गुरुवार, 22 मई 2014

लैंको पावर के आवासीय परिसर के गैस एजेन्सी द्वारा मनमाने तरीके से घरेलू गैस के वितरण व उपभोक्ताओं की अनदेखी।

घरेलू गैस सिलेंडर की किल्लत को लेकर उपभोक्ताओं में रोष।
पर्ची न कटने के साथ-साथ समय पर नहीं हो रही गैस सिलेंडर की सप्लाई।
महीनों से बन्द है वितरण की कार्य प्रणाली व गैस ऐजेन्सी का आफिस।
आवासीय परिसर के उपभोक्ताओं इतर बाहरी उपभोक्ताओं की अनदेखी। 
अनपरा। क्षेत्र के लोगों को उन्हें रसोई गैस के सिलेंडरों की सप्लाई समय पर नहीं की जा रही है। जिससे लोगों को गैस को लेकर काफी परेशानी हो रही है, लोग रसोई गैस कनेक्षन होने के बावजूद भी इसके लिये ब्लैक में औने-पौन गैस खरीदने का मजबूर हो रहे है। बात पिछले वर्ष लैंको अनपरा पावर के आवासीय परिसर में खुले नये गैस ऐजन्सी का की है, जब ऐजेन्सी खुली तो लोगों में नये रसोई गैस कनेक्षन लेने के लिये एक बारगी होड़ सी मच गई थी, लगभग ग्राम-औड़ी, परासी व अनपरा के सैकड़ों लोगों ने आनन-फानन में अपना-अपना गैस कनेक्षन करा तो लिया, पर यह नहीं जानते थे कि कुछ दिन बाद उन्हें गैस के जिये सिलेण्डर के लिये चक्कर पे चक्कर लगाने पड़ेगे। उपभोक्ताओं के अनवतर कनेक्षन कराये जाने से ऐजेन्सी धारक ने सैकड़ो नये गैस कनेक्षन तो कर दिये परन्तु इन्हें गैस सिलेण्डर वितरण की कोई समुचित व्यवस्था नहीं की जिससे की कुछ महिनों में उपभोक्ताओं के समक्ष गैस किल्लत की समस्या उतपन्न होने लगी। 

कई सप्ताह से बन्द पड़ी गैस ऐजेन्सीं। 
आवासीय परिसर में खुले नये गैस ऐजन्सी पर लगभग एक माह से ताला लगा है, आस-पास के दुकानदारों से पता चला की यह ऐजेन्सी रेनुकूट की थी इसलिए उसे अपने सर्किल से बाहर गैस सप्लाई करने का आदेष नहीं है। परन्तु ऐजेन्सी द्वारा ज्यादा कनेक्षन व मुनाफे के इरादे से अनपरा परिक्षेत्र में गैस कनेक्षन मनमानी संख्या में बड़ा ली परन्तु उन्हें गैस किस प्रकार वितरित किया जाय इस बारे में नहीं सोचा। जिसके कारण अब लोगों में कनेक्षन होने के बावजूद भी ब्लैक में गैस सिलेण्डर खरीदने मजबूरी बन गई है। ऐजेन्सी सप्ताह में कुछ घण्टों के लिये खुलती तो है पर कुछ चहेतों और जान-पहचान के लोगों को ही सिलेण्डर उपलब्ध कराया जाता है। यदि कोई उपभोक्ता उस समय पहुँच जाता है तो उसकी पर्ची काट दी जाती है और वह पर्ची लेकर 10 से 20 दिन परेषानी के बाद सिलेण्डर प्राप्त कर पाता है। वहीं बाहरी उपभोक्ताओं के इतर आवासीय परिसर में ऐजेन्सी द्वारा अनवरत हर माह रसोई गैस सिलेण्डर वितरित किया जाता है। 


ग्राहकों को होम डिलीवरी सिस्टम से समय पर रिफिल पहुंचाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। नही ंतो इसकी षिकायत जिला आपूर्ति अधिकारी से की जायेगी और यदि आवासीय परिसर के बाहरी गैस कनेशनधारियों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो इसके विरूद्ध बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया जाएगा।  - शक्ति आनन्द, गैस उपभोक्ता।

ग्राम-औड़ी के रसोई गैस कनेक्षनधारी व उपभोक्ता मो. उस्मान अंसारी, सहदेव प्रसाद गुप्ता, गोविन्द मिस्त्री, गनेष प्रसाद, रामप्रवेष यादव, शक्ति आनन्द पिन्टी सिंह आदि ने बताया कि रिफिल बुकिंग के 25 दिन बाद नंबर लगाया जाता है, उसे गैस एजेंसी से ग्राहक को पर्ची दी जाती है। ग्राहक पर्ची लेकर गैस गोदाम पर सिलेंडर लेने जाता है तो उसे चार, पांच दिन बाद आने के लिए कह दिया जाता है एवं कई-कई हफ्तो तक गैस ऐजेन्सी बन्द रहती है ऐजेन्सी के सम्बन्धित लोगों के मोबाइल पर जब फोन किया जाता है तो स्वीच आॅफ बताता है। कभी-कभी तो गैस एजेंसी का स्टाफ रिफिल बुक करने से मना कर देता है। स्टाफ का कहना होता है कि अभी आपका नंबर नहीं लग पाएगा। सिलेंडरों के लिए लोगों की पर्चियां तक नहीं काटी जा रही हैं। उपभोक्ताओं को समय पर रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध करवाने की बजाय एजेंसी संचालक मनमानी कर रहा है और गैस वाहन सप्लाई करने वाले चालक का मोबाइल नम्बर देकर सम्पर्क कर अपनी पर्ची देकर सिलेण्डर प्राप्त करने का कह देता है जब वाहन चालक का नम्बर लगाया जाता है तो वह भी स्वीच आॅफ होात है। लोगों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो ऐजेन्सी के विरूद्ध मनमाने रवैये अपनाने को लेकर बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया जाएगा। 

गुरुवार, 15 मई 2014

नियमो को ताख में रख कर, खुली गाड़ी में हो रहा कचरे का परिवहन

सोनभद्र अनपरा, निजी विद्युत् परियोजना लेन्को अनपरा पॉवर के द्वारा सभी नियमो को ताख पर रखकर अपनी आवासीय परिसर का कचड़ा निस्तारण हेतु ले जाने के लिए खुले ट्रेक्टर का प्रयोग किया जा रहा है जिससे बिमारिय फैलने की आशंका है , आज साप्ताहिक बाज़ार के बीच जब कचरे से लदी हुयी खुली गाड़ी गुजरी तो लोगो ने अपनी नाक बंद करली , इस बाबत जब लेन्को के अधिकारी नित्यानद तिवारी से बात की गयी तो उन्होंने मामले की जानकारी न होने की बात कही और कहा की अगर येसा है तो इसे शीघ्र ही रोका जायेगा .
औडी मोड़ निवासी , ग्राम सभा सदस्य , शक्ति आनंद , बी. डी. सी. सुभाष चंद भारती , समाज सेवी , रीता भारती , आदि ने के इस कृत्य तीखी आलोचना करते हुए कहा की परियोजना , अपने आस पास के क्षेत्र के लोगो की बीमारियाँ दूर करने की बजाय उनको बीमारियाँ बाँट रही है , जिसे तुरंत रोकना होगा .

बुधवार, 14 मई 2014

हैंडपंपों के खराब होने से गहराया पानी संकट

नगवां ब्लाक के कई गांवों में पेयजल का संकट खड़ा हो गया है। तमाम हैंडपंप खराब पड़े हैं। लोगों को नदी, चुआंड़ और बंधियों से पानी लाना पड़ रहा है। दूषित जल पीने से बीमारी फैलने की आशंका है। चुनावी अधिसूचना से हैंडपंपों की मरम्मत नहीं हो सकी है इस नाते लोग परेशान हैं। गर्मी का मौसम शुरू होते ही पानी का संकट शुरू हो जाता है। खासकर पहाड़ी इलाकों में पानी के लिए ग्रामीणों को खासी परेशानी झेलनी पड़ती है। मार्च से ही पानी की समस्या मई में विकराल हो जाती है। नगवां ब्लाक में फिलहाल पानी की समस्या गंभीर हो गई है। ब्लाक क्षेत्र के नगवां, मांची, बांकी, सियरियां, बाराडाड़, चरगड़ा, धोबी, दरेंव, बिछियां, सरईगाढ़ आदि कई गांवों में हैंडपंप खराब हैं। सबसे ज्यादा खराब स्थिति चरगड़ा, बाराडाड़ और सियरिया गांव में है। इन गांवों में आधा से अधिक हैंडपंपों ने साथ छोड़ दिया है। ग्रामीण दूर-दूर से पानी ला रहे हैं। बाराडाड़ में लोग बांध का दूषित पानी पी रहे हैं तो सियरियां गांव में नदी का पानी ही लोगों का सहारा बना है। बाराडाड़ की प्रधान अजीमा बेगम कहती हैं कि अधिकारियों को पानी के संकट से अवगत कराया गया है लेकिन समस्या का कोई निदान नहीं हो सका है। खोड़ैला गांव की प्रधान निर्मला कहती हैं कि यह गांव ऊंची पहाड़ी पर बसा है। यहां पहले से ही पानी का संकट है। फिर गर्मी में लोगों का पानी के लिए क्या हाल होगा किसी से छिपा नहीं है। यहां के पृथ्वीनाथ ने कहा कि पानी की समस्या हर साल होती है लेकिन उसका कोई स्थायी समाधान नहीं हो रहा। मांची के प्रधान विजय और दरेंव के प्रधान मंगल का कहना है कि हैंडपंपों की गहराई कम होने से पानी का संकट होता है। उन्होंने टैंकर से पानी की आपूर्ति की मांग की है।

स्ट्रांग रूम की सुरक्षा में लगे जवान

राजकीय पालिटेक्निक कालेज के स्ट्रांग रूम में रखी गई इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की निगरानी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के हवाले है। स्ट्रांग रूम के चारो ओर जवानों की तैनाती की गई है। अंदर आने-जाने वालों पर सीसीटीवी से भी नजर रखी जा रही। सोमवार को मतदान के बाद देर रात तक सभी 1284 मतदान केंद्रों से आई इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों को स्ट्रांग रूम में रखा गया। ईवीएम की सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गई है। स्ट्रांग रूम में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं ताकि निगरानी की जा सके कि स्ट्रांग रूम की ओर कौन आ जा रहा है। मंगलवार की सुबह प्रेक्षक टाम जोश, डीएम चंद्रकांत ने स्ट्रांग रूम का जायजा लिया। उधर, सुरक्षा में लगे जवानों ने सुबह कालेज के पास से गुजर रहे दो संदिग्ध युवकों को पकड़कर करीब आधा घंटे तक पूछताछ की। दोनों युवकों ने जब बताया कि वे कालेज के पास की बस्ती के हैं और शौच के लिए जा रहे हैं तब उन्हें छोड़ा गया। चेतावनी दी कि मतगणना तक वे कालेज की ओर न नजर आएं। उधर, एसपी रामबहादुर यादव ने बताया कि सीआईएसएफ का एक प्लाटून ईवीएम की सुरक्षा में लगाया गया है। हर चार घंटे पर शिफ्ट के अनुसार जवानों की तैनाती की जा रही है। स्ट्रांग रूम के इर्द-गिर्द किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं है। उनका कहना है कि 16 मई को मतों की गणना होने के बाद ही कालेज में कोई व्यक्ति जा सकता है।

बसपा के लिए भी पिछड़ा वर्ग के लोगों ने वोटिंग की लेकिन इस बार इस वोट में भाजपा की अच्छी सेंधमारी सुनने को मिली। इसी तरह आदिवासी एवं दलित वोटर जिसे बसपा के लोग बेस वोट मान रहे थे। इनकी जुबां से भी इस बार भाजपा, कहीं-कहीं कांग्रेस का भी नाम सुनने को मिला। सीमा क्षेत्र के इलाके जहां पिछले कुछ चुनावों से सपा और बसपा के नाम का डंका बजा करता था वहां भाजपा के पक्ष में वोटिंग की खबर जहां भाजपा जनों को गदगद करती नजर आईं वहीं इस बदलाव के चलते अन्य दलों की स्थिति झुंझलाहट वाली देखने को मिली। वैनी और खलियारी क्षेत्र में जहां जसौली परियोजना का मुददा लोगों में अन्य दलों के प्रति रोष का भाव बनाए दिखा। वहीं मांची, चरगड़ा, पनौरा और महुली इलाके में सड़कों की खस्ताहाली, पेयजल संकट एवं अन्य सरकारी योजनाओं की बंदरबांट की स्थिति लोगों को इस बार बदलाव की तरफ धकेले रही। इन इलाकों में सुबह से लंबी लाइन के साथ पहाड़ी क्षेत्रों में 80 से 90 फीसद और सीमा से सटे कस्बाई इलाकों में 65 से 70 प्रतिशत मतदान भी इस बार बदलाव की आहट सुनाता नजर आया। कई वोटरों की स्थिति यह थी कि कौन प्रत्याशी अच्छा है, कौन बुरा.. इससे उन्हें कोई मतलब नहीं था। बस उनके मन में एक ही ललक थी इस बार चुनावी सब्जबाग दिखाकर गायब होने वालों को कड़ा सबक सिखाना है। हालांकि चुनाव में किसकी जीत होगी किसकी हार यह तो 16 मई को आने वाले परिणाम ही बताएगा लेकिन जिस तरह वोटरों के मन में बदलाव और आक्रोश भरे चेहरों से मतदान देखने को मिला वह काफी हद तक बदलाव का ही संदेश देता नजर आया।

जनपद में 52.87 फीसदी पड़े मत

आसमान से बरसती आग, बदन झुलसाते लू के थपेड़े..। इन सब खामियों के बावजूद सोनांचल में इस बार 52.87 प्रतिशत वोट डाले गए। इस आंकडे़ से पिछले कई चुनावों के रिकार्ड टूट गए। राबर्ट़्सगंज के तीन विधानसभा क्षेत्रों में दो घंटे पहले ही मतदान खत्म करा दिया गया। पिछले कई चुनावों के बाद पहली बार राबर्ट्सगंज सीट पर वोटों की बारिश हुई। दुद्धी में पिछली बार महज 50.27 मतदाताओं ने वोट डाला था। वहीं इस बार वोट डालने का प्रतिशत 57 पहुंच गया। ओबरा विधानसभा क्षेत्र में पिछले लोस चुनाव में महज 38.40 फीसद वोटिंग हुई थी लेकिन इस बार यह प्रतिशत 43 तक पहुंच गया। राबर्ट्सगंज विधानसभा में 2009 का मतदान प्रतिशत 49.16 था। वहीं इस बार 54 प्रतिशत वोटरों ने अपने अधिकार का प्रयोग किया। घोरावल विधानसभा में पिछले लोस चुनाव में 54.18 प्रतिशत वोटरों ने अपने अधिकार का प्रयोग कर सबसे अव्वल स्थान प्राप्त किया था। यहां इस बार मतदान 57.49 प्रतिशत रहा। इससे पहले सुबह से ही जगह-जगह बूथों पर मतदाताओं की कतार लगनी शुरू हो गई। दोपहर तक वोटरों ने डटकर मतदान किया। इसके बाद तेज धूप ने उनके पांव रोक दिए। तीन बजे के बाद फिर से वोटरों के निकलने का सिलसिला शुरू हुआ लेकिन राबर्ट्सगंज, दुद्धी और चकिया विस क्षेत्र में शाम चार बजे तक ही वोटिंग कराए जाने से तमाम वोटरों को बूथों पर पहुंचने के बाद भी वापस लौटना पड़ा। घोरावल और ओबरा विस क्षेत्र में शाम छह बजे तक वोटिंग होती रही। यहां वोटिंग प्रतिशत को बताने में निर्वाचन महकमे को रात आठ बज गए।

आदर्श बूथों पर भी नहीं दिखी बेहतर स्थिति

निर्वाचन आयोग के निर्देश पर इस बार जनपद के 32 बूथों को आदर्श का दर्जा मिला था। इनमें चारों विधानसभा के आठ-आठ बूथों चिह्नित किए गए थे लेकिन हर बूथ पर कोई न कोई कमी मुंह बांए खड़ी रही। छांव के इंतजाम संग प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था तो था मगर अन्य सुविधाओं के मामले में ज्यादातर बूथों पर नि:शुल्क स्टाल पोस्टर नजर आया। कहीं पेयजल के इंतजाम तो दिखे लेकिन पानी के शुद्धता की स्थिति भी दावों का माखौल उड़ाती रही। राबर्ट्सगंज विस क्षेत्र के आदर्श इंटर कालेज पर बालू के ढेर पर आदर्श बूथ का नि:शुल्क स्टाल तो लगा ही था। नौ बजे तक इस स्टाल के लिए किसकी तैनाती है यह बताने वाला कोई नहीं था। इसी तरह संस्कृत विद्यालय स्थित बूथ पर लगे नि:शुल्क स्टाल पर पानी का इंतजाम तब हुआ जब एसडीएम राजेंद्र तिवारी ने पहुंचकर संबंधितों को फटकार लगाई। आरएसएम इंटर कालेज ही ऐसा था जहां पेयजल के मुकम्मल इंतजामात नजर आए। 

जीजीआईसी में नि:शुल्क स्टाल पर बीएलओ का कब्जा था। हालांकि यहां पेयजल के इंतजाम दूसरी तरफ किए गए थे। जय ज्योति चुर्क, बिरला हायर सेकेंडरी स्कूल पटवध के साथ ही बिरला के पश्चिमी और दक्षिणी पाठशाला पर आदर्श बूथ के नि:शुल्क स्टाल व्यवस्थाओं की कोरमपूर्ति बया करते नजर आए। इसी तरह घोरावल विस क्षेत्र के बढ़ौली गांव स्थित बूथ से आदर्श बूथ का पोस्टर ही नदारद था। उरमौरा, भरौली, जुड़िया, मुड़िलाडीह, शाहगंज पर छांव के इंतजाम तो नजर आए लेकिन अन्य व्यवस्थाएं खानापूर्ति की ही कहानी बया करती रहीं। ओबरा विधानसभा क्षेत्र में ओबरा इंटर कालेज, राजकीय इंटर कालेज पिपरी, प्राथमिक विद्यालय रेणुकूट, आदित्य बिड़ला इंटर कालेज हिण्डाल्को रेणुकूट, मांटेसरी स्कूल प्राथमिक विद्यालय रेणुकूट, प्राथमिक विद्यालय औराडांड, अनपरा व रेनूसागर में भी व्यवस्थाएं नजर आईं लेकिन नि:शुल्क स्टाल के पोस्टर कई जगह शो-पीस बने रहे। दुद्धी विस क्षेत्र के संत जोसेफ स्कूल शक्तिनगर, केंद्रीय विद्यालय रिहंदनगर, डीएवी स्कूल रिहंदनगर, प्राथमिक विद्यालय, पूर्व माध्यमिक विद्यालय दुद्धी, म्योरपुर के बीडीओ कार्यालय आदि में भी आदर्श बूथ का इंतजाम ठीक नहीं था।

मु्द्दो ने जातीय समीकरण कर दिया ध्वस्त

सोनभद्र। राबर्ट्सगंज संसदीय सीट पर मतदान का परिणाम तो 16 मई की गणना से पता चलेगा लेकिन जिस तरह से मतदान के दिन जातीय समीकरणों के ध्वस्त होने का परिदृश्य सामने आया है, उसने प्रत्याशियों को बेचैन करके रख दिया है। राजनीतिक विश्लेषक भी इस बदलाव की वजह जानने में लगे हुए हैं। हालांकि मतदाताओं से ली गई जानकारी में यह बात तो साफ हो गई इस बार स्थानीय मुद्दों ने इस समीकरण को तोड़ने में अहम भूमिका तो निभाई ही महंगाई, भ्रष्टाचार ने भी लोगों के दिल-दिमाग को खूब प्रभावित किया। अगड़ों को भाजपा का बेस वोटर, पिछड़ों को सपा का बेस वोटर और अनुसूचित जाति, जनजाति को ज्यादातर बसपा का बेस वोट माना जाता रहा है लेकिन इस बार मतदान के दिन जिस तरह के समीकरण सुनने को मिले उससे यह बात साफ नजर आई कि इस बार जातीय समीकरणों की काफी हद तक हवा निकल गई। वर्ष 2012 के विस चुनाव में जिन अल्पसंख्यकों ने सपा का खुलकर साथ दिया था उन्हीं के जुबान से इस बार बसपा, कांग्रेस, कहीं-कहीं तो भाजपा का भी नाम सुनने को मिला। इसी तरह बैकवर्ड वोटर जिनका भी पिछले विस चुनाव में सपा की तरफ अच्छा-खासा झुकाव देखने को मिला था।

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

युवा वर्ग समस्याओं को हल करने वाले को देंगे वोट

(लोकसभा चुनाव-2014 के बाबत ऊर्जान्चल परिक्षेत्र के युवा वर्ग की प्रतिक्रिया।)
जनपद-सोनभद्र के राबर्टसगंज संसदीय क्षेत्र में इस बार लोकसभा चुनाव में मतदाताओं में जागरूकता युवा वर्ग के लोगो के सिर चढ़ कर बोल रहा है। प्रत्याषीयों को हर बार की तरह सिर्फ आष्वासन नहीं अबकी बार लोगों की समस्याओं को हल कराना होगा। लोगो की मौलिक मांगों की समस्याओं को हल करने, महंगाई को कम करने, गैस की बड़ी हुई किल्लत, बिजली की अन्धा-धुन्ध कटौती, पानी की जटील समस्या को प्रमुखता से हल करने वाले प्रत्याशी को ही युवा वर्ग के मतदाताओं का मत मिलेगा। युवाओं ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और उनके प्रमुख समस्या को हल करने वाले के पक्ष में मतदान करने की बात कही। 
हरिनाथ खरवार 

ऊर्जान्चल परिक्षेत्र के रेहटा गाँव के रहने वाले हरिनाथ खरवार ने बताया कि प्रतिनिधि चुने जाने के बाद प्रत्याशियों द्वारा लोगो की समस्याओं की अनदेखी की जाती है, यह अच्छी बात नहीं है, उन्हें जनता इसी कार्य के लिये अपना मत देती है। मैं विस्थापन की समस्या से निजात दिलाने वाले के साथ ही जो परास्नातक की शिक्षा के लिए महाविद्यालय की स्थापना कराए, उसे अपना मत दूंगा।
 नूर मोहम्मद 

अनपरा गाँव निवासी नूर मोहम्मद का कहना है कि बिजली, पानी आदि जैसी कई समस्याओं से हमेशा जूझना पड़ता है। प्रत्याशी चुने जाने के बाद समस्याओं पर ध्यान ही नहीं दिया जाता है। उन्होंने कहा कि जो प्रत्याशी इन समस्याओं से निजात दिलाएगा, वोट उसी को दिया जाएगा चाहे वह किसी दल या जाति का हो। 
शक्ति आनंद 

ग्राम पंचायत औड़ी के शक्ति आनन्द का कहना है कि लोकसभा में महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए आवाज उठाने वाले प्रत्याशी के पक्ष में वोट करने की जरूरत है। कहा कि जीतने के बाद वे हर तबके के लोगों की समस्या के साथ ही साथ क्षेत्र की बेरोजगारी दूर करने में अपनी अहम भूमिका निभाएं, ऐसे प्रत्याशी को अपना मत दूंगा। हम अपना बहुमूल्य मत उसे देंगे जो कर्मठ हो और जनहित में जिसका योगदान रहा हो। क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति जागरूक उम्मीदवार को भी वरीयता मिलेगी।
राजकुमार पनिका 

पिपरी सोनवानी के राजकुमार पनिका कहते हैं कि महिला एवं दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर अंकुश लगाने वाले प्रत्याशी को अबकी वोट दिया जाएगा। जनता की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए उसका निदान करे ऐसे प्रत्याशी को अपना मत देने का विचार कर रहा हूं। 
 मुकेश पाण्डेय 

बेलवादह निवासी मुकेष पाण्डेय कहते हैं कि हमे क्षेत्र का ऐसा प्रतिनिधि चुनना चाहिए जो ग्रामीण क्षेत्रों पानी, बिजली की समस्याओं का समाधान करते हुए आम जनमानस की भावनाओं की कद्र करते हुए उनकी समस्या हल करें। 
  लक्ष्मीकांत दुबे 

रेहटा के रहने वाले लक्ष्मीकान्त दूबे कहते है कि जिसने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया हो के साथ-साथ बेरोजगारी दूर करने वाले को वोट देगें। 

जयमंजय पनिका 
बांसी गाँव के निवासी जयमंजय पनिका कहते हैं कि ऐसे प्रत्याशी जो गांव और शहरों में रहने वाले मतदाताओं की समस्याओं को हल करें, ऐसे प्रत्याशी को हमें वोट देना चाहिए। 

मोहम्मद सद्दाम 

आदर्षनगर क्षेत्र के मोहम्मद सद्दाम महंगाई सहित कई समस्याओं प्रति जागरूक प्रत्याशी को वोट देंगे, चाहे वह किसी भी दल का हो। 

इस लोकसभा चुनाव में मतदान को लेकर ज्यदातर युवाओं का कहना है कि चुनाव के दौरान पार्टियां और उनके प्रत्याशी लंबे-चैड़े वायदे ऐसे करते हैं जैसे जीत के बाद रामराज ला देंगे। लेकिन चुनाव के बाद सब कुछ पहले जैसा ही दिखता है। अबकी बार हम सोच समझकर ही प्रत्याषीयों को मतों में तरजीह देंगे। लगता है कि मतदान को लेकर जागरूकता युवाओं में पूरी तरीके से समा गया है। 

रविवार, 27 अप्रैल 2014

इन्दिरा आवास निर्माण को वन भी विभाग ने गिराया।


"म्योरपुर विकास खण्ड के अन्तर्गत ऐसे कई इन्दिरा आवास के पात्र परिवर है जिन्हे बीपीएल परिवार के आधार पर आवास योजना का पात्र तो माना गया है, परन्तु आवास बनाने के लिये उनके पास कोई भूमि नहीं होने के कारण इस योजना को लाभ पात्र होने के बावजूद भी उन्हें नहीं मिल पा रहा है। " 
" इन्दिरा आवास योजना के तहत 75 हजार की राषि दो किष्तो में पात्रों को दी जानी है। दो किष्तो की राषि में प्रथम किष्त 37,500 की राषि का भुगतान किये जाने के बाद उस राषि से आधा निर्माण कार्य कराये जाने के बाद आवास की फोटो जमा करने पर दूसरी किष्त जारी की जाती है।"
जहाँ एम ओर सरकार गरीबों को उनका आवास देने की इच्छा से इन्दिरा आवास के नाम पर धन बाटने का कार्य कर रही है, वहीं जंगल विभाग सरकारी धन से बनाये जा रहे उन आवासों को बिराने का काम कर रही है। मामला है म्योरपुर विकासखण्ड के ग्राम-पाटी का। जहाँ ग्राम के ही निवासी रामसुभाग खरवार व वंष बहादुर खरवार को राष्ट्रीय इन्दिरा आवास योजना के तहत बीपीएल परिवारों को अपना आवास निर्मित करने वाली आवास योजना के तहत दो किष्तो में दी जाने वाली राषि के प्रथम किष्त का भुगतान किया जा चुका है, उस धन से दोनों ने अपना-अपना आवास लगभग निर्मित कर लिया था। दूसरी किष्त के लिये अर्धनिर्मित आवास की फोटो ब्लाक में खिचने के पश्चात ही राषि का भुगतान किया जाना था। परन्तु फोटो खीचने के पहले ही वन विभाग द्वारा बुधवार के दिन उन दोनो के अर्धनिर्मित मकानों को यह कहते हुए गिरा दिया गया कि ये दोनों मकान वन विभाग की भूमि पर बनाये जा रहे थें। इसलिये इन्हें विभाग के संज्ञान में आने पर गिरा दिया गया है। वहीं इन्दिरा आवास पात्र लाभार्थियों का कहना है कि जिस भूमि पर वें अपना आवास बना रहे थें, वह भूमि उनके वर्षो की जोत-कोड़ और कब्जे की भूमि है एवं उक्त भूमि दोनों द्वारा वनाधिकार अधिनियम के तहत वनाधिकार समिति के समक्ष अपना दावा भी प्रस्तुत किया था, जिस पर उन्हें अभी तक अधिभोग पत्र जारी नहीं हो पाया है। दोनों ग्रामीणों का कहना है कि सरकार ने हमें बीपीएल परिवार मानते हुए आवास तो दे दिया, परन्तु हमारें पास अपने पीढ़ीयों की जोत-कोड़ की जंगल की कब्जे की भूमि के अलावा कहीं भी भौमिक अधिकार या भूमि नहीं है ऐसी स्थिति में हम अपना आवास बनाये तो कहा बनाये। 

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

विस्थापन की पीड़ा और दंष की बहु-चर्चीत कहानी - Sonebhadra

हिन्दुस्तान में भट्टा-परसौल, सिंगूर और उड़ीसा में भूमि अधिग्रहण को लेकर किसान, सरकार और कार्पोरेट के आमने-सामने आने के बाद धधकी आग ने कितनों को बन्दुक की गोलियों का षिकार बनाया तो कितने किसानों ने अपने सीनों पर गोलियाँ खायी, किसानों और आदिवासियों के बढ़ते आक्रोष ने सरकारों को झकझोर कर रख दिया जिसका परिणाम नया भूमि अधिग्रहण एवं पुर्नवास, पुर्नस्थापन कानून-2013 है, मगर क्या कागजों में लिखें कानून पिछले तीन-चार दषक से विस्थापन का दंष और मिठा जहर झेल रहे लाखों आदिवासी-दलित किसानों को न्याय दिलाने में सक्षम होगा। क्योंकि कानून बनाने वाले ही कार्पोरेट घरानों की चाकरी में लीन है और उनका किसान-आदिवासी प्रेम टीवी चैनलों और घोषणा पत्रों तक ही सिमित है उनके ही इषारों पर आदिवासी-दलित किसानों पर गोलियाँ चलाकर कार्पोरेट को औने-पौने दामों पर जमीनें दी जाती है, फिर वही नेता आदिवासी- दलित किसानों के बीच आकर कहता है कि बन्दूक तले नहीं हों सकता विकास। 


विस्थापन की पीड़ा और दंष की बहु-चर्चीत कहानी का नाम है सोनभद्र के दक्षिणांचल में स्थित ऊर्जान्चल परिक्षेत्र जहाँ की उत्पादित बिजली पूरे देष को रौषन करने में अपना योगदान दे रहा है, पर इस विकास का प्रकाष उस किसान के घर पहुँचते-पहुँचते विलुप्त होकर उसके जीवन में अन्धकार में परिवर्तित हो जाता है। जिसकी भूमि और भविष्य दोनो परियोजनाओं के निर्माण की बली चढ़ी है। 

तीन दशक पूर्व उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की अनपरा तापीय परियोजना, अनपरा, जिला-सोनभद्र (उ.प्र.) के निर्माण के लिये 25 हजार से अधिक आदिवासी-दलित किसानों की भूमि अधिग्रहित की गई थी, अधिग्रहण के तीन दशक बीत जाने के बावजूद भी भूमि के बदले प्रतिकर, पुर्नवास एवं पुर्नस्थापन लाभ न देकर, अन्याय की एक नई मिषाल कायम कर दी गई है। अन्त यह नहीं होता तीन दशक बाद मा.सर्वोच्च न्यायालय ने विस्थापितों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय के मुद्दे पर 02 मार्च, 2012 को एसएलपी (सिविल), 27062/2009, सहयोग सोसाइटी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य में पारित अपने आदेश में उत्तर प्रदेश में प्रभावी वर्तमान पुर्नवास एवं पुर्नस्थापन नीति के अनुसार समस्त लाभ दिये जाने का आदेश पारित किया गया था। न्यायालय के आदेष व राज्य सरकार के अनुसार दिये गये शपथ पत्र के अनुसार अनपरा तापीय परियोजना के प्रभावित किसानों को लगभग एक हजार करोड़ रूपये प्रतिकर, पुर्नवास एवं पुर्नस्थापन लाभ रूप में राष्ट्रीय पुर्नवास एवं पुर्नस्थापन नीति-2003 एवं उत्तर प्रदेश की नई भूमि अधिग्रहण नीति-2011 के अनुसार दिया जाना था पर प्रदेष सरकार व उत्पादन निगम हजार करोड़ की जगह 35 से 40 करोड़ रूपये में सारे मामले कों समाप्त करना चाहती है। 02 मार्च, 2012 को एसएलपी (सिविल), 27062/2009, सहयोग सोसाइटी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य में पारित अपने आदेश में उत्तर प्रदेश में प्रभावी वर्तमान पुर्नवास एवं पुर्नस्थापन नीति के अनुसार समस्त लाभ दिये जाने का आदेश के लगभग दो वर्ष बीत जाने के बाद भी अब तक मात्र 125 प्रभावित परिवारों को ग्यारह करोड़ रूपये ही वितरित किया जा सका है। 

सरकार एवं प्रषासन ने ठान रखा है कि बन्दूक तले ही 25 हजार आदिवासी-दलित किसानों की आवाज दबानी है और सरकार और प्रषासन की ओर से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा की जा रही है की किसान सड़क पर आये और फिर सरकार की मंषा अनुसार उन पर गोलियाँ चलाकर और उन पर सैकड़ों फर्जी मुकदमें लाद उन्हें सलाखों के पिछे धकेल कर पुर्नवास एवं पुर्नस्थापन की कागजी कार्यवाही को अपने तालीबानी सोंच के अनुसार पूर्ण कर लिया जाय। 25 हजार आदिवासी-दलित किसानों ने सरकार की इस अन्यायपूर्ण व्यवहार व अपनी तीन दषक के विस्थापन के दंष का सड़क पर ऊतर कर सत्याग्रह आन्दोलन के माध्यम से पुरजोर विरोध किया और किसानों का यह आन्दोलन देष के नेताओं का सोचने पर यह मजबूर करके रख दिया कि क्या सिर्फ कानून बनाने से ही विस्थापित किसानों को न्याय मिल पायेगा।

आज यह प्रष्न वह आदिवासी कर रहा है जिसके खुद के सर पर छत नहीं है और पाँव के नीचे जमीन परियोजनाओं के कारण नहीं बची है जिसने बल्ब की रौषनी नहीं देखी और उनकी ही जमीनों पर कार्पोरेट के बड़े उद्योग खडे़ है और दुधिया रौषनी आदिवासीयों को मुँह चिढ़ा रहें है, यह उनके साथ एक ऐतिहासिक अन्याय को बयां करता है। 

ऊर्जान्चल परिक्षेत्र के लोगो के साथ बिजली विभाग द्वारा किया जा रहा ऐतिहासिक अन्याय।

ऊर्जान्चल परिक्षेत्र जो ऊर्जा उत्पादन में विश्व में अपना अद्वितीय स्थान रखता है, यहाँ कि उत्पादित बिजली से चहुँओर उजाला एवं विकास हो रहा है, परन्तु ऊर्जान्चल के रहवासियों और यहां के विस्थापितों जिनकी कई पीढ़ीयों ने विस्थापन का दंश झेला है और अपना सर्वश्व राष्ट्रहित में ऊर्जा उत्पादन के लिये समर्पित कर दिया, उन्हीं के साथ बिजली विभाग ऐतिहासिक अन्याय कर रहा है। 

जहाँ एक ओर ऊर्जान्चल के धरती से पैदा हुई बिजली से रौशन जनपद इटावा, कन्नौज व मैनपूरी और बुन्देलखण्ड क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में 18 से 24 घण्टे विद्युत आपूर्ति की जा रही है और बिजली बिल मात्र 445 से 517 रूपये उपभोक्ताओं से लिया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर ऊर्जान्चल के सभी गांव में बिजली भी मयस्सर नहीं है और जिन ग्राम पंचायतों में 16 से 18 घण्टे बिजली आपूर्ति की भी जा रही है, वहां पिछले तीन सालों से ग्रामीण उपभोक्ताओं से बिजली बिल के नाम पर लूट का नया किर्तिमान बनाकर वर्तमान में 1718 रूपये बिजली बिल के नाम पर लूटा जा रहा है। 

जबकि ऊर्जान्चल के 95 प्रतिशत किसान विद्युत उत्पादन हेतु विभिन्न परियोजनाओं की स्थापना के लिये किये गये भूमि अधिग्रहण से भूमिहीन है एवं पीढ़ियों के विस्थापन के दंश के बावजूद भी उन्हें आज तक न तो बिजली की समुचित सुविधा मिल पायी है, दूसरी ओर बिजली बिल के नाम पर ग्रामीण क्षेत्रों से चार से पाँच गुना अधिक बिजली बिल वसूली जा रही है। 

सिंगरौली परिक्षेत्र में बढ़ता जानलेवा प्रदुषण।

सिंगरौली परिक्षेत्र जो ऊर्जा उत्पादन में विश्व में जहाँ अद्वितीय स्थान रखता है, वहीं दूसरी ओर नीजि व सरकारी औद्योगिक ईकाईयों की पर्यावरण के प्रति असंवेदनशीलता ने सिंगरोली परिक्षेत्र को दुनिया का सबसे प्रदूषित क्षेत्र बना दिया है। जिन जिम्मेदार संस्थाओं व अधिकारियों के जिम्मे पर्यावरण संरक्षण एवं मानवीय जीवन को संरक्षित रखने की जिम्मेवारी थी, उनके हुक्मरानों ने लाखों लोगों को प्रदूषण रूपी मौत के अन्धे खांयी में धकेल कर अपने व अपने परिवारजनों को इन नीजि संस्थाओं में अच्छे ओहदों पर नौकरियाँ दिलावायी है और करोड़ों रूपये अर्जित किये गये है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा अधिकारिक रूप से यह आकड़े जारी किये गये है कि सिंगरौली परिक्षेत्र की हवा व पानी में देश का सर्वाधिक जहरीलस तत्व मौजूद होने के कारण यहाँ के रहवासियों में अनेकों प्रकार की गम्भीर बिमारियाँ पैदा हो रही है व आने वाली पीढ़ियों पर इसके गम्भीर दुष्परिणाम दिखायी देंगे। 

नीजि विद्युत परियोजनाओं के लिये अन्धा-धुन्ध तरीके से लाभ अर्जित करने की परम्परा से खुले मालवाहकों पर कोयले व राख के अभिवहन ने पूरे सिंगरोली परिक्षेत्र को मौत की काल-कोठरी बनाकर रख दिया है। प्रदूषण की धूल ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व जिला प्रशासन व परिवहन विभाग के अधिकारियों के आँखों पर भ्रष्टाचार की मोटी परत चढ़ा दी है। जिससे उन्हें सिंगरोली परिक्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण के कारण लाखों लोगों की धीमी मौत दिखायी नहीं पड़ रही है। 

महत्वपूर्ण है कि विश्व की कई जानी-मानी संस्थाओं ने सिंगरौली परिक्षेत्र के पर्यावरण की स्थिति पर अपनी रिर्पोट में स्पष्ट किया है कि वह दिन दूर नहीं जब सिंगरोली परिक्षेत्र के लोग व्यापक प्रदूषण के कारण बे-मौत मरेंगे, जो अन्य कारणों से होने वाली मौतों से ज्यादा की संख्या में हांेगी। खैर सत्ता के शिखर पर बैठे सत्ताधीश और हुक्मरानों के पास इन सबके विषय पर सोचने का वक्त कहां है। क्योंकि उन्हें लगता है कि अकुत धन से कृत्रिम सांसे खरीदकर अपनी जिन्दगी जी ही लेंगे। 

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

विस्थापितों से हुये समझौते होंगे लागू- दारापुरी

:- विस्थापित गांवों का पूर्व आई.जी. एस.आर.दारापुरी ने किया दौरा

राबर्ट्सगंज, 26 मार्च14, पूर्व आई. जी. व आइपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता एस.आर. दारापुरी ने कहा है कि 60 के दशक में बने रिहंद जलाशय और बाद में स्थापित हुए औद्यागिक प्रतिष्ठानों से लाखों लोंगो को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा। आज भी विस्थापित गवर्नमेंट ग्रांट पट्टों के सहारे उनकी जिंदगी चल रही है. भारी विस्थापन के समय सरकार ने जो समझौते किये उनका अनुपालन न कराया जाना ही विस्थापितों की दुर्दशा की प्रमुख वजह हैं।

आज आइपीएफ नेताओं के साथ म्योरपुर व बभनी ब्लाक के झीलो खमरिया, पीपरहर,डोडहर,करहिया,सीसवां झापर,चैना,घघरा,बजिया,मचबंधवां,भॅवर इत्यादि रिहंद विस्थापित गांवो का दौरा करने और कई सभाओं को संबोधित करते हुए श्री दारापुरी ने कहा कि विस्थापितों को तय मुआवजा राशि जो बेहद कम थी उसे भी पूरी तरह नहीं दिया गया, इसलिए नये आधार पर मुआवजा राशि को दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र खनिज संपदा से भरपूर है और कारपोरेट्स की नजर है जिससे भविष्य में भारी विस्थापन का खतरा मौजूद है। दारापुरी ने डोडहर गाँव के लोगों का पुलिस द्वारा उत्पीड़न करने की कड़ी निंदा की और उन की बैठक में उन्हें आश्वस्त किया कि उन के सवाल हर हाल में हल कराये जायेंगे। इन विस्थापित गांवों के हजारों लोगो ने दारापुरी जी से आग्रह किया किया कि विस्थापितों की आवाज को संसद तक पहुँचाने के लिए इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करें क्योकि आज तक किसी जन प्रतिनिधि ने विस्थापितों के मुददों को संसद में नही उठाया है।

श्री दारापुरी ने विस्थापितों को आश्वस्त किया कि उनके सवालों को आइपीएफ हर स्तर पर संघर्ष करेगा और विस्थापितों के साथ अन्याय नही होने दिया जायेगा। उन्होंने कहा कि जिस क्षेत्र से पूरे देश के लिए बिजली का उत्पादन होता है वहां के गांवो में आज भी बिजली नहीं है और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधओं का अभाव है।

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

मीटर लग गए पर स्कूलों में बिजली नहीं आई

सिटिजन जर्नलिस्ट जुल्फिकार हैदर खान ने अपनी पड़ताल में सोनभद्र में शिक्षा विभाग की कारगुजारियों के बारे में खुलासा किया।

विकास ने खोली चैक डैम में हुए फर्जीवाड़े की पोल

गांव और गरीबों के विकास के लिये सरकार करोड़ों रुपए जारी करती है। लेकिन सरकारी अमला इसमें फर्जीवाड़ा कर रकम डकार जाता है।

किलर रोड की तस्वीर बदलकर रहेंगे पंकज

आईबीएन-7 | Jun 28, 2010 at 03:13pm | Updated Jul 21, 2010 at 05:05pm



सोनभद्र। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में प्रदेश को सबसे ज्यादा राजस्व देने वाले इस जिले की सड़क मौत की सड़क बन गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस हाईवे को किलर रोड नाम दिया है। 2007 से 2009 के बीच यहां हुई सड़क दुर्घटनाओं में 540 लोग मारे गए। 2010 में अब तक 117 लोग मारे जा चुके हैं। सिटीजन जर्नलिस्ट पंकज मिश्रा का संघर्ष उस अव्यवस्था के खिलाफ है जो सोनभद्र की सड़कों पर मौत और विकलांगता बांट रही है। उनकी रिपोर्ट देखने के लिए वीडियो देखें।

महेंद्र ने छेड़ी गंदे पानी के खिलाफ मुहिम

 | May 27, 2010 at 04:18pm | Updated May 28, 2010 at 06:51pm


उनकी 24 साल की इकलौती बेटी रानी ने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं।
सोनभद्र। 
सोनभद्र जिले के महेंद्र अग्रवाल पिछले 20 साल से पानी में फैले जहर को खत्म करने की मुहिम छेड़े हुए हैं। गंदे पानी की वजह से उनकी 24 साल की इकलौती बेटी रानी ने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं। उसे पीलिया हो गया था। नवंबर में गांव के एक दर्जन से भी ज्यादा लोग मारे गए।

महेंद्र अग्रवाल का संघर्ष पानी में घुले उस जहर के खिलाफ है जो यहां के लोगों के लिए बीमारी और मौत की वजह बन रहा है। सोनभद्र जिले में लोग भूमिगत पानी पर निर्भर हैं। गर्मियों के मौसम में भूमिगत पानी का स्तर नीचे होने पर लोग रिहंद डैम का पानी इस्तेमाल करने लगते हैं।  यहां के ग्रामीण इलाकों में लोग जो पानी इस्तेमाल कर रहे हैं वो पीने लायक नहीं है। कई संस्थाएं यहां के पानी की जांच कर इसमें जहर की मौजूदगी पा चुकी हैं। पीने के पानी में फ्लोराइट की मात्रा 1 एमजी प्रति लीटर होनी चाहिए जबकि ये यहां 7 एमजी प्रति लीटर है। पारे की मात्रा .001 एमजी प्रति लीटर होना चाहिये पर ये .005 है। यानी सभी केमिकल सामान्य से कई गुना ज्यादा हैं।

लोगों को प्रदूषण के प्रति जागरूक करने के लिए महेंद्र गांव-गांव का दौरा करते हैं। हर घर में जाकर साफ पानी के अधिकार के बारे में बताते हैं। जनसुनवाइयों में लोगों की बात रखते हैं। 2005 में उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की। कोर्ट ने प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड को निर्देश दिए। लेकिन हालात नहीं बदले। पानी जैसी बुनियादी जरूरत पूरी हो सके इसलिए महेंद्र ने जिला प्रशासन, संबंधित विभागों के अधिकारियों से लेकर प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति तक से गुहार लगाई है। मानवाधिकार आयोग ने उनके आवेदन पर जांच के आदेश भी दिए लेकिन फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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शिक्षा की अलख जगाना जिंदगी का मकसद बना

 | Jul 28, 2010 at 03:40pm



सोनभद्र। सरकार ने भले ही शिक्षा के अधिकार का कानून बनाया हो लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने शिक्षा देना और शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना अपनी जिंदगी का मकसद बना रखा है। सिटिजन जर्नलिस्ट अशोक चंद्रवंशी ऐसे ही लोगों में शामिल हैं। जिन्होंने अपने आपको शिक्षा के प्रति पूरी तरह समर्पित कर दिया है। वो दस साल से शिक्षा की अलख जगाने की कोशिश में जुटे हैं। कैसी है उनकी कोशिश ये जानने के लिए वीडियो देखें।




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पेड़ों को मरहम लगाते हैं हरि किशन

 | Nov 07, 2008 at 05:22pm



सोनभद्र। हरि किशन सोनभद्र जिले के नगवा गांव के रहने वाले हैं। उनकी मेहनत से एक वीरान जंगल दस साल की मेहनत के बाद अब हरा भरा हो गया है।

गांव के लोगों के लिए लकड़ी एक बुनियादी जरूरत है। चाहे वो घर के लिए हो, खाना बनाने के लिए, दाह संस्कार के लिए या फिर दूसरी जरूरतों के लिए। इन्हीं जरूरतों को पूरा करने के लिए आज से दस साल पहले एक जंगल की कटाई शुरू हुई। भारी संख्या में पेड़ काटे जाने लगे और जंगल वीरान हो गए।

हरि किशन इस जंगल को दोबारा जीवित करने के लिए कुछ करना चाहते थे लेकिन पैसे की कमी के कारण वो नए पेड़ नहीं लगा सकते थे। पर फिर भी उन्होंने इन पेड़ों को बचाने के लिए कुछ करना चाहा। पूर्वजों से विरासत में मिली मरहम लगाने की तरकीब ने कटे पेड़ों को हरा भरा बनाने में उनका साथ दिया। और दस सालों की मेहनत का नतीजा है कि इस जंगल में करीब दस लाख पेड़ जीवित हो गए हैं।

जिस लेप को किशन इन पेड़ों के घावों में लगाते हैं वो नीम, गोबर, हठ जोड़, गोमूत्र, मदर का पत्ता और मुलतानी मिट्टी का लेप होता है। उन्होंने इस जंगल का नाम ‘जनता जंगल’ रखा क्योंकि इस जंगल को बचाने में गांव वालों ने उनका पूरा साथ दिया। इस जंगल में एक भी पेड़ बाहर से नहीं लगाया गया है। कटे हुए तने से पेड़ों को दोबारा जीवित किया गया है।

जंगल बसने के बाद समस्या थी उसकी रखवाली की। सबने जंगल को चार भागों में बांटा और चार समितियां बनायीं जो कि जंगल की देख-रेख करती हैं। पेड़ काटने वालों को सामाजिक और आर्थिक सजा दी जाती है। आज एकबार फिर जंगल में वो जड़ी बूटियां मौजूद हैं जो आदिवासियों के जीवन का अहम हिस्सा हैं।
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सोनभद्र में भीड़ के हमले से 3 पुलिसवाले घायल

 | Jan 25, 2011 at 01:23pm


सोनभद्र। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में एक युवक की कथित हत्या से उत्तेजित लोगों के हिंसक प्रदर्शन और पथराव से तीन पुलिसकर्मी घायल हो गये। घटना जिले के कोन इलाके की है। 30 साल के स्थानीय युवक अजय कुमार की मौत से नाराज लोग सोमवार देर रात से यहां हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। युवक का शव रविवार को रोरवान लौंगा गांव के समीप से बरामद किया गया था।

स्थानीय लोगों के मुताबिक कुमार कुछ दिन पहले अपनी ससुराल रोरवान लौंगा गया था। उसका शव ससुराल से कुछ ही दूरी पर पाया गया। स्थानीय लोग पुलिस को शव न सौंपकर ससुरालवालों पर कुमार की हत्या का आरोप लगाकर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग कर रहे थे।

सोमवार रात जब पुलिस अधिकारी गांव के लोगों को यह समझाने गए कि कुमार की हत्या नहीं की गई बल्कि उसकी मौत एक हादसे में हुई। इस पर भीड़ हिंसक हो उठी और उसने पुलिस अधिकारियों पर पथराव कर उनकी गाड़ियों में जमकर तोड़फोड़ की। भीड़ ने पुलिस के वाहनों में आगजनी की भी कोशिश की।

जिले के पुलिस अधीक्षक दीपक कुमार ने मंगलवार को संवाददाताओं को बताया कि भीड़ ने पुलिस अधिकारियों को चारों तरफ से घेर लिया था। सूचना मिलने पर जब अन्य थानों से पुलिस बल मौके पर पहुंचा तब हालात पर काबू पाया जा सका। पथराव में एक पुलिस उपाधीक्षक सहित तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए।
कुमार ने कहा कि हालात नियंत्रण में लेकिन तनावपूर्ण हैं। तनाव के मद्देनजर प्रांतीय सशस्त्र बल (पीएसी) और पुलिसबल तैनात किया गया है। पुलिस प्रशासन के आला अधिकारी मौके पर डेरा डाले हुए हैं।
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