बुधवार, 16 जुलाई 2014

हर शाख पे एंडरसन बैठा है...................... उर्फ कथा सोनभद्र की!

बिके हुए हैं अखबार, कहीं कोई खबर नहीं

ये देश में हर जगह पैदा हो रहे भोपाल का किस्सा है। ये हिंदुस्तान के स्विट्जरलेंड की तबाही का किस्सा है। ये रिहंद बांध में अपने महल के साथ डूब गयी रानी रूपमती का किस्सा है। ये मंजरी के डोले का किस्सा है और ये लोरिक की बलशाली भुजाओं को आज तक महसूस कर रहे चट्टानों का किस्सा है। ये किस्सा इसलिए भी है क्योंकि हम एक ऐसे देश में जी रहे हैं, जहां मौजूद मीडिया को ये मुगालता है कि वो देश-काल को बदलने का दमखम रखता है। हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की! हम इसे देश की ऊर्जा राजधानी कहते हैं। ये देश का सबसे बड़ा एनर्जी पार्क है। सोनभद्र सिंगरौली पट्टी के लगभग 40 वर्ग किमी क्षेत्र में लगभग 18000 मेगावाट क्षमता के आधा दर्जन बिजलीघर मौजूद हैं, जो देश के एक बड़े हिस्से को बिजली मुहैया करते हैं। अगले पांच वर्षों में यहां रिलायंस और एस्सार समेत निजी और सार्वजानिक कंपनियों के लगभग 20 हजार मेगावाट के अतिरिक्त बिजलीघर लगाये जाएंगे। बिरला जी का अल्युमीनियम और कार्बन, जेपी का सीमेंट और कनोडिया का रसायन कारखाना यहां पहले से मौजूद है। यह इलाका स्टोन माइनिंग के लिए भी पूरे देश में मशहूर है। यहां पांच लाख आदिवासी भी मौजूद हैं, जिन्हें दो जून की रोटी भी आसानी से मयस्सर नहीं होती।

सोनभद्र की एक और पहचान भी है। यहां आठ नदियां हैं, जिनका पानी पूरी तरह से जहरीला हो चुका है। यह इलाका देश में कुल कार्बन डाइऑक्साइड के उत्स्सर्जन का 16 फीसदी अकेले उत्सर्जित करता है। सीधे सीधे कहें तो यहां चप्पे चप्पे पर यूनियन कार्बाइड जैसे दानव मौजूद हैं, इसके लिए सिर्फ सरकार और नौकरशाही तथा देश के उद्योगपतियों में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लिए मची होड़ ही जिम्मेदार नहीं है। सोनभद्र को ध्वंस के कगार पर पहुंचाने के लिए बड़े अखबारी घरानों और अखबारनवीसों का एक पूरा कुनबा भी जिम्मेदार है। कैसे पैदा होता है भोपाल, क्यों बेमौत मरते हैं लोग? अब तक वारेन एंडरसन के भागे जाने पर हो हल्ला मचाने वाला मीडिया कैसे नये नये भोपाल पैदा कर रहा है, आइए हम आपको इसकी एक बानगी दिखाते हैं।

मौत की चिमनियां..................

मरता हुआ रिहंद....................

यहां भी खामोश है मीडिया.......

कनोडिया कैमिकल देश में खतरनाक रसायनों का सबसे बड़ा उत्पादक है। कनोडिया के जहरीले कचरे से हर साल औसतन 40 से 50 मौतें होती हैं। हजारों की संख्या में लोग आंशिक या पूर्णकालिक विकलांगता के शिकार होते हैं, मगर खबर नहीं बनती, क्योंकि कनोडिया अखबारों की जुबान बंद करने का तरीका जनता है। पिछले वर्ष दिसंबर माह में उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा पर मौजूद सोनभद्र के कमारी डांड गांव में कनोडिया द्वारा रिहंद बांध में छोड़ा गया जहरीला पानी पीकर 20 जानें चली गयीं। उसके पहले विषैले पानी की वजह से हजारों पशुओं की मौत भी हुई थी, मगर जनसत्ता को छोड़कर किसी भी अखबार ने खबर प्रकाशित नहीं की। जबकि जांच में ये साबित हो चुका था मौतें प्रदूषित जल से हुई हैं। हां, ये जरूर हुआ कि इन मौतों के बाद सभी अखबारों ने कनोडिया के बड़े बड़े विज्ञापन प्रकाशित किये थे।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। इसके पहले 2005 जनवरी में भी कनोडिया के अधिकारियों की लापरवाही से हुए जहरीली गैस के रिसाव से पांच मौतें हुईं। मीडिया खामोश रहा। मीडिया अब भी खामोश है, जब सोनभद्र के गांव के गांव फ्लोरोसिस की चपेट में आकर विकलांग हो रहे हैं। यहां के पडवा कोद्वारी, कुसुम्हा इत्यादि गांवों में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जो फ्लोरोसिस का शिकार न हो। जांच से ये बात साबित हो चुकी है कि फ्लोराइड का ये प्रदूषण कनोडिया और आदित्य बिरला की हिंडाल्को द्वारा गैर जिम्मेदाराना तरीके से बहाये जा रहे अपशिष्टों की वजह से है। बिरला जी की इस बरजोरी के खिलाफ लिखने का साहस शायद किसी भी अखबार ने कभी नहीं किया। हां, वाराणसी से प्रकाशित “गांडीव” ने एक बार हिंडाल्को द्वारा रिहंद बांध में बहाये जा रहे कचरे पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

शायद ये विश्वास करना कठिन हो, मगर सच है कि आज तक हिंदी दैनिकों ने अपने सोनभद्र के कार्यालयों पर सालाना विज्ञापन का लक्ष्य एक से डेढ़ करोड़ निर्धारित कर रखा है। इनमें वो विज्ञापन शामिल नहीं हैं जो जेपी और हिंडाल्को समेत राज्य या केंद्र सरकार की कंपनियां सीधे या एजेंसियों के माध्यम से देती हैं। अगर इन सबको शामिल कर लिया जाए तो सोनभद्र से प्रत्येक अखबार को सालाना 8 से 10 करोड़ रुपये का विज्ञापन मिलता है। इन अतिरिक्त विज्ञापनों का लक्ष्य यहां के गिट्टी बालू के खनन क्षेत्रों से प्राप्त किया जाता है। ये खनन क्षेत्र जिन्हें “डेथ वेली” कहते हैं और जो सरकार प्रायोजित भ्रष्टाचार और वायु एवं मृदा प्रदूषण का पूरे देश में सबसे बड़ा उदाहरण बने हुए हैं। पर कोई भी अखबार कलम चलने का साहस नहीं करता। और तो और यहां की खदानों से निकलने वाली भस्सी ने हजारों एकड़ जमीन को बंजर बना डाला। खबरें न छापने की एक और वजह है। सोनभद्र में ज्यादातर पत्रकारों की अपनी खदानें और क्रशर्स हैं। जिनकी नहीं हैं, उनकी भी रोजी रोटी इन्हीं की वजह से चल रही है। खबरें न छापने की कीमत वसूलना अखबार भी जानते हैं, पत्रकार भी।

सोनभद्र के बिजलीघरों से प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ टन पारा निकलता है। हालत ये है कि यहां के लोगों के बालों, रक्त और यहां की फसलों तक में पारे के अंश पाये गये हैं। इसका असर भी आम जन मानस पर साफ दिखता है। उड़न चिमनियों की धूल से सूरज की रोशनी छुप जाती है और शाम होते ही चारों और कोहरा छा जाता है। इस भारी प्रदूषण से न सिर्फ आम इंसान मर रहे हैं बल्कि गर्भस्थ शिशुओं की मौत के मामले भी सामने आ रहे हैं। मगर खबरें नदारद हैं। वजह साफ है। सभी अखबारों के पन्ने दर पन्ने प्रदेश के ऊर्जा विभाग के विज्ञापनों से पटे रहते हैं। सैकड़ों की संख्या में मंझोले अखबार तो ऐसे हैं, जो बिजली विभाग के विज्ञापनों की बदौलत चल रहे हैं। ये एक कड़वा सच है कि उत्तर प्रदेश सरकार के ओबरा और अनपरा बिजलीघरों को पिछले एक दशक से केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनापत्ति प्रमाणपत्र के बिना चलाया जा रहा है। जबकि बोर्ड ने इन्हें बेहद खतरनाक बताते हुए बंद करने के आदेश दिये हैं। मगर खबर नदारद है। सिर्फ सोनभद्र में ही नहीं, देश के कोने-कोने में भोपाल पैदा हो रहे है, अखबार के पन्नों पर वारेन एंडरसन सुर्खियों में है। और हम, खुश हैं कि मीडिया अपना काम कर रहा है।
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लेखक - आवेश तिवारी लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आवेश से awesh29@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है।

दूसरे भोपाल गैस त्रासदी की जमीन हो रही तैयार

भोपाल गैस त्रासदी में विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के तीनों स्तंभों कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका की कार्यवाही, मुंबई पोर्ट ट्रस्ट पर रखे सिलेंडर से क्लोरीन गैस का रिसाव। फिर वर्धमान (पश्चिम बंगाल) में दुर्गापुर स्टील प्लांट में गैस रिसाव से दर्जनों लोगों का झुलस जाना। ये सभी घटनाएं आम नागरिकों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सत्ताधारी राजनीतिक पार्टियों की कार्यकुशता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती हैं। भोपाल गैस त्रासदी की घटना में पीडि़त आज भी न्याय के लिए दर दर ठोकरे खा रहे हैं। इस मामले में देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका ने पीड़ितों को निराश ही किया है। इसके साथ ही इन तीनों स्तंभों ने देश के करोड़ों नागिरकों की भावनाओं को भी आहत किया है जो अपनी सुरक्षा के लिए राजनीतिक पार्टियों को देश की सत्ता चलाने के लिए बागडौर सौंपते हैं।


गौर करने वाली बात है कि पूंजीपतियों के मानकविहीन औद्योगिक इकाइयों की कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है। पीडि़त न्याय के लिए ठोकरे खाता है और घटना के जिम्मेदार व्यक्ति को कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका मिलकर देश से बाहर कर देते हैं। भोपाल गैस त्रासदी में करीब 26 साल बाद आए निचली अदालत के फैसले ने यहीं साबित किया है। आम नागिरकों की आशाओं पर देश का लोकतांत्रिक तंत्र खरा नहीं उतरा है। लोगों के दिल में आज भी अपनी सुरक्षा को लेकर भय बना हुआ है। मुंबई पोर्ट ट्रस्ट और दुर्गापुर स्टील प्लांट में गैस रिसाव की घटना ने इसे प्रबल कर दिया है। दोनों ही घटनाओं में घायल व्यक्तियों को कबतक न्याय मिलेगा यह कहना मुश्किल है, क्योंकि देश के सबसे विभत्स भोपाल गैस त्रासदी की घटना में निचली अदालत से फैसला आने में ही 26 साल लग गए। इसके बावजूद, मामले का मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन देश की कानून व्यवस्था से बाहर है। 

देश की इस लचर कानून व्यवस्था का फायदा सिर्फ विदेशी पूंजीपति ही नहीं उठा रहे, बल्कि देश के वे सभी पूंजीपती उठा रहे हैं जो अधिकाधिक लाभ कमाने के चक्कर में नौकरशाहों की मिलीभगत से मानकविहीन औद्योगिक इकाइयों की स्थापना और संचालन करते हैं। ठेकेदारी प्रथा और भ्रष्ट नौकरशाही के कारण सार्वजिनक क्षेत्रों की औद्योगिक इकाइयों में भी सुरक्षा मानकों की अनदेखी बड़े पैमाने पर मिल रही है। मुंबई पोर्ट ट्रस्ट और दुर्गापुर स्टील प्लांट की घटना इसकी बानगी मात्र है जहां आम आदमी के हितों के साथ खिलवाड़ किया गया था। निजी कंपनियों के मामले में सुरक्षा मानकों की अनदेखी और भी बड़े पैमाने पर है। आदिवासी बहुल पिछड़े एवं नक्सल प्रभावित इलाकों में कारपोरेट घरानों की औद्योगिक इकाइयों की स्थापना और संचालन में सुरक्षा मानकों की अनदेखी और भी बड़े पैमाने पर देखने को मिल रही है। भारत सरकार के  पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से औद्योगिक इकाइयों को पर्यावरणीय सहमति अथवा अनापत्ति प्रमाण पत्र दिलाने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन जनसुनवाई करता है लेकिन जन सुनवाई के दौरान शासनादेशों की जमकर धज्जियां उड़ाई जाती हैं। इसका विरोध करने पूंजीपति और जिला प्रशासन आम जनता की आवाज को कानून के शिकंजे में जकड़कर दबा देते हैं। पूंजिपतियों के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने के लिए पूंजीपतियों की शह पर शासन के नुमाइंदों ने एक नई तरकीब इजात की है। 


आदिवासी बहुल इलाकों, जहां पर कारपोरेट घरानों की औद्योगिक इकाइयां स्थापित हो रही हैं या होने वाली हैं, को नक्लप्रभावित घोषित कर दिया है,जिसके कारण प्रशासन के नुमाइंदों को पूंजीघरानों के खिलाफ उठाने वाली आवाज को दबाने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं होती। अपने को सभ्य समाज का प्रतिनिधि बताने वाले भी शासन-प्रशासन के इस करतूत को ठीक बताते हैं।  छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाके इसका ज्वलंत उदाहरण हैं, जहां सैकड़ों गरीब आदिवासियों को फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मार दिया गया। सैकड़ों को फर्जी मुकदमों में फंसाकर जेलों में ठूंस दिया गया। इन इलाकों की सच्ची तस्वीर जानने के लिए सबसे कम नक्सल प्रभावित राज्य उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल जनपद सोनभद्र पर गौर करते हैं। सोनभद्र उत्तर प्रदेश शासन की ओर से सबसे नक्सल प्रभावित जनपद घोषित है। सोनभद्र (4 मार्च 1989 से पहले मिर्जापुर) में औद्योगिक कल-कारखानों की शुरूआत 1950 के दशक में चुर्क सीमेंट फैक्ट्री की स्थापना के साथ हुई। 12 जुलाई 1954 को चुर्क सीमेंट फैक्ट्री के उद्घाटन अवसर पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि यह स्थान भारत का स्वीटजरलैंड बनेगा। नेहरू की घोषणा समय के साथ झूठी साबित होती गयी। यह स्थान स्वीटजरलैंड तो नहीं बन सका लेकिन मानकविहीन औद्योगिक इकाइयों की स्थापना से भोपाल बनने की ओर अग्रसर जरूर हो गया है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की मानें तो यह क्षेत्र देश के 42 सबसे अधिक प्रदूषित औद्योगिक इकाइयों में नौवें स्थान पर हैं। वहीं, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पर्यावरण की दृष्टि से देश का पांचवा समस्याग्रस्त औद्योगिक क्षेत्र है। 

सोनभद्र में औद्योगिक इकाइयों की बात करें तो वर्तमान में सार्वजनिक क्षेत्र की एनटीपीसी, एनसीएल, ओबरा थर्मल पावर, रिहंद सुपर थर्मल पावर, निजी क्षेत्र की हिण्डालको एल्यूमिनियम,प्लांट, कानोरिया केमिकल्स एम्ड इंडस्ट्रीज लिमिटेड, रेणुसागर पावर प्लांट, जेपी सीमेंट फैक्ट्री, डाला एवं चुर्क आदि औद्योगिक इकाइयां संचालित हो रही हैं। इनके अलावा हजारों मानक विहीन स्टोन क्रशर प्लांट्स कैमूर की वादियों में जहर उगल रहे हैं। सोनभद्र के मूल वाशिंदों की विडंबना है कि इतनी औद्योगिक इकाइयों के बाद भी इनको दो वक्त की रोटी मयस्सर नहीं हो रही है। हर साल सैकड़ों लोग भूखमरी, कुपोषण और बीमारी की चपेट में आकर दम तोड़ रहे हैं। यहां के खनन क्षेत्र में हर दिन दो व्यक्ति की औसत दर से दम तोड़ रहे हैं। मरने वालों में अधिकतर आदिवासी एवं दलित मजदूर होते हैं। कैमूर की वादियों को जहरीली बना चुकी औद्योगिक इकाइयों में सोनभद्र के मूल बाशिंदों के रोजगार की बात करें तो अधिकतर लोग दिहाड़ी मजदूर हैं जिन्हें महीना में 20 दिन से ज्यादा का रोजगार मुहैया नहीं हो पाता है। शेष मौतका कुंआं बन चुकी पत्थर की खदानों में दम तोड़ने को मजबूर हैं। किसान पिछले छह सालसे पड़ रहे सूखे से बेहाल हैं और खेत बेचकर पलायन करने कोमजबूर हो रहे हैं। औद्योगिक इकाइयों की सुरक्षा मानकों की बात करें तो अधिकतर औद्योगिक इकाइयां पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के मानकों को पूरा नहीं करती हैं। खासकर खनन क्षेत्र में स्थापित स्टोन क्रशर प्लांट केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों को पूरा नहीं करते, लेकिन बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी की शह पर सभी मानकविहीन औद्योगिक इकाइयां धड़ल्ले से संचालित हो रही हैं। 

उदाहरण के लिए निजी क्षेत्र की रेणुकूट स्थित कानोरिया केमिकल्स एंण्ड इंडस्ट्रीज लिमिटेड एवं सार्वजनिक क्षेत्र की ओबरा थर्मल पावर की "v" और "c"  औद्योगिक इकाइयों को लेते हैं।  दोनों ही इकाइयां केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सूची में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के मानकों को पूरा नहीं करती हैं। इसके बावजूद ये इकाइयां संचालित हो रही हैं। कानोरिया केमिकल्स एण्ड एंडस्ट्रीज लिमिटेड की भयावहता पर गौर करें तो यहकंपनी एसिटेल्डिहाइड, फार्मेल्डिहाइड, लिण्डेन, हेक्सामीन, इंडस्ट्रीयल एल्कोहल, एल्यूमिनियम क्लोराइड, एथिल एसिटेड, एसिटिक एसिड कामर्सियल हाइड्रोजन आदि घातक रसायनों का उत्पादन करती है।  मानक विहीन सुरक्षा व्यवस्था के कारण कंपनीके प्रयोगशाला में आग भी लगती रहती है। आग की चपेट में आकर पूर्व में कई व्यक्ति झूलस भी चुके हैं। इसके बावजूद मानक विहीन यह कंपनी संचालित हो रही है। ओबरा थर्मल पावर कारपोरेशन की अ एवं ब इकाई केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से डिफाल्टरघोषित हो चुकी है। दोनों इकाइयां संचालित हो रही हैं। उधर, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय केमानकों को धता बताते हुए जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड एवं हिण्डालकों ने भी इस औद्योगिक इलाका में अपने औद्योगिक इकाइयों का विस्तार कर दिया है। शासन के निर्देशों की धज्जियां उड़ाते हुए इन कारपोरेट घरानों की औद्योगिक इकाइयों को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण-पत्र देने के लिए जनसुनवाइयां भी हो चुकी हैं। इन जन सुनवाइयों में करीब 60 फीसदी वक्ताओँ ने इन सुरक्षा मानक विहीन औद्योगिक इकाइयों को अनापत्ति प्रमाण-पत्र नहीं देने की वकालत की थी। इसके बावजूद जिला प्रशासन ने कारपोरेट घरानों के पक्ष में शासन को रिपोर्ट भेज दी। कुछ औद्योगिक इकाइयों को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलभी गया है। कुछ का मामला पेंडिंग हैं। जेपी समूह की डाला इकाई तो अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलने से पूर्व ही संचालित होने लगी थी। 

नौकरशाहों द्वारा पूंजीपति एवं कारपोरेट घरानों के लिए आम आदमी के हितों की अनदेखी कर मानक विहीन औद्योगिक इकाइयों को दिया जा रहा अनापत्ति प्रमाण पत्र भोपाल गैस त्रासदी के दूसरे अध्याय की जमीन तैयार कर रहा है। नौकरशाहों के इस कारगुजारियों परअंकुश लगाने की शीघ्र आवश्यकता है। साथ ही ऐसी नीति की व्यवस्था करने की जरूरत है कि जिसमें औद्योगिक इकाइयों से प्रभावित होने वाले आम आदमियों की आवाज सुनी जा सके और उनके हितों की रक्षा हो सके। अन्यथा भोपाल गैस त्रासदी की घटना बार-बार घटित होती रहेगी।         -------------------------------------------------------------------------
लेखक - आवेश तिवारीलखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। पिछले सात वर्षों से विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की पर्यावरणीय परिस्थितियों का अध्ययन और उन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आवेश से awesh29@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है।

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

आम बजट 2014-2015 पर प्रतिक्रिया।

मोदी सरकार के आम बजट पर ऊर्जान्चल की जनता की भी प्रतिक्रिया आने लगी है। कोई मोदी सरकार के इस आम बजट को निराशाजनक बता रहा है तो कोई कह रहा है कि नई सरकार ने नया कुछ नहीं किया है।

पंकज कुमार मिश्रा
कांग्रेस नेता पंकज कुमार मिश्रा ने आम बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार का बजट बेहद निराशानजक है। बजट में जो घोषणाएं की गईं है उसमें में 90 फीसदी कार्य हमारी सरकार द्वारा किया हुआ है, नई सरकार ने कुछ भी नया नहीं किया है। सारे विचार हमारी सरकार के हैं। आम आदमी तो दुर इस बजट से उद्योगपतियों को फायदा पहुँचाने की कोषिष की गई है, सिर्फ हवाई बातों का पिटारा है ये बजट। इस बजट से उम्मीदें कम नजर आती हैं।

शक्ति आनन्द 
कांग्रेस नेता व ग्राम पंचायत सदस्य शक्ति आनन्द ने कहा कि बजट बेहद निराशाजनक है। टैक्स में सिर्फ 50 हजार की राहत ना के बराबर है। आम आदमी को कोई राहत नहीं है। सोशल सेक्टर में कोई बढि़या निवेश नहीं है, विकास दर का लक्ष्य बेहद कम है। बीजेपी विपक्ष में बहुत चिल्लाती थी अब हकीकत क्या है उन्हें पता चल रही है। बजट में वित्त मंत्री ने ऐसा कुछ नहीं है जिससे आम आदमी को फायदा हो। 

विजय कुमार सिंह
विजय कुमार सिंह ने कहा कि बजट में ना कोई विजन है और ना ही कोई रोडमेप है। आखिर सरकार देश को कहा ले जाना चाहती है। विडंबना है कि एफडीआई का विरोध करने के बाद वे आज इसके नियम आसान कर रहे हैं। इस बजट के बाद आम आदमी के ऊपर भार बढ़ने वाला है।

ओंकार केशरी 
बीजेपी नेता ओंकार केशरी ने कहा कि चुनावी घोषणा पत्र में जनता से किए गए ज्यादातर वादों को बजट में शामिल किया गया है। इसमें मुद्रास्फीति को संभालते हुए विकास करने की कोशिश की है, मोदी सरकार का ये बहुत ही सकारात्मक बजट है। इसमें साफ दिखाई देता है कि अरुण जेटली इस बजट से भारतीय अर्थव्यवस्था को सही रास्ते पर लाएंगे।

के.सी. जैन
बीजेपी नेता  के.सी. जैन ने कहा कि देश के सम्पत्ति और भंडार को पूर्व की सरकार ने बर्बाद किया गया है, उसको ध्यान में रखते हुए ही जेटली ने इस बार का बजट बनाया है। लेकिन कह सकता हूं कि ये नौकरियों का बजट है। नौकरियां आएंगी।

आशीष मिश्रा
समाजवादी पार्टी के नेता आशीष मिश्रा ने बजट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बजट में कोई बड़ा विचार दूर-दूर तक नहीं था। अगर आप अपनी आंखें बंद कर लें तो यह चिदंबरम का भाषण जैसा लग सकता है।

इनके साथ-साथ ऊर्जान्चल के लोगों ने बजट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि बजट में पिछड़ों, गरीबों, मजदूरों, किसानों और कर्मचारियों के लिए कुछ भी नहीं है। उन्हें सिर्फ सपने दिखाए गए हैं और जनहित की योजनाओं को नजरअंदाज किया गया है। बजट में मुख्यरूप से उद्योगपतियों का हित साधा गया है।

शनिवार, 14 जून 2014

उर्जांचल के विस्थापितों के दशकों का दर्द, आज भी नहीं मिला न्याय

ः पुर्नवास के नाम पर बेलवादह के परिवारों को मिलेमात्र एक लाख 
ः कोर्ट के फैसले के बावजूद भी नहीं मिल प् रहा है शतप्रतिशत पुर्नवास लाभ 
ः तीन वर्षों से चल रही है पुनर्वास लाभ वितरण की प्रक्रिया

नक्सल समस्या आज राष्ट्रीय समस्या है और इससे निपटने का कार्य सिर्फ क¢न्द्र सरकार का ही नहीं बल्कि प्रभावित राज्य सरकारो का भी है। कुछ राज्यों ने सुरक्षा और अन्य प्रभावी योजनाओं के लिए तमाम कदम उठाये हैं लेकिन उ.प्र. सरकार अपने राज्य के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित जिले सोनभद्र में ऐसी कोई कवायद शुरू करने के मूड में नहीं है। 1950 के बाद रिहन्द बांध बनने के उपरान्त सोनभद्र को उर्जांचल के रूप में विकसित किया जाने गा साथ ही औद्योगिक विकास को लेकर कदम भी उठाये गये।

ओबरा, अनपरा ताप विद्युत परियोजना तथा एनटीपीसी हिण्डाल्को इण्डस्ट्रीज, जे.पी.सिमेण्ट, लैंको पावर सहित तमाम औद्योगिक प्रतिष्ठान सोनभद्र में स्थापित हैं बावजूद इसके गरीब आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण करने के बाद भी उनसे किये गये वायदे के अनुसार कुछ भी नहीं मिला।  लिहाजा विस्थापित/आदिवासी आज अपने हक के लिए किसी भी हद तक जाने की बात कर रहा है। उ.प्र. सरकार नक्स प्रभावित जिा सोनभद्र क¢ आदिवासियों को लेकर कितना संजीदा है इसका अन्दाजा इसी बात से गाया जा सकता है कि विद्युत इकाई सी बनने के लिए जिन आदिवासियों ने अपनी भूमि दी उन्हें नौकरी नहीं मिलि और उस जमीन को लैंको पावर प्राइवेट लिमिटेड को स्थानान्तरित कर दी गयी। जिस पर आज लैंको की चिमनियों से विस्थापितों की आहे निकल रही है। विस्थापित प्रतिनिधियों द्वारा इस बात पर सवा पुछे जाने पर उ.प्र.पावर कारपोरेशन के अधिकारी इसे शासनादेश बतातें हैं, और इस प्रकरण से अपना पल्ला झाड़ लेते है। 

पंकज मिश्रा
" विस्थापितों का प्रतिनिधित्व करने वो गैर सरकारी संगठन सयोग के सचिव पंकज मिश्रा द्वारा य बताया जाता है कि सार्वजनिक प्रयोजन हेतु किये गये भूमि अधिग्रण में जो भूमि अधिग्रति की जाती है से किसी नीजि कम्पनी को लीज पर देने का अधिकार उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत त्पादन निगम को नहीं है, तथा राज्य सरकार की नई भूमि अधिग्रण नीति के तहत यदि किसी नीजि कम्पनी को सार्वजनिक प्रयोजन हेतु अधिग्रहित की गयी भूमि दी जाती है तो से कम्पनी में शतप्रतिशत भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवार के एक सदस्य को स्थायी सेवा योजन प्रदान किया जायेगा। जबकि लैंको द्वारा इसे एक सिरे से नकार दिया जाता है। लैंको द्वारा बताया जाता है कि ऐसा कोई अनुबंध भूमि स्तानांतरण के अनुबंध पत्र में निगम द्वारा नीं रखा गया है। "


शक्ति आनन्द
" ग्राम पंचायत सदस्य ओढ़ी शक्ति आनन्द का कहना है कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र की समस्या सुझाने में यहाँ के स्थानीय जनप्रतिनिधियों की काफी जिम्मेदारी होती है और इस समस्या की बाबत क्षेत्रीय विधायक से स्तक्षेप करने का अनुरोध किया गया तो गया तो उन्होंने इस प्रकरण को सदन में उठाने की बात कह कर अपना पल्ला झाड लिया। जिम्मेदारी लेना तो दूर इस समस्या को सुझाने का उनके पास कोई विकल्प नहीं। श्री आनन्द ने यह भी बताया कि वर्तमान में जो पूर्नवास प्रस्ताव परियोजना द्वारा बनाकर पुर्नवास लाभ बाटा जा रहा  है व सिर्फ विस्थापितों के साथ न्याय की एक खानापूर्ति है। क्योंकि इस पुर्नवास प्रस्ताव में ग्राम बेलवादह व बासी के प्रभावित परिवारों को सूचीबद्ध नहीं किया गया है तथा हजारो परिवारों को पुर्नवास लाभ प्रस्ताव से वंचित रखा गया है। जिनका नाम विभिन्न कारणों की वजह से परियोजना के प्रभावित परिवारों की सूची में दर्ज नहीं हो पाया है। "

हरदेव सिंह 
ग्राम सभा बेलवादह के ग्राम प्रधान हरदेव सिंह ने बताया कि वर्तमान में प्रस्तावित पूर्नवास लाभ सूची में बेलवादह के विस्थापितों को वंचित रखने की वजह से यहाँ के विस्थापितों में परियोजना के इस रवैये को लेकर बहुत आक्रोस त्पन्न हुआ है। जिससे कि परियोजना के कार्य को ग्रामीणों द्वारा रोककर विरोध दर्ज कराया गया था। जिस पर परियोजना कहती है कि यहाँ के विस्थापितों को वर्ष २००२ में  ही पुर्नवास लाभ व प्रतिकर दिया जा चुका है। जबकि उस समय बाटी गयी राशि का पुर्नवास लाभ से कोई लेना देना नहीं है। जिसकी आ़ड में परियोजना हमें पुर्नवास लाभ  सें वंचित रख रही है। इस विषय पर प्रभावित परिवार माननीय सर्वोंच्च न्यायाय के अगकी सुनवाई का इंतजार कर रे है।


कुल मिलाकर इस कहानी में कुछ ऐसे कटु आध्याय हैं जिसे देखकर देश के लोकतान्त्रिक स्वरूप को भी शर्म आयेगी। १९७८ में इस परियोजनाओं की शुरूआत के दौरान तत्कालीन सरकार ने आदिवासियों के पुर्नवास और नौकरी के लिए बड़े  निर्णय लिए थे फिर बाद की सरकारों ने इन परियोजनाओं को पैसा बनाने की मशीन बना लिया। बीते दो दशकों से इन आदिवासियों का विष्य कागजों में दबा हुआ है और आदिवासियों के हित में आवाज उठाने वो लोगो को सत्याग्रह करने की वजह से जेल भी जाना पड़ा। तमाम सरकारी चक्रव्यू में फंसा यह मामाला सुप्रीम कोर्ट के  संज्ञान में है। जिस पर कोर्ट ने बीते वर्ष २०१२  में अपना फैसा विस्थापितों के  पक्ष में दे दिया है फिर भी कोर्ट के  इस फैसेले का शतप्रतिशत अनुपान नहीं किया जा रहा है। जो हजारो आदिवासियों के विष्य को लेकर लोकतान्त्रिक स्वरूप में मांग कर रहे आदिवासी समुदाय के लोगो को राज्य सरकार अपना जवाब लाठी और डंडो से दे रही है।

रविवार, 1 जून 2014

कनहर परियोजनाओं में खुलेआम हो रही चोरी

कनहर परियोजना के पुराने भूखण्ड व उपकरणों की चोरी बदस्तूर जारी है। अमवार मंे परियोजना शुरू कराने के पूर्व विस्थापितों के लिए सड़क व आवास निर्माण की प्रक्रिया गति पकड़ रही है। इसके आड़ में कुछ लोग सफेदपोष व कर्मियों की मिलीभगत से पुराने भूखण्डों व गोदामों पर पड़े कीमती सामानों पर हाथ साफ करके अपनी जेब गरम करने में लगे हुए है। इतना ही नहीं हौसला बुलंद लोग मायाजाल में फंसा कर चोरी के सामानों को नीलाम मंे लेने की बात भी प्रचरित करा रहे है ताकि लोगों को किसी प्रकार का शक न होने पाये। सूत्रों की माने तो टीन व सीमेंट की शेडों के अलावा लाखों के सामान गुपचूप तरीके से परियोजना परिसर से हटाया जा चुका है। 

दीमक की तरह परियोजना को पूरी तरह चाट चुके चोरों की करतूत का अंदाजा वहां की तस्वीरों को देख कर आसानी से लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं बेखौफ ढंग से कुछ श्रमिक एक ट्रैक्टर-ट्राली पर पुराने भवन से निकले पत्थरों को लोड करने मंे लगे हुए थे। ट्रैक्टर चालक ने एक व्यक्ति का नाम लेते हुए बताया कि उन्ही के निर्देष पर यहां का बोल्डर वह बाजार में बेचता है। इसी तरह परियोजना स्थल से गुपचूप ढंग से उजाड़ी गयी टीन शेड अब वहां के ग्रामीणों के चहारदिवारी का काम कर रही है। ऐसे कई मकान देखने को मिला जिसमें परियोजना स्थल व आवासीय कालोनी से निकला हुआ लोहे का सामान लगाया गया है। सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर कोई नहीं मिला। फिल्ड हास्टल में दो लोग मिले। वह अपने आप को श्रमिक बताकर किनारा कस लिये। वहां तैनात चैकीदारों के बाबत जानकारी लेने पर ग्रामीणों द्वारा कोई सटीक जानकारी नहीं दी गयी। प्रभारी निरीक्षक पीपी सिंह के मुताबिक इस तरह की कोई षिकायत उनके संज्ञान में नहीं आयी है।

फाइलों में कैद है जयन्त हादसे का सबूत

कोल इण्डिया की प्रमुख सहयोगी कंपनी नार्दर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड की जयन्त कोयला परियोजना में ओबी/कोयला फेस खिसकने से पांच कामगारों के मौत की वजहों की रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं हो पायी है। दिल दहला देने वाले हादसे के लिए कौन लोग जिम्मेदार रहे और किस तरह की लापरवाही के वजह से घटना हुई, यह आज भी पहेली बनी हुई है। जानकारो ंकी माने तो हादसे की जांच के लिए एनसीएल व डायरेक्टर जनरल आफ माइंस सेफ्टी स्तर से दो टीमों का गठन किया था और डीजीएमएस की टीम ने हादसे की वजहों की गहन पड़ताल भी की, लेकिन इसकी रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गयी, इस बाबत कोई जिम्मेदार अधिकारी कुछ बताने को तैयार नहीं है। वर्ष 2008  में एनसीएल के जयन्त कोयला खदान में हुए एक हादसे में पांच कंपनी कर्मियों की मौत हो गयी थी। फेस के बीच दबे कर्मियों के शवों को निकालने में हुई देरी की वजह से कंपनी के मजदूरों ने बवाल भी काटा था। आक्रोषित मजदूरों और इलाके के लोगों का कहना था कि घटना के लिए जिम्मेदार लोगों को चिन्हित कर सजा दिलायी जाय। समय के साथ इस मामले को बिसार दिया गया और मृतक श्रमिकों के परिजन व कंपनी के मजदूरों के साथ इलाके के लोग आज तक यह नहीं जान पाये कि आखिर वह कौन सी वजह थी, जिससे पांच लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। 

आई जी का निर्देष भी नहीं आया काम:- कोयला खदान में हुए हादसे के गरीब दो साल बाद सिंगरौली आये रीवां रेंज के आईजी गाजीराम मीणा के जनता दरबार में हादसे में हुई मौतों का मामला गूंजा। इस पर श्री मीणा ने मोरवा थाने के टीआई अनिल उपाध्याय को जांच करने और डीजीएमएस की रिपोर्ट प्राप्त कर चालान पेश करने का निर्देश देने के साथ यह भी माना था कि मामले में 304 ए और 304 बी के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन आईजी के निर्देश पर नतीजा भी सिफर है।

धारा-20 के पेच में फसे विद्यालय

वन विभाग नहीं बनने दे रहा अतिरिक्त कक्ष और बाउन्ड्री

धारा बीस के पेच में तमाम विद्यालयों का विकास कार्य प्रभावित है। विद्यालयों में बनने वाले अतिरिक्त कक्ष, किचन शेड और बाउन्ड्री के निर्माण के लिए आया धन जस का तस खाते में पड़ा है। वन विभाग के लोग काम शुरू होने के बाद रोक दे रहे है। उनका कहना है कि वे वन क्षेत्र में निर्माण नहीं होने देंगे। जबकि ग्रामीणों का कहना है कि वनाधिकार कानून के तहत सार्वजनिक दावे के रूप में जमीनों का दावा दाखिल हो चुका है। वनाधिकार कानून लागू होने के बावजूद धारा बीस की जमीन से वन कर्मियों का मोह भंग नहीं हो सका है। ग्रामीणों के कब्जे की भूमि के अलावा सार्वजनिक कार्यों के लिए किये गये दावे भी उनके गले नहीं उतर रहा है। धारा बीस की जमीनों में बने विद्यालयों को जहां वन कर्मियों द्वारा गिराने तक की धमकी दी जा रही है, वहीं निर्माण की सूचना पर पहुंचे वनकर्मी कार्य को भी रोक रहे है। वनाधिकार कानून के तहत समितियों के पास पड़े सार्वजनिक दावों को भी वन कर्मी नहीं मान रहे है। इस तरह के विद्यालयों पर ध्यान दे ंतो प्राथमिक विद्यालय छुरछुरिया, नकटू, लीलासी और पूर्व माध्यमिक विद्यालय लीलासी का भी काम धारा बीस की जमीन होने के कारण ठप हो गया है। इन विद्यालयों में किचन शेड, बाडन्ड्री नकटू, अतिरिक्त कक्षाकक्ष का निर्माण प्रभावित हुआ है। काचन ग्राम पंचायत के छुरछुरिया विद्यालय के निर्माण के बाद इसे गिराने के लिए भी वन कर्मियों द्वारा कहा जा रहा है।

इसी विद्यालय की बाउन्ड्रीवाल का निर्माण आधा अधूरा होकर पूरा होने का इंतजार कर रहा है। विद्यालय की बाउन्ड्री न होने के कारण यहां तैनात अध्यापिका एवं बच्चे असुरक्षित महसूस कर रहे है। कुक्ड मिल का भोजन करते मसय जहां कुत्ते और अन्य जीव जंतु पहुंच जा रहे है, वही अतिरिक्त कक्ष न बन पाने के कारण बच्चें बाहर पढ़ने के लिए मजबूर है। रविवार को विकास खण्ड मुख्यालय पर पहुंचे विन्ध्याचल मण्डल के आगमन पर ग्रामीणों ने इसकी षिकायत उनसे की है। इस सम्बन्ध में म्योरपुर षिक्षा क्षेत्र के खण्ड षिक्षा अधिकारी राजीव यादव ने कहा कि वन विभाग सरकारी प्रक्रिया के तहत ही जमीनों के हस्तान्तरण की बात कह रहा है, ऐसे में जब तक प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती तब तक कुछ भी नहीं किया जा सकता है। 

खूबसूरत सरकारी भवनों को लावारिस छोड़ना एक पहेली

करमा का बंगला भुतहा, निसोगी व बेलौरी के भवन भी क्षतिग्रस्त

सरकारों की कार्य शैली हाल के वर्षों में कैसे जरूरत व कायदें की हदें लांघती-छलांगती हुई क्रमषः वोटखिंचू होती चलीगयी है, यह योजना-परियोजनाओं के जमीनी पंच वर्षीय शैली से लेपटाॅप-वितरण सरीखे वोटखिंचू वर्चूवल अंदाज तक में पहुंच जाने के नमूने से जगजाहिर हैं। ऐसे रवैये नजरिये का ही दुष्परिणाम है संरक्षण योग्य कई महत्वपूर्ण स्थलों या सरकारी उपक्रमों की घनघोर अनदेखी और ऐसे में उनका तीव्र गति से क्षरण। जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में लावारिस छोड़ दिये गये खूबसूरत सरकारी डाकघरों इसी की छोटी ही किन्तु सरकारी कार्य-दृष्टिकोण में बड़े क्षरण की दुखदायी मिशाल हैं।सबसे दर्दनाक हालत हो गयी है करमा के डाकबंगले की जो ढ़हता हुआ अब कंकाल जैसी हालत में जा पहुंचा है। इसे देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को हृदय-मन पर गहरे आघात का ही अनुभव हो सकता है। एकदम जैसे भुतहा खंडहर हो। यह वर्ष 1917 का बना बताया गया। जबकि निसोगी और रामगढ़ के डाकबंगले 1914 के। निसोगी व धंधरौल वाले डाकबंगले तो जरा-सा मरम्मत के बाद तत्काल उपयोग में लाये जाने के लायक हैं ऐसे में जबरन मिटाए जा रहे दोनों डाकबंगले जैसे अपने साथ जारी उपेक्षा अत्याचार की करूण स्वर में वजह पूछ रहे हों। कुछ इस अंदाज में हमारे तो हाथ-पांव से लेकर नाक-कान-मुंह तक सलामत हैं फिर क्यो किया गया हमारा परित्याग। क्या है हममे कमी? क्या बिना किसी वजह के यों त्याग देना उचित है? कोई क्यों नहीं दे रहा जवाब? बेशक ऐसे सवाल विचलित करने वाले हैं। 

धंधरौल बांध के निकट स्थित निसोगी का डाकबंगला हो या रामगढ़ के पास बेलौरी का। दोनों का निर्माण अंग्रेजी शासन के दौरान 1914 में हुआ था। दोनों का निर्माण अग्रेजी साहिबी बंगले की है। बिलायती खपड़े की छप्पर वाले बरामदे सामने निकले हुए है जबकि भीतर ड्राइंग रूम जैसी चैकोर बैठक और इसके अगल-बगल शयन-कक्ष, रसोई भीतरी बरामदें खूबसूरत अंदाज में बने हुए है। इनके उपर है पक्की छत। कुल मिलाकर एक दिलकश और संपूर्ण यूनिट। दर्ज निर्माण काल के हिसाब से दोनों भवन इस साल अपनी शताब्दी का वर्ष देख रहे है। दोनों की छत-दिवारें सलामत है। लावारिस पाकर अराजक तत्वों ने जहां-तहां कुछ क्षति पहुंचायी है। इसके बावजूद कुल मिलाकर भवनों की हालत अब भी ज्यादा खराब नहीं हैं। यह समझना मुष्किल है कि ऐसे भवन आखिर क्यों लम्बे समय से परित्यक्त करके छोड़ हुए है। उन्हें क्यों एकदम लावारिस हालत में छोड़ दिया गया हैं, यह बताने वाला कोई नहीं है। सवाल पूछने पर विभागीय सूत्र बंगले झांकने लग रहे। कुछ इस अंदाज में जैसे, डाकबंगलों की गलत अनदेखी तो उन्हें खूब समझ में आ रही हो लेकिन मामला जब सरकारी पाॅलिसी का हो तो किया क्या जाय। निसोगी डाकबंगले के साथ देश के महान स्वतंत्रता सेनानी व समाजवादी चिंतक डाॅ. राममनोहर लोहिया की स्मृति जुड़ी हुई हैं। यहां उन्होंने 32 दिन बिताये थे और महत्वपूर्ण लेखन कार्य पूरा किया था। जाहिर है इस तथ्य के आलोक में यह स्थान राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा हुआ है। ऐसा महत्वपूर्ण स्थल कुछ इस तरह छोड़ दिया गया है कि सही सलामत होकर भी यह छुट्टी मवेशियों और आवारा नषेड़ियों-जुआरियों का अड्डा बना हुआ है। इसकी ऐसी हालत या इसके साथ ऐसा सलूक स्वयं में एक पहेली है। चैकाने वाली बात यह है कि प्रदेष में लोहिया नाम की माला खटखटाने वाले कई बार पहले भी सत्ता में आ चुके है और फिलहाल भी आसीन हैं, इसके बावजूद महान समाजवादी चिंतक की स्मृतियों से जुड़ा निसोगी डाकबंगला क्यों दशकों से लावारिस छोड़ा हुआ है? इसका अब तक उद्धार या सरक्षण क्यों नहीं किया गया?

आजादी के 65 साल के बाद भी पूरा गांव है षिक्षा से कोसों दूर

आजादी के 65 साल भी अगर पूरा गांव ही अनपढ़ हो तो अन्दाजा लगाया जा सकता है कि रेणुकापार के आदिवासी अंचलों को कालापानी क्यों कहा जाता है। दुर्गमता ऐसी कि दुर्गम शब्द की नई परिभाषा गढ़नी पड़े। आजादी के 65 वर्षो बाद भी रेणुकापार के पनारी ग्राम सभा के दुर्गम आदिवासी गांव पल्सों में अभी तक षिक्षा का दीपक नहीं जला है। जोर शोर के साथ प्रचरित सर्वषिक्षा अभियान की जमीनी हकीकत पल्सो गांव में दिखायी पड़ती है। गांव में 15 वर्षो से उपर के ग्रामीणों की बात छोड़े 4 से 14 वर्ष का कोई भी बच्चा विद्यालय का दर्षन कभी नहीं कर पाया हैं। इस गांव की दुर्गमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों बीते विधानसभा चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल का प्रत्याषी इस गांव तक नहीं पहुंच पाया। गांव से नजदीकी विद्यालय के 15 किमी से ज्यादा दूर होने के कारण कोई भी ग्रामीण अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दिला पाया। रेणुका नदी के तट पर बसे इस गाव तक पहुंचना भी काफी टेढ़ी खीर साबित है। दुर्गम खाड़र से 10 किमीदूर पल्सो तक पहुंचने के लिए लम्बे सूनसान जंगल से होकर गुजरना पड़ता है। नई पीढ़ी को शिक्षा नहीं दिला पाने को लेकर आदिवासी काफी मायूस हैं। वयोवृद्ध जोखन खरवार मायूसी से कहते है कि कई पीढ़ी बड़ी हो गयी लेकिन सभी षिक्षा से दूर रहे। 

यहां विद्यालय नहीं होने के कारण गांव के बच्चों को देष-दुनिया के बारे में कुछ नहीं पता है। लगभग 25 घरों वाले इस गांव की आबादी 200 के करीब है। वर्तमान में 4 से 14 वर्ष के प्रत्यक्ष रूप से देखा जाये तो पल्सो से नजदीकी प्राथमिक विद्यालय 15 किमी दूर खैराही में स्थित है। वर्ममान में पल्सो से नौ किमी दूर खाड़र में प्राथमिक विद्यालय निमार्णाधीन है। लेकिन ग्रामीणों की मानें तो खाड़र तक भी बच्चों को नहीं भेजा जा सकता है। लगभग नौ किमी तक घनघोर जंगल है। पक्की सड़क मार्ग नहीं होने के कारण यह जानलेवा हो सकता है। कुल मिलाकर आजादी के 65 वर्षो बाद भी पूरे गांव के अनपढ़ होने से कई सवाल खड़े हो रहे है।

पचास साल बाद आरक्षण के दंश से मुक्ति

जनपद के चुनावी इतिहास को यादों के दिये की लौ में देखे तो विधान सभा क्षेत्रों की स्थिति का एक आकलन हो आयेगा। थोड़ा पीछे जाये तो 50 साल का इंतजार अब 2012 में खत्म होने जा रहा है। प्रतीक्षा करते-करते आंखे पथरा गयी थी कि कब सामान्य व पिछड़ी जाति के लोगों को भी यहां से विधान सभा के लिए निर्वाचित होने का अवसर मिलेगा। वजह सन् 1962 में हुए नये परिसीमन के कारण जनपद की दो पूर्ण विधानसभा क्षेत्र आरक्षित थे। आंशिक क्षेत्र राजगढ़ भले ही अनारक्षित था लेकिन यहां के नेताओं को इस क्षेत्र से निर्वाचित होने के लिए आवश्यक समीकरण कभी फेवर में नहीं दिखे। पराधीनता काल में तो मिर्जापुर दक्षिणी क्षेत्र में ही यहां का सम्पूर्ण क्षेत्र रहा करता था। स्वाधीनता के बाद 1951 में परिसीमन हुआ तो राबर्टसगंज एवं दुद्धी विधान सभा अस्तित्व में आ गया। तब एक सीट से दो विधायक निर्वाचित होते थे। एक सामान्य जाति का तो दूसरा अनुसूचित जाति का प्रत्याशी एक साथ चुनाव लड़ते थे। मतदाता दो प्रत्याषी का चुनाव करते थे। दोनों जन प्रतिनिधि एक साथ क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे। इसी व्यवस्था को सन् 1952.1957 तक जारी रखा गया। सन् 1962 में नये परिसीमन में व्यवस्था बदल दी गयी। राबर्टसगंज एवं दुद्धी क्षेत्र में बिना परिवर्तन किये इन दोनों सीटों को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। अब इन सीटों में केवल अब अनुसूचित जाति के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते थे। इसमें खासियत यह थी कि अनुसूचित जन जाति के लोग भी चुनाव लड़ सकते थे। क्योंकि तब अनुसूचित जन जातियों को संवैधानिक दर्जे के दायरे में नहीं लाया गया था। इसका लाभ भी मिला अनुसूचित जन जाति के रामप्यारे पनिका दो बार और विजय सिंह गोड़ लगातार सात बार दुद्धी से विधायक निर्वाचित हुए थे। तीसरी बार नये परिसीमन में सोनभद्र में दो और विधानसभा क्षेत्र घोरावल और ओबरा के नाम से सृजित हो गये है। इस तरह से 2012 के विधानसभा सामान्य निर्वाचन में अब चार विधायक निर्वाचित होंगे। इसमें राबर्टसगंज, घोरावल और ओबरा विधानसभा क्षेत्र अनारक्षित है अर्थात अब सामान्य एवं पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों को भी मत पाने का अधिकार मिल गया है बावजूद इसके दुद्धी विधान सभा क्षेत्र अब भी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित ही है। इसका मतलब साफ है कि अभी भी सामान्य एवं पिछड़ी जाति के लोगों को दुद्धी विधान सभा क्षेत्र में तो मतदान का अधिकार मिला है लेकिन उन्हें मत प्राप्त करने का मौका नहीं दिया गया है। इसी के साथ अब अनुसूचित जन जाति के लोग भी यहां केवल वोटर और सपोर्टर बन कर रह गये है। अब की बार 2012 में यहां से तीन अनारक्षित एवं एक आरक्षित सीट से चुनकर विधायक जायेंगे तो लोगों की उम्मीद के लिए सरकार पर दबाव बना सकेंगे।

गुरुवार, 22 मई 2014

लैंको पावर के आवासीय परिसर के गैस एजेन्सी द्वारा मनमाने तरीके से घरेलू गैस के वितरण व उपभोक्ताओं की अनदेखी।

घरेलू गैस सिलेंडर की किल्लत को लेकर उपभोक्ताओं में रोष।
पर्ची न कटने के साथ-साथ समय पर नहीं हो रही गैस सिलेंडर की सप्लाई।
महीनों से बन्द है वितरण की कार्य प्रणाली व गैस ऐजेन्सी का आफिस।
आवासीय परिसर के उपभोक्ताओं इतर बाहरी उपभोक्ताओं की अनदेखी। 
अनपरा। क्षेत्र के लोगों को उन्हें रसोई गैस के सिलेंडरों की सप्लाई समय पर नहीं की जा रही है। जिससे लोगों को गैस को लेकर काफी परेशानी हो रही है, लोग रसोई गैस कनेक्षन होने के बावजूद भी इसके लिये ब्लैक में औने-पौन गैस खरीदने का मजबूर हो रहे है। बात पिछले वर्ष लैंको अनपरा पावर के आवासीय परिसर में खुले नये गैस ऐजन्सी का की है, जब ऐजेन्सी खुली तो लोगों में नये रसोई गैस कनेक्षन लेने के लिये एक बारगी होड़ सी मच गई थी, लगभग ग्राम-औड़ी, परासी व अनपरा के सैकड़ों लोगों ने आनन-फानन में अपना-अपना गैस कनेक्षन करा तो लिया, पर यह नहीं जानते थे कि कुछ दिन बाद उन्हें गैस के जिये सिलेण्डर के लिये चक्कर पे चक्कर लगाने पड़ेगे। उपभोक्ताओं के अनवतर कनेक्षन कराये जाने से ऐजेन्सी धारक ने सैकड़ो नये गैस कनेक्षन तो कर दिये परन्तु इन्हें गैस सिलेण्डर वितरण की कोई समुचित व्यवस्था नहीं की जिससे की कुछ महिनों में उपभोक्ताओं के समक्ष गैस किल्लत की समस्या उतपन्न होने लगी। 

कई सप्ताह से बन्द पड़ी गैस ऐजेन्सीं। 
आवासीय परिसर में खुले नये गैस ऐजन्सी पर लगभग एक माह से ताला लगा है, आस-पास के दुकानदारों से पता चला की यह ऐजेन्सी रेनुकूट की थी इसलिए उसे अपने सर्किल से बाहर गैस सप्लाई करने का आदेष नहीं है। परन्तु ऐजेन्सी द्वारा ज्यादा कनेक्षन व मुनाफे के इरादे से अनपरा परिक्षेत्र में गैस कनेक्षन मनमानी संख्या में बड़ा ली परन्तु उन्हें गैस किस प्रकार वितरित किया जाय इस बारे में नहीं सोचा। जिसके कारण अब लोगों में कनेक्षन होने के बावजूद भी ब्लैक में गैस सिलेण्डर खरीदने मजबूरी बन गई है। ऐजेन्सी सप्ताह में कुछ घण्टों के लिये खुलती तो है पर कुछ चहेतों और जान-पहचान के लोगों को ही सिलेण्डर उपलब्ध कराया जाता है। यदि कोई उपभोक्ता उस समय पहुँच जाता है तो उसकी पर्ची काट दी जाती है और वह पर्ची लेकर 10 से 20 दिन परेषानी के बाद सिलेण्डर प्राप्त कर पाता है। वहीं बाहरी उपभोक्ताओं के इतर आवासीय परिसर में ऐजेन्सी द्वारा अनवरत हर माह रसोई गैस सिलेण्डर वितरित किया जाता है। 


ग्राहकों को होम डिलीवरी सिस्टम से समय पर रिफिल पहुंचाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। नही ंतो इसकी षिकायत जिला आपूर्ति अधिकारी से की जायेगी और यदि आवासीय परिसर के बाहरी गैस कनेशनधारियों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो इसके विरूद्ध बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया जाएगा।  - शक्ति आनन्द, गैस उपभोक्ता।

ग्राम-औड़ी के रसोई गैस कनेक्षनधारी व उपभोक्ता मो. उस्मान अंसारी, सहदेव प्रसाद गुप्ता, गोविन्द मिस्त्री, गनेष प्रसाद, रामप्रवेष यादव, शक्ति आनन्द पिन्टी सिंह आदि ने बताया कि रिफिल बुकिंग के 25 दिन बाद नंबर लगाया जाता है, उसे गैस एजेंसी से ग्राहक को पर्ची दी जाती है। ग्राहक पर्ची लेकर गैस गोदाम पर सिलेंडर लेने जाता है तो उसे चार, पांच दिन बाद आने के लिए कह दिया जाता है एवं कई-कई हफ्तो तक गैस ऐजेन्सी बन्द रहती है ऐजेन्सी के सम्बन्धित लोगों के मोबाइल पर जब फोन किया जाता है तो स्वीच आॅफ बताता है। कभी-कभी तो गैस एजेंसी का स्टाफ रिफिल बुक करने से मना कर देता है। स्टाफ का कहना होता है कि अभी आपका नंबर नहीं लग पाएगा। सिलेंडरों के लिए लोगों की पर्चियां तक नहीं काटी जा रही हैं। उपभोक्ताओं को समय पर रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध करवाने की बजाय एजेंसी संचालक मनमानी कर रहा है और गैस वाहन सप्लाई करने वाले चालक का मोबाइल नम्बर देकर सम्पर्क कर अपनी पर्ची देकर सिलेण्डर प्राप्त करने का कह देता है जब वाहन चालक का नम्बर लगाया जाता है तो वह भी स्वीच आॅफ होात है। लोगों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो ऐजेन्सी के विरूद्ध मनमाने रवैये अपनाने को लेकर बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया जाएगा। 

गुरुवार, 15 मई 2014

नियमो को ताख में रख कर, खुली गाड़ी में हो रहा कचरे का परिवहन

सोनभद्र अनपरा, निजी विद्युत् परियोजना लेन्को अनपरा पॉवर के द्वारा सभी नियमो को ताख पर रखकर अपनी आवासीय परिसर का कचड़ा निस्तारण हेतु ले जाने के लिए खुले ट्रेक्टर का प्रयोग किया जा रहा है जिससे बिमारिय फैलने की आशंका है , आज साप्ताहिक बाज़ार के बीच जब कचरे से लदी हुयी खुली गाड़ी गुजरी तो लोगो ने अपनी नाक बंद करली , इस बाबत जब लेन्को के अधिकारी नित्यानद तिवारी से बात की गयी तो उन्होंने मामले की जानकारी न होने की बात कही और कहा की अगर येसा है तो इसे शीघ्र ही रोका जायेगा .
औडी मोड़ निवासी , ग्राम सभा सदस्य , शक्ति आनंद , बी. डी. सी. सुभाष चंद भारती , समाज सेवी , रीता भारती , आदि ने के इस कृत्य तीखी आलोचना करते हुए कहा की परियोजना , अपने आस पास के क्षेत्र के लोगो की बीमारियाँ दूर करने की बजाय उनको बीमारियाँ बाँट रही है , जिसे तुरंत रोकना होगा .

बुधवार, 14 मई 2014

हैंडपंपों के खराब होने से गहराया पानी संकट

नगवां ब्लाक के कई गांवों में पेयजल का संकट खड़ा हो गया है। तमाम हैंडपंप खराब पड़े हैं। लोगों को नदी, चुआंड़ और बंधियों से पानी लाना पड़ रहा है। दूषित जल पीने से बीमारी फैलने की आशंका है। चुनावी अधिसूचना से हैंडपंपों की मरम्मत नहीं हो सकी है इस नाते लोग परेशान हैं। गर्मी का मौसम शुरू होते ही पानी का संकट शुरू हो जाता है। खासकर पहाड़ी इलाकों में पानी के लिए ग्रामीणों को खासी परेशानी झेलनी पड़ती है। मार्च से ही पानी की समस्या मई में विकराल हो जाती है। नगवां ब्लाक में फिलहाल पानी की समस्या गंभीर हो गई है। ब्लाक क्षेत्र के नगवां, मांची, बांकी, सियरियां, बाराडाड़, चरगड़ा, धोबी, दरेंव, बिछियां, सरईगाढ़ आदि कई गांवों में हैंडपंप खराब हैं। सबसे ज्यादा खराब स्थिति चरगड़ा, बाराडाड़ और सियरिया गांव में है। इन गांवों में आधा से अधिक हैंडपंपों ने साथ छोड़ दिया है। ग्रामीण दूर-दूर से पानी ला रहे हैं। बाराडाड़ में लोग बांध का दूषित पानी पी रहे हैं तो सियरियां गांव में नदी का पानी ही लोगों का सहारा बना है। बाराडाड़ की प्रधान अजीमा बेगम कहती हैं कि अधिकारियों को पानी के संकट से अवगत कराया गया है लेकिन समस्या का कोई निदान नहीं हो सका है। खोड़ैला गांव की प्रधान निर्मला कहती हैं कि यह गांव ऊंची पहाड़ी पर बसा है। यहां पहले से ही पानी का संकट है। फिर गर्मी में लोगों का पानी के लिए क्या हाल होगा किसी से छिपा नहीं है। यहां के पृथ्वीनाथ ने कहा कि पानी की समस्या हर साल होती है लेकिन उसका कोई स्थायी समाधान नहीं हो रहा। मांची के प्रधान विजय और दरेंव के प्रधान मंगल का कहना है कि हैंडपंपों की गहराई कम होने से पानी का संकट होता है। उन्होंने टैंकर से पानी की आपूर्ति की मांग की है।

स्ट्रांग रूम की सुरक्षा में लगे जवान

राजकीय पालिटेक्निक कालेज के स्ट्रांग रूम में रखी गई इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की निगरानी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के हवाले है। स्ट्रांग रूम के चारो ओर जवानों की तैनाती की गई है। अंदर आने-जाने वालों पर सीसीटीवी से भी नजर रखी जा रही। सोमवार को मतदान के बाद देर रात तक सभी 1284 मतदान केंद्रों से आई इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों को स्ट्रांग रूम में रखा गया। ईवीएम की सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गई है। स्ट्रांग रूम में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं ताकि निगरानी की जा सके कि स्ट्रांग रूम की ओर कौन आ जा रहा है। मंगलवार की सुबह प्रेक्षक टाम जोश, डीएम चंद्रकांत ने स्ट्रांग रूम का जायजा लिया। उधर, सुरक्षा में लगे जवानों ने सुबह कालेज के पास से गुजर रहे दो संदिग्ध युवकों को पकड़कर करीब आधा घंटे तक पूछताछ की। दोनों युवकों ने जब बताया कि वे कालेज के पास की बस्ती के हैं और शौच के लिए जा रहे हैं तब उन्हें छोड़ा गया। चेतावनी दी कि मतगणना तक वे कालेज की ओर न नजर आएं। उधर, एसपी रामबहादुर यादव ने बताया कि सीआईएसएफ का एक प्लाटून ईवीएम की सुरक्षा में लगाया गया है। हर चार घंटे पर शिफ्ट के अनुसार जवानों की तैनाती की जा रही है। स्ट्रांग रूम के इर्द-गिर्द किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं है। उनका कहना है कि 16 मई को मतों की गणना होने के बाद ही कालेज में कोई व्यक्ति जा सकता है।

बसपा के लिए भी पिछड़ा वर्ग के लोगों ने वोटिंग की लेकिन इस बार इस वोट में भाजपा की अच्छी सेंधमारी सुनने को मिली। इसी तरह आदिवासी एवं दलित वोटर जिसे बसपा के लोग बेस वोट मान रहे थे। इनकी जुबां से भी इस बार भाजपा, कहीं-कहीं कांग्रेस का भी नाम सुनने को मिला। सीमा क्षेत्र के इलाके जहां पिछले कुछ चुनावों से सपा और बसपा के नाम का डंका बजा करता था वहां भाजपा के पक्ष में वोटिंग की खबर जहां भाजपा जनों को गदगद करती नजर आईं वहीं इस बदलाव के चलते अन्य दलों की स्थिति झुंझलाहट वाली देखने को मिली। वैनी और खलियारी क्षेत्र में जहां जसौली परियोजना का मुददा लोगों में अन्य दलों के प्रति रोष का भाव बनाए दिखा। वहीं मांची, चरगड़ा, पनौरा और महुली इलाके में सड़कों की खस्ताहाली, पेयजल संकट एवं अन्य सरकारी योजनाओं की बंदरबांट की स्थिति लोगों को इस बार बदलाव की तरफ धकेले रही। इन इलाकों में सुबह से लंबी लाइन के साथ पहाड़ी क्षेत्रों में 80 से 90 फीसद और सीमा से सटे कस्बाई इलाकों में 65 से 70 प्रतिशत मतदान भी इस बार बदलाव की आहट सुनाता नजर आया। कई वोटरों की स्थिति यह थी कि कौन प्रत्याशी अच्छा है, कौन बुरा.. इससे उन्हें कोई मतलब नहीं था। बस उनके मन में एक ही ललक थी इस बार चुनावी सब्जबाग दिखाकर गायब होने वालों को कड़ा सबक सिखाना है। हालांकि चुनाव में किसकी जीत होगी किसकी हार यह तो 16 मई को आने वाले परिणाम ही बताएगा लेकिन जिस तरह वोटरों के मन में बदलाव और आक्रोश भरे चेहरों से मतदान देखने को मिला वह काफी हद तक बदलाव का ही संदेश देता नजर आया।

जनपद में 52.87 फीसदी पड़े मत

आसमान से बरसती आग, बदन झुलसाते लू के थपेड़े..। इन सब खामियों के बावजूद सोनांचल में इस बार 52.87 प्रतिशत वोट डाले गए। इस आंकडे़ से पिछले कई चुनावों के रिकार्ड टूट गए। राबर्ट़्सगंज के तीन विधानसभा क्षेत्रों में दो घंटे पहले ही मतदान खत्म करा दिया गया। पिछले कई चुनावों के बाद पहली बार राबर्ट्सगंज सीट पर वोटों की बारिश हुई। दुद्धी में पिछली बार महज 50.27 मतदाताओं ने वोट डाला था। वहीं इस बार वोट डालने का प्रतिशत 57 पहुंच गया। ओबरा विधानसभा क्षेत्र में पिछले लोस चुनाव में महज 38.40 फीसद वोटिंग हुई थी लेकिन इस बार यह प्रतिशत 43 तक पहुंच गया। राबर्ट्सगंज विधानसभा में 2009 का मतदान प्रतिशत 49.16 था। वहीं इस बार 54 प्रतिशत वोटरों ने अपने अधिकार का प्रयोग किया। घोरावल विधानसभा में पिछले लोस चुनाव में 54.18 प्रतिशत वोटरों ने अपने अधिकार का प्रयोग कर सबसे अव्वल स्थान प्राप्त किया था। यहां इस बार मतदान 57.49 प्रतिशत रहा। इससे पहले सुबह से ही जगह-जगह बूथों पर मतदाताओं की कतार लगनी शुरू हो गई। दोपहर तक वोटरों ने डटकर मतदान किया। इसके बाद तेज धूप ने उनके पांव रोक दिए। तीन बजे के बाद फिर से वोटरों के निकलने का सिलसिला शुरू हुआ लेकिन राबर्ट्सगंज, दुद्धी और चकिया विस क्षेत्र में शाम चार बजे तक ही वोटिंग कराए जाने से तमाम वोटरों को बूथों पर पहुंचने के बाद भी वापस लौटना पड़ा। घोरावल और ओबरा विस क्षेत्र में शाम छह बजे तक वोटिंग होती रही। यहां वोटिंग प्रतिशत को बताने में निर्वाचन महकमे को रात आठ बज गए।

आदर्श बूथों पर भी नहीं दिखी बेहतर स्थिति

निर्वाचन आयोग के निर्देश पर इस बार जनपद के 32 बूथों को आदर्श का दर्जा मिला था। इनमें चारों विधानसभा के आठ-आठ बूथों चिह्नित किए गए थे लेकिन हर बूथ पर कोई न कोई कमी मुंह बांए खड़ी रही। छांव के इंतजाम संग प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था तो था मगर अन्य सुविधाओं के मामले में ज्यादातर बूथों पर नि:शुल्क स्टाल पोस्टर नजर आया। कहीं पेयजल के इंतजाम तो दिखे लेकिन पानी के शुद्धता की स्थिति भी दावों का माखौल उड़ाती रही। राबर्ट्सगंज विस क्षेत्र के आदर्श इंटर कालेज पर बालू के ढेर पर आदर्श बूथ का नि:शुल्क स्टाल तो लगा ही था। नौ बजे तक इस स्टाल के लिए किसकी तैनाती है यह बताने वाला कोई नहीं था। इसी तरह संस्कृत विद्यालय स्थित बूथ पर लगे नि:शुल्क स्टाल पर पानी का इंतजाम तब हुआ जब एसडीएम राजेंद्र तिवारी ने पहुंचकर संबंधितों को फटकार लगाई। आरएसएम इंटर कालेज ही ऐसा था जहां पेयजल के मुकम्मल इंतजामात नजर आए। 

जीजीआईसी में नि:शुल्क स्टाल पर बीएलओ का कब्जा था। हालांकि यहां पेयजल के इंतजाम दूसरी तरफ किए गए थे। जय ज्योति चुर्क, बिरला हायर सेकेंडरी स्कूल पटवध के साथ ही बिरला के पश्चिमी और दक्षिणी पाठशाला पर आदर्श बूथ के नि:शुल्क स्टाल व्यवस्थाओं की कोरमपूर्ति बया करते नजर आए। इसी तरह घोरावल विस क्षेत्र के बढ़ौली गांव स्थित बूथ से आदर्श बूथ का पोस्टर ही नदारद था। उरमौरा, भरौली, जुड़िया, मुड़िलाडीह, शाहगंज पर छांव के इंतजाम तो नजर आए लेकिन अन्य व्यवस्थाएं खानापूर्ति की ही कहानी बया करती रहीं। ओबरा विधानसभा क्षेत्र में ओबरा इंटर कालेज, राजकीय इंटर कालेज पिपरी, प्राथमिक विद्यालय रेणुकूट, आदित्य बिड़ला इंटर कालेज हिण्डाल्को रेणुकूट, मांटेसरी स्कूल प्राथमिक विद्यालय रेणुकूट, प्राथमिक विद्यालय औराडांड, अनपरा व रेनूसागर में भी व्यवस्थाएं नजर आईं लेकिन नि:शुल्क स्टाल के पोस्टर कई जगह शो-पीस बने रहे। दुद्धी विस क्षेत्र के संत जोसेफ स्कूल शक्तिनगर, केंद्रीय विद्यालय रिहंदनगर, डीएवी स्कूल रिहंदनगर, प्राथमिक विद्यालय, पूर्व माध्यमिक विद्यालय दुद्धी, म्योरपुर के बीडीओ कार्यालय आदि में भी आदर्श बूथ का इंतजाम ठीक नहीं था।

मु्द्दो ने जातीय समीकरण कर दिया ध्वस्त

सोनभद्र। राबर्ट्सगंज संसदीय सीट पर मतदान का परिणाम तो 16 मई की गणना से पता चलेगा लेकिन जिस तरह से मतदान के दिन जातीय समीकरणों के ध्वस्त होने का परिदृश्य सामने आया है, उसने प्रत्याशियों को बेचैन करके रख दिया है। राजनीतिक विश्लेषक भी इस बदलाव की वजह जानने में लगे हुए हैं। हालांकि मतदाताओं से ली गई जानकारी में यह बात तो साफ हो गई इस बार स्थानीय मुद्दों ने इस समीकरण को तोड़ने में अहम भूमिका तो निभाई ही महंगाई, भ्रष्टाचार ने भी लोगों के दिल-दिमाग को खूब प्रभावित किया। अगड़ों को भाजपा का बेस वोटर, पिछड़ों को सपा का बेस वोटर और अनुसूचित जाति, जनजाति को ज्यादातर बसपा का बेस वोट माना जाता रहा है लेकिन इस बार मतदान के दिन जिस तरह के समीकरण सुनने को मिले उससे यह बात साफ नजर आई कि इस बार जातीय समीकरणों की काफी हद तक हवा निकल गई। वर्ष 2012 के विस चुनाव में जिन अल्पसंख्यकों ने सपा का खुलकर साथ दिया था उन्हीं के जुबान से इस बार बसपा, कांग्रेस, कहीं-कहीं तो भाजपा का भी नाम सुनने को मिला। इसी तरह बैकवर्ड वोटर जिनका भी पिछले विस चुनाव में सपा की तरफ अच्छा-खासा झुकाव देखने को मिला था।

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

युवा वर्ग समस्याओं को हल करने वाले को देंगे वोट

(लोकसभा चुनाव-2014 के बाबत ऊर्जान्चल परिक्षेत्र के युवा वर्ग की प्रतिक्रिया।)
जनपद-सोनभद्र के राबर्टसगंज संसदीय क्षेत्र में इस बार लोकसभा चुनाव में मतदाताओं में जागरूकता युवा वर्ग के लोगो के सिर चढ़ कर बोल रहा है। प्रत्याषीयों को हर बार की तरह सिर्फ आष्वासन नहीं अबकी बार लोगों की समस्याओं को हल कराना होगा। लोगो की मौलिक मांगों की समस्याओं को हल करने, महंगाई को कम करने, गैस की बड़ी हुई किल्लत, बिजली की अन्धा-धुन्ध कटौती, पानी की जटील समस्या को प्रमुखता से हल करने वाले प्रत्याशी को ही युवा वर्ग के मतदाताओं का मत मिलेगा। युवाओं ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और उनके प्रमुख समस्या को हल करने वाले के पक्ष में मतदान करने की बात कही। 
हरिनाथ खरवार 

ऊर्जान्चल परिक्षेत्र के रेहटा गाँव के रहने वाले हरिनाथ खरवार ने बताया कि प्रतिनिधि चुने जाने के बाद प्रत्याशियों द्वारा लोगो की समस्याओं की अनदेखी की जाती है, यह अच्छी बात नहीं है, उन्हें जनता इसी कार्य के लिये अपना मत देती है। मैं विस्थापन की समस्या से निजात दिलाने वाले के साथ ही जो परास्नातक की शिक्षा के लिए महाविद्यालय की स्थापना कराए, उसे अपना मत दूंगा।
 नूर मोहम्मद 

अनपरा गाँव निवासी नूर मोहम्मद का कहना है कि बिजली, पानी आदि जैसी कई समस्याओं से हमेशा जूझना पड़ता है। प्रत्याशी चुने जाने के बाद समस्याओं पर ध्यान ही नहीं दिया जाता है। उन्होंने कहा कि जो प्रत्याशी इन समस्याओं से निजात दिलाएगा, वोट उसी को दिया जाएगा चाहे वह किसी दल या जाति का हो। 
शक्ति आनंद 

ग्राम पंचायत औड़ी के शक्ति आनन्द का कहना है कि लोकसभा में महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए आवाज उठाने वाले प्रत्याशी के पक्ष में वोट करने की जरूरत है। कहा कि जीतने के बाद वे हर तबके के लोगों की समस्या के साथ ही साथ क्षेत्र की बेरोजगारी दूर करने में अपनी अहम भूमिका निभाएं, ऐसे प्रत्याशी को अपना मत दूंगा। हम अपना बहुमूल्य मत उसे देंगे जो कर्मठ हो और जनहित में जिसका योगदान रहा हो। क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति जागरूक उम्मीदवार को भी वरीयता मिलेगी।
राजकुमार पनिका 

पिपरी सोनवानी के राजकुमार पनिका कहते हैं कि महिला एवं दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर अंकुश लगाने वाले प्रत्याशी को अबकी वोट दिया जाएगा। जनता की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए उसका निदान करे ऐसे प्रत्याशी को अपना मत देने का विचार कर रहा हूं। 
 मुकेश पाण्डेय 

बेलवादह निवासी मुकेष पाण्डेय कहते हैं कि हमे क्षेत्र का ऐसा प्रतिनिधि चुनना चाहिए जो ग्रामीण क्षेत्रों पानी, बिजली की समस्याओं का समाधान करते हुए आम जनमानस की भावनाओं की कद्र करते हुए उनकी समस्या हल करें। 
  लक्ष्मीकांत दुबे 

रेहटा के रहने वाले लक्ष्मीकान्त दूबे कहते है कि जिसने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया हो के साथ-साथ बेरोजगारी दूर करने वाले को वोट देगें। 

जयमंजय पनिका 
बांसी गाँव के निवासी जयमंजय पनिका कहते हैं कि ऐसे प्रत्याशी जो गांव और शहरों में रहने वाले मतदाताओं की समस्याओं को हल करें, ऐसे प्रत्याशी को हमें वोट देना चाहिए। 

मोहम्मद सद्दाम 

आदर्षनगर क्षेत्र के मोहम्मद सद्दाम महंगाई सहित कई समस्याओं प्रति जागरूक प्रत्याशी को वोट देंगे, चाहे वह किसी भी दल का हो। 

इस लोकसभा चुनाव में मतदान को लेकर ज्यदातर युवाओं का कहना है कि चुनाव के दौरान पार्टियां और उनके प्रत्याशी लंबे-चैड़े वायदे ऐसे करते हैं जैसे जीत के बाद रामराज ला देंगे। लेकिन चुनाव के बाद सब कुछ पहले जैसा ही दिखता है। अबकी बार हम सोच समझकर ही प्रत्याषीयों को मतों में तरजीह देंगे। लगता है कि मतदान को लेकर जागरूकता युवाओं में पूरी तरीके से समा गया है।