तक पहुंचने के लिए लम्बे सूनसान जंगल से होकर गुजरना पड़ता है। नई पीढ़ी को शिक्षा नहीं दिला पाने को लेकर आदिवासी काफी मायूस हैं। वयोवृद्ध जोखन खरवार मायूसी से कहते है कि कई पीढ़ी बड़ी हो गयी लेकिन सभी षिक्षा से दूर रहे।
यहां विद्यालय नहीं होने के कारण गांव के बच्चों को देष-दुनिया के बारे में कुछ नहीं पता है। लगभग 25 घरों वाले इस गांव की आबादी 200 के करीब है। वर्तमान में 4 से 14 वर्ष के प्रत्यक्ष रूप से देखा जाये तो पल्सो से नजदीकी प्राथमिक विद्यालय 15 किमी दूर खैराही में स्थित है। वर्ममान में पल्सो से नौ किमी दूर खाड़र में प्राथमिक विद्यालय निमार्णाधीन है। लेकिन ग्रामीणों की मानें तो खाड़र तक भी बच्चों को नहीं भेजा जा सकता है। लगभग नौ किमी तक घनघोर जंगल है। पक्की सड़क मार्ग नहीं होने के कारण यह जानलेवा हो सकता है। कुल मिलाकर आजादी के 65 वर्षो बाद भी पूरे गांव के अनपढ़ होने से कई सवाल खड़े हो रहे है।
पचास साल बाद आरक्षण के दंश से मुक्ति
जनपद के चुनावी इतिहास को यादों के दिये की लौ में देखे तो विधान सभा क्षेत्रों की स्थिति का एक आकलन हो आयेगा। थोड़ा पीछे जाये तो 50 साल का इंतजार अब 2012 में खत्म होने जा रहा है। प्रतीक्षा करते-करते आंखे पथरा गयी थी कि कब सामान्य व पिछड़ी जाति के लोगों को भी यहां से विधान सभा के लिए निर्वाचित होने का अवसर मिलेगा। वजह सन् 1962 में हुए नये परिसीमन के कारण जनपद की दो पूर्ण विधानसभा क्षेत्र आरक्षित थे। आंशिक क्षेत्र राजगढ़ भले ही अनारक्षित था लेकिन यहां के नेताओं को इस क्षेत्र से निर्वाचित होने के लिए आवश्यक समीकरण कभी फेवर में नहीं दिखे। पराधीनता काल में तो मिर्जापुर दक्षिणी क्षेत्र में ही यहां का सम्पूर्ण क्षेत्र रहा करता था। स्वाधीनता के बाद 1951 में परिसीमन हुआ तो राबर्टसगंज एवं दुद्धी विधान सभा अस्तित्व में आ गया। तब एक सीट से दो विधायक निर्वाचित होते थे। एक सामान्य जाति का तो दूसरा अनुसूचित जाति का प्रत्याशी एक साथ चुनाव लड़ते थे। मतदाता दो प्रत्याषी का चुनाव करते थे। दोनों जन प्रतिनिधि एक साथ क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे। इसी व्यवस्था को सन् 1952.1957 तक जारी रखा गया। सन् 1962 में नये परिसीमन में व्यवस्था बदल दी गयी। राबर्टसगंज एवं दुद्धी क्षेत्र में बिना परिवर्तन किये इन दोनों सीटों को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। अब इन सीटों में केवल अब अनुसूचित जाति के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते थे। इसमें खासियत यह थी कि अनुसूचित जन जाति के लोग भी चुनाव लड़ सकते थे। क्योंकि तब अनुसूचित जन जातियों को संवैधानिक दर्जे के दायरे में नहीं लाया गया था। इसका लाभ भी मिला अनुसूचित जन जाति के रामप्यारे पनिका दो बार और विजय सिंह गोड़ लगातार सात बार दुद्धी से विधायक निर्वाचित हुए थे। तीसरी बार नये परिसीमन में सोनभद्र में दो और विधानसभा क्षेत्र घोरावल और ओबरा के नाम से सृजित हो गये है। इस तरह से 2012 के विधानसभा सामान्य निर्वाचन में अब चार विधायक निर्वाचित होंगे। इसमें राबर्टसगंज, घोरावल और ओबरा विधानसभा क्षेत्र अनारक्षित है अर्थात अब सामान्य एवं पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों को भी मत पाने का अधिकार मिल गया है बावजूद इसके दुद्धी विधान सभा क्षेत्र अब भी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित ही है। इसका मतलब साफ है कि अभी भी सामान्य एवं पिछड़ी जाति के लोगों को दुद्धी विधान सभा क्षेत्र में तो मतदान का अधिकार मिला है लेकिन उन्हें मत प्राप्त करने का मौका नहीं दिया गया है। इसी के साथ अब अनुसूचित जन जाति के लोग भी यहां केवल वोटर और सपोर्टर बन कर रह गये है। अब की बार 2012 में यहां से तीन अनारक्षित एवं एक आरक्षित सीट से चुनकर विधायक जायेंगे तो लोगों की उम्मीद के लिए सरकार पर दबाव बना सकेंगे।
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