सोमवार, 7 मई 2012

अवैध गिट्टी और रेत से हो रहे है सरकारी निर्माण


जिले में खनिज का अवैद्य उत्खनन एवं तस्करी बदस्तूर जारी है। जिले के लुंज-पुंज प्रशासनिक व्यवस्था के चलते कई वषों से हो रही बहुमूल्य खनिज की तस्करी चल रही है। जिसमें चूना पत्थर, के्रसर गिट्टी बोल्डर जैसे कीमती खनिज हैं। काफी दिनों से नेशनल हाईवे से अवैद्य खनिज बड़े पैमाने से परिवहन हो रहे हैं। इस पर प्रशासन द्वारा पकडने अथवा रोक लगाने की कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। अवैद्य परिवहन के अलावा जिले में खनिज के अवैद्य उत्खनन एवं चोरी बड़े पैमाने पर की जा रही है। जिला मुख्यालय से लगभग 20 कि.मी. दूर बिल्ली-मुारकुण्डी में नेशनल हाईवे के किनारे पर गिट्टी एवं बोल्डर का अवैद्य उत्खनन हो रहा है।  काफी तादाद में यहां से गिट्टी एवं बोल्डर अन्यत्र सप्लाई की जा रही है।  काफी दिनों से उत्खनन जारी है, परंतु सम्बंधित विभाग  बिलकुल मौन है। प्राप्त जानकारी के अनुसार यंहा से निकली जा रही गिट्टी स्थानीय परियोजनाओं एवं पंचायत में ही निर्माण कार्यों में खपाया जा रहा है। वहीं जिले में हो रही इस मनमानी पर प्रशासन की चुप्पी से अवैद्य उत्खनन को प्रोत्साहन मिल रहा है। इसके अलावा जिले के चोपन, डाला एवं चुर्क क्षेत्र में भी पत्थर, गिट्टी, मुरूम आदि खनिजों के उत्खनन एवं परिवहन हो रहे हैं। ज्ञात हुआ है कि जिले में करोड़ों रूपयों के लागत पर हो रहे विभिन्न निर्माणों में ये खनिज उपयोग में लाये जा रहे हैं। जहां मनमाफिक दर पर निर्माणों के टेंडर होने के बावजूद भी ठेकेदारों द्वारा खनिज की चोरी कर रायल्टी राशि की बचत कर सरकार के लाखों रूपये की राजस्व की हानि हो रही है। खनिज विभाग एवं प्रशासन द्वारा खनिज के अवैद्य उत्खनन एवं चोरी पर कार्रवाई नहीं किये जाने के परिणाम स्वरूप तस्करों के हौसले और बुलंद होते जा रहे हैं।    

चैथी बार विस्थापन का भय


डाला स्थित सीमेंट बनाने वाली कंपनी द्वारा स्थानीय भलुआ टोला में मलिन बस्ती के लगभग दो दर्जन मकानों में रहने वाले लोगों को बेदखल करने के उद्देश्य से बाउंड्री का निर्माण कराया जा रहा है, जिसका स्थानीय लोगों ने जम कर विरोध किया। रहवासियों ने बताया कि सीमेंट कंपनी का कहना है कि उक्त क्षेत्र भलुआ माइंस के परिधि में आती है इसलिए उक्त स्थान पर बाउंड्री का निर्माण कराया जा रहा है। विगत 40 वर्षों से निवास कर रहे दलितों को अपने आशियाना उजड़ जाने की खौफ सताए जा रहा है। रहवासियों की मांग है कि उक्त कंपनी व प्रशासन द्वारा आवास व पीने के लिए पानी की व्यवस्था कराई जाए तब जाकर बाउंड्री का कार्य कंपनी द्वारा कराया जाय अन्यथा बड़े पैमाने पर आंदोलन होगा। जिले में दलितों का उत्पीड़न हो रहा है। कहा कि जेपी समूह द्वारा बाउंड्रीवाल कार्य को रोकते हुए सर्वप्रथम इनके रहने के लिए घर व पीने के लिए पानी की व्यवस्था करे। इसके पूर्व भी जेपी समूह द्वारा यह बस्ती उजड़वाने का प्रयास किया जा चुका था लेकिन जन आक्रोश को देखते हुए जेपी समूह पीछे हट गया। भलुआ टोला में लगभग चालीस वर्षों से तीसरी बार विस्थापित होकर रह रहे दलित आदिवासियों को फिर एक बार उजाड़ कर उन्हें बेघर कर दिया गया। ओबरा विद्युत नगरी से सटे भलुआ टोला क्षेत्र में लगभग एक हजार से भी अधिक दलित आदिवासियों को अपना आशियाना उजाड़े जाने का भय खाए जा रहा है। वर्तमान स्थिति में भलुआ माइंस के अस्तित्व में आने के पहले ही यह बस्ती आबाद हो चुकी थी। उधर जेपी समूह के सीनियर मैनेजर सुधीर मिश्रा ने बताया कि जिन लोगों को बाउंड्री से तकलीफ है वे हमसे मिले हम मामले को समझ कर मैनेजमेंट को बताएगें। रही बात पानी और अन्य जन कल्याण कार्यक्रमों की तो इसके लिए जेपी समूह हर समय तैयार है।

मरने के कगार पर खड़ा है ऊर्जांचल का संयुक्त चिकित्सालय


ऊर्जांचल मंे अच्छे अस्पताल के अभाव में यहां के निवासी कुछ नामी डाॅक्टरों व छोलाछाप डाॅक्टरों के हाथों  हमेषा से लूटे जा रहे है। जबकि ऊर्जांचल औद्योगिक क्षेत्र के रूप में सम्पूर्ण भारत में विख्यात है। इन औद्योगिक संस्थानों से देष के लगभग सभी राज्यों में ऊर्जां के संसाधनों का निर्यात किया जाता है। चाहे वह बिजली के रूप में हो या फिर कोयले के रूप में। क्षेत्रफल को देखे तो ऐसा प्रतित होता कि परियोजनाओं के अतरिक्त यहां कुछ भी नहीं है। देष को अरबों रूपये का राजस्व देने वाला यह क्षेत्र आज भी एक अच्छे अस्पताल के अभाव मंे निरन्तर जूझ रहा है।  

जब अनपरा परियोजना के निमार्ण कराया गया था तब अनपरा परिक्षेत्र के डिबुलगंज में सरकार द्वारा यहा के लोगों को चिकित्सकिय सुविधा प्रदान करने के लिये एक उच्च तकनिकी सुविधाओं से लैस अस्पताल के निमार्ण का कार्य प्रारम्भ कर दिया गया। कार्य सम्पन्न होने मंे ज्यादा समय नहीं लगा जैसे अस्पताल की आवष्यकता यहां के निवासियों को थी, वह उनके सामने बनकर खड़ा था लेकिन आज भी इसकी जर्जर हालत को देख कर लगता है मानों यह बस खड़ा ही है। जिसका सबसे मूल कारण राज्य सरकार एवं परियोजना की उदासिनता भरा रवैया है। इस अस्पताल का उद्घाटत बड़े-बड़े नेताआंे के द्वारा दो बार किया गया। लेकिन आज तक यह अस्पताल अपने आवष्यक चिजों के लिए तरस रहा है। उपकरणों के अभाव मंे यह अस्पताल दम तोड़ रहा है, कुछ सरकारी दुवाआंे एवं गिने चुने डाॅक्टरों के अलावा यहां कुछ भी नहीं है। कहने के लिए तो यहां हर इमर्जेंसी से निबटने के लिए सारे कक्ष उपलब्ध है लेकिन उपकरणों एवं डाक्टरों का टोटा है। जिससे यहां के निवासी या परियोजनाओं में कार्य करने वाले लोग एक छोटी सी बीमारी के इलाज के लिए भी नीजि अस्पताल के डाॅक्टरों द्वारा लूटे जा रहे है। गम्भीर दुर्घटना की स्थिति में यहां के लोगों की मौत भी लगातार कई वर्ष हो रही है इसका प्रमुख कारण यहां एक अच्छे अस्पताल का अभाव रहा है। इस सरकारी अस्पताल की उपेक्षा ने इसमें घी का काम किया। जिससे यहां के रहवासी काल के गाल में लगातार प्रवेष कर रहे है। ज्यादतर दुर्घटनाएं रोड पर चलने वाले बड़े वाहनों से होता है जो परियोजनाओं के कार्यों में संलग्न है। मौत का दूसरा प्रमुख कारण यहां बढ़ती प्रदूषण की समस्या है। ऊर्जांचल के इस क्षेत्र में इतना प्रदूषण है कि यह भारत का साँतवा सबसे प्रदूषित स्थान बन चुका है जिससे यहां निवास करने वाले लोग किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त है। जिसमें कैंसर से लेकर बल्डपे्रसर, बल्डकैंसर, टीवी, तथा मलेरियाँ यहां के प्रमुख बीमारियों में एक है यहाँ निवास करने वाले लोग लगभग 40 प्रतिषत गैंस की बीमारी से प्रभावित है। 

कुछ यही हाल यहा पर बने चीरघर (पोस्टमार्टम हाऊस) का है। जिसे उर्जान्चल परिक्षेत्र में दो पुलिस चैकियों एवं दो थानों को मद्देनज़र रखते हुए शवों के अन्त्यपरिक्षण करने के उद्देष्य से बनवाया गया था। अस्पताल के साथ-साथ चीरघर के निमार्ण मंे भी परियोजना एवं सरकार द्वारा करोड़ों रूपये खर्च की गये परन्तु सुविधाओं, उपकरणों एवं चिकित्सकों की अभाव में इस चीरघर में आज तक किसी शव का अन्त्यपरिक्षण नहीं किया जा सका है। जिससे पुलिस को शवों के अन्त्यपरिक्षण करने के लिये उर्जान्चल से लगभग 100 किमी दूर दुद्धी जाना पड़ता है। जिससे शवों को लाने-ले जाने में काफी असुविधा उत्पन्न होती है। 

परियोजना के इस अस्पताल के निमार्ण मंे परियोजना एवं सरकार द्वारा करोड़ों रूपये खर्च की गये लेकिन अस्पताल चलाने के लिए जिसकी आवष्यकता सबसे ज्यादा होती उनकों उपलब्ध कराने में राज्य सरकार एवं परियोजना दोनों ही कतराती रही। जिसका परिणाम यह हुआ कि यहां के वासिंदे लगातार बीमारियों की गिरफ्त में फसते जा रहे है। 

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

सड़क पर फिर चलने लगा मौत का खेल

  • सड़क पर बने ब्रेकरो से दुर्घटनाओं की दर हुई थी कम। 
  • ट्रैफिक पुलिस की मांग कर रहे है, स्थानीय लोग।
  • प्रशासन एवं पुलिस की उदासीनता से दुर्घटनाओं पर नहीं लग रहा है अंकुष। 

अनपरा। उर्जानचल क्षेत्र के अन्तर्गत डिबुलगंज से लेकर शक्तिनगर तक राष्ट्रीय राजमार्ग 75 ई पर स्थानीय नागरिको एवं पुलिस के हस्तक्षेप से सड़क पर दुर्घटनाओं पर अंकुष लगाने के इरादे से जगह-जगह पर ब्रेकर बनाये गये थे, जिससे कुछ दिनों तक दुर्घटनाओं पर माने थोड़ा बहुत अन्तर जरूर लगा था परन्तु जब इन ब्रेकरों को तोड़ दिया गया तब वाहन चालको द्वारा रफ्तार पर अंकुष लगना बिल्कुल बन्द हो गया है। महत्वपूर्ण है कि डिबुलगंज से लेकर शक्तिनगर तक तक यह सड़क बहुत ही आवा-जाही वाला मार्ग है। जिस पर स्कूली बच्चो से लेकर स्थानीय लोगो परियोजनाओं में कार्य करने वाले मजूदरों का इस सड़क पर रोज का आना-जाना लगा रहता है। लेकिन जब से इन ब्रेकरों को उनके जगह से तोड़कर हटा दिया गया है तब से वाहनों की रफ्तार को कम करा पाना प्रषासन के लिये बड़ा सवाल बनता जा रहा है। विगत सप्ताह में इसी राह पर सील सीलेवार दुर्घटनाओं के होने के बाद लगता है कि किलर रोड़ के नाम से विख्यात यह रोड़ फिर से उर्जान्चल में मौत का खेलने लगी है। जिसे कुछ हद तक नागरिको एवं पुलिस के हस्तक्षेप के बाद बने ब्रेकरो से रोकने का प्रयास सही साबित हो रहा था।


पंकज मिश्रा
उक्त सड़क पर होने वाले दुर्घटनाओं के सन्दर्भ में सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार के विरूद्ध मुकदमा लड़ रहे पंकज मिश्रा, सचिव, सहयोग (गैर संरकारी संगठन) का कहना है कि सिर्फ ब्रेकरो के माध्यम से ही वाहनों की गति सीमा को कुछ हद रोके जाने का प्रयास करने से नहीं कार्य चल सकता था फिर भी यह एक सफल तरीका था जिससे वाहनों से होने वाली दुर्घटना दर कम हुई थी। 
शक्ति आनन्द 


ग्राम पंचायत सदस्य-औड़ी शक्ति आनन्द एवं स्थानीय लोगों का कहना है कि उर्जानचल के भीड़-भाड़ वाले इलाको में वाहनों की गति सीमा को कम करने के लिये प्रषासन को जगह-जगह पर ट्रैफिक पुलिस तैनात करनी चाहिए, जो ब्रकरो से भी सफल कार्य साबित होगी। जिससे भविष्य में भी लगातार होने वाले दुर्घनाओं को रोका जा सकेगा। ज्ञात हो कि उक्त सड़क पर मालवाहकों के साथ-साथ सवारी गाड़ियों की भरमार हमेषा बनी रहती है। उक्त मार्ग उर्जान्चल का सर्वाधिक व्यस्ततम एवं लोगो के लिए लाईफ-लाईन कही जाने वाली सड़क है। 

शनिवार, 31 मार्च 2012

सोनांचल में पड़ने जा रही एक और संघर्ष की बुनियाद


कहीं भट्टा परसौल न बन जाए बभनी क्षेत्र
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विस्थापन के दर्द को लेकर शायद सेानभद्र में एक और संघर्ष की बुनियाद पड़ने वाली है। यदि विस्थापितों की समस्याओं का समाधान कर लिया जाएगा तो बभनी इलाके को एक और भट्टा परसौल बनाने से बचाया जा सकता है। इसकी प्रमुख वजह धारा बीस (वन भूमि) की जमीनें जिस पर पुरखों से काबिज आदिवासी एवं वनवासी साबित होंगी। इन जमीनों का मुआवजा अधिग्रहण के लिये तय न किए जाने को लेकर पावर प्लांट के निर्माण में प्रभावित हो रहे परिवारों की वजह से पेंच फंस सकता है। अंदर ही अंदर ग्रामीणों द्वारा आंदोलन की रणनीति तैयार की जा रही है। 

उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन द्वारा बभनी में बनाए जाने वाले 1980 मेगावाट के पावर प्लांट के निर्माण की प्रक्रिया भले ही बड़ी तेजी से अमल में लाई जाती हो, लेकिन यहां से विस्थापित होने वाले भी बिना मुआवजा मिले उसी तेजी से घरों के उजाड़े जाने को लेकर लामबंद हो रहे हैं। बभनी के कई ग्राम पंचायतों में करीब तीन सौ एकड़ धारा बीस की जमीनें भी निर्माण के दायरे में आ रही हैं। इन जमीनों पर रिहंद से विस्थापित होकर आए करीब पंद्रह सौ आदिवासी वर्षों से काबिज हैं। बाप दादा की इन जमीनों पर उनका घर, कुआं, खेत, बागीचा और खलिहान है। केंद्र सरकार ने धारा बीस की जमीनों पर काबिज लोगों को अधिकार देने के लिए वनाधिकार कानून लागू किया है। इस कानून के तहत यहां काबिज लोगों ने वनाधिकार समितियों के सामने अपने-अपने दावे भी कर दिए हैं। जिन्हें अब इन जमीनों का अधिकार पत्र देने की तैयारी चल रही है।

इसी बीच पावर प्लांट के निर्माण के लिए भी प्रशासन पूरी तरह से सक्रिय दिखाई दे रहा है। धारा बीस की जमीनों पर काबिज तथा विस्थापित होने वालों का कहना है कि प्रशासन द्वारा उनकी जमीनों का जब मुआवजा तय ही नहीं होगा तो वे जाकर आखिर बसेंगे कहां। इन जमीनों पर काबिज लोगों को न्याय दिलाने के लिए तमाम स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी कमर कस ली है। इसके अलावा इलाके में पड़ने वाले पर्यावरण प्रदूषण को भी लेकर लोगों में उबाल है। सोनभद्र में रिहंद बांध के विस्थापन के बाद लोग आज भी सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। बभनी में बनाए जाने वाले 1800 मेगावाट के पावर प्लांट के निर्माण की प्रक्रिया भले ही बड़ी तेजी से अमल में लाई जाती हो, लेकिन यहां से विस्थापित होने वाले भी बिना मुआवजा मिले उसी तेजी से घरों के उजाड़े जाने को लेकर लामबंद हो रहे हैं।

सोमवार, 26 मार्च 2012

पच्चीस ग्राम हिरोइन के साथ दो गिरफ्तार


अर्तंराष्ट्रीय बाजार में किमत दो लाख 
अनपरा पुलिस ने पायी कामयाबी

अनपरा-स्थानीय थाना क्षेत्र में नशे सौदागरों को रंगे हाथ गिरफ्तार कर अनपरा पुलिस ने बड़ी कामयाबी हासिल की। मिली जानकारी के अनुसार थानाध्यक्ष शिवानन्द मिश्रा ने मुखबिर कि सूचना पर दो अलग-अलग जगहों पर छापा मारकर दो हिरोइन बेचने वाले को गिरफ्तार कर जेल भेजा। जानकारी के मुताबिक राजेश पाठक उर्फ राजू पिता राम दूलारे उम्र 26 वर्ष व संतोष कुमार पटेल पिता अशोक कुमार अनपरा कालोनी को पुलिस ने 25 ग्राम हिरोइन व पीने के सामग्री के साथ गिरफ्तार कर दोनों को थानाध्यक्ष शिवानन्द ने पत्रकारों के सामने पेश किया। पूछ ताछ के दौरान आरोपी संतोष ने बताया कि इस क्षेत्र में हिरोइन जैसे नशे को फैलाने वाला राजेश पाठक उर्फ राजू है। जिसके द्वारा बड़े पैमाने पर नशे की खेप लोगों तक पहुचायी जाती रही है। राजेश पाठक द्वारा ओबरा व रेनूकूट से इसकी खेप उठाता था। पुलिस द्वारा पकड़े जाने के बाद जब उसकी तलाशी ली गयी तो मोजे और जूते के शोल में छिपाकर रखे लगभग 70 पुडि़या हिरोइन को बरामद किया गया। आरोपियो ने हिरोइन के इस कारोबार का तार मुगलसराय से जुड़े होने की बात कबुली। आरोपियों की माने तो इस क्षेत्र में लगभग एक हजार लोग इस नशे का सेवन करने वाले है। जब इतने लोग ऐसा नशा करने वाले है ंतो बेचने वाले आये दिन पैदा होते रहेगें। क्षेत्र में बढ़ते नशे की लत के कारण जहाँ युवा अपने जीवन गर्त मे डाल रहे है वहीं नशे के सौदागर इस युवाओं के नशे के कुए में डाल मोटी रकम इक्ठठा कर रहे है। पुलिस काफी दिन से इस कारोबार का खुलासा करने मे लगी थी जिसके अतंर्गत कुछ दिन पूर्व राजू पाठक को पकड़ा गया था लेकिन तलाशी के दौरान माल बरामद नहीं हो सका था। गुरूवार को मुखबिर की सूचना पर की गयी घेराबंदी में राजू पटेल को आरपीएल औड़ी पेट्रोल पम्प से पकड़ा गया। मौके पर ली गयी तलाशी के दौरान जहाँ राजू के पास से लगभग 70 पुडि़या हिरोइन बरामद हुयी वहीं आवासीय परिसर से पकड़ा गया आरोपी संतोष के पास से लगभग 25 पुडि़या हिरोइन बरामद हुयी। पकड़ने वाले टीम मे वंशराज पटेल, विवेेक दूबे, अरूण यादव, राजेश विश्वकर्मा आदि मौजूद रहे, तथा आरोपियों को पुलिस ने 8/21 एनडीपीएस एक्ट में जेल भेज दिया। 

सोमवार, 19 मार्च 2012

पेट की आग ने बना दिया कलाकार


यह बिल्कुल सच है की पेट की आग किससे क्या ना करवा दे। इसका जीता जागता उदाहरण है राजस्थान के रहने वाले अनील उर्फ थाणाराम जो एक खानाबदोष मूर्ति बनाकर बेचने वाले कारीगर है। ये मुर्तिया वह वाइट सिमेन्ट एवं प्लास्टर आफ पेरिस की सहायतता से सांचे में ढाल कर बनाते है। वर्तमान में उर्जान्चल में अपना डेरा डाले यह अनील अपनी पत्नी, छोटे भाई व दो बच्चो के साथ लगभग एक माह के लिये यहा अपनी बनाई मुर्तिया बेचने आये है। उनका कहना है कि बेरोजगारी व गरीबी के चलते वह अपने परिवार के पालने के लिये इस क्षेत्र में कार्य करना प्रारम्भ किया और धीरे-धीरे अपने भाई व पत्नी को भी इस काय से जोड़ा, जिससे तीनों मिलकर एक दिन में कम से कम 10 मुर्तिया बना लेते है। इनके द्वारा बनाये गये मुर्ति की बाजार में किमत ज्यादा तो नहीं पर इतना जरूर है, जिससे इन्हे दो वक्त की रोटी तो मिल ही जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि हमारा परिवार साल के हर माह में कभी उत्तर प्रदेष, मध्य प्रदेष, छत्तिसगढ़ तथा गुजरात के कई शहरो में खानाबदोषों की तरह तम्बू लगाकर अपने इस कलाकारी की बदौलत रोजी-रोटी कमाने घुमती रहती है। अनील की पत्नी बताती है कि जब मेरे पति ने यह कार्य करना प्रारम्भ किया तब मैं भी इनके साथ हाथ बटाने के लिये इनके साथ यह काम करने लगी। जिससे हम एक दिन में ज्यादा मुर्तिया बना पाते है। लेकिन इन सबका कहना है कि उदनके द्वारा बनाई गई मूर्तियों की सही किमत आज भी बाजार में नहीं मिलती जिससे धीरे-धीरे इ स कला का पतन हो रहा हैै और आजकल फैन्सी जमाने में इन मुर्तियों की पहचान खत्म हो रही है। जिससे उनके तरह ढे़रो कलाकरों के सामने बेरोजगार हो जाने का डर बना रहता है। 

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

सड़क को बनाया सवारी स्टैंड लोग परेशान, अधिकारी बेपरवाह


बीना पुलिस चैकी के ठीक सामने का रोड ड्राइवर और खलासियों का अड्डा बन चुका है। विभिन्न प्रकार की बड़ी और छोटी गाडियां बस स्टैंड की बजाय सड़क पर ही खड़ी मिलती है और पैसेंजर यहीं से बैठकर गंतव्य स्थान की ओर जाते हैं। नतीजा ये है कि आम लोगों को पैदल या निजी वाहनों से इस सड़क से गुजरने में खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कभी-कभी तो जाम इस कदर लग जाता है कि जरूरतमंदों को यहाँ से निकलने के लिए लंबे समय का इन्तजार करना पड़ता है, और ये जाम लगभग बीना पुलिस चाकी के गेट से बीना स्टेडियम तक लगा रहता है। हैरत की बात तो ये है कि पुलिस  के अधिकारीगण भी यहाँ से रोज ही गुजरते हैं, पर लगता है कि उन्हें लोगों की परेशानी से कोई लेना-देना नहीं है। यहाँ खड़ी गाडि़यों की चिल्ल-पों पुलिस अधिकारियों के कान तक नहीं पहुँचती और इन सवारियों की वजह से अक्सर लगा जाम उन्हें नजर नही आता, दूसरी तरफ गाड़ी खड़ी करने तथा बुकिंग के उद्देश्य से बीना परिसर में कोई व्यवस्था मेन रोड़ पर नहीं है। बस स्टैंड के ना होने की दषा में सवारी वाहने अक्सर रोड़ को स्टैण्ड बना देती है। इस सम्बन्ध में एक आटो के ड्राइवर का कहना है कि यहाँ सड़क पर गाड़ी जल्द भर जाती है। उधर बस वाले का कहना है कि हमें मना नही किया गया है इसलिए सब जायज है। चलिए हम भी मान लेते हैं, पुलिस चैकी के सामने ही पुलिस ही अंधी और बहरी हो जाए वहां लोगों की परेशानी तो जायज ही मानी जा सकती है।

ऊर्जांचल की ऐश प्लांटों की राख बन रही जहरीली


  • वल्कर राख सड़क पर उड़ेलकर वातावरण कर रहे है प्रदूषित।
  • क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ही इनकी नकेल कसने के लिए कुछ करती।
  • कई बीमारियों के होने का बन रही वजह।


ऊर्जांचल की ऐश प्लांटों से वल्करों में इतना अधिक राख भर दिया जा रहा है वे इसे ले जाने में असहज महसूस करते है तथा ऊर्जांचल की सड़कों पर उड़ेलकर यहां के फिजा को जहरीला बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इनसे जब आम लोग राख को बीच सड़क पर गिराने का वजह पूछते है तो ये रटी-रटाई एक ही बात कहते है कि ओवरलोड हो गया है। गौरतलब है कि ऊर्जांचल के तापीय परियोजनाओं में जलने वाले कोयले की राख सीमेंट आदि उद्योगों में प्रयुक्त होने के लिए एमपी, बिहार सहित अन्य प्रदेशों में भी जाती है। कई परियोजनाएं अपने यहां ऐश रिफाइन कर ट्रकों में लोड करा कर बाहर भेजती है। अनपरा सहित पूरे ऊर्जांचल में इसे ढोने वाले वल्करों में न जाने किस अनुपात में राख भर दिया जाता है कि कुछ दूर जाने के बाद चालकों द्वारा इसमें से कुछ भाग को खुले सड़क पर नीचे उड़ेल दिया जाता है। सड़क पर गिरने के बाद ये राख के बारीक कण पूरे क्षेत्र में कुहरे की तरह हवा छा जाते है। प्रदूषण के मामले में गंभीर चल रहा ऊर्जांचल इन राख के कणों पर से गाडि़यों के गुजरने से उड़ने वाली धूल से और प्रदूषित हो जाता है। क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी इसपर नकेल कसने के लिए कुछ नही करती है। मनमाने तरीके से राख का ढेर लगाना इनके आदतों में शुमार हो गया है। विदित हो कि सिंगरौली-अनपरा मार्ग पूर्व में ही इस राखड़ के ढेर से पट गया है लेकिन अब बिहार तथा यूपी के अन्य भागों में राख ढोने वाले वल्कर वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग पर राख का ढेर गाज कर इस मार्ग पर भी दुश्वारियों का ढेर लगा रहे है।

जनससमया को हल करने वाला प्रत्याषी चाहिए।


इस बार विधान सभा चुनाव में मतदाता जागरूकता अभियान महिलाओं के भी के सिर चढ़ कर बोल रहा है। प्रत्याषीयों को महिलाओं की भी की समस्याओं को हल कराना होगा। महिलओं की मुख्य समस्या महंगाई कम करने, गैस की किल्लत, बिजली, पानी की समस्या, प्रदुषण एवं महिला के उपर हो रहे उत्पीड़न/अत्याचार को प्रमुखता से हल करने वाले प्रत्याशी को ही महिलाये एवं सम्मानित मतदाताओं का मत मिलेगा। 

आरती देवी
ओबरा विधान सभा क्षेत्र की निवासी आरती देवी कहती है कि हम महंगाई सहित कई समस्याओं प्रति जागरूक प्रत्याशी को वोट देंगे। चाहे वह किसी भी पार्टी का हो।

पिंकी सिंह
पिंकी सिंह का कहना है कि महिलाये ज्यादातर पानी, बिजली की समस्या से जूझती हैं। इस प्रकार की समस्याओं को एवं महिला एवं दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर अंकुश लगाने वाले को वोट दिया जाएगा।

बुच्ची देवी
बुच्ची देवी पूर्व ग्राम पंचायत सदस्य-औड़ी का कहना है कि बिजली, पानी आदि जैसी कई समस्याओं से हमेशा जूझना पड़ता है। प्रत्याशी चुने जाने के बाद समस्याओं पर ध्यान ही नहीं दिया जाता है। उन्होंने कहा कि जो प्रत्याशी इन समस्याओं से निजात दिलाएगा, वोट उसी को दिया जाएगा। 

राधा देवी 
राधा देवी कहती हैं कि महिला एवं दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर अंकुश लगाने वाले प्रत्याशी को वोट दिया जाएगा। जनता की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए उसका निदान करे ऐसे प्रत्याशी को अपना मत देंगी। 

रन्नों देवी
रन्नों देवी का कहना है कि विधान सभा में महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए आवाज उठाने वाले प्रत्याशी के पक्ष में वोट करने की जरूरत है। कहा कि जीतने के बाद वे हर तबके के लोगों की समस्या के साथ ही साथ क्षेत्र की बेरोजगारी दूर करने में अपनी अहम भूमिका निभाएं, ऐसे प्रत्याशी को मत देना चाहिए। हम अपना बहुमूल्य मत उसे देंगे जो कर्मठ हो और जनहित में जिसका योगदान रहा हो। क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति जागरूक उम्मीदवार को भी वरीयता मिलेगी।

फुलमनी देवी
फुलमनी देवी का कहना है कि चुनाव के दौरान पार्टियां और उनके प्रत्याशी लंबे-चैड़े वायदे ऐसे करते हैं जैसे जीत के बाद विकास की गंगा बहा देंगे। लेकिन चुनाव के बाद सब कुछ पहले जैसा ही दिखता है। अब हम सोच समझकर ही प्रत्याषीयों को देंगे तरजीह देंगी। 

पार्वती देवी 
पार्वती देवी कहती हैं कि ऐसे प्रत्याशी जो गांव और शहरों में रहने वाले मतदाताओं की महिलाये ज्यादातर पानी, बिजली की समस्याओं को हल करन वालेे प्रत्याशी को वोट देना चाहिए। 

सरला देवी
सरला देवी कहती हैं कि हमे क्षेत्र का ऐसा प्रतिनिधि चुनना चाहिए जो घरेलू गैस, पानी, बिजली की समस्याओं का समाधान करते हुए आम जनमानस की भावनाओं की कद्र करे। 

छोटी देवी 
छोटी देवी विकास को अहमियत देती हैं। उनका कहना है कि जनप्रतिनिधि ऐसा हो जो रोजगार परक शिक्षा के लिए राजकीय कालेज की स्थापना कराए। जिससे हमारे बच्चे उच्च षिक्षा के लिये बाहर ना जाने पाये। 

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

कोल्ड स्टोरेज का अब भी इंतजार


सोनांचल में काफी प्रयास के बाद भी शीतलन केंद्र (कोल्ड स्टोरेज) की स्थापना नहीं हो सकी है। इससे बंपर पैदावार के बाद भी किसानों को आलू सुरक्षित रखने का ठिकाना नहीं है। इसी तरह अत्यधिक टमाटर उत्पादन के बाद भी इसके केचअप आदि बनाने के लिए इकाई की स्थापना नहीं हो सकी। इसके लिए जिले में योजना तैयार की गई लेकिन न तो शीतलन केंद्र के लिए और न ही फल संरक्षण केंद्र के लिए कोई आगे आया। सोनांचल की पथरीली जमीन पर पारंपरिक खेती उतनी मात्रा में नहीं हो पाती है। हां यहां गैर परंपरागत सब्जी, फूल और फलों की खेती की असीम संभावनाएं हैं। यहां के किसान फल और सब्जियों की खेती कर भी रहे हैं। करमा इलाका तो टमाटरों के लिए प्रसिद्ध है, वहीं मधुपुर केकराही आदि सब्जियों के उत्पादन में आगे है। यही नहीं उर्जांचल फलों की खेती के लिए इलाके भर में जाना जाता है। बावजूद इसके किसानों को उचित प्रशिक्षण और फलों के संरक्षण का केंद्र न होने की वजह से किसानों को उतना लाभ नहीं हो पाता है। फूड प्रोसेसिंग प्लांट न होने से आलू की बंपर पैदावार के बावजूद उसे रखने के लिए कोल्ड स्टोर नहीं है। लोगों की मांग पर इस वर्ष शासन द्वारा कोल्ड स्टोरेज खोलने की योजना बनाई गई। मई माह में एक कोल्ड स्टोरेज खोलने के लिए आवेदन मांगे गए। तीन करोड़ की लागत से बनने वाले कोल्ड स्टोर के लिए एक करोड़ बीस लाख रुपये अनुदान की घोषणा उद्यान विभाग द्वारा की गई। बावजूद इसके कोल्ड स्टोरेज खोलने के लिए कोई आगे नहीं आया। अब तो पैसा वापस होने की नौबत आ गई है। इसी तरह शासन की घोषणा के बाद फूड प्रोसेसिंग प्लांट की राह ही ताक रहे हैं। जनपद में फूड प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना के लिए इच्छुक लोगों से आवेदन मांगे गए थे। प्लांट की स्थापना करने वाले को एक लाख बीस हजार रुपये अनुदान की घोषणा की गई। इसके लिए तीन लोगों ने आवेदन किए, जिसमें एक अक्टूबर को विभाग द्वारा एक नाम चयनित कर लखनऊ भेजा गया है। अब देखना है कि कब तक इसका निर्माण होता है। 

लोगों को जल्द मिलेगी ब्लड बैंक की सौगात


रेणुकूट के नगर एवं आसपास के लोगों को अब जल्द मिलने जा रही है ब्लड बैंक की सौगात। कई महीनों से लंबित हिण्डाल्को अस्पताल के ब्लड बैंक लाइसेंस को शासन ने मंजूरी दे दी है, जिससे दक्षिणाचंल में खून की कमी से मृत्यु दर में कमी आएगी। विदित है कि शासन द्वारा एक वर्ष से अस्पतालों में रक्त निकालने एवं चढ़ाने पर पाबंदी लगा रखी थी। केवल अधिकृत रक्त बैंक में ही यह सुविधा उपलब्ध थी, जिसके कारण औद्योगिक क्षेत्र में संस्थानों एवं सड़क दुर्घटनाओं में घायल व्यक्ति रक्त न उपलब्ध हो पाने से असमय काल के गाल में समा जा रहे थे। नगर में ब्लड बैंक के लिए व्यापार मंडल द्वारा इस वर्ष 15 अप्रैल को अजय राय द्वारा एक दिनी भूख हड़ताल, नगर पंचायत अध्यक्ष अनिल द्वारा 25 अक्टूबर वर्ष 2011 को उपवास एवं खाड़पाथर में नौ अक्टूबर 2011 को मंडलायुक्त की जन चैपाल में ज्ञापन के साथ साथ बीस नवंबर से समाजसेवी शिवप्रताप सिंह द्वारा किया गया भूख हड़ताल जो 26 नवंबर को समाप्त होकर इस मांग को मूर्तरूप दिया। विदित हो कि हिण्डालको अस्पताल में सुसज्जित आधुनिक ब्लड बैंक बन कर तैयार है परंतु लाइसेंस न मिलने से वह शोपीस बन कर रह गया था। गुरुवार को सीएमओ डा. जीके कुरील ने ब्लड बैंक के लाइसेंस मिलने की पुष्टि करते हुए बताया कि जनप्रतिनिधियों एवं जिला प्रशासन के अथक प्रयास से यह संभव हो सका है।

दो साल बाद भी बकाया मजदूरी के पैसे नहीं मिले।


दो वर्षों बाद भी मनरेगा मजदूरी का भुगतान न होने से आक्रोशित बनौरा द्वितीय गांव के ग्रामीणों ने खुली बैठक के दौरान सेक्रेटरी को बंधक बना लिया। किसी तरह सेक्रेटरी बच कर भाग निकला तो ग्रामीणों ने सांकेतिक रूप से राबर्ट्सगंज घोरावल मार्ग पर जाम लगा दिया था। गांव के बड़े बुजुर्गों के समझाने पर जाम समाप्त कर दिया। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि शीघ्र ही मजदूरी को लेकर बड़ा आंदोलन किया जाएगा। गांव के प्राथमिक विद्यालय पर खुली बैठक का आयोजन किया गया था। इसमें अतिरिक्त खाद्यान्न वितरण के लिए पात्रों का चयन किया गया था। समय से बैठक शुरु हुई। अपराह्न करीब दो बजे गांव के दर्जनों मनरेगा मजदूरों ने सेक्रेटरी शिवनारायण सिंह से दो वर्ष पूर्व से बकाए मजदूरी की मांग की। सेक्रेटरी ने बाद में इस मामले का निपटाने का आश्वासन दिया। इस पर श्रमिक भड़क गए कहा कि वर्ष 2010 में हुए कार्य का भुगतान आज तक नहीं किया गया। मजदूरों के हजारो रुपये बकाए हैं। मजदूरों ने तहसील दिवस में इसकी शिकायत की तथा बीडीओ से भी शिकायत की लेकिन भुगतान नहीं हुआ। बार बार सिर्फ आश्वासन दिया जा रहा है। मजदूरों ने सेक्रेेटरी से ठोस आश्वासन की मांग की। सेक्रेटरी द्वारा टाल मटोल किए जाने पर श्रमिक भड़क गए और दोपहर में करीब दो बजे सेक्रेटरी को बंधक बना लिया। सचिव करीब आधे घंटे बाद किसी तरह श्रमिकों की चंगुल से भाग निकले। 

कर्मठ प्रत्याशी को देंगी वोट


इस बार विधान सभा चुनाव में मतदाता जागरूकता अभियान लोगो के सिर चढ़ कर बोल रहा है। लोगों की समस्याओं को हल कराना होगा। लोगो की समस्याओं को हल करने, महंगाई कम करने, गैस की किल्लत, बिजली, पानी की समस्या को प्रमुखता से हल करने वाले प्रत्याशी को ही युवा एवं सम्मानित मतदाताओं का मत मिलेगा। युवाओं ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और उनके प्रमुख समस्या को हल करने वाले के पक्ष में मतदान करने की बात कही। 

जगदीश सोनी 

ओबरा विधान सभा क्षेत्र की निवासी जगदीश सोनी का कहना है कि घर में हम पानी, बिजली की समस्या से जूझती हैं। इस प्रकार की समस्याओं को हल करने वाले प्रत्याशी को वोट दिया जाएगा।


रमेश राजभर 
रमेश राजभर का कहना है कि हम महंगाई सहित कई समस्याओं प्रति जागरूक प्रत्याशी को वोट दिया जाएगा। चाहे वह किसी भी दल का हो। 


अशोक यादव
अशोक यादव ने कहा कि प्रतिनिधि चुने जाने के बाद प्रत्याशियों द्वारा लोगो की समस्याओं की अनदेखी की जाती है। यह अच्छी बात नहीं है। 


सतीश दूबे
सतीश दूबे का कहना है कि बिजली, पानी आदि जैसी कई समस्याओं से हमेशा जूझना पड़ता है। प्रत्याशी चुने जाने के बाद समस्याओं पर ध्यान ही नहीं दिया जाता है। उन्होंने कहा कि जो प्रत्याशी इन समस्याओं से निजात दिलाएगा, वोट उसी को दिया जाएगा चाहे वह किसी दल या जाति का हो। 


अख्तर रजा
अख्तर रजा कहते हैं कि महिला एवं दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर अंकुश लगाने वाले प्रत्याशी को वोट दिया जाएगा। जनता की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए उसका निदान करे ऐसे प्रत्याशी को अपना मत देने का विचार कर रहा हूं। 


शक्ति आनन्द
शक्ति आनन्द का कहना है कि विधान सभा में महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए आवाज उठाने वाले प्रत्याशी के पक्ष में वोट करने की जरूरत है। कहा कि जीतने के बाद वे हर तबके के लोगों की समस्या के साथ ही साथ क्षेत्र की बेरोजगारी दूर करने में अपनी अहम भूमिका निभाएं, ऐसे प्रत्याशी को मत देना चाहिए। हम अपना बहुमूल्य मत उसे देंगे जो कर्मठ हो और जनहित में जिसका योगदान रहा हो। क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति जागरूक उम्मीदवार को भी वरीयता मिलेगी।


शिवशंकर तिवारी
शिवशंकर तिवारी कहते हैं कि ऐसे प्रत्याशी जो गांव और शहरों में रहने वाले मतदाताओं की समस्याओं को हल करें, ऐसे प्रत्याशी को वोट देना चाहिए। 


ओम प्रकाश द्विवेदी कहते हैं कि हमे क्षेत्र का ऐसा प्रतिनिधि चुनना चाहिए जो घरेलू गैस, पानी, बिजली की समस्याओं का समाधान करते हुए आम जनमानस की भावनाओं की कद्र करे। 


जनेश्वर दूबे
जनेश्वर दूबे ने कहा कि विस्थापन की समस्या से निजात दिलाने वाले को वह वोट देंगे। साथ ही जो परास्नातक की शिक्षा के लिए महाविद्यालय की स्थापना कराए। 


मनोनीत
मनोनीत उसे वोट देंगे जिसने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया हो। 
अंकुर मेहता 
अंकुर मेहता शिक्षा के साथ-साथ बेरोजगारी दूर करने वाले को वोट देने की बात कहते हैं। 


प्रशांत शर्मा
प्रशांत शर्मा विकास को अहमियत देते हैं। उनका कहना है कि जनप्रतिनिधि ऐसा हो जो रोजगार परक शिक्षा के लिए राजकीय कालेज की स्थापना कराए। 


प्रशांत शर्मा
लक्ष्मीकान्त दूबे विकास के प्रति जागरूक उम्मीदवार को चुनना चाहते है। जिसमें न्याय-अन्याय के निर्णय की क्षमता हो, वह चुना जाना चाहिए। 


हरिगोबिन्द तिवारी
हरिगोबिन्द तिवारी कहते हैं कि वह उस उम्मीदवार को वोट देंगी जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष का माद्दा रखता हो। 
सन्तोष पटेल
प्रदीप


सद्दाम हुसैन

सन्दीप गुप्ता


प्रदीप, सद्दाम हुसैन, सन्दीप गुप्ता, सन्तोष पटेल आदि का कहना है कि चुनाव के दौरान पार्टियां और उनके प्रत्याशी लंबे-चैड़े वायदे ऐसे करते हैं जैसे जीत के बाद रामराज ला देंगे। लेकिन चुनाव के बाद सब कुछ पहले जैसा ही दिखता है। अब हम सोच समझकर ही प्रत्याषीयों को देंगे तरजीह। 




रविवार, 5 फ़रवरी 2012

विष्ठापितो को अब देरी बर्दाश्त नहीं!


21 सितम्बर 2011 को उ.प्र.रा.वि.उ.नि.लि. को मुख्यालय द्वारा अनपरा तापीय परियोजना के निर्माण लिये किये गये भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों के लम्बित पुर्नवास एवं पुर्नस्थापन के सन्दर्भ में लिये गये निर्णय के अनुरूप उ.प्र. सरकार की नई भुमि अधिग्रहण नीति-2011 के अनुरूप पुर्नवास एवं पुर्नस्थापन लाभ तथा भारतीय वन अधिनियम की धारा-4, वर्ग-4 एवं वनाधिकार अधिनियम-2006 के तहत बेलवादह के जनजाति परिवारों को दिये गये भूमि आदि पर मुआवजा, पुर्नवास एवं पुर्नस्थापन लाभ दिये जाने हेतु जिलाधिकारी, सोनभद्र द्वारा 22.09.2011 को बनाई गई त्रीस्तरीय समिति द्वारा दावेधारको के दावों का निस्तारण अभी तक नहीं होने से परियोजना प्रभावित हजारों परिवारों में गम्भीर रोष व्याप्त है। समयबद्ध पुर्नवास एवं पुर्नस्थापन लाभ के साथ-साथ मुआवजे का भुगतान ना होने तथा पिछली बार सितम्बर के माह में हुए विस्थापितों के आन्दोलन के उपरान्त अनपरा पुलिस द्वारा बसपा नेताओं के दबाव में फर्जी रूप से डिबुलगंज के लोग जिनकी आन्दोलन में सक्रिय भूमिका थी। उन पर सड़क जाम का फजी मुकदमा दर्ज कराया है तथा विगत एक वर्ष में सत्ताधारी दल के दबाव में विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं पर दर्ज कराये गये फर्जी मुकदमों को सरकार द्वारा वापस ना लिये जाने की स्थिति में परियोजना प्रभावित परिवारों तथा समस्त उर्जान्चलवासियों द्वारा हजारों की संख्या में सामुहिक भुख हड़ताल करने की चेतावनी दी गई। 

इसके अलावा एनसीएल एवं एनटीपीसी के लिये भूमि अधिग्रहण से प्रभावित किसानों को भी आन्दोलन से जोड़ने का निर्णय लिया गया। विस्थापितों द्वारा अपने आन्दोलन में सहयोग हेतु सभी राजनीतिक दलों के मुखिया को हजारों किसानों के हस्ताक्षर युक्त पत्र भेजकर उनसे सहयोग भी मांगा गया। इसके अलावा देष में कार्यरत प्रमुख समाज सेवी संगठनों से भी इस आन्दोलन में सहयोग करने के लिये आग्रह किया गया है। इसी क्रम में प्रस्तावित आन्दोलन के बिन्दूओं पर दिल्ली एवं लखनऊ में प्रेस कांफ्रेन्स कर इस आन्दोलन को व्यापक प्रचार-प्रसार के साथ-साथ विषाल रूप देने का निर्णय लिया गया है। पिछले तीन दषक से विस्थापन की पीड़ा झेल रहे दलित-आदिवासी किसानों का धैर्य अब जवाब दे रहा है तथा वह किसी भी हद तक अपने अधिकारों के लिये सघर्ष करने को तैयार है। 

नशे की लत बना रही है, सोनभद्र के नवयुवकों को अपराधी


1. अवैध नषीले पदार्थ की बिक्री पर पुलिस नहीं लगा पा रही है रोक। 
2. नषे की पूर्ति करने के लिए युवा करते है चोरी। 
3. चिन्हीत नषीले पदार्थ बेचने वालों से करती वसूली। 
4. 60 आबकारी एक्ट में चिन्हीत आरोपियों को ही पुलिस द्वारा दिखाया जाता है चालान। 

‘‘तुझे सूरज कहू या चन्दा, तुझे दीप कहू या तारा मेरा नाम करेगा रौषन, जग में मेरा राज दुलारा’’

यें पक्तियाँ एक फूल दो माली फिल्म की है। जिसमें हर पिता के उन सपनों का माखौल उड़ा रही है जब पहली बार पुत्र रत्न की प्राप्ति होने पर हर पिता इस सपने को संजोये रखता है। पर उसे क्या मालूम की इस भ्रष्ट समाज एवं प्रषासन के गैर जिम्मेदारी के चलते उसके सपने वक्त अनुसार चकनाचूर हो जायेंगे। आज समाज में जिवकोपार्जन चलाने के नाम पर अवैध सामग्रीयों के धन्धा करने वाले लोग उस सच को झूठला दे रहे है कि सामने खड़े जिस युवक को मैं मौत की सामग्री बेंचकर अपनी जिवीका चला रहा हूँ, उसी के समान उनका अपना भी पुत्र है। वही दूसरी तरफ भ्रष्ट प्रषासन को जानकारी होने के बावजूद इसीके रोकथाम के लिए, कोई उचित कदम नही उठ रहा है। नषे की लत की गिरफ्त में पड़ा हर नवयुवक आज मुजरिम बनने के कगार खड़ा हो चुका है। इन सबके पिछे क्या कारण है ? इन कारणों के सुधार बजाय पुलिस इन्हें पकड़कर लाती है और उनके ऊपर धारा लगाकर जेल भेज देती है। चोरी, छिनैती, डाका, हत्या जैसे जघन्य अपराध में पड़े इन युवकों के ऊपर कानून की धारा लगाकर बड़े मुजरिम बनने का प्रमाण पत्र दे देती है। हर माह आबकारी विभाग द्वारा दौरा किया जाता है। जाँच के नाम पर सिर्फ औपचारिकता अदा कर दी जाती है। 

आज भी उर्जान्चल में सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के नाम पर स्टेषनरी, मेडिकल स्टोर, सरकारी भांग की दुकान एवं पान बेचने की आड़ में नषे की बिक्री तेजी से फलफूल रहा है। उल्लेखनीय है कि जरूरी नहीं की जो चिन्हीत है, उन्हीं के ऊपर कार्यवाही हो। आज स्टेषनरी से वाईटनर, मेडिकल स्टोर से कोरेक्स (खांसी की दवा) सरकारी भांग की दुकान एवं पान बेचने वाले के यहाँ से गांजा जैसे सामानों कों इन युवको को परोसा जा रहा है। नषे का सेवन करते-करते इसके आदि बन चुके नवयुवक आर्थिक कमजोरी के कारण चोरी, छिनैती उसके बाद बड़े से बड़े अपराध करना शुरू कर देते है। पुलिसिया कार्यवाही के आदि बन जाने के बाद शुरू हो जाता है। कुछ महिनों पूर्व क्षेत्र में हुए दर्जनों चोरियों में चोरों ने पत्रकार के घर में हाथ साफ किया। इसके बाद दौरे पर आये पुलिस अधीक्षक दीपक कुमार एवं जिलाधिकारी पनधारी यादव की मौजूदगी में रेनुसागर बाजार में लगभग आधा दर्जन दुकानों का ताला तोड़कर चोरों ने सलामी ठोकी थी। इन दर्जनों चारियों में दो चोरी का खुलासा हो पाया। चोरी में लिप्त युवकों को आज भी गन्तव्य स्थानों पर गांजा, शराब एवं वाईटनर का प्रयोग करते आज भी देखा जा सकता है। 

आज कानून व्यवस्था में इस जुर्म को रोकने के लिए तरह-तरह की व्यवस्थाये प्रदान की जा रही है। लेकिन देष का संविधान इस बात को भूल चुकी है कि जुर्म करने वाले के साथ, उसे जुर्म की ओर भेजने वाला भी उतना ही बड़ा आरोपी होता है। लेकिन कानून व्यवस्था अपनी गैर जिम्मेदारी के चलते वक्त का इन्तजार करती है। समयानुसार देष का भविष्य कहे जाने वाले युवक जब इस गर्त में घुस कर अपना जीवन बर्बाद कर देते है तो कानून उसको सिर्फ संविधान की धाराओं से अवगत कराती है। उनको इस गर्त में धकेलने वाले लोग अपने धन्धे में मषगुल रहते है। अवैध तरीके से की जा रही बिक्री के ऊपर कानून को षिकंजा कसना चाहिए। 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

आज भी नहीं मिल रही आदिवासियों को पहचान


सोनभद्र के आठों विकासखंडों के अनेक गांवों के आदिवासी-जनजाति निवासी अपने दर्द को हमेषा से बयां कर रहे हैं, वह ज्यादातर उत्तर प्रदेश में निवास करने वाली कोल, कोरवा, मझवार, धांगर (उरांव), बादी, मलार, कंवर आदि अनुसूचित जातियों के लाखों लोगों का दर्द है। इनके सरीखे सोनभद्र के लाखों आदिवासी-जनजाति के लोग जंगल से लकड़ी, कंदमूल आदि लाकर और मजदूरी करके पेट की आग शांत कर लेते हैं, लेकिन सरकारी दाव-पेंच में फंसकर जेल की हवा खाने का खौफ इन्हें हमेशा सालता रहता है। इस खौफ की वजह जिला प्रशासन है। जिला प्रशासन ने अब तक सैकड़ों लोगों पर वन भूमि पर अवैध कब्जे का आरोप लगाकर जेल भेज दिया है, जो अभी भी जेल की हवा खाने को मजबूर हैं। 

गौरतलब है कि कोल, कोरवा, मझवार, धांगर (उरांव), बादी, मलार, कंवर सरीखी जातियों के लोग आदिकाल से जंगलों में निवास कर अपना जीवनयापन करते चले आ रहे हैं। इसका वर्णन हमे शास्त्रों में भी मिलता है। आज से करीब चार सौ साल पहले तुलसीदास ने रामचरित मानस  में भी कोलों का वर्णन आदिवासी के रूप में किया है। भारत सरकार ने भी बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगड़, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में कोल, कोरवा, मझधार, धांगर (उरांव), बादी, मलार, कंवर आदि जातियों को आदिवासी के दर्जे से नवाजा है। वहीं, जनसंख्या के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में इन जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल किया गया है। जो इनके साथ किये गये एक ऐतिहासिक अन्याय की गवाह है। जिसके कारण इन जातियों के लोगों को अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून-2006 यानी वनाधिकार कानून का लाभ नहीं मिल पा रहा है और यह जातियाँ इनके मौलिक अधिकार से वंचित हो रहे है। विसंगतियों से भरे वनाधिकार अधिनियम-2006 के प्राविधानों के कारण वन विभाग की भूमि पर काबिज आदिवासियों को ही आसानी से कब्जा मिल पाता है। अन्य परंपरागत वन निवासियों को अब भी अपने पूर्वजों की जोत-कोड़ की जमीन पर निवास करने अथवा खेती करने के अधिकार से वंचित रहना पड़ रहा है। वनाधिकार कानून में अन्य परंपरागत वन निवासियों के लिए उन्हें अधिनियम में उल्लिखित जंगल में अपने पूर्वजों की तीन पीढि़यों के निवास प्रमाण पत्र उपलब्ध कराने के प्रावधान ने कोल सरीखे पारंपरिक आदिवासियों को कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। इन निवास करने के प्रमाणों को प्रशासन के सामने पेश करने के लिए इन्हें काफी परेशानी उठानी पड़ रही है। जिसके कारण ये वनाधिकार कानून के लाभ से भी वंचित हो रहे हैं तथा प्रशासन उन्हें अतिक्रमणकारी बताकर जेलों में ठूंस रही है। प्रशासन की इस कार्यवाही से अब यह प्रश्न उठने लगा है कि आखिरकार आदिवासी कौन हैं ? पारंपरिक रूप से वनों में रहकर उसके वनो से प्राप्त अवशेषों से अपना और अपने परिवार का गुजर-बसर करने वाले लोग या फिर राजनीतिक पार्टियों के नुमाइंदों द्वारा तैयार किए गए कागज के पुलिंदों में अंकित जातियों के लोग। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र एवं इससे सटे मिर्जापुर जिले में निवास करने वाली कोल, कोरवा, मझवार, धांगर (उरांव), बादी, मलार, कंवर आदि जाति के लोगों को वनाधिकार कानून का लाभ मिलता दिखाई नहीं दे रहा है, जबकि अन्य राज्यों समेत शास्त्रों तक में ये आदिवासी के रूप में दर्ज हैं। साथ ही उत्तर प्रदेश में कोल, कोरवा, मझवार, धांगर (उरांव), बादी, मलार, कंवर आदि जातियों की सामाजिक स्थिति काफी दयनीय है। ये जातियाँ सोनभद्र में आज भी जंगलों से लकड़ी, कंदमूल सरीखे अवशेष बेचकर और मजदूरी करके अपना तथा अपने परिवार का पेट भर रहे हैं। फिर भी राज्य सरकार एवं जिला प्रशासन इन्हें उनकी पुस्तैनी जंगल की कब्जे की जमीन से बेदखल कर रहा है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में कोल, कोरवा, मझवार, धांगर (उरांव), बादी, मलार, कंवर आदि सरीखे पारंपरिक आदिवासियों के छिनते अधिकार पर सत्ताधारी अथवा गैर-सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों के नुमाइंदें चुप्पी साधे हुए हैं। कोल बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले बहुजन समाज पार्टी के पूर्व सांसद लालचंद कोल और भाईलाल कोल भी संसद में अपने समुदाय की आवाज बुलंद नहीं कर सके। करीब सवा लाख कोलों की आबादी वाले राबर्ट्सगंज संसदीय से अब समाजवादी पार्टी के पकौड़ी लाल कोल लोकसभा में लाखों कोलों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। फिर भी कोलों के आदिवासी दर्जे की आवाज संसद में बुलंद नहीं हो रही। उधर उत्तर प्रदेश के नक्सल प्रभावित जनपद मिर्जापुर, चंदौली और सोनभद्र में जिला प्रशासन नक्सल के नाम पर कोलों को निशाना बना रहा है। इसके कारण कोल जाति के लोग अपने हक की आवाज उठाने से कतरा रहे हैं।

आदिवासीयों के मौलिक अधिकार से वंचित कोल, कोरवा, मझवार, धांगर (उरांव), बादी मलार, कंवर आदि जातियों के लोग अपनी पुस्तैनी जमीन से बेदखल होने के बाद दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। जिसके साथ ही, उनकी अमूल्य नृत्य संस्कृति भी दम तोड़ रही है। आदिवासियों के वनाधिकार कानून समेत अन्य अधिकारों को लेकर कुछ सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने आवाज उठानी शुरू कर दी है। इन संगठनों में जन संघर्ष मोर्चा, वनवासी गिरिवासी और श्रमजीवी विकास मंच का नाम प्रमुख है। इन सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के प्रयास से वनाधिकार कानून के लाभ से वंचित आदिवासियों ने भी धीरे-धीरे अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी है। आदिवासी राजनीतिक नुमाइंदों से पूछ सकते हैं कि ................... वास्तविक आदिवासी कौन ?


आलू की खेती से होता हो रहा नुकसान


जनपद में आलू उत्पादन की असीम संभावनाओं के बाद भी इसके लिये कोल्ड स्टोरेज के अभाव में कम मात्रा में आलू उत्पादन करते हैं। जनपद के किसानों का कहना है कि मिर्जापुर में दो शीतलन केेंद्र हैं, लेकिन हमारे लिये इतनी दूर मिर्जापुर और चुनार जाकर आलू रखना मुश्किल है। आलू की अधिक खेती करने पर किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। शीतलन केंद्र न होने से यहां के आलू उत्पादकों को मुश्किल होगी। कोल्ड स्टोरेज की स्थापना से यहां आलू व्यवसायिक खेती हो सकती थी, जिसका लाभ सीधे तौर पर किसानों को मिलता। अपर उद्यान अधिकारी, सोनभद्र का कहना है कि सोनांचल में काफी प्रयास के बाद भी शीतलन केंद्र (कोल्ड स्टोरेज) की स्थापना अब तक नहीं हो सकी है, जिसके लिये प्रयास चल रहा है, लेकिन आवेदन ही न आने पर क्या किया जा सकता है। फूड प्रोसेसिंग प्लांट इसी वर्ष स्थापित होगा, इससे टमाटर उत्पादक लाभान्वित होंगे। 

बुधवार, 25 जनवरी 2012

भौतिकी की छात्रा को मिला गोल्ड मेडल


ओबरा परियोजनाकर्मी की बेटी मीनू सिंह ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के अंतर्गत संचालित महाविद्यालयों में भौतिक विज्ञान द्वितीय एमएससी में गोल्ड मेडल प्राप्त कर नगर एवं जनपद का गौरव बढ़ाया है। अटूट दूर-दृष्टि एवं कड़ी मेहनत के बल पर परियोजनाकर्मी देवानंद सिंह की पुत्री मीनू सिंह ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ द्वारा संचालित 287 महाविद्यालय में ओबरा पीजी कालेज की एमएससी द्वितीय वर्ष की परीक्षा में 12 सौ में 854 अंक प्राप्त कर भौतिक विज्ञान में यूनिवर्सिटी टाप कर महाविद्यालय के गौरव को ऊंचा किया। बचपन से ही मृदुल एवं शांत स्वभाव की मीनू पहली कक्षा से ही अपने मेहनत के बल पर माता पिता सहित शिक्षकों का दिल जीतती रही। पढ़ाई के अलावा मीनू सिंह घर के काम काज में भी मां का हाथ बंटाने में गुरेज नहीं करती है।ओबरा पीजी कालेज के प्राचार्य डा. एचएन सिंह ने बताया कि मीनू सिंह जितनी अच्छी पढ़ाई में है, उससे भी अधिक संस्कारपूर्ण छात्रा है। मीनू सिंह ने गोल्ड मेडल पाकर महाविद्यालय का नाम गौरवान्वित किया है। महाविद्यालय परिवार उसके उज्जवल भविष्य की कामना करता है। वहीं एमएससी द्वितीय वर्ष भौतिकी टाप टेन लिस्ट में ओबरा कालेज के महताब आलम पुत्र शमशुल आलम, अंजुम फातमा पुत्री अतिकुल्हक खान, जुगनू पुत्र अजय सिंह ने छठवां, सातवां व आठवां स्थान पाकर महाविद्यालय का नाम गौरवान्वित किया।

करोड़ो के कीमती जमीन पर हो रहे कब्जे को लेकर प्रशासन का मौन परदे के पीछे अनुबंध की पुष्टि


उर्जानचल के मध्य रेणुकूट से लेकर शक्तिनगर तक के वन विभाग के जमीनों की बेशकीमती भूमि पर करोड़पति व्यवसायियों द्वारा बेरोकटोक अवैध निर्माण किया जा रहा है। जिला प्रशासन को इसकी जसूचना होने के बाद भी कोई कार्यवाही नही करने से परदे के पीछे हुए किसी अनुबंध की पुष्टि होती है। एक ओर गरीब एवं आवासहीनों को अनिवार्य जरूरत के लिए भी अनुपयोगी व पहाड़ी जैसे जगहों पर बनाये जा रहे झोपडियों को तोडने के लिए प्रशासन कोई कसर नही छोड रही है। वहीं क्षेत्र में जिला प्रशासन के नाक के नीचे करोडों की बहुमूल्य भूमि पर धडल्ले से चल रहे निर्माण के प्रति प्रशासन की रहमदिली सदेंह के दायरे में है। जबकि व्यवासायियों द्वारा प्रशासन के साथ शायद गुप्त समझौते के चलते करोड़ो की भूमि हथियाने का यह कारोबार फल-फू ल रहा है एवं बीना किसी अनुमति के दो-दो मजिंल की इमारतों तक का निर्माण किया जा चुका है। महत्वपूर्ण है कि यदि गरीबों बेघरों को छोटी-मोटी झोपडियंा बनाने पर विभाग के अधिकारी ढेरों अनापत्ति प्रमाण पत्रों की मांग करते है वहीं वन विभाग के अन्तर्गत पड़ने वाली भूमियों के बीचों-बीच करोड़ो के कीमती जमीन पर हो रहे कब्जे को लेकर प्रशासन का मौन साधे रहना सोचनीय है। अवैध कब्जा कर रहे एक व्यवसायी के अनुसार निर्माण पूरी तरह से अवैध है, इसके लिए किसी प्रकार की अनुमति नही ली गई है।