मंगलवार, 25 जून 2013

स्कूल जाने की उम्र में खतरों से खेल रहे

ऽ पैसा न होने की वजह से पढ़-लिख कर अधिकारी नहीं बन पाने का मलाल
सांप का पिटारा लिए मासूम।

केंद्र एवं प्रदेश सरकार की मंशा के अनुरूप शिक्षा महकमा सर्व शिक्षा अभियान के तहत गरीब तबके बच्चों को कितनी शिक्षा मुहैया करा रहा है इसका अंदाजा टोकरी में सर्प लेकर घूम रहे बच्चों को देख कर सहज ही लगाया जा सकता है। पापी पेट के लिए दस वर्षीय रफीनाथ पढ़ने-लिखने की उम्र में नागराज से खेल रहा है। चंद रुपयों के लिए बालक स्कूली बैग की जगह सांप के पिटारों को लेकर नगर और गांवों में दिन-दिन भर भ्रमण कर रहे हैं। प्रतिवर्ष शिक्षा विभाग के अधिकारी और कर्मचारी बच्चों एवं अभिभावकों को जागरूक करने के लिए लाखों रुपये पानी की तरह खर्च करते हैं। बावजूद इसके गरीब तबके के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध नही हो पा रही है। गुरुवार को राबर्ट्सगंज नगर में इलाहाबाद जनपद के शंकरगढ़ के मूल एवं राबर्ट्सगंज नगर के अस्थायी निवासी रफीनाथ (10) पुत्र कपूरनाथ समेत आधा दर्जन बच्चे पढ़ने की उम्र में पिटारे में सर्प लेकर घर-घर घूम रहे हैं। अमर उजाला से बातचीत के दौरान रफीनाथ ने बताया कि मेरे अभिभावकों के पास पैसा नहीं है इसलिए मैं चाह कर भी पठन-पाठन नहीं कर पा रहा हूं। पेट के लिए दिनभर बांबी में नागराज को लेकर लोगों को दर्शन कराता हूं, शाम तक करीब पचास से सौ रुपये कमा कर अपनी मां को ले जाकर दे देता हूं। कमाई में से दस रुपया नाश्ता के लिए प्रतिदिन मिलता है। पढ़ाई करने का मन तो बहुत है लेकिन पैसा न होने की वजह से पढ़-लिख कर अधिकारी नहीं बन पा रहा हूं।

सरकार के पेट से निकली राजनीतिक पतनशीलता

देश की राजनीतिक पतनशीलता सरकार के पेट से ही निकली हुई है। इसकी बानगी देश के हर इलाके में देखने को मिल रही है, लेकिन आदिवासी इलाकों में यह कुछ ज्यादा ही दिखाई देती है। चाहे वह उड़ीसा का आदिवासी इलाका हो या फिर झारखंड का। उत्तर प्रदेश का आदिवासी इलाका भी इससे अछूता नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल जनपद सोनभद्र में राजनीतिक पतनशीलता की झलक आसानी से देखी जा सकती हैं। जहां आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत वननिवासियों को देश की आजादी के करीब साढ़े छह दशक बाद भी उनका हक नहीं मिल पाया है, ना ही भविष्य में मिलने की संभावना दिखाई दे रही है। 

बाहरी लोगों को अचरज होगा कि इस जनपद में कानूनी रूप से जंगल लगभग 57 फीसदी भूभाग पर अवस्थित है। पर देखने और जांच करने पर इस आंकड़े का आधा भी प्रमाणित हो जाए तो बड़ी बात होगी। हजारों एकड़ वन भूमि तो दस से अधिक उन बड़े कारखानों को खैरात में दे दी गई है जो यहां माननीयों के रूप में मानवीकृत हैं तथा उनके पदाधिकारी विकास  पुरुष (ध्यान रहे कारखानों के मालिक नहीं, मालिकों के सीईओ) के रूप में सम्मानित किए जा रहे हैं। यह प्रायोजित बिडंबना ही हैं कि एशिया का विशाल बांध कहा जाने वाला रिहंद बांध जो पंत सागर के नाम से विख्यात है, आज कारखानों की राख से पटता जा रहा है। सवाल है कि इस पतनशीलता के लिए किसे उत्तरदायी माना जाए ?

यहां यह प्रसंग कि सोनभद्र में 57 फीसदी जंगल कानूनी रूप से कैसे हो गया। इस आलेख को विस्तृत करना होगा पर संक्षेप में यह जानकारी देना अनिवार्य है कि सोनभद्र के दक्षिणांचल का परिक्षेत्र को अंग्रेजों ने ‘अनुसूचित परिक्षेत्र’ का दर्जा दिया था तथा अपने कानून इस परिक्षेत्र में लागू नहीं किए। ऐसा करके अंग्रेजों ने इस क्षेत्र का भला ही किया। भला इस अर्थ में कि इस क्षेत्र की पैमाइस नहीं कराया और इस क्षेत्र को तत्कालीन राजाओं एवं ज“मीनदारों से अलग कर दिया। एक तरह से अंग्रजों के अपने स्वामित्व वाला परिक्षेत्र तथा यहां की एक तहसील दुद्धी को तो विक्टोरिया की रियासत ही बना दिया। आजादी के बाद जाहिर है फिर तो यहां जंगल को कागज में विस्तृत रूप में होना ही था। आज तकलीफ इस बात की है कि वह जंगल अब है कहां? जमींदारी टूटते समय आखिर उन वनवासियों के नाम से जमीनें क्यों नहीं आवंटित की गईं, जबकि वे जोत-कोड़ व घर मकान के साथ काबिज थे। आज नये वन अधिनियम के तहत उन्हें भूमि देने की कवायदें क्यों की जा रही हैं, इसे रंगीन नाटक नहीं कहा जाएगा तो क्या कहा जाएगा ?

औद्योगिक स्थापनाओं ने यहां जैसी बर्बरताओं को उगाया है। वैसी मिसालें कहीं अन्यत्र मिलना मुश्किल होगा। यह करूण शोध होगा पता लगा लेना कि सोनभद्र के वन विभाग ने जितने वनवासियों एवं आदिवासियों को वन अधिनियम की धारा-चार और बीस के तहत विस्थापित किया है, क्या उससे अधिक देश के किसी दूसरे हिस्से में किया है? आंकड़े की बात करें तो लाखों के पार वनवासी और आदिवासी अब तक विस्थापित किए जा चुके हैं। क्या यह मजाक नहीं है कि आज उन्हें जमीन देने की बातें की जा रही हैं। आखिर इससे बड़ी दूसरी चुनौती क्या हो सकती है? इधर हाल ही में जिन जातियों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल किया गया है, उन्हें भी तो अभी तक कानूनी दर्जा नहीं मिल पाया है। पेंच कहां फंसा है। इन सब पतनशीलताओं को समझाना मुश्किल नहीं।

पेंच तो जाहिर है कि सरकारों की राजनीतिक इच्छा शक्ति में है। हमारी सरकारें अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से बाहर निकलती जा रही हैं। हर पांच साल बाद सरकार नया रूप धर रही है, चुनाव हो रहे हैं जनता वोट दे रही हैं और सरकारें चल भी रही हैं। फिर काहे की चिन्ता। किस बात की चिन्ता। सरकार भी तो उनकी नहीं जो गरीब हैं, विस्थापित हैं! उनकी कभी सरकार बन सकती है इसकी दूर दूर तक संभावना नहीं। संभावना तो इस बात की भी नहीं है कि उन्हें दो जून की रोटी भी समानुपातिक ढंग से मिल सकेगी, फिर क्या होगा? यहां वह मामला नहीं कि जो होगा ठीक ही होगा। सभी जानते हैं कि सोनभद्र में ठीक नहीं हो रहा। यहां ठीक केवल एक शब्द है जो अथर्हीन है। यहां की औद्योगिक संस्कृति ने एक तरह से राज्य की विनम्रता ही छीन लिया है, जो जंगल कभी विनम्रता का प्रतीक हुआ करता था उसमें हर ओर आग लगी हुई है। कौन सी चिनगारी कहां गिरेगी किसी को नहीं मालूम। कौन जलेगा, कौन मरेगा, कुछ नहीं कहा जा सकता। आग का आलम यह है कि जो वनवासी कभी लाल वर्दी वाले चैकीदार को देखते ही गांव छोड़कर भाग जाया करते थे, वे आज वर्दीधारी हो गए हैं। उनके कन्धों पर बन्दूकें लटकी हुई हैं। वे जो संवाद की भाषा तक नहीं जानते थे उनके लिए बन्दूक की भाषा और बोली मुहब्बत की बोली और भाषा हो गई है। इसे समझने और महसूस करने के लिए संवेदनशील दिल की आवश्यकता होगी। कानून इस पर तभी विचार कर सकता है जब वह अपनी जड़ता तोड़े और जल, जमीन और जंगल के साथ-साथ जन पर भी विचार करे। जन विहीन जंगल का क्या मतलब ? जन हैं तो जंगल है। जन बचेंगे तो जंगल खुद-ब-खुद बच जाएगा।

माना जाता है कि बिना औद्योगिक इकाइयों के निर्माण से विकास कैसे होगा। विकास आज के समय में उद्योगों के निर्माण का दूसरा नाम है। पर किसका विकास हुआ क्षेत्र का या यहां के जन का ? यहां के लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि ना ही जन का विकास हुआ, ना ही क्षेत्र का। यहां के दो फीसदी मूल निवासियों को भी इन कारखानों से नहीं जोड़ा जा सका है। अब तो भारी मशीनीकरण के युग में रोजगार की दूर-दूर तक संभावना भी नहीं है। वैसे ही सारे कारखाने वाले कर्मचारियों के मैनुअल आॅडिट के तहत छंटनी पर छटनी किए जा रहे हैं। आज की स्थिति यह है कि कारखाने वाले कमर्चारियों का नियमितीकरण ही नहीं कर रहें हैं। सारे काम ठेका मजदूरों (कुशल एवं अकुशल दोनों) एवं कर्मचारियों से कराए जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में कर्मचारियों की भर्ती एवं नियमितीकरण का सवाल ही कहां ह? औद्योगिक विकास कानारा ‘हर हाथ को काम’ के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है कि वह साबित करे कि उसकी उपयोगिता समाज को है या नहीं। जाहिर है जब औद्योगिक संरचनाएं जन का सम्मान करेंगी तभी जन भी उसका सम्मान करेंगे। यही टूट रहा है। दुनिया जानती है जन के दिलों का टूटना। किसी भी सभ्यता के लिए सामान्य परिघटना नहीं है।

औद्योगिक विकास का प्रतिफल सोनभद्र में अब साफ-साफ दिखने लगा है। गांव के गांव विकलांगता के शिकार होते जा रहे हैं। यहां का पानी पीने लायक नहीं रह गया है। पानी में फ्लोराइड ओर दूसरे तरह के विषैले रसायन जो कारखानों से उत्सर्जित होते हैं, मिलते जा रहे हैं। हर ओर धूल-धुआं और राखड़।  तर्क दिया जा रहा है कि इसका कारण वन का कटाव है। अरे भाई किसने वन कटवाया? किसने कारखानों को लगवाया? और आज कौन तोड़वा रहा है गिट्टी के पहाड़ों को ? कौन निकलवा रहा है नदियों का बालू ?


तो यह तस्वीर है उ.प्र. के एक जिले सोनभद्र की, जहां दसेक कारखाने खड़े हैं और भी खड़े होंगे जैसा कि प्रस्तावित हैं। यहां के आदमी लंगड़े हो रहे हैं। कारखाने सेंसेक्स बड़ा रहे हैं और लोगों के घरों के चूल्हे बुझ रहे हैं। अस्पताल हैं उनमें केवल दवाइयां नहीं हैं। डाक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस में व्यस्त हैं। स्कूल हैं जिनमें प्रधान जी की भैंसे बांधी जा रही हैं। स्कूल के सरकारी अघ्यापकों के बच्चे नर्सर्री स्कूल में पड़ रहे हैं। जिलाधिकारी और एसपी स्थानांतरण से परेशान हैं। कौन सा अदना कर्मचारी उन्हें राजधानी के मुख्यालय से जोड़वा देगा ज्ञात नहीं। डर तो शाश्वत है।  शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, रहवास की सुरक्षा का नारा लगाने वाली व्यवस्था की चुनौतियों से किसे लड़ना है, तंत्र को या जन को ? सोचना यही है। यही सोचना ही जनतंत्र को सबल भी बनाएगा। पर क्या हम सोच रहे हैं?       
                                                       
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। लेखक उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद के राबर्ट्सगंज के रहने वाले हैं। उन्होंने आदिवासियों पर कई किताबें लिखी हैं. मोबाइल नंबर-09451184771 )

गुरुवार, 2 मई 2013

शराब की मांग में इजाफे से बढ़ गई तस्करी, ऊर्जांचल में बेखौफ हो रही तस्करी



ऊर्जांचल में पारा लुढ़कने के साथ अंग्रेजी शराब की मांग में बढ़ोतरी होने से अंतरप्रांतीय शराब तस्करों का गिरोह सक्रिय हो गया है। जानकारों के दावे पर एतबार करें तो सीमावर्ती मध्य प्रदेश एवं हरियाणा के साथ पड़ोसी राज्यों बिहार, झारखंड व छत्तीसगढ़ से शराब की खेप ऊर्जांचल के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाई जा रही है। कुछ खास ब्रांडों की कीमतों में अंतर को भुनाने के लिए कारोबारियों ने अपना नेटवर्क खड़ा किया है। सीमांचल क्षेत्रों में स्थित दुकानों पर अन्य प्रदेशों की शराब किस तरीके से कैसे पहुंच रही है इसका जवाब संबंधित महकमे के जिम्मेदारों के पास नहीं है, लेकिन बीते सालों में बार्डर क्षेत्र में हुई कई बरामदगियों को नजर अंदाज नहीं किया जाए तो सब कुछ सामने है। सूत्रों की माने तो पहले बाहरी शराब को सीधे उसी पैक में बेच दिया जाता था लेकिन अब यूपी के बोतलों में ही बाहरी शराब को भर कर बेच दिया जा रहा है। इस तरह मध्य प्रदेश एवं हरियाणा में बेचे जाने वाली शराब की बोतलें यूपी के बार्डर इलाके में आबाद शराब की दुकानों पर खुलेआम बेची जा रही हैं। सूत्र बताते हैं कि मध्य प्रदेश के विंध्यनगर का एक चर्चित कारोबारी का उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के व्यवसायियों से तालमेल हो गया है। यही वजह है कि सब कुछ सेट है और बिना किसी जोखिम के कार्य को अंजाम दिया जा रहा है। इस बाबत सिंगरौली के आबकारी अधिकारी दिनेश उदैनिया का कहना है कि एमपी की शराब यूपी में बेची जा रही है तो मप्र के राजस्व का कोई नुकसान नहीं है यह तो उत्तर प्रदेश सरकार को देखना चाहिए।

उर्जांचल में वसूले जा रहे है शराब के औने पौने दम

1. सरकारी शराब के दुकानों से सरकार को हो रही लाखों की राजस्व क्षति।
2. निर्धारित मूल्य से ज्यादा वसूला जा रहा है, शराब पीने वाले ग्राहकों से। 
3. उर्जान्चल में लगभग 05-10 हजार रूपये रोजाना वसूले जा रहे है, शराब पीने वाले ग्राहकों से।

इसे ग्राहकों की दरियादिली कहे या दुकानदारों की दादागिरी, क्षेत्र में अंग्रेजी शराब व बियर की दुकानों पर आबकारी नियमों की धज्जिया उड़ाते हुए जहाँ राजस्व का नुकसान करा रहे है। वही बोतलों पर छपे मूल्य से ज्यादा पैसा ग्राहको से लेकर महंगी शराब बेची जा रही है। जानकारी के अनुसार अनपरा, शक्तिनगर, बीना, रेनुसागर, बाँसी, डिबुलगंज, औड़ी मोड़ इत्यादि जगहों पर अंगे्रजी शराब का पौआ, अद्धा, बोतल पर क्रमष 10,15,20 रूपये निर्धारित मूल्य में जोड़कर ज्यादा लिया जा रहा है। कारण पूछने पर दुकानदार प्रिन्ट किया हुआ एक रेट-लिस्ट दिखाते हुए बताते है कि ये आबकारी विभाग की निर्धारित मूल्य सूची है, इसी मूल्य पर हमें बेचने का आदेष दिया गया है। 

गत दिनों औड़ी के एक बियर दुकान के लाईसेन्सी से जब निर्धारित मूल्य से ज्यादा दाम लिये जाने की बात कही गई तो उसने बताया कि प्रति बोतल दस रूपया बतौर ट्रान्सपोर्टिंग लिया जा रहा है। क्योंकि यह दुकान जिला मुख्यालय से 100 किमी से ज्यादा दूर है। साथ ही लाईट कटने पर जेनेरेटर से फ्रिजर चलाना पड़ता है। इतना ही नहीं अंग्रेजी शराब के दुकानदार अपने फायदे के चक्कर मे सरकार के झोली में जाने वाले लाखों रूपये के राजस्व कों चपत लगा रहे है। उक्त स्थान के किसी भी अंग्रेजी शराब के दुकान पर बे-रोक टोक आप पैसा देकर दस बीस बोतल शराब या बियर खरीद सकते है। यह कोई नई बात नहीं है। यहा के होटलों एवं ढाबों में हर रात शराब की पार्टिया होती रहती है। लोग पैसा देते है और उनके मनपसन्द शराब की ब्राण्ड उन्हें दे दी जाती है। 

आबकारी अधिनियम के मुताबिक विदेषी शराब विक्रेता किसी व्यक्ति को दो बोतल से अधिक शराब नहीं दे सकता है। लेकिन दुकानदार को नियमों से कुछ लेना देना नहीं है। बड़े-बड़े समारोह या त्योहारों के समय भी खुलेआम शराब पीना जुर्म है। परन्तु यहाँ के होटलों और सरेराह बारात में शामिल लोग बोतल लेकर झूमते नजर आते है। जिस पर विभाग के आला अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक किसी की नजर नहीं पड़ती है। ज्ञातव्य है कि पार्टी, समारोह के मद्देनजर दो से अधिक शराब की बोतलों के लिये आबकारी विभाग में फार्म एफएल-11 के जरिये परमिट हासिल करना होता है, आबकारी विभाग बतौर इसके एवज में एक हजार रूपये का शुल्क लेता है। एफएल-11 परमिट दो तरह का होता है। घरेलू एफएल-11 घरेलू परमिट का शुल्क एक सौ रूपया होता है। 

आबकारी विभाग द्वारा जारी किये जाने वाले परमिट में सम्बन्धित शराब विक्रेता का नाम, कितने बोतल शराब उपलब्ध कराई जानी है इत्यादि का स्पष्ट उल्लेख होता है। इससे अवैध और जहरीली शराब की बिक्री से बचाव होता है तथा किसी व्यक्ति के नकली या जहरीली शराब पीने से गम्भीर होने के खतरे कम होते है। क्योंकि एफएल-11 परमिट पर हासिल शराब का स्त्रोत अधिकृत होता है। आबकारी विभाग की चुप्पी और अंग्रेजी शराब के दुकानदारों की मनमानी के चलते पूरे जनपद में प्रतिवर्ष राज्य सरकार के खजाने में जाने वाले लाखों रूपये के राजस्व की क्षति पहुँचायी जा रही है। अंग्रेजी शराब के दुकानदार के मुताबिक किसी को 2 बोतल से ज्यादा शराब नहीं दिया जा सकता, लेकिन लोग जबरजस्ती ले जाते है तो हम क्या करें। नाम ना छापे जाने पर एक अंग्रेजी शराब के विक्रेता ने बताया कि कोई लाख उपाय करले जब तक अधिकारी हर पेटी पर अपनी निर्धारित कमिषन माफ नहीं कर देते तब तक हमें ग्राहको से मूल्य से अधिक पैसे लेना मजबूरी बन जाती है। इस सम्बन्ध में जिला आबकारी के पी सी पाल, आबकारी निरीक्षक सुदर्षन का कहना है कि अधिक मूल्य एवं नकली शराब बेचने वाले के खिलाफ समय-समय पर अभियान चलाकर अंकुष लगाया जाता है। फिर भी तथ्यपूर्ण षिकायत मिलने पर कार्यवाही की जायेगी। 

रविवार, 10 मार्च 2013

प्रषासन के संरक्षण मंे उर्जान्चल में चल रहे ढग्गामार वाहन

ऽ-घट सकती है कभी भी बड़ी दुर्घटना। 
ऽ-नषे मंे धूत ड्राईवर कर रहे हैं जीपों का संचालन।
ऽ-इसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी गाली-गलौज की घटनाएं हो चली है आम।
ऽ-फिक्स भाड़े से ज्यादा वसुले जाते है पैसे

अनपरा के डिबुलगंज से षक्तिनगर तक जाने वाली ढ़ग्गामार वाहन दुर्घटना को दे रहे है दावत। इन ढ़ग्गामार वाहनों को संचालित करने वाले मालिकों एवं ड्राईवरों के पास न तो परमीट है न तो लाईसेंस साथ में अनपरा पुलिस का हाथ जो उन्हें खुलेआम कानून का उलंघन करने के लिए प्रेरित कर रहा है। अनपरा थाने के सामने से रोजाना लगभग 40 ढ़ग्गामार वाहन गुजरते है लेकिन पैसे की लालच ने उन्हें रोकने की बजाय उन्हें और ज्यादा मात्रा में प्रोत्साहित करने का कार्य किया है। ज्ञात हो कि डिबुलगंज से षक्तिनगर जाने वाले इस मार्ग पर लगभग 40 जीप चलती है। इन वाहनों में लगभग 90 प्रतिषत वाहन ऐसे है जो इस बड़े राजमार्ग पर चलने के लायक नहीं है जिनकी समय सीमा बहुत पहले ही समाप्त हो चुकी है साथ ही इनके कुछ ड्राईवरों के पास लाईसेंस तक नहीं उम्र भी काफी कम लेकिन अनपरा पुलिस ने इन गाड़ियों को रोक कर पुछते की जहमत भी नहीं उठाती की गाड़ी का एंसुरेन्स है कि नहीं ड्राईवरों के पास लाईसेंस है कि नहीं,  इस मार्ग पर चलने के लिए परमीट है कि नहीं ऐसे कई सारे सवाल है जिनका उत्तर सिर्फ प्रषासन के पास है। 
ड्राईवरों की माने तो इस राजमार्ग पर चलने के लिए उनके द्वारा प्रषासन को प्रतिमाह धन उपलब्ध कराया जाता है, इसी कारण से प्रषासन भी उन्हें देखकर आखे बन्द कर लेती है। इन ढ़ग्गामार वाहन पर जब भारी संख्या में लाग बैठते है तो यह वाहन एक तरफ झुक सा जाता है जिसे देखकर ऐसा लगता है कि कहीं ये वाहन पलट न जायंे इसके अतरिक्त ड्राईवर ऐसे बैठकर गाड़ी चलाता है कि जैसे वह अब जीप से बाहर ही गिरने वाला हो ऐसी स्थिति में वह गाड़ी का इस्टेरिंग न पकड़े तो वह निष्चित ही गिर जायेगा। लेकिन संचालक होने के कारण वह उसे पकड़ा रहता है। ऐसी स्थिति में वाहन अगर पलट जाये तो भारी संख्या मंे लोगांे को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा। मगर प्रषासन को इन सब की चिंता कहा जब दुर्घटना होगी तो देखा जायेगा। उनका ऐसा मानना है। ऐसा कई बार देखा जा चुका है कि ड्राईवर द्वारा राजमार्ग पर जब अप-डाउन के दौरान उनके मँुह से दारू की बास आती है जिससे मालुम होता है कि ड्राईवर नषे मंे हैै। जबकि इस राजमार्ग पर लगभग कई सौं गाड़ियाँ परियोजनाओं एवं वाराणसी मंडी मंे कोयला ले जाने का कार्य करती है। नषे मंे धुत ड्राईवर द्वारा एक छोटी सी गलती पर भी बड़ी दुर्घटना हो सकती है जबकि इस राजमार्ग पर आये दिन दुर्घटना होती रहती हैं। जिसमें कई हजार लोगों की जाने जा चुकी है। इसके अतिरिक्त इन ढ़ग्गामार वाहनों में बैठे सवारियांे के साथ गाली-गलौज एवं मारपीट की घटनाएं आम हो चली है। लेकिन लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर ये ढ़ग्गामार वाहन इस मार्ग पर खुलेआम प्रषासन के संरक्षण मंे अपने वाहनों का संचालन कर रहे हैं। थाने मंे पैसे देने के कारण उनकों किसी का डर नहीं सब जानते है कोई भी मामला होगा वह थाने ही पहुचेगाँ जिसे पैसा देकर हल कराया जा सकता है। अगर समय रहते इस पर विचार नहीं किया गया तो किसी बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता ऐसी स्थिति में प्रषासन इन जिम्मेदारियों से अपना मुहँ मोड़ नहीं सकता है। बड़ी दुर्घटना की स्थिती मंे लोगों द्वारा किये जाने वाले जाम एवं राजमार्ग बाधित होने से देष को करोड़ों रूपये के राजस्व का नुकषान पहुचेगाँ। इसकी पूर्ति किसके द्वारा की जायेगी। इसके बारे मंे प्रषासन को ही जबाब देना होगा। 

रेगिस्तान में बदल रहा हैं, उर्जान्चल


उत्तर प्रदेष वि़द्युत विभाग का नवनिर्माणाधिन अनपरा ‘‘डी’’ तापीय परियोजना जिसकी कुल उत्पादन क्षमता 1000 मेगावाट है। निर्माणाधिन अनपरा ‘‘डी’’ परियोजना के निर्माण से कई वर्ष पूर्व में ही एक निष्चित योजना के अंतर्गत यहां के मूल निवासियों की भूमि को जिसे सरकार ने अधिग्रहण कर उनको सरकारी नौकरी तथा मुआवजा देकर इसे खाली करा लिया बाद में सरदार गोविन्द वल्लभ पन्त सागर के आस-पास के भू-भाग को एक व्यवस्थित तरीके के साथ बांध बनाकर उसमें अनपरा ए और बी की इकाईयों द्वारा प्रयुक्त हो चुके कोयला जो जलने के उपरान्त सिर्फ राख मात्र बचता है। इस राख को कई वर्षों तक इसमें भरा गया,  जिससें एक विषाल भू-भाग का निर्माण हुआ। इस भू-भाग को तैयार करने में लगभग 50 फिट राख को इस बाध के अन्दर भरा गया था जो पहले ही सरदार गोविन्द वल्लभ पंत सागर (डैम) के द्वारा छीनी गयी जमीन थी। जिससे एक ऐसे भूमि स्थल का निर्माण किया गया जहाँ पर एक पावर प्लांट का निर्माण किया जा सके, जब प्लांट के निर्माण कार्य करने की समय सीमा तय होने के पष्चात उत्तर प्रदेष सरकार ने इसे ठेके के तौर पर प्लांट निर्माण का कार्य बी.एच.ई.एल (भेल) को षौप दिया ।

‘‘डी’’ परियोजना का प्लंाट निर्माण कार्य षुरू करने से पूर्व राख के उपर तीन फिट मिट्टी डाली गयी ताकि कार्य करने के दौरान राख न उड़े लेकिन जैसे-जैसे इस भू-भाग पर पाइलिंग का कार्य आगे बढ़ा तो तीन फिट मिट्टी जो राख न उड़े इसके लिए डाली गयी थी वह भारी वाहनों एवं भारी मषीनों के द्वारा रौदकर इस मिट्टी को भी राख मे मिला दिया। अब आलम यह है कि जहाँ इस बड़े भू-भाग पर प्लांट का निर्माण हो रहा है। वह राख से भरी है। कार्य करने आये श्रमिकेां को इस राख रूपी भूमि पर कार्य करना पड़ रहा है जो गर्मीयेां के समय में जब हल्की सी भी हवा चलती है तो ऐसा प्रतित होता है कि रेगिस्तान में तुफान आ गया। बरसात के मौसम में यह भूमि दलदल का रूप धारण कर लेती है अनपरा ‘‘डी’’ में कार्य करने वाले मजदूरों की माने तो यहाँ कार्य करना एक बड़ी चुनौती है क्योकि गर्मियों के समय में हल्की सी हवाएँ चलती है तो इतनी राख उड़ती है कि एक-दूसरे के बगल में खड़ा मजदूर अपने दूसरे साथी को नहीं देख सकता। प्रदूषण से सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रूपये कम्पनियों वसुलती है लेकिन ये सुरक्षा के उपकरण मजदूरों तक नहीं पहुच पाते जिसमें करोड़ों की हेर-फेर प्रदूषण से सुरक्षा के नाम पर किया जा रहा है।

प्रदूषण से सुरक्षा के नाम पर इन मजदूरों के पास ऐसा कोई भी उपकरण नहीं है जो राख या किसी अन्य प्रदूषित वस्तुओं से इन्हे बचा सके जब कि यह क्षेत्र प्रदूषण के मामले में भारत का नवां सबसे अधिक प्रदूषित क्षेत्र घोषित है। इस परियोजना की लागत कई सौ करोड़ों रूपये में है लेकिन यहाँ कार्य करा रही कम्पनियों केा यहाँ कार्य करने वाले मजदूरों से कोई लगाव नहीं है। कम्पनियों को सिर्फ अपने कार्य से ही मतलब है। बावजूद मजदूर चाहे राख खाये या गन्दा पानी पीये सुरक्षा के नाम पर कम्पनियों की तरफ से राख से बचने व पीने के पानी की भी सही व्यवस्था नहीं है तथा जो संसाधन मजदूरों को सुरक्षा के लिए आते भी है वेा कम्पनी अपने तरीके से बेच खाती है या मजदूरों तक ही नहीं पहुच पाती। कम्पनी के लोग आपस में मिल बाटकर खा जाते है। सूत्रों की माने तो कम्पनियाँ यहाँ कार्य तो करा ही रही है लेकिन अब तक करोड़ों के वारे-न्यारे फर्जी तरीके के साथ हो चुका है। 

भविष्य में भी इस तरह के गतिविधियाँ होती रहेगी। कम्पनियों के अधिकारीयों को बैठने के लिए आवास बने है जब कि मजदूर जो दिन भर धुप व राख खाता है उसे पीने के पानी की भी व्यवस्था डैम के द्वारा की जाती है। जो पहले ही काफी प्रदुषित हो चुका है क्योकि इन औद्योगिक संस्थानों के द्वारा इतने रसायनिक कचरे इस गोविन्द वल्लभ पन्त सागर में बहाया जा चुका है कि इसका जल काफी हद तक जहरीला हो चुका हैं। ऐसी कई घटनाये समाने आ चुकी है कि डैम का प्रदूषित पानी पीकर यहां के लोग अपनी जान भी गवा चुके है। लेकिन यहां के कम्पनियों के लोग आज तक इस समस्या के समाधान एवं मजदूरों की सुरक्षा पर किसी तरह की चिंता दिखाई नहीं देती अगर भविष्य में  सरकार इन समस्याओं की तरफ ध्यान नहीं देती तो ऐसी घटनाए आम हो जायेगी। 

राशन लेने के लिए तीस किमी तक पैदल चलना पड़ता है,

" जिले के कई भाठ एवं दूरूह क्षेत्रों में सार्वजानिक वितरण प्रणाली का हाल बुरा"

PDS
गरीब परिवारों को सस्ते दर पर खाद्या्न उपलब्ध कराने के नाम पर जिले में कई पंचायत में अब तक राशन दुकान एवं सुलभ वितरण हेतु कई नजदीकी भण्डार नही खुल पायी है। इन पंचायतो के कई आश्रित ग्रामों को तो तीस किमी तक राशन लेने के लिए पैदल चलना पड़ता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जिले के भाठ क्षेत्र में कही-कही पर ही ग्रामीण राशन दुकान है। इनमे से कई तो पहुंच विहीन व नक्सल प्रभावित क्षेत्रो में है। जिला मुख्यालय से मात्र तीस किमी दूर जुगैल ग्राम पंचायत के लगभग 15 से ज्यादा टोलो के लोगों को राशन लेने 10 से 15 किमी की यात्रा करके राषन लेने आना पड़ता है। इसमे कुलडोमरी ग्राम पंचायत एवं व बेलहत्थी ग्राम पंचायत का भी यही हाल है। हजारों ग्रामीणो को कोसो पैदल या जीप से के रास्ते 10 से 15 किमी से ज्यादा सफर करना पड़ता है। चोपन सहित म्योरपुर विकासखंण्ड के लगभग 20 से 25 ग्राम पंचायतों का यही हाल है। पनारी, बैरपुर, परसोई एवं कुलडोमरी ग्राम पंचायत का है जहा सबसे ज्यादा बुरी स्थिति मेड़रदह, पनारी, गाढ़ापाथर, अरंगी इत्यादि की है, जहां कई राशन दुकान 10 से अथवा उसके भीतर की परिधी में है। जिसके कारण ग्रामीण इन दुकानों में आने से परहेज करते है। कई ग्राम पंचायतों के ग्राम प्रधानों का कहना है कि अंदरूनी क्षेत्रो में राशन दुकान नही खुल पाने का कारण पहुंच की समस्या के अलावा ग्राम पंचायतो के इनके सुचारू रूप से लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है। 

पूर्वांचल राज्य बनने से कमाई होगी चैपट

मोटर मालिकों को लेना पड़ेगा आल इंडिया परमिट
ट्रांसपोर्टर यूपी का बंटवारा नहीं चाह

उत्तर प्रदेश से कट कर पूर्वांचल राज्य बना तो मोटर मालिकों की कमाई पूरी तरह से चैपट हो जाएगी। ट्रक मालिकों को आल इंडिया परमिट बनवाना पड़ेगा। गैर जनपद के माफिया अभी भी बगैर परमिट के वाहनों का संचालन कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे, लेकिन यहां के वाहन स्वामी पर परेशान हो जाएंगे। राज्य बड़ा होने से वाहनों को अन्य जनपदों में भेजने में दिक्कत नही हो रही है, छोटा राज्य बनते ही समस्याएं उत्पन्न हो जाएगी यें बातें ट्रक मालिक एवं ट्रांसपोर्टरों ने कहीं। वाहन स्वामी राजेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि पूर्वांचल राज्य बनते ही कारोबार कर दायरा सिमट जाएगा। छोटे-छोटे राज्यों के बनने से वाहन स्वामियों का व्यापक पैमाने पर शोषण होने लगेगा। विजय कुमार सिंह ने कहा कि प्रदेश सरकार ने चुनाव के मद्देनजर पूर्वांचल समेत अन्य राज्यों के बनाने के लिए विधेयक पास कराया है। कहा कि सूबे की मुखिया अपने फायदे के लिए जनता के ऊपर विभिन्न प्रकार की समस्याएं लाद रही हैं। हरदेव सिंह ने कहा कि छोटे राज्य बनने से वाहन स्वामियों को कोई फायदा नही होने वाला है। गैर प्रांतों में वाहनों के प्रवेश के लिए परमिट बनवाना पड़ेगा। वाहनों का किराया बढ़ते ही सामानों के दाम भी बढ़ जाएगें। शक्ति आनन्द कहते हैं कि पूर्वांचल राज्य बनने से गांवों में विकास कार्य तो होगा, लेकिन वाहन स्वामियों को हानि होगी। हालांकि आगामी विधान सभा चुनाव नजदीक आने पर राज्यों के बनाने की बात जनता के साथ धोखा है। ओम प्रकाष द्विवेदी ने कहा कि प्रदेश सरकार मोटर मालिकों की समस्याएं दूर करने के बजाय बढ़ा रही है। छोटे-छोटे राज्य बनते ही विकास का पहिया रुक जाएगा। लक्ष्मीकान्त दूबे ने कहा कि पूर्वांचल राज्य बनने से मोटर मालिकों को अपनी समस्याओं को शासन तक पहुंचाने के लिए भटकना नही पड़ेगा। सूबे की मुखिया का फैसला सर्वजन के हित में है।

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

शक्तिनगर से वाराणसी के लिए सीधे ट्रेन न मिलने से उर्जान्चलवासी निराष


साल भर से चल रहे आंदोलनों प्रयासों के बावजूद नतीजा रहा सिफर

रेल मंत्री पवन बंसल ने पूरे देश में 67 एक्सप्रेस ट्रेन, 27 पैसेंजर सहित कुल 93 नई ट्रेनें चलाई लेकिन ऊर्जांचल सहित पूरे जनपद के खाते में एक भी ट्रेन नहीं आई। शक्तिनगर से वाराणसी के लिए सीधे ट्रेन घोषणा का लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे थे लेकिन उनकी इस हसरत पर भी मौजूदा रेल बजट में पानी फिर गया। रेल बजट में अपने क्षेत्र का नाम देखने के लिए लोग दिन भर टीवी से चिपके रहे। लेकिन अपने क्षेत्र के लिए कुछ नया न होने पर काफी मायूस रहे। ऐसे में रेल सुविधाओं के लिए लगातार आंदोलनरत ऊर्जांचल के लोग काफी मायूस हैं।

पंकज मिश्रा
क्षेत्र के लोग पिछले एक साल से शक्तिनगर से वाराणसी तक सीधी ट्रेन के लिए कई बार आंदोलन किया। बावजूद बजट में कुछ नहीं मिला। ऊर्जांचलवासियों के लिए यह बजट पूरी तरह से फ्लाप रहा। पंकज मिश्रा, कांग्रेस नेता। 

हरदेव सिंह
ऊर्जांचल में रेलवे पटरियों का दोहरीकरण की बात कही जा रही थी लेकिन सिंगल पथ का भी विस्तार नहीं किया गया। ऐसे में यहां के लोगों में बजट को लेकर भारी हताशा है। हरदेव सिंह, ग्राम प्रधान-बेलवादह।

सुनील सिंह यादव
रेल मंत्री को मिर्चाधूरी रेलवे स्टेशन के फाटक को खोलने से लेकर भारी राजस्व देने वाले ऊर्जांचल क्षेत्र में रेलवे के विस्तार के लिए कई बार पत्र लिखा लेकिन बजट में नतीजा सिफर रहा। अब इसके लिए आंदोलन का सहारा लिया जाएगा। सुनील सिंह यादव, विधायक, ओबरा।

विजय कुमार सिंह
रेलवे मंत्री ने बड़ी चतुराई से फ्यूल सरचार्ज के नाम पर रेलवे टिकट और मालभाड़े का भार आम आदमी पर डाल दिया है। जो महंगाई में बढ़ोत्तरी करने में सहायक सिद्ध होगा।  विजय कुमार सिंह (मैनेजर, एलगी)।

अषोक यादव
रेल मंत्री ने किराया सीधे तौर पर नहीं बढ़ाया है लेकिन ईंधन के नाम पर माल भाड़ा आदि बढ़ने से सामनों की ढुलाई और महंगी होगी। जिसका खामियाजा आमजन को ही भुगतना पड़ेगा।  अषोक यादव (व्यापारी)

शक्ति आनन्द
ऊर्जांचल से देश रोशन होता है लेकिन रेल सुविधा का घोर अभाव सभी के लिए कष्टदायक है। बजट से लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। परियोजना होने के चलते यहां रेल पथ का और विस्तार होना जरूरी था, जिन बुनियादी सुविधाओं की दरकार थी उसमें से कुछ भी नहीं मिला। रेल मंत्री ने युवाओं को वाई-फाई का झुनझुना पकड़ा कर तसल्ली देने का काम किया है, ट्रेनों में वाई-फाई के जगह जरूरी सुविधाओं को दुरुस्त करने का काम किया जाना आवश्यक था। गंदे कोच और बदबूदार शौचालय भारतीय रेल की पहचान बनती जा रही है। शक्ति आनन्द, ग्राम पंचायत सदस्य-औड़ी। 

चुन्नू तिवारी
रेल बजट हर तबके को निराश करने वाली है। लोगों को मंत्री से बहुत अपेक्षाएं थी लेकिन वह खरे नहीं उतरे। नौकरी और कुछ ट्रेनों में वाई- फाई की सुविधा देकर युवाओं को लुभाने का प्रयास जरूर किया गया है। चुन्नू तिवारी, भाजपा नेता। 

अजय प्रकाष पाण्डेय
आशा के विपरीत बजट सबकुछ आशा के विपरीत हुआ है। लेकिन राहत इस बात की है कि आम लोगों और खासकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए चार सौ स्टेशनों पर लिफ्ट की सुविधा दिए जाने की बात कही गई है। अजय प्रकाष पाण्डेय, ग्राम प्रधान-रणहोर।

जगदीष बैसवार
बुजुर्गों को बड़ी उम्मीद थी की उनके टिकटों में 30 से पचास प्रतिशत की रियायत मिलेगी लेकिन इस मामले में उनके हक में कुछ नहीं किया गया। बजट में बुजुर्गों की उपेक्षा की गई है। जगदीष बैसवार, पूर्व जिला पंचायत सदस्य-अनपरा। 

बालकेष्वर सिंह
इस बजट में कई प्रकार की निराशा जनक तथ्य है। पहला अनपरा सहित पूरे ऊर्जांचल में कोई नई सुविधा नहीं दी गई। दूसरा आम आदमी को कोई विशेष सहूलियत भी नहीं मिली है। बालकेष्वर सिंह, जिला पंचायत सदस्य-कुलडोमरी। 

अवधेष शुक्ला
रेल मंत्री से ऊर्जांचल में रेल सुविधा को बेहतर करने की बड़ी उम्मीद थी लेकिन बजट में इलाके को कोई तरजीह नहीं दी गई। इससे लोगों में नाराजगी है। थोड़ी उम्मीद इस बात से है कि डेढ़ लाख लोगों को नौकरी देने का ऐलान किया गया है। अवधेष शुक्ला, एडवोकेट। 

सुभाष चन्द्र
रेल मंत्री की बजट ने लोगों के सपने टूटे हैं। आम आदमी के लिए बजट में कुछ भी खास नहीं है। ई-टिकट का समय 23 घंटे करके थोड़ी सी राहत देने की कोशिश की गई है। सुभाष चन्द्र, क्षेत्र पंचायत सदस्य-औड़ी। 

रेल बजट-2013 पर उर्जान्चल की महिलाओं की ओर से प्रतिक्रया


रेल मंत्री पवन बंसल ने मंगलवार को जनता के सामने अपने पहले रेल बजट का पिटारा खोला। इस पिटारे से तमाम तरह की घोषणाएं भी की गयी। साथ ही बजट में महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रेल सुरक्षा बल महिला कर्मिकों की चार कंपनियों का गठन किया गया। परन्तु उर्जान्चल की महिलाएं रेल में इतनी सी सुरक्षा इन्तजाम से नाखुश नजर आयी। 

रेनु कुषवाहा
सरकार ने रेल में सफर तय करने वाली महिलाओं के प्रति चिंता नहीं जाहिर की है, अफसोस इस बात की है कि अक्सर ऐसा होता है कि मौके पर महिला पुलिस कर्मी होने के बाद भी घटना घट जाती है। इसलिए उन पर भी नजर रखने के लिए विशेष पुलिस की तैनाती की जानी चाहिए। - रेनु कुषवाहा, (जिला पंचायत सदस्य-कोटा)।

चन्द्रप्रभा पटेल
सिर्फ महिला सुरक्षा गार्ड की घोषणा की गयी है। जबकि सच तो यह है कि महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ महिला पुलिस के भरोसे नहीं की जा सकती। इसमें महिला-पुरुष दोनों होने चाहिए। - चन्द्रप्रभा पटेल (गृहिणी)।

करूणा
पुलिस प्रोटेक्सन में ही महिलाओं को सफर करना चाहिए। रेल बजट में घोषित चार कंपनी महिला सुरक्षा बल से काम नहीं चलने वाला है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए रेलवे स्टेशन के टिकट खिड़की से लेकर बोगी तक सुरक्षा इंतजाम होना चाहिए।- करूणा (गृहिणी)।

पूनम सिंह
इस बजट में महिलाओं के लिए सरकार का यह सार्थक कदम तारिफ के काबिल है। परन्तु इतने से काम नहीं चलेगा अभी सरकार को हर महिला बोगी के साथ अन्य बोगियों में भी विशेष सुरक्षा व्यवस्था करना चाहिए। -पूनम सिंह (प्रचार्या, अवद्युत भगवान राम पीजी कालेज)।

किरन देवी
ट्रेन में सफर करने वाली महिलाओं के लिए इतनी सुरक्षा कम है। सिर्फ महिला पुलिस के होने से सुरक्षा नहीं होती। रेल में सफर के दौरान ट्रेन में एक लेडिज डाक्टर के साथ महिलाओं की अन्य सुविधा की चीजें भी होनी चाहिए। - किरन देवी (ग्राम प्रधान, कुलडोमरी)

महिला सुरक्षा को लेकर सरकार काफी हायतौबा मचा रही थी लेकिन रेलवे में महिलाओं की यात्रा करने के लिए अलग से स्लीपर और एसी में महिला कोच का इंतजाम नहीं किया गया जिसके चलते महिलाओं को यात्रा में खतरे बने रहेंगे। -शषि उपाध्याय (नगर अध्यक्ष, महिला कांग्रेस, अनपरा)

रीता देवी
रेल बजट सभी तबके के लोगों को निराश करने वाली है महिलाओं के सुरक्षा और सुविधाजनक यात्रा के लिए कोई कारगर ऐलान नहीं किया गया है। यह बेहद निराशाजन रेल बजट है। महिलाओं के लिए सरकार को फिर से सोचने की जरूरत है।- रीता देवी (ग्राम प्रधान, औड़ी)

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

पुलिसिया कार्रवाई के आदि बन चुके हैं गरीब आदिवासी तबके के लोग


आबकारी अधीक्षक सोनभद्र के दिषा निर्देषन पर चलाये जा रहे अवैध मादक पदार्थों की बिक्री के रोकथाम के लिए एक सूत्रीय अभियान इस अवैध धंधे में लिप्त लोगों के लिए पुलिसिया कार्रवाई के आदि बन जाने का एक मिषाल खड़ा कर रहा है। प्रषासन द्वारा सारे हथकंडे अपनाये जाने के बावजूद भी आज तक इस जुर्म पर रोक नहीं लगाया जा सका। कार्रवाई तो होती है परन्तु दूसरे दिन से जमानत पर छूट कर आये अपराधियों द्वारा फिर उसी धन्धे में उतर जाना रोज की दिनचर्या बन चुकी है, क्या इस जुर्म को विभाग रोक पायी है, हर महीने छापेमारी के दौरान सैकड़ों कुंतल लहन और शराब नष्ट करने के बाद विभाग वापस चली जाती है परन्तु षाम होते-होते फिर से षराब की विक्री षुरू हो जाती है, विभाग कार्रवाई तो करती है लेकिन जिला प्रषासन द्वारा इनके निजी जिन्दगी के विषय में आज तक किसी ने झाकने की कोषिष नहीं की कि यह सब करने के पीछे क्या कारण है। 

अगर इनके बारे में जानकारी करना है तो इनके करीब जाकर देखिए सब कुछ लोगों के सामने होगा, इनमें से कुछ ऐसे हैं जो विस्थापितों घराने से ताल्लूकात रखते हैं, कोई धन्धा न होने के कारण एक मात्र यही इनके जीविकोपार्जन का प्रमुख स्रोत बना हुआ है। इनके निजी जिन्दगी में शासन द्वारा सुधार लाने की बजाय प्रषासन संविधान की धाराओं से अवगत कराकर एक बड़े अपराधी बनने का प्रमाण पत्र दे देती है, पुलिसिया कार्रवाई के आदि बन जाने के कारण परिवार को जीवित रखने के लिए इस गर्त में घुसते चले जाते हैं। देष को करोड़ों रूपये का राजस्व उपलब्ध कराने वाला यह परिक्षेत्र, जिसने रोषनी से लेकर खान सम्बंधित भारी मात्रा में राजस्व देष को उपलब्ध कराकर अपनेआप को गौर्ववान्वित महसूस कर रहा है एवं जिनके जमीन पर इतने बड़े उर्जा घर को खड़ा किया गया, आज वहीं मुजरिम बनकर या तो पुलिसिया कार्रवाई के आदि बन चुके हैं या फिर पेट की भूख से कैद होकर लोगों से मदद की गुहार लगा रहे हैं। विगत चार माह पूर्व आबकारी विभाग द्वारा इसी परिक्षेत्र में छापेमारी की गयी, छापेमारी के दौरान सूत्रों से पता लगा कि एक दलित महिला के घर में घुस कर तोड़-फोड़ कर कीमती सामानों को उठा ले गये। अभियुक्त राजकुमार के उपर धारा लगाकर पुलिस खोजबीन में जुटी थी, पुलिस के मुताबिक राजकुमार फरार चल रहा था, परन्तु घटना के वक्त राजकुमार अस्वस्थ्यता के कारण एक निजी अस्पताल में भर्ती चल रहा था। सदमें में आयी उसकी पत्नी विक्षिप्त होकर घुम रही है, लेकिन उसका सुध लेने वाला कोई नहीं है। यदि समय रहते इन गरीबों के उपर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले भविष्य में अभियुक्त राजकुमार के पत्नी की तरह हो सकता है अनगिनत भुक्तभोगी महिलायें विक्षिप्त होकर घुमती नजर आयेंगी।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

सोनभद्र


उत्तर प्रदेष के दक्षिण व पूर्वी सीमा क्षेत्र में स्थित सृजित जनपद सोनभद्र अपनी प्राकृतिक सम्पदाओं के विपुल भण्डारण, रिहन्द जलाषय व ऊर्जा के श्रोत केन्द्र के रूप में विष्व पटल पर अपना स्थान बना चुका हैं। जनपद की कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 664522 हेक्टेयर है जिसमें 3,69,973.3 है भूमि वन भूमि जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 61.2 प्रतिषत है। कुल वन क्षेत्रफल का 40 प्रतिषत भू-भाग वन क्षेत्र सर्वें प्राक्रियो के बाद वन क्षेत्र से अलग हो जाने की सम्भावना है। 

जनसंख्या की आधे से ज्यादा जनसंख्या वनों पर आधारित है तथा बढ़ती जनसंख्या के दबाव, क्षेत्र में हो रहे अनियमित, अनियमित विकाष कार्यो व सर्वे प्रक्रिया के नाम पर, एक बडे़ पैमाने पर वनों व वन क्षेत्र का विनाष हुआ है। इस विनाष से सबसे ज्यादा प्रभावित यहां के मूल निवासी हुए हैं जो रिहन्द जलाषय के निर्माण से पूर्व इस क्षेत्र में निवास करते थे, लेकिन रिहन्द जलाषय के निमार्ण के बाद यहां के निवासियों को पुनर्वास का दंष झेलना पड़ा, यह पुर्नवास एक बार ही नहीं वरन् दो से तीन बार झेलना पड़ा। यह पुनर्वास जितनी बार भी हुआ उनकी परेषानियाँ उतना ही बिकराल रूप धारण करती चली गयी। 

औद्योगिक संस्थानाओं के निमार्ण के साथ ही कुछ लोगों को नौकारियाँ दे दी गयी उनमें वे लोग थे जो उच्च जाति के या फिर अन्य पिछड़ी जाती के लोग थे, जबकि सबसे ज्यादा जनसंख्या अनसूचीत जाति या अनसूचित जनजाति की थी जो आज भी अपने पूराने वनवासी तरीके से अपना जीवन -यापन कर रहे हंै। ऊर्जांचल का भाट क्षेत्र जो अपने मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है यहां के निवासी अपना जीवन-यापन काफी कठिनाइयों से व्यतित कर रहे हैं। देष में कई बार चुनाव हुआ तथा कई बार देष के नेता बदले, लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। जब चुनाव नजदीक आता है तो बरसाती मेढ़क की तरह सभी नेता उनकी समस्याओं को जानने के नाम पर उनका मजाक उड़ते नजर आते हैं, कहने के लिए वे उनके नुमांइदे होते हैं जेा चुनाव बितने के बाद दिखाई तक नहीं देते। 

भाट क्षेत्र में निवास कर रहे लोगों की समस्याओं को देखे तो ऐसा लगता है कि ये लोग आज भी अपना जीवन आदिमानव की तरह व्यतित कर रहे हैं। विकास के नाम पर जो भी चीजें इनको मिलनी चाहिए थी वह आज तक नहीं मिली। यहां जाने के लिए आप को काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ेगा। बच्चों को पढ़ने के लिए यहां न तो स्कूल है और न ही पीने के लिए षुद्ध पानी की कितनी समस्या है, यहां इस बात से अंदाजा लागया जा सकता है कि लोगों को चुओं से पानी पीना पड़ता है तो सोचिए पषु का क्या हाल होता होगा, जबकि यहां के मूल निवासियांे का जीवन-यापन करने का मुख्य साधन पषुपाल एवं मक्के की खेती है। 

बरसात के समय में अच्छी बारीस न हो तो कृर्षि का मुख्य साधन भी बरबाद हो जाता है। जिससे इनके सामने बिकराल समस्या खड़ी हो जाती है। सरकारी महकमा इनका सुध न लिया है न लेने वाला है, पषु प्यास से मरते हैं और यहां की जनता भूख से। सरकार की तरफ से काफी योजनाएं आयी, लेकिन उन तक पहुची नहीं या फिर उसमें भी सरकारी महकमें द्वारा इतना लूट-खसोट की गयी कि जितनी मात्रा में उनको संसाधन प्राप्त होने चाहिए थे उन संसाधनों का आधा भाग भी उन तक नहीं पहुच पाता। कुछ ऐसी घटनाएं सामने आयी है जिसमें सरकारी महकमें द्वारा खुली लूट देखने को मिली। मनरेगा में कार्य कर चुके मजदूरों का बकाया आज तक पैसा उनकों नहीं मिला जिससे सरकारी कार्यों के तरफ से इनका मन उब गया है। पैसे के लिए मजदूरों ने हर सरकारी चैकठ पर दस्त दिया, लेकिन उनकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है। आज भी पैसों के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है ऐसी स्थिती यहां के दबे कुचले लोग नक्सली बनने के राह पर अग्रसर होने की स्थिती पैदाकर दी हैं। पानी के अभाव में यहां के लोग रिहन्द जलाषय का जल पीने के लिए बाध्य हैं जो पहले ही काफी प्रदूषित हो गया है।

रिहन्द जलाषय में पायी जाने वाली प्रदुषण कि मात्रा इसी बात से पता लगायी जा सकती है कि फ्लोराईड के कारण काफी मात्रा में लोग हड्डी सम्बन्धि रोगों से ग्रस्त हैं। पारा की मात्रा रिहन्द जलाषय में इस हद तक है कि जलाषय की मछलीयों तक मे पारा विद्यमान है जो यहां के निवासियों के पाचन तंत्र को विकृत करने में काफी सहायक है।

सूत्रों की माने तो सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान जो गरीबों को भोजन से लेकर रौषनी तक के साधन उपलब्ध कराती है वह भी भष्ट्राचार की भंेट चढ़ चुकी है। कोटेदारों द्वारा मनमाने तरीके से कोटा बांटने व दो से तीन महिनों में एक बार कोटे को खुलना और कोटे के सामनों का खुले बाजार में काला बाजारी से यहां के लोगों को मिलने वाले संसाधनों का कोई भी लाभ नहीं मिल रहा है। ऐसी स्थिती में यहां के आदिवासियों एवं वनवासियों के सामने अपने हक को पाने के लिए नक्सली बनने हेतु बाध्य कर रही हैं। अगर सरकार इनकी समस्याओं की तरफ ध्यान नहीं देती हैं तो ऐसे नक्सलियों की संख्या में भारी इजाफा होगा जो देष के लिए घातक साबित होगा तथा सरकार इनकों समाज के मुख्य धारा से जोड़ने में असमर्थ हो जायेगी। इसके साथ ही देष का भविष्य भी अधंकारमय हो जायेगा। 

भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला-सोनभद्र


जनपद-सोनभद्र भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला है। इस जिले का मुख्यालय राबर्ट्सगंज है। सोनभद्र जिला, मूल मिर्जापुर जिले से 4 मार्च 1989 को अलग किया गया था। 7,388 वर्ग किमी क्षेत्रफल के साथ यह उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है। यह 23.52 तथा 25.32 अंश उत्तरी अक्षांश तथा 82.72 एवं 93.33 अंश पूर्वी देशान्तर के बीच स्थित है। जिले की सीमा पश्चिम में मध्य प्रदेश, दक्षिण में छत्तीसगढ़, पूर्व में झारखण्ड तथा बिहार एवं उत्तर में उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जिला है। रार्बट्सगंज जिले का प्रमुख नगर तथा जिला मुख्यालय है। जिले की जनसंख्या 14,63,519 है तथा इसका जनसंख्या घनत्व उत्तर प्रदेश में सबसे कम 198 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। जनपद की कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 664522 हेक्टेयर है जिसमें 3,69,973.3 है भूमि वन भूमि जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 61.2ः है। कुल वन क्षेत्रफल का 40ः भू-भाग वन क्षेत्र सर्वें प्राक्रियो के बाद वन क्षेत्र से अलग हो जाने की सम्भावना है।

जिले में दो भौगोलिक क्षेत्र हैं जिनमें से क्षेत्रफल में हर एक लगभग 50 प्रतिशत है। पहला पठार है जो विंध्य पहाड़ियों से कैमूर पहाड़ियों तक होते हुए सोन नदी तक फैला हुआ है। यह क्षेत्र गंगा घाटी से 400 से 1,100 फिट ऊंचा है। दूसरा भाग सोन नदी के दक्षिण में सोन घाटी है जिसमें सिंगरौली तथा दुध्दी आते हैं। यह अपने प्राकृतिक संसाधनों एवं उपजाऊ भूमि के कारण विख्यात हैं। इस जनपद का अधिकाषः भाग विन्ध्यपर्वत श्रृखलाओं का एक भाग हैं। उत्तरी भारत में भूमि काली व कुछ गहरायी लिये है तथा अन्य भागों में भूमि छिछली स्तर की षेल्स व क्वार्टज युक्त है। मुख्य षैैल प्रकार सैण्ड स्टोन, डोलोमाइट एवं लाइम स्टोन है। यहाॅ की मुख्य भौगोलिक सरचना उत्तर में पोस्ट विन्ध्यम् तथा दक्षिण में गोडवाना संरचना युक्त है। जो स्वयं में कोयले का विपुल भण्डार अपने गर्भ स्थल में संजोये हुए है। 

जिले में बहने वाली सोन नदी जिले में पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। इसकी सहायक नदी रिहन्द जो छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश के पठार से निकलती है सोन में जिले के केन्द्र में मिल जाती है। रिहन्द नदी पर बना गोवन्दि वल्लभ पंत सागर आंशिक रूप से जिले में तथा आंशिक रूप से मध्य प्रदेश में आता है।

स्वतंत्रता मिलने के लगभग 10 वर्षों तक यह क्षेत्र (तब मिर्जापुर जिले का भाग) अलग-थलग था तथा यहां यातायात या संचार के कोई साधन नहीं थे। पहाड़ियों में चूना पत्थर तथा कोयला मिलने के साथ तथा क्षेत्र में पानी की बहुतायत होने के कारण यह औद्योगिक स्वर्ग बन गया। यहां पर देश की सबसे बड़ी सीमेन्ट फैक्ट्रियां, बिजली घर (थर्मल तथा हाइड्रो), एलुमिनियम एवं रासायनिक इकाइयां स्थित हैं। साथ ही कई सारी सहायक इकाइयां एवं असंगठित उत्पादन केन्द्र, विशेष रूप से स्टोन क्रशर इकाइयां, भी स्थापित हुई हैं। 

जनसंख्या की आधे से ज्यादा जनसंख्या वनों पर आधारित है। तथा बड़ती जनसंख्या के दबाव, क्षेत्र में हो रहे अनियमित, अनियमित विकाष कार्यो व सर्वे प्रक्रिया के नाम पर, एक बडे़ पैमाने पर वनों व वन क्षेत्र का विनाष हुआ है। तथा पर्यावरण प्रदुषण के रूप में जनपद एक गम्भीर चुनौती की त्रासदी से त्रस्त है।


नार्दल कोल्डफिल्ड लि. एन.सी.एल की खुले मँुह की नौ परियोजनाए चलता है। जिसमें से प्रमुख चार परियोजनाए जनपद की सीमा के अन्दर स्थित है। तथा 5 अन्य म.प्र. राज्य में जनपद सीमा पर स्थित है। इसके अतरिक्त पावर जनरेषन के रूप में नेषनल थर्मल पावर कापोरेषन (एन.टी.पी.सी.) उत्तर प्रदेष राज्य विद्युत परिषर तथा नीजि क्षेत्र को मिला 6 प्रमुख तापीय परियोजना विद्युत केन्द्रों मे इस समय लगभग 6800 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। इसके अतरिक्त अन्य प्रमुख औद्योगिक इकायों में हिन्डालकों इण्डस्ट्रीज लि., कनौरिया केमिकल्स, हाईटेक कार्बन, विकास गैसेज, जे.पी. सीमेन्ट डाला व चुर्क सीमेन्ट फैक्ट्रीया, कार्बन, चुना भट्ठा, क्रेसर अद्योग, बारूद के कारखाने गैस तथा रसायनों के उत्पादन हेतु स्थापित है।

इस क्षेत्र मेें विकास कर अन्य सम्भावनाओं के रूप में क्षेत्र में निहीत कोयला निवेष के अनुसार लगभग हजारों  मेगावाट विद्युत उत्पादन के अतिरिक्त उत्पादन विस्तार की कल्पना विद्युत क्षेत्र के लिए अनुमोदित योजनाओं के आधार पर कि जा सकती है। इसके अतिरिक्त क्षेत्र में सोना व यूरेनियम स्त्रोतों की जानकारी मिलने के उपरान्त क्षेत्र मेें वनों की सीमा के अतिरिक्त सिमटने व अन्य खनन की सम्भावनाए अतिरिक्त बलवती हुयी है। जो क्षेत्र के पर्यावरण के असंतुलन की प्रमुख स्त्रोत होगे। इस सम्पूर्ण क्षेत्र एक मात्र जल श्रोत गोविन्द बल्लभ पंत सागर ही है। जिसमे 458 वर्ग किमी का जल भराव क्षेत्र है तथा इस महत्वपूर्ण कोयला व विद्युत परियोजनाए इस भराव क्षेत्र के किनारों पर स्थित है। तथा इस सम्पूर्ण परियोजनाओं को जल आपूर्ति का एक मात्र साधन हैै। 

यद्यपि जनपद सोनभद्र देष ही नहीं अपितु विष्व के एक मूल्यवान तथा अपेक्षाकृत सस्ते श्रोत के रूप में निर्मित हुआ है। यद्यपि कोयला खनन, विद्युत उत्पादन और आधूतिक उद्योगों के परिणाम स्वरूप जीवन यापन के पारम्परिक तैर-तरीके में आये परिर्वतनों का क्षेत्र की अधिकाष जनसंख्या के लाभकारी नहीं रहे है तथा कथित विकास के नाम पर अनियमित विकास की आधी ने राजस्व बटोरने की बहुयामी श्रोत को जरूर उपलब्ध कराया है। परन्तु क्षेत्र की जनता के स्वास्थ व बड़ते पर्यावरण प्रदुषण की निष्चित उपेक्षा ही की है। 


समय-समय पर क्षेत्रीय नागरिकों एंव प्रबुध जनों द्वारा पर्यावरण परिस्थितियों के प्रति अनेक विरोध भी प्रगट किये गये है। जो कही भी सार्थक प्रयास तो नही कहे जा सकते हैं। जनपद सोनभद्र के पर्यावरण का प्रदुषण जनपद की सिमाओं तक ही सिमित तो नहीं है। अतः आवष्कता है कि इस क्षेत्र की पर्यावरण समस्यों का उच्चस्तरीय अध्ययन समिक्षा का सुझाव की तथा पर्यावरण जागरूकता की जिससे परियोजनाओं द्वारा किये जा रहे विकास को जनता के स्वास्थ की किमत पर आने देने से रोका जाय। जनपद के समस्त वायु जल व ध्वनी प्रदुषण एक चुनौती के रूप में सामने खड़ा है। तथा आवष्यक हो गया है यह कि विचार करना की इसी प्रकार एक स्वस्थ वातावरण बनाये रखा जाय तो हमारे जीवन की परम आवष्यकता है। 

इस विचार के पूर्व यदि जनपद के पर्यावर्णिय आवरण के संदर्भ में प्रदुषण की चर्चा की जाय। जनपद के बड़े भू-भाग में वन क्षेत्र थे तथा इन वन क्षेत्रों के विकास के नाम पर अंधा-धून कटाइ्र्र तथा सर्वें प्रक्रिया के दौरान एक बड़े भू-भाग को नियमितिकरण की समस्यों में जनपद सोनभद्र की प्राकृतिक धरोहर को विदीर्ण कर दिया है। सम्पूर्ण सोनभद्र वैसे तो पहले से ही अपने जल के प्रदुषण के लिए बदनाम था रही सही कसर औद्योगिक प्रतिष्ठानों के तेल मोबील कोयले की राख तथा चुपके से रातो के अंधेरे में छोड़े गये रसायन युक्त पानी ने तो सारे रिकार्ड ही तोड़ दिये है। जनपद के एक मात्र विषाल जल भण्डार रिहन्द जलासय तो अब अपने प्रदुषित जल के विभीषिता का प्रयाय बनता जा रहा है। 

वनों के क्षरण से अवनत वन भूमि के तल के सिधे सम्पर्क में आकर अपनी प्राकृतिक मृदा स्वरूप व उसकी उत्पादकता तो खोती ही जा रही है। साथ ही साथ जल में मृदा कड़ोे की प्रचुरता में रिहन्द जलाषय की धारक क्षमता पर ही प्रष्न चिन्ह लगा दिया है। बाकी रही-सही कसर विभिन्न परियोजनाओं से निकले कुड़ा-करकट प्रदुषित जल बड़ी मात्रा में प्रदुषण की गजर से ही स्थापित ऐस बन्धों की राख अपनी उत्पादक क्षमता बनाये रखने के लिए जलासय में बहा दी जाने वाली कारक को बेपनाह मात्रा में जलासय की धारक क्षमता के अतिरिक्त जल की प्राकृतिक कड़ों पर भी कफी असर पड़ा तथा अग्रहाय होता जा रहा है। जल में फ्लोराइड, वराकेडियम, अरगनी तथा पार्टिकुलेट आडिपरार्थी का भारी मात्रा में प्रदुषण हैं। फ्लोराईड के कारण काफी मात्रा में लोग हड्डी सम्बन्धि रोगों से ग्रस्त है । पारा की मात्रा रिहन्द जलाषय में इस हद तक है कि जलाषय की मछलीयों तक मे पारा विद्यमान है जो यहा के निवासीयों पाचन तंत्र को विकृत करने में काफी सहायक है क्यों की इसी जलाषय का जल यहा के बहुसंख्य लोगों को पीने के लिए प्रयोग करने हेतुु वितरित किया जाता है। वायु प्रदुषण के सम्बन्ध में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार वायु मण्डल में सल्फर डाई-आॅक्साईड की एक स्तर की मात्रा जमती जा रही है जो सूर्य की रोषनी अट्रावायलेट बिकीरण से स्वाभाविक है तथा वर्षां काल में राषानियक प्रतिक्रिया से गंधक व तेजाब की बारीस से इंनकार नहीं किया जा सकता। कारखानों से निकले धुए जहरीली गैसों से वायु प्रदुषण तेजी से फैलता जा रहा है कुछ डाॅक्टरों के अनुसार यहा निवासरत/कार्यरत श्रमिकेां व्यक्त्यिों में फालिस की बिमारी तरल कार्बन के कारण फेफड़े की बिमारीया हो रही है इसके अलावा इन कारखानांे से दमें, छय आदि रोगों से ग्रसीत हो चुके है।चारों ओर की फसल व पेड़ पैधों भी रोग ग्रस्त है तथा उनकी फल देने की क्षमता लुप्त प्रायः होती जा रही है।

कुल मिलाकर इस क्षेत्र में इंधन इतना जलाया जा रहा है कि वायु मण्डल में निष्क्रिय गैसों का मात्रा खास तौर से कार्बन-डाक्साईड की मात्रा इस कदर बढ़ती जा रही है कि आक्सीजन की कमी दिन प्रतिदिन होती जा रही है। सीमेन्ट कारखानों की धूल में उपस्थित सिलिका की मात्रा से फेफड़े चलनी होती जा रही है। पर्यावरण विज्ञानिक, पर्यावरण विभाग केन्द्र का भी विष्वविद्यालय के निदेषक डाॅ. वी.डी. त्रिपाठी के अनुसार ऊर्जांन्चज में लोग ष्ष्वांस, उच्च रक्तचाप, सीलीकोषिया, प्लम्बोसिस दातों के प्लोरोसिस एवं स्वेक्षण आंखों के रोषनी का कम होना, बच्चो की आई क्यू में कमी, अपराध पवृत्ति में वृद्धि तथा हृदय रोग व केंसर की षिकार मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है।

इस समय तक 1.5 लाख टन धूल, सीेमेन्ट, कोयला, राख प्रतिदिन पूरे ऊर्जांचल के वातावरण में छोड़ा जा रहा है। यहा परियोजनाओं में खदानों से धूल कड़ों के अलावा सल्फर-डाई-आक्साईड, नाईट्रोजन आक्साईड, कार्बन मोनों आक्साईड, हाइड्रोजन फ्लोराइड इत्यादि गैस रोजाना वातावरण में निकाली जा रही है। ध्वनि प्रदुषण की समस्या भी इस क्षेत्र में काफी बढ़ गई है। मषीनों की गड़गड़ाहट, विष्फोंटो वाहनों के षोरगुल ने व्यक्तियों की ध्वनि श्रव्य सीमा को इस कदर प्रभावित किया है कि बहराइन की समस्या, चिड़चिड़ापन तथा लोगों को बातचीत का लहजा भी ऊॅचा होता जा रहा है तथा स्वास्थ्य समस्याओं के अतिक्ति व्यक्ति की कर्मक्षमता तथा सामाजिक परिवार सम्बन्धों में निरन्तर हा्रस होता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार इस क्षेत्र में षोर का स्तर 75 से 92 डेसिबल तक बढ़ा है जो क्षेत्रीय जनता स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती ही है। इस प्रकार कुल मिलाकर क्षेत्र प्रदुषण की समस्या से बुरी तरह प्रभावित हो गया है यद्यपि इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के नाम काफी कुछ करने का प्रयास किया जा रहा है परन्तु यदि समय रहते इस समस्या के प्रति गंभीर उपायात्मक कदम नहीं उठाये गये तो इस क्षेत्र का विकास मानव जाति के लिए एक अभिषाप के अतिरिक्त कुछ और नहीं बन पायेगा।

भारतीय वन संरक्षण अधिनियम, 1980 यद्यपि पर्यावरण की इन्हीं समस्यों को दृष्टिगत रखकर बनाया गया तथा क्षेत्रीय वनों में विनाष को बचाते हुए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कुछ इस तरह से किया जाय की प्रदुषण की समस्या न्यूनतम हो तथा परियोजना की स्थापनाओं के साथ ही प्रदुषण के विरूद्ध कारगर कदम उठाये जाए परन्तु षासन स्तर की अनुमति प्राप्त होते ही विकास के नाम की जा रही प्रगति में लगातार पर्यावरण की उपेक्षा की जा रही है अतः आवष्यकता है इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के लिए एक स्थानिय प्रकोष्ठ की स्थापना की जो समय-समय पर परियोजनाओं के विकास के क्रम में प्रदुषण सम्बन्धी समस्यों का अध्ययन करते हुए सुझावात्मक उपाय कराता रहे तथा परियोजनाओं को प्रदुषण की समस्या एक मानक  स्तर तक कम करने हेतु विवष करे। दुर बैठा यह विभाग मात्र कोरम पूरा कर के कुछ नहीं कर पाता आवष्यकता हेै इस संगठन को और मजबूत करने की, साथ एक ऐसा  ढ़ाचा तैयार करने की जिसमें स्थानीय वन विभाग क्षेत्रीय स्वंयसेवी संगठनों, पर्यावरणविदों व पर्यावरण विभाग की मदद ली जाय तथा मासिक स्तर पर सुझाये गये उपायों की समीक्षा की कि किस स्तर तक परियोजनओं द्वारा न्यूनतम प्रदूषण किये जा रहे है। एक ऐसी सामाजिक चेतना की आवष्यकता है कि विकास-उत्पादन -प्रदूषण में सामंजस्य बनाने वाली दीर्घकालीन योजना के अनुसार ही कर्म किये जाय क्योकि प्रदूषण मुक्त समाज की कल्पना में ही किसी समाज के द्वारा किये जा रहे किसी विकास का महत्व उपयोग किया जा सकता है।