सोमवार, 1 सितंबर 2014

आदिवासियों का हक मार रहीं सरकारी एजेंसियां

By Shiv Das 

खनन और विकास परियोजनाओं के नाम पर राज्य सरकारों की विभिन्न एजेंसियों द्वारा आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के अधिकारों की अनदेखी पर चिंता जाहिर करते हुए आदिवासी मामलों के केंद्रीय मंत्रालय ने बीते दिनों राज्यों के मुख्य सचिवों को एक पत्र लिखा। इसमें उसने स्वीकार किया है कि जंगल की जमीन पर आबाद आदिवासियों को जबरिया हटाया और तंग किया जा रहा है। इस साल यह दूसरी बार है जब मंत्रालय ने आदिवासियों के अधिकारों के हनन को लेकर राज्यों के प्रमुख सचिवों को पत्र लिखा है। इससे पहले मंत्रालय ने इस मुद्दे को लेकर मई में राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखा था और उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़ा किए थे। इससे यह लाजिमी है कि जल, जंगल और जमीन के अधिकार के मुद्दे पर आदिवासियों, बुद्धिजीवियों और राजसत्ता की सोच को विश्लेषित किया जाए। 

जल, जगंल और जमीन के अधिकार को लेकर दशकों से आंदोलन चल रहे हैं और बार-बार यही सवाल खड़ा होता है कि प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक किसका है? आदिवासियों के हितों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व आईएएस अधिकारी बीडी शर्मा का मानना है कि प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य नहीं, समाज का अधिकार है। आदिवासी इस परंपरा को मानने वाले लोग हैं। इसलिए इसपर पहला हक उनका है। बीडी शर्मा सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल खड़ा करते हैं। उनका कहना है कि धरती भगवान ने बनाई, हम भगवान के बच्चे, फिर सरकार बीच में कहां से आ गई? जंल, जंगल और जमीन के अधिकार को लेकर बीडी शर्मा के इस तर्क का अब आदिवासी मामलों के केंद्रीय मंत्रालय ने भी समर्थन किया है। पिछले दिनों राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखे अपने पत्र में मंत्रालय ने कहा है कि जंगल पर पहला अधिकार आदिवासियों का है और उनकी कीमत पर इसे महज धन बनाने या पर्यटन की दूसरी गतिविधियों के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों को लिखे पत्र में मंत्रालय ने साफ कहा है कि जमीन से जुड़े मामलों का निपटारा और पुनर्वास होने से पहले आदिवासियों को दावे वाली उनकी जमीनों से बेदखल नहीं किया जाए। 

मंत्रालय की यह चिंता अनायास नहीं है। इसकी वाजिब वजहें भी हैं। इन दिनों देश के विभिन्न इलाकों में आदिवासियों और किसानों की जमीनों को बड़े पैमाने पर हड़पने की साजिश चल रही है, जिसमें सरकारी एजेंसियों के नुमाइंदों से लेकर उद्योगपति और सफेदपोश सभी शामिल हैं। औद्योगिकरण और सार्वजनिक उपक्रम स्थापित कर क्षेत्र का विकास करने के नाम पर किसानों की उपजाऊ जमीनों को बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर उनसे खरीदा जा रहा है। फिर इन जमीनों को बाजारमूल्य पर पूंजीपतियों को बेच दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड आदि राज्यों में इस तरह के दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, महाराष्ट्र आदि राज्यों में विकास परियोजनाओं के नाम पर जंगल की जमीनों को बड़े पैमाने पर खाली कराया जा रहा है। इस प्रक्रिया में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम-2006, वन संरक्षण अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के विभिन्न प्रावधानों समेत मानवाधिकारों की अनदेखी की जा रही है। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में एक उद्योग घराने को जंगल की जमीन हस्थानांतरित करने के लिए उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अनदेखी भी कर दी गई है, जिसका खामियाजा इस इलाके में रहने वाले आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को भुगतना पड़ रहा है।
इसका लब्बोलुआब यह है कि डोलो स्टोन, सैंड स्टोन, लाइम स्टोन, मोरम, कोयला, चूना, लौह अयस्क आदि खनिज संपदा के दोहन और उद्योगघरानों को फायदा पहुंचाने के लिए आम नागरिक के अधिकारों की बलि चढ़ाई जा रही है, जिसमें राज्य सरकारों की एजेंसियों की बड़ी भूमिका है। इसका सबसे अधिक नुकसान खनिज संपदा से परिपूर्ण इलाकों में रहने वाले आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को भुगतना पड़ रहा है जो वहां के मूल निवासी हैं। हालांकि वे निष्कपट संस्कृति और जागरुकता के अभाव में मूल निवासी होने का दस्तावेज सरकारी पुलिंदों में दर्ज नहीं करा सके और ना ही सरकारी एजेंसियों के नुमाइंदों ने ईमानदारी से उनके दस्तावेज तैयार करने की कोशिश की। रही-सही कसर विकास परियोजनाओं की स्थापना ने पूरे कर दिए, जिसकी वजह से उन्हें अपने मूल स्थान से दूसरी जगह विस्थापित होना पड़ा। कागजी पुलिंदों के महत्व की अज्ञानता आज उन्हें भारी पड़ रही है। भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे सरकारी नुमाइंदे उन्हें प्रताड़ित कर रहे हैं। इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली, लखीमपुर खीरी, बहराइच, गोरखपुर, चित्रकुट, सहारनपुर आदि जिलों समेत मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, आंध प्रदेश में आसानी से देखा और समझा जा सकता है। 

उत्तर प्रदेश में वन विभाग की टीम ने करीब 50 हजार आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों पर विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा पंजीकृत करा रखा है, जिसकी वजह से हजारों लोगों को जेल की हवा खानी पड़ी है और हजारों लोग अभी भी अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए न्यायालयों का चक्कर लगा रहे हैं। राबर्टसगंज वन क्षेत्र के चुर्क रेंज में आने वाले सिलहटा और राजपुर गांव के करीब डेढ़ सौ आदिवासी और अन्य परंपरागत वन निवासी हाल ही में गिरफ्तारी से बचने के लिए उच्च न्यायालय इलाहाबाद से आदेश प्राप्त किया है, जिसके लिए उन्हें हजारों रूपये गंवाने पड़े। जबकि 15 लोगों को जेल की हवा खानी पड़ी थी। अभी भी वे वन विभाग द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमों से बाहर निकलने के लिए अदालतों का चक्कर लगा रहे हैं। गौरतलब है कि देश में संसद द्वारा पारित अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम-2006 लागू है, लेकिन इसके तहत प्राप्त दावों का निस्तारण किए बिना ही वन विभाग के नुमाइंदे जंगल की जमीन पर काबिज आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को वहां से बेदखल कर रहे हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश में वनाधिकार कानून के तहत ग्रामसभा स्तर पर करीब एक लाख दावे प्राप्त हुए थे, जिनमें से 66 हजार से ज्यादा दावों को खारिज कर दिया गया। इन खारिज दावों में तीस हजार से ज्यादा दावे अन्य परंपरागत वन निवासियों के थे। अभी भी करीब पंद्रह हजार दावे लंबित हैं। पूरे राज्य में करीब दस हजार लोगों को ही वनाधिकार कानून के तहत पट्टे मिल पाए हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर कानून के प्रावधानों को उल्लंघन किया गया है। अगर केवल सोनभद्र की बात करें तो यहां 56 हजार से ज्यादा दावे खारिज किए जा चुके हैं। जिन लोगों को जमीन के पट्टे मिले हैं, उनके दावों और आवंटित जमीन में काफी अंतर है। इतना ही नहीं, कुछ दबंग प्रकृति के लोग इनकी जमीनों पर कब्जा किए हुए हैं और सरकार के नुमाइंदे भी उनकी नहीं सुन रहे। इन हालातों में सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली में जल, जंगल और जमीन के मुद्दे को लेकर संघर्ष तेज होने की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। अगर भविष्य में ऐसा होता है तो इसके लिए सरकारी एजेंसियां ही जिम्मेदार होंगी क्योंकि वे जिम्मेदारी से वनाधिकार कानून में उल्लिखित साक्ष्यों पर गौर नहीं कर रही हैं।

अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम-2006 के प्रावधानों के तहत जनजातीय कार्य मंत्रालय की ओर से 1 जनवरी, 2008 को जारी अधिसूचना पर गौर करें तो वनाधिकारों की मान्यता के साक्ष्यों में गजेटियर, जनगणना, सर्वेक्षण और बंदोबस्त रिपोर्टों, मानचित्र, उपग्रहीय चित्र, कार्य योजनाओं, प्रबंध योजनाओं, लघु योजनाओं, वन जांच रिपोर्टों, वन्य अभिलेखों, अधिकारों के अभिलेखों, पट्टा या लीज, सरकार द्वारा गठित समितियों, आयोगों की रिपोर्टों, सरकारी आदेशों, अधिसूचनाओं, परिपत्रों, संकल्पों. अर्द्ध न्यायिक या न्यायिक अभिलेखों आदि को शामिल किया गया है। इनके अलावा उन रूढ़ियों और परंपराओं के अनुसंधान अध्ययनों एवं दस्तावेजीकरण को भी साक्ष्य के रूप में मान्यता दी गई है जो किन्हीं वनाधिकारों के उपयोग को स्पष्ट करते हैं। इसमें भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण जैसी ख्यातिप्राप्त संस्थाओं द्वारा रूढ़िजन्य विधि का बल भी शामिल है। तत्कालीन रजवाड़ों या प्रांतों या ऐसे अन्य मध्यवर्तियों से प्राप्त अभिलेखों को भी साक्ष्य माना गया है जिसके अंतर्गत मानचित्र, अधिकारों का अभिलेख, विशेषाधिकार रियायतें हैं। कुएं, कब्रिस्तान और पवित्र स्थल जैसी पुरातंता को स्थापित करने वाली पारंपरिक संरचनाओं, गृह, झोपड़ी और भूमि में किए गए स्थाई सुधारों जैसे बंध और चैकडेम बनाना आदि, भूमि अभिलेखों में उल्लिखित या पुराने समय में गांव के वैध निवासी के रूप में मान्यताप्राप्त विशिष्ट लोगों के पुरुखों का पता लगाने वाली वंशावली, दावेदार से भिन्न बुजुर्गों का कथन भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार है। इसके बावजूद वन समितियों के प्रतिनिधि मतदाता पहचान-पत्र, राशनकार्ड, पासपोर्ट, गृहकर रसीदें, मूल निवास प्रमाण-पत्र आदि दस्तावेजों के आधार पर ही निर्णय लेते हैं। पूर्व में गठित आयोगों अथवा सर्वेक्षणों का अध्ययन करने की जहमत नहीं उठाते। अगर सोनभद्र की बात करें तो यहां जिला प्रशासन मूल निवास प्रमाण-पत्र जारी ही नहीं करता है। सभी लोगों को सामान्य निवास प्रमाण पत्र ही जारी किया जाता है, जिससे यहां के आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों को उनका वनाधिकार नहीं मिल पा रहा। ऐसा ही हाल चंदौली जिले का है, जहां आदिवासियों की भारी आबादी को अनुसूचित जाति में शामिल कर दिया गया है, जबकि उनकी समाजिक स्थिति ठीक सोनभद्र के आदिवासियों की तरह ही है। कोल, कंवर, बादी, मुसहर, उरांव आदि को यहां की सरकार आदिवासी मानती ही नहीं है। ऐसे में वनाधिकार कानून के लिए उन्हें तीन पीढ़ियों का दस्तावेज लाना नामुमकिन साबित हो रहा है। इसके अलावा अशिक्षित आदिवासियों में उपरोक्त साक्ष्यों की जानकारी का भारी अभाव है, जिससे वे अपने अधिकार से वंचित हो जा रहे हैं। दूसरी ओर उन्हें सरकारी एजेंसियों के उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में आदिवासी मामलों के केंद्रीय मंत्रालय द्वारा राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखा गया पत्र उनके संघर्ष को नई धार दे सकता है, जिसकी अगुआई प्रख्यात बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता कर रहे हैं।

मूल लेख स्त्रोत:-
द पब्लिक लीडर मीडिया ग्रुप, 
राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश
ई-मेल:thepublicleader@gmail.com, 
मोबाइल-09910410365

जेपी समूह को 409 करोड़ माफ

उप्र सरकार ने वन बंदोबस्त अधिकारी के फैसले के खिलाफ राज्य के प्रमुख वन संरक्षक को नहीं करने दी अपील 


by Shiv Das

वन बंदोबस्त अधिकारी वीके श्रीवास्तव के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश वन विभाग के प्रमुख वन संरक्षक ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में अपील करने की राय मांगी, लेकिन राज्य सरकार ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। उत्तर प्रदेश सरकार के सचिव पवन कुमार ने 12 सितंबर, 2008 को वन विभाग के प्रमुख वन संरक्षक को पत्र संख्या-3792/14-2-2008 के माध्यम से राज्य सरकार के निर्णय से अवगत भी कराया और सोनभद्र में भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तहत विज्ञप्ति जारी किए जाने हेतु दो दिनों के अंदर आवश्यक प्रस्ताव शासन को भेजने का निर्देश दिया। 

उत्तर प्रदेश सरकार के सचिव (वन) ने 25 नवंबर, 2008 को अधिसूचना संख्या-4952/14-2-2008-20(17)/2008 के माध्यम से सोनभद्र में भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तहत अधिसूचना जारी कर शासकीय दस्तावेजों में वन क्षेत्र को कम कर दिया, जिसमें जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के पक्ष में निकाली गई वन भूमि भी शामिल थी। इतना ही नहीं अपनी कारगुजारियों को कानूनी जामा पहनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने उच्चतम न्यायालय में लंबित जनहित याचिका (सिविल)-202/1995 में आईए संख्या-2469/2009 दाखिल कर जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के पक्ष में विवादित खनन लीज का नवीनीकरण करने के लिए अनुमति मांगी। साथ ही उसने उप्र सरकार द्वारा 25 नवंबर, 2008 को जारी भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तरह जारी अधिसूचना की पुष्टि करने का अनुरोध किया। उच्चतम न्यायालय ने मामले में सीईसी से रिपोर्ट तलब की। जवाब में सीईसी के सदस्य सचिव एमके जीवराजका ने 10 अगस्त, 2009 को फाइल संख्या-1-19/सीईसी/एससी/2008-पीटी-21 के माध्यम से उच्चतम न्यायालय के रजिस्ट्रार के पास अपनी संस्तुति दे दी। 

अगर केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की ओर से की गई कार्रवाइयों पर गौर करें तो सोनभद्र के गैर-सरकारी संगठन वनवासी पंचायत के सदस्य रमेश कुमार ने साल-2008 में पत्र लिखकर भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 के तहत अधिसूचित वन भूमि पर जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड द्वारा गैर-वानिकी कार्य करने की शिकायत समिति से की थी। सीईसी के सदस्य सचिव एमके जीवराजका ने 8 सितंबर, 2008 को उत्तर प्रदेश वन विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षक को पत्र (फाइल संख्या-1-26/सीईसी/एससी/2008-पीटी28) लिखकर स्पष्टीकरण मांगा। साथ ही उन्होंने भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 के तहत अधिसूचित वन भूमि का उपयोग खनन अथवा अन्य किसी प्रकार के गैर-वानिकी कार्य के लिए नहीं होने देने का निर्देश दिया। इसके अलावा सीईसी ने इस मामले की जांच के लिए एक पत्र केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय (मध्य क्षेत्र), लखनऊ के मुख्य वन संरक्षक आजम जैदी को लिखा। आजम जैदी ने मामले की जांच वन संरक्षक वाईके सिंह चौहान को सौंपी। वाईके सिंह चौहान ने साल 2009 में 21 और 22 जनवरी को इलाके का निरीक्षण किया। जांच के दौरान उन्होंने पाया कि जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड द्वारा भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 के तहत अधिसूचित वन भूमि पर अवैध निर्माण हो रहा है। उन्होंने 3 फरवरी, 2009 को पत्र लिखकर सीईसी को अपनी जांच से अवगत कराया। 

अगर वाईके सिंह के दावों पर गौर करें तो जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के पक्ष में कोटा, पड़रछ, पनारी, मारकुंडी की 820.06 हेक्टयर और मारकुंडी गांव स्थित कैमूर वन्यजीव विहार की 253.176 हेक्टेयर भूमि भा.व.अ. की धारा-4 से अलग की गई है जो कुल 1083.231 हेक्टेयर है। इससे उसे कुल 409.09 करोड़ रुपये का फायदा हुआ है। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अनुसार, जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड को एनपीवी के रूप में 192.83 करोड़ रुपये, गैर-वन भूमि के रूप में 133.78 करोड़ रुपये, वनरोपण क्षतिपूर्ति (कंपेनसेटरी एफॉरेस्टेशन) के रूप में 10.84 करोड़ रुपये, दंडनीय वनरोपण क्षतिपूर्ति (पीनल कंपेनसेटरी एफॉरेस्टेशन) के रूप में 21.64 करोड़ रुपये, आदिवासी एवं वन्यजीव विकास के लिए 50 करोड़ रुपये सरकार को देने पड़ते। अगर राबर्ट्सगंज (सोनभद्र) के तहसीलदार की ओर से 13 फरवरी, 2009 को सोनभद्र के डाला (कोटा) स्थित सोनांचल जन कल्याण संस्था के सचिव अजीत कुमार को लिखे पत्र पर गौर करें तो जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड को भा.व.अ. की धारा-4 से निष्कासित भूमि का अधिकांश हिस्सा हस्तांतरित कर दिया गया है और वह उसके कब्जे में है। 
गैर-सरकारी संगठन, वनवासी पंचायत, सोनभद्र के सदस्य, रमेश कुमार, अपना दल के सोनभद्र अध्यक्ष चौधरी यशवंत सिंह, चंदौली जनपद के नौगढ़ विकासखंड के शमशेरपुर गांव निवासी बलराम सिंह उर्फ गोविंद सिंह, जन संघर्ष मोर्चा के प्रवक्ता दिनकर कपूर, पीयूसीएल के विकास शाक्य, वनाधिकार कानून पर काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता रोमा समेत स्थानीय बाशिंदों की लिखित शिकायतों पर विश्वास करें तो जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड ने जिला प्रशासन के नुमाइंदों की सहायता से यूपीएससीसीएल की संपत्तियों के अधिग्रहण के बहाने ग्राम सभा, संरक्षित वन क्षेत्र और कैमूर वन्य जीव विहार की करीब 24,000 एकड़ भूमि पर कब्जा कर लिया है।...जारी

(यह रिपोर्ट मासिक पत्रिका "ऑल राइट्स" के फरवरी 2013 अंक में प्रकाशित हो चुकी है)

उप्र सरकार ने जेपी समूह को मुफ्त में दे दी 4283 बीघा वन भूमि

“द पब्लिक लीडर” के पास उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड ने 2007 की शुरुआत में वन बंदोबस्त अधिकारी अधिकारी, ओबरा (सोनभद्र) के पास कोटा, पड़रछ, पनारी, मकरीबारी, डाला, बारी और मारकुंडी में स्थित खनन पट्टों के तहत आने वाली और भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 के तहत अधिसूचित भूमि को निकालने के लिए विभिन्न केस संख्या-354/2007 दाखिल किया, जबकि उच्चतम न्यायालय के आदेशों के तहत इन वन ग्रामों की बंदोबस्त प्रक्रिया करीब एक दशक पहले ही पूर्ण हो चुकी थी। तत्कालीन वन बंदोबस्त अधिकारी ने 5 फरवरी, 2007 को केस संख्या-354/2007 यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उच्चतम न्यायालय के आदेशों के मुताबिक विवादित वन वंदोबस्त अधिकारी और अपीलीय अधिकारी के रूप में नियुक्त अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने विवादित भूमि को संरक्षित वन भूमि दर्ज किया है। इसलिए यह मामला इस न्यायालय के अधिकार के बाहर है। 

जय प्रकाश एसोसिएट्स ने इस फैसले के खिलाफ सोनभद्र के जिला न्यायाधीश के यहां अपील की, जिन्होंने 29 मई, 2007 को इस मामले को पुनः वन बंदोबस्त अधिकारी, ओबरा (सोनभद्र) के पास भेज दिया और कंपनी के दावे को स्वीकार करने योग्य बताया। इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने भी जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड का ही पक्ष लिया, जबकि उत्तर प्रदेश वन विभाग ने कंपनी के दावे का पुरजोर विरोध किया था। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सोनभद्र के तत्कालीन जिलाधिकारी राजेश्वर प्रसाद सिंह ने वन बंदोबस्त अधिकारी, ओबरा के सामने 5 फरवरी, 2007 को लिखित अपने बयान में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के पक्ष को सही ठहराया है।

पत्र में उन्होंने साफ लिखा है कि विवादित भूखण्ड कभी भी वन भूमि नहीं रही। उन्होंने यह भी लिखा है कि विवादित भूखण्ड पहाड़ी के रूप में है, जिसका खनन कार्य हेतु पट्टा समय-समय पर किया जाता रहा है। इसके बावजूद अनियमित रूप से उक्त भूखण्ड को भी भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 में शामिल कर लिया गया है। 
गौरतलब है कि राज्य सरकार के दस्तावेजों के अनुसार यूपीएससीसीएल और यूपीएसएमडीसी के खनन पट्टे की 1399.583 हेक्टेयर भूमि भावअ की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी, जिसे उन्हें एक निश्चित समय के लिए पट्टे पर दिया गया था। उच्चतम न्यायालय के आदेशों के अनुसार, इनमें से करीब 1094 हेक्टेयर वन भूमि पर खनन कार्य के लिए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की ओर से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेना आवश्यक है। ऐसा नहीं की वजह से यूपीएससीसीएल और यूपीएसएमडीसी के पक्ष में खनन पट्टों का नवीनीकरण नहीं हो पाया था और मामला अभी लंबित है। इसके बावजूद जिलाधिकारी राजेश्वर प्रसाद सिंह ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर राज्य सरकार के पक्ष को वन बंदोबस्त अधिकारी, ओबरा के सामने रखा, जबकि उन्होंने कानून के प्रावधानों के तहत सक्षम अधिकारी से अनुमति नहीं ली थी।

दस्तावेजों पर गौर करें तो वन बंदोबस्त अधिकारी, ओबरा, वीके श्रीवास्तव ने जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड की ओर से भारतीय वन अधिनियम की धारा-9 और 11 के तहत दाखिल सात मामलों भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचित 1083.231 हेक्टेयर भूमि कंपनी के पक्ष में निकाल दी।वीके श्रीवास्तव ने 19 सितंबर, 2007 को केस संख्या-180/353 (कोटा) में 27.824 हेक्टेयर और केस संख्या-181/354(कोटा) में 210.056 हेक्टेयर, 28 नवंबर, 2007 को केस संख्या 386/388(कोटा) में 18.268 हेक्टेयर, 5 दिसंबर, 2007 को केस संख्या-395/397 (कोटा-पड़रछ) में 273.018 हेक्टेयर और केस संख्या-396/398(पनारी-निंगा) में 70.045 हेक्टेयर, 7 जनवरी, 2008 को केस संख्या-399/401 (मकरीबारी) में 230.844 हेक्टेयर और 25 जनवरी, 2008 को केस संख्या-398/400 (मारकुंडी-गुरमा) में 253.176 हेक्टेयर भूमि भावअ की धारा-4 से अलग कर दी। इन सात मामलों में पांच मामलों की पुष्टि सोनभद्र के तत्कालीन जिला न्यायाधीश ने भी अपने आदेशों में की है। केस संख्या-398/400 (मारकुंडी-गुरमा) में निष्कासित 253.176 हेक्टेयर भूमि में कैमूर वन्यजीव विहार की भूमि भी शामिल है।

वन बंदोबस्त अधिकारी वीके श्रीवास्तव ने 1987 में भावअ. की धारा-20 के तहत अधिसूचित 399.51 हेक्टेयर संरक्षित वन क्षेत्र में से 230.844 हेक्टेयर वन भूमि को भी जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के पक्ष में गैरकानूनी ढंग से निकाल दिया है, जिसकी पुष्टि उच्चतम न्यायालय के आदेश के तहत अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने भी नहीं की LrLथी। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की जांच रिपोर्ट के अंशों पर गौर करें तो वन बंदोबस्त अधिकारी वीके श्रीवास्तव उपरोक्त मामलों की सुनवाई नहीं कर सकते थे। वे केवल उन 12 गांवों के मामले की सुनवाई कर सकते थे, जिसके लिए राज्य सरकार ने 21 जुलाई, 1995 को जारी आदेश में सहायक अभिलेख अधिकारी शिव बक्श लाल को विशेष वन बंदोबस्त अधिकारी, सोनभद्र नियुक्त किया था। हालांकि इसके लिए भी शासन की ओर से उनकी नियुक्ति होनी चाहिए।...जारी

(यह रिपोर्ट मासिक पत्रिका "ऑल राइट्स" के फरवरी 2013 अंक में प्रकाशित हो चुकी है)

उत्तर प्रदेश सरकार ने मजदूरों के सीने पर चलवाई थी गोलियां

“द पब्लिक लीडर” के पास मौजूद दस्तावेजों के अनुसार, उच्चतम न्यायालय के उपरोक्त आदेश के अनुपालन में उत्तर प्रदेश सरकार ने 17 फरवरी 1995 को कार्यालय ज्ञाप संख्या-52/(49)/90-244/90-रा-14 निर्गत कर जिलाधिकारी/अभिलेख अधिकारी, सोनभद्र को 12 ग्रामों में भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचित 26,947 एकड़ भूमि की सर्वे क्रियाओं के संपादन के लिए विशेष अधिकारी नामित किया। इस आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए उत्तर प्रदेश शासन के राजस्व अनुभाग-14 के विशेष सचिव डॉ, सूर्य प्रसाद ने 21 जुलाई, 1995 को ऑफिस मेमोरंडम संख्या-52/(49)/90-244/90-रा-14 के माध्यम से सोनभद्र के सहायक अभिलेख अधिकारी शिव बक्श लाल को उपरोक्त 12 ग्रामों में विवादित भूमि के सर्वे क्रियाओं के संपादन के लिए विशेष अधिकारी नामित कर दिया। इससे यह साफ हो जाता है कि उच्चतम न्यायालय के आदेशों के तहत महेश्वर प्रसाद कमेटी की सिफारिशों में शामिल 433 गांवों में से 421 गांवों की वन बंदोबस्त प्रक्रिया समाप्त हो चुकी थी। सहायक अभिलेख अधिकारी शिव बक्श लाल बतौर विशेष वन बंदोबस्त अधिकारी केवल 12 ग्रामों से जुड़ी हुई आपत्तियों के मामले में ही सुनवाई कर सकते थे। 

उच्चतम न्यायालय में सीईसी के सदस्य सचिव एमके जीवराजका की ओर से दाखिल संस्तुतियों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के अनुसार यूपी एस सी सी एल के 2168.828 हेक्टेयर भूमि पर स्थित खनिज पट्टों के अलावा भलुआ, जुलगुल और बारी गांवों की 1698.008 हेक्टयर भूमि पर उत्तर प्रदेश राज्य खनिज विकास निगम (यूपीएसएमडीसी) के भी खनन पट्टे थे, जिसमें 396.017 हेक्टेयर भूमि भावअ की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी। इस तरह कोटा (कजरहट), गुरमा (मारकुंडी-मकरीबारी), पनारी (निंघा), भलुआ, जुलगुल और बारी गांवों की 3866.836 हेक्टेयर भूमि पर यूपीएससीसीएल और यूपीएसएमडीसी के खनन पट्टे थे, जिसमें से 1399.583 हेक्टेयर भूमि भावअ की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी। कैमूर सर्वे एजेंसी की वन बंदोबस्त प्रक्रिया के दौरान भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचित और खनन लीज में आने वाली 1399.583 हेक्टेयर भूमि में से करीब 237 हेक्टेयर भूमि संरक्षित वन क्षेत्र से निकाल दी गई थी। शेष संरक्षित वन क्षेत्र में से करीब 68 हेक्टेयर वन भूमि भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तहत अधिसूचित कर दी गई थी। 1094.583 हेक्टेयर वन भूमि के लिए भी भा.व.अ. की धारा-20 के तहत अधिसूचना जारी करने के लिए प्रक्रिया शुरू की गई थी लेकिन मामला उच्चतम न्यायालय में लंबित होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया।

उधर, यूपीएससीसीएल की हालत खस्ताहाल हो गई। राज्य सरकार के नुमाइंदों की लापरवाही के कारण करोड़ों रुपये का फायदा देने वाली डाला, चुर्क और चुनार स्थित सीमेंट फैक्ट्रियां करोड़ों रुपये के घाटे में चली गईं। राज्य सरकार ने उन्हें बंद करने और कर्मचारियों को बेरोजगार करने की कवायद शुरू कर दी, जिसके विरोध में मजदूर संगठनों ने जमकर प्रदर्शन किया। जवाब में राज्य पुलिस के नुमाइंदों ने उनपर गोलियां दागीं और नौ मजदूरों मारे गए। मजदूर संगठनों ने उनकी याद में डाला स्थित यूपीएससीसीएल फैक्ट्री के सामने शहीद स्मारक बनवाया जो आज भी मजदूरों के ऊपर राज्य सरकार के जुल्मों की दास्तां को बयां करता है। 

यूपीएससीसीएल 1996 में 380 करोड़ रुपये से ज्यादा के घाटे में चली गई। मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंच गया। औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) ने 2 जुलाई, 1997 को ऑफिसियल लिक्विडेटर के जरिए यूपीएससीसीएल को बेचने की राय दी जो उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में 17 जुलाई, 1997 को कंपनी आवेदन संख्या-4/1997 के रूप में दर्ज हुआ। सभी पक्षों को सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने 8 दिसंबर, 1999 को कंपनी को बंद करने का आदेश दिया और कंपनी के लिक्विडेटर की नियुक्ति की। उच्च न्यायालय के इस आदेश से करीब 6000 कर्मचारी बेरोजगार हो गए।

कई असफल कदमों के बाद 8 अगस्त, 2005 को यूपीएससीसीएल की संपत्तियों की बिक्री के लिए समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित हुआ। चार कंपनियों मेसर्स जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (जेएएल), मेसर्स डालमिया सीमेंट (भारत) लिमिटेड, मेसर्स लफार्ज (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड और मेसर्स ग्रासिम इंडस्ट्रीज लिमिडट की निविदाओं को 4 अक्टूबर, 2005 को खोला गया। जय प्रकाश एसोसिट्स लिमिटेड (जेएएल) की 459 करोड़ रुपये की निविदा सबसे अधिक थी। दूसरे स्थान पर मेसर्स डालमिया सीमेंट (भारत) लिमिटेड की 376 करोड़ रुपये और तीसरे स्थान पर मेसर्स लफार्ज (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड की 271 करोड़ रुपये की निविदाएं थीं। जेएएल की 359 करोड़ रुपये की निविदा को उच्च न्यायालय, इलाहाबाद ने 30 जनवरी, 2006 को स्वीकृति प्रदान की। जेएएल ने निविदा की 25 फीसदी धनराशि जमा की और शेष धनराशि को तीन किस्तों में भुगतान करने की पेशकश की। धनराशि का भुगतान होने पर उच्च न्यायालय, इलाहाबाद ने 11 अक्टूबर, 2006 को जेएएल के पक्ष में यूपीएससीसीएल की बिक्री की पुष्टि कर दी। इसके बाद उच्च न्यायालय, इलाहाबाद के आदेश की आड़ में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड और राज्य सरकार के नुमाइंदों का खेल शुरू हो गया।...जारी 

 (यह रिपोर्ट मासिक पत्रिका "ऑल राइट्स" के फरवरी 2013 अंक में प्रकाशित हो चुकी है)

सुप्रीम कोर्ट के आदेश बाद भी नहीं मिला आदिवासियों का हक 

उच्चतम न्यायालय में उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग के तत्कालीन संयुक्त सचिव बीके सिंह यादव द्वारा पेश दस्तावेजों के अनुसार राज्य सरकार द्वारा गठित महेश्वर प्रसाद कमेटी ने तत्कालीन मिर्जापुर जनपद के कैमूर क्षेत्र के दक्षिण में 433 गांवों को इस मामले से जुड़ा हुआ पाया था, जिनमें शीर्ष अदालत के आदेशों के अनुसार वन बंदोबस्त की प्रक्रिया पूर्ण की जानी थी। इनमें से 299 गांव दुद्धी तहसील में थे जबकि शेष 134 गांव राबर्ट्सगंज तहसील में थे। 

विवादित इलाका 9 लाख 23 हजार 293 एकड़ का था, जिसमें से 58 हजार 937.42 एकड़ भूमि भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तहत संरक्षित वन घोषित हो चुकी थी। शेष 7 लाख 89 हजार 86 एकड़ भूमि भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी। इसी इलाके के खम्हरिया, परबतवा, झीलोटोला, डोहडर और जरहा गांवों में नेशनल थर्मल पॉवर कॉर्पोरेशन (एनटीपीसी) की रिहंद सुपर थर्मल पॉवर प्लांट के राख निष्पादन के लिए जरूरी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया भी उच्चतम न्यायालय के आदेशों के तहत आ गई थी। इस मामले में शीर्ष अदालत ने 8 फरवरी, 1989 को साफ निर्देश दिया कि भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 के तहत अधिसूचित भूमि वन संरक्षण अधिनियम-1980 की धारा-2 के तहत आती है। इसलिए एनटीपीसी के लिए आवश्यक है कि वह उक्त अधिनियम के प्रावधानों के तहत सक्षम अधिकारी से अनापत्ति प्रमाण-पत्र हासिल करे।

उच्चतम न्यायालय के आदेशों के तहत विशेष वन बंदोबस्त अधिकारियों ने स्थानीय लोगों के दावे प्राप्त किये और उन दावों की जांच की। उसके बाद उन्होंने सभी आवश्यक दस्तावेज अपने इलाके के अपीलीय अधिकारी के रूप में तैनात अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों के सामने रखे। उन्होंने प्राप्त दावों और आवश्यक दस्तावेजों की जांच की और अपना फैसला सुनाया। समय-समय पर राज्य सरकार ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों के आदेशों के अनुरूप वन बंदोबस्त प्रक्रिया पूर्ण होने की अधिसूचना जारी की। अगर उच्चतम न्यायालय के 16 फरवरी, 1993 के आदेश पर गौर करें तो न्यायमूर्ति बीएल लूम्बा ने अपनी सातवीं रिपोर्ट में 17 वन गांवों में जारी वन बंदोबस्त प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए थे, जिनमें छतरपुर, नगवां, गोइठा, गुलालहरिया, जामपानी, कुदरी, धूमा, घघरी, सुखरा, किरबिल, सुपाचुआं, सांगोबांध, नौडीहा, जरहा, मधुवन, बैलहत्थी और करहिया गांव शामिल थे।

इस मामले में उच्चतम न्यायालय के आदेशों पर गौर करें तो साल 1994 में कैमूर सर्वे की वन बंदोबस्त प्रक्रिया के तहत आने वाले 433 गांवों में से 421 गांवों की वन बंदोबस्त प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इन गांवों में कोटा और ओबरा(पनारी) के वे गांव भी शामिल थे, जिनमें यूपीएससीसीएल और उत्तर प्रदेश राज्य खनिज विकास निगम (यूपीएसएमडीसी) की खनन वे लीजें स्थित थीं जो जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड को हस्तांतरित की गई हैं। शेष 12 गांवों में स्थित भूमि की बंदोबस्त प्रक्रिया जारी थी।
उच्चतम न्यायालय ने 18 जुलाई, 1994 के आदेश में कहा था, “13 मई, 1994 को इस न्यायालय के आदेश के अनुसार केवल एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश काम कर रहे हैं। हम निर्देश देते हैं कि वे 30 सितंबर, 1994 तक काम करते रहेंगे और उस तिथि तक वे सभी अपीलों और याचिकाओं की सुनवाई संपन्न कर लेंगे। हम समझते हैं कि कैमूर सर्वे एजेंसी की शेष इकाई को बनाए रखने की कोई वजह नहीं है। हम 1 अगस्त, 1994 से उन इकाइयों को बंद करने का निर्देश देते हैं।...न्यायमूर्ति लूम्बा ने अपनी 14वीं रिपोर्ट में उद्धत किया है कि भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचित 12 गांवों की लगभग 26,947 एकड़ भूमि उत्तर प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम की धारा-54 के तहत है। हम उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व सचिव को निर्देश देते हैं कि वह ऐसे विशेष अधिकारियों की नियुक्ति करे जो 20 नवंबर, 1986 के आदेश के आलोक में इस विवादित भूमि के विवाद का समाधान करे।...हम राजस्व सचिव को यह भी निर्देश देते हैं कि वह विभिन्न अपीलों में अनुभवी अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों के निर्णयों और विचारों को लागू करें।...हम इस केस की प्रक्रिया को बंद करते हैं। हालांकि हम विभिन्न पक्षों को यह अधिकार देते हैं कि जब भी आवश्यक हो, वे जरूरी दिशा-निर्देशों के लिए इस अदालत के पास आ सकते हैं।”......जारी
(यह रिपोर्ट मासिक पत्रिका "ऑल राइट्स" के फरवरी, 2013 के अंक में प्रकाशित हो चुकी है।)

देश आजाद हुआ पर आदिवासी नहीं
उन्नीस सौ सैतालिस में 15 अगस्त को देश अंग्रेजों की गुलामी से भले ही आजाद हो गया हो लेकिन जंगलों और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के लिए गुलामी का दौर उसी दिन से शुरू हो गया था। उत्तर प्रदेश के जंगली इलाकों में आजाद आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के लिए भी ऐसा ही था।
"द पब्लिक लीडर" के पास मौजूद दस्तावेजों के अनुसार उत्तर प्रदेश में वर्ष-1950 में जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार कानून अस्तित्व में आया जो कैमूर वन क्षेत्र के दक्षिण में स्थित मिर्जापुर (अब सोनभद्र) जिले की दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसीलों में दो हिस्सों में लागू हुआ। कुछ हिस्सों में यह कानून 30 जून, 1953 को लागू हुआ तो कुछ हिस्सों में 1 जुलाई, 1954 को। हालांकि राज्य सरकार ने आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों वाले इलाके यानी वन क्षेत्रों को 1952 में ही अपने कब्जे में ले लिया था। इसमें वन ग्राम, पहाड़, नदी, तालाब आदि शामिल थे। राज्य सरकार ने 11 अक्टूबर, 1952 को अधिसूचना जारी कर राज्य की समस्त जंगल भूमि को प्रबंधन के लिए उत्तर प्रदेश वन विभाग को सौंप दिया, जिससे अंग्रेजों के जमाने में जंगलों में आजाद जीवन व्यतीत करने वाले आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों की जिंदगी पर पहरा लग गया। इसकी जद में दुद्धी क्राउन स्टेट का इलाका भी आ गया, जिसमें तत्कालीन मिर्जापुर जिले की दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसीलों की लाखों एकड़ वन भूमि और इस पर आबाद सैंकड़ों वन ग्राम शामिल थे। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इस इलाके में मौजूद खनिज संपदा को ध्यान में रखते हुए चुर्क और डाला सीमेंट फैक्ट्रियों की स्थापना की। हालांकि यह यहां के मूल बाशिंदों के लिए बहुत ज्यादा लाभकारी साबित नहीं हुआ। 1 जनवरी, 1967 को राज्य की कांग्रेस सरकार ने दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसील की सात लाख नवासी हजार एकड़ वन भूमि भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचित कर दी। इससे इस इलाके में आबाद सैकड़ों वन ग्रामों के हजारों आदिवासियों का जमीनी अधिकार छीन गया और लोग अपने हक की मांग को लेकर मुखर होने लगे। अक्सर वन विभाग के अधिकारियों से अनका विवाद होता रहता। 

दस्तावेजों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 अप्रैल, 1972 को उत्तर प्रदेश राज्य सीमेंट निगम लिमिटेड (यूपीएससीसीएल) नामक कंपनी का निर्माण किया और हस्तांतरण विलेख (ट्रांसफर डीड) के माध्यम से चुर्क और डाला सीमेंट फैक्ट्रियों की समस्त संपत्ती उसे हस्तांतरित कर दी। साथ ही राज्य सरकार ने 24 अक्टूबर, 1973 को यूपीएससीसीएल को कोटा ग्राम की 815.828 हेक्टयर भूमि 20 वर्षों के लिए खनन पट्टे पर दे दिया, जिसमें 380.635 हेक्टयर भूमि भारतीय वन अधिनियम (भा.व.अ.) की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी। यह खनन पट्टा 1 मई, 1976 से 30 अप्रैल, 1996 तक दिया गया था। 19 जनवरी, 1973 को राज्य सरकार ने यूपीएससीसीएल को दूसरा खनन पट्टा बीस वर्षों के लिए बिल्ली मारकुंडी और मकरीबारी ग्राम की 1266 हेक्टेयर भूमि पर आबंटित किया, जिसमें 552.603 हेक्टेयर भूमि भा.व.अ. की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी। इसकी अवधि 27 सितंबर, 1978 से 26 सितंबर, 1998 तक थी। इसके अलावा सरकार ने 24 अक्टूबर, 1974 को पनारी (निंघा) ग्राम की 87 हेक्टेयर भूमि पर 10 वर्षों के लिए खनन पट्टा कंपनी को आबंचित किया जिसमें 70.328 हेक्टेयर भूमि भा.व.अ. की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी। इसकी अवधि 19 अप्रैल, 1982 से 18 अप्रैल, 1992 तक थी। इस तरह राज्य सरकार ने यूपीएससीसीएल को उपरोक्त गांवों में कुल 2168.828 हेक्टेयर भूमि खनन पट्टे के रूप में आवंटित की, जिसमें 1003.566 हेक्टेयर भूमि भा.व.अ. की धारा-4 के तहत अधिसूचित थी। 

जैसे-जैसे राज्य सरकार इस प्रकार की सुधारात्मक कदमों को उठा रही थी, वैसे-वैसे इन इलाकों के आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों की मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं। 25 अक्टूबर, 1980 को वन संरक्षण अधिनियम-1980 प्रभाव में आया, जिसके बाद भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 और धारा-20 के तहत अधिसूचित वन भूमि पर खनन अथवा अन्य गैर-वानिकी कार्य के लिए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंतालय से अनुमति लेना अनिवार्य हो गया। भारतीय वन अधिनियम और वन संरक्षण अधिनियम के लागू होने से तत्कालीन मिर्जापुर के दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसीलों के वन क्षेत्रों में निवास करने वाले आदिवासियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों की मुसीबतें और बढ़ गईं। वन विभाग के नुमाइंदे वन ग्रामों में रहने वाले लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज कर उन्हें उनकी पुस्तैनी जमीनों से बेदखल करने लगे। इलाके के मूल बाशिंदों की समस्याओं से चिंतित म्योरपुर स्थित बनवासी सेवा आश्रम के प्रेम भाई ने 1982 में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई। उच्चतम न्यायालय ने बनवासी सेवा आश्रम के पत्र को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया और मामले पर सुनवाई शुरू की। उच्चतम न्यायालय के आदेश पर राज्य सरकार ने गठित महेश्वर प्रसाद कमेटी का गठन किया। कमेटी ने विवादित क्षेत्र पर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार और उच्चतम न्यायालय को सौंपी। 

इस मामले में विभिन्न पक्षों को सुनने के बाद उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पीएन भगवती की पीठ ने 20 नवंबर, 1986 को ऐतिहासिक फैसला दिया, जिसके आधार पर मिर्जापुर जनपद के कैमूर वन क्षेत्र के दक्षिण में स्थित दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसीलों की वन भूमि का सर्वे और उसकी बंदोबस्त प्रक्रिया शुरू हुई। उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार, भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तहत अधिसूचित वन भूमि को जनहित याचिका का अंश नहीं बनाया गया था, जिसके कारण इससे जुड़े मामलों पर कोई सुनवाई नहीं होनी थी। शीर्ष अदालत ने वन अधिकारियों को आदेश दिया था कि वे 1 दिसंबर, 1986 से छह हफ्तों के भीतर भारतीय वन अधिनियम की धारा-4 के तहत अधिसूचित भूमि की पहचान कर उसका सीमांकन करें। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी आदेश दिया कि वे अदालत के दिशा-निर्देशों को बड़े पैमाने पर प्रचारित-प्रसारित करें और 15 जनवरी, 1987 से तीन महीनों के अंदर भारतीय वन अधिनियम की धारा-6 (सी) के तहत स्थानीय लोगों के दावे स्वीकार करें। इसके अलावा न्यायालय ने 31 दिसंबर, 1986 तक पर्याप्त संख्या में भूलेख अधिकारियों की नियुक्ति करने का आदेश राज्य सरकार को दिया। शीर्ष अदालत ने यह भी आदेश दिया राज्य सरकार दुद्धी तहसील के दुद्धी, म्योरपुर, किरबिल और राबर्ट्सगंज तहसील के राबर्ट्सगंज तथा तेलगुड़वा स्थानों पर पांच अनुभवी अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति करे जो उच्च न्यायालय इलाहाबाद की ओर से मुहैया कराए जाएंगे। 

राज्य सरकार उनकी सहायता के लिए पर्याप्त संख्या में उन्हें सहायक और कर्मचारी मुहैया कराएगी। सभी अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों को भारतीय अधिनियम की धारा-17 के तहत प्रदत्त अपीलीय अधिकारी का अधिकार होगा। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी लिखा कि वन बंदोबस्त अधिकारी प्राप्त दावों की जांच करेंगे और उससे संबंधित आवश्यक दस्तावेज इलाके के अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों के सामने रखेंगे। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश इन दस्तावेजों की पड़ताल अपीलीय अधिकारी के रूप में करेंगे और उनके द्वारा दिया गया आदेश भारतीय वन अधिनियम के प्रावधानों के तहत अपेक्षित आदेश होगा। यदि अपीलीय अधिकारी प्राप्त दावे को स्वीकृति प्रदान कर देता है तो राज्य सरकार उस निर्णय का सम्मान करेगी और उसे लागू करेगी।.......जारी 

( यह रिपोर्ट मासिक पत्रिका "ऑल राइट्स" के फरवरी अंक में प्रकाशित हो चुकी है।)
(देश में हर तरफ प्राकृतिक संपदा की लूट मची है। कोई जमीन भेद रहा है तो कोई पाताल। आकाश की धूप और हवा भी अछूती नहीं है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, ओडिशा, गोवा आदि राज्यों के विभिन्न इलाकों में जिस तरह से कोयला, लौह अयस्क, डोलो स्टोन, लाइम स्टोन (चूना पत्थर), सैंड स्टोन, बालू, मोरम आदि खनिज पदार्थों के अवैध दोहन का मामला बीते सालों में सामने आया है, उससे लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए हैं। इससे ना केवल भारतीय वन अधिनियम, वन संरक्षण अधिनयम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भारतीय खान ब्यूरो आदि के मानकों का उल्लंघन हुआ है, बल्कि इसने आम आदमी के अधिकारों के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के आदेशों और संविधान के मूल्यों पर भी हमला बोला है। 2जी स्पेक्ट्रम आबंटन, कोयला ब्लॉक आबंटन और केजी बेसीन मामले ने तो देश के शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली पर ही सवाल खड़ा कर दिए। इन हालात में आम आदमी के लिए ईमानदारी से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना किसी जंग जीतने के बराबर है। एक तरफ वह जहां देश के विभिन्न कानूनों के अनुपालन में तिल-तिल मर रहा है, वहीं दूसरी ओर पूंजीपति और उद्योगघराने कानूनों की धज्जियां उड़ाते जा रहे हैं। उनके इस कार्य में सत्ता के गलियारों में बैंठे कुछ सियासतदां और भ्रष्ट नौकरशाह हाथ बंटाते हैं। यहां तक कि वे कानून के विभिन्न प्रावधानों के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के आदेशों और संवैधानिक मूल्यों की अह्वेलना करने से भी बाज नहीं आते। उत्तर प्रदेश में एक उद्योगघराने और सत्ता में काबिज नुमाइंदों की ऐसी ही सांठगांठ की पोल खोलती यह रिपोर्टः)
देश में वनाधिकार कानून-2006 लागू है। फिर भी लाखों आदिवासी एवं वन निवासी भूमि के अधिकार से वंचित हैं। वे सरकारी नुमाइंदों के दरवाजे खटखटा रहे हैं लेकिन उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। वे उन्हें भारतीय वन अधिनियम-1927 और वन संरक्षण अधिनयम-1980 सरीखे कानूनों की अनेक धाराओं में फंसाकर जेलों की कालकोठरी में ठूंस रहे हैं। दूसरी ओर, केंद्र और राज्य की सरकारें पूंजीपतियों और उद्योगघरानों को जंगल और ग्रामसभा की हजारों एकड़ जमीनें खैरात में बांट रही हैं। उत्तर प्रदेश में शासन करने वाली राजनीतिक पार्टियों की सरकारों ने तो एक निजी उद्योगघराने को जंगल और कैमूर वन्यजीव विहार की भूमि देने के लिए भारतीय वन अधिनयम, वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के आदेशों को भी नजरअंदाज कर दिया। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) और विंध्याचल मंडल के तत्कालीन आयुक्त सत्यजीत ठाकुर की ओर से गठित टीम की अलग-अलग जांच रिपोर्टों के दस्तावेजों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन वन बंदोबस्त अधिकारी वीके श्रीवास्तव (अब सहायक अभिलेख अधिकारी, मिर्जापुर) ने वर्ष 2007-08 में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के पक्ष में जंगल और कैमूर वन्यजीव विहार की 1083.231 हेक्टेयर (करीब 4283.238 बीघा) भूमि उच्चतम न्यायालय के आदेशों के विपरीत निकाल दी। राज्य की पूर्ववर्ती बहुजन पार्टी की सरकार ने इस पर मुहर लगाते हुए अधिसूचना भी जारी कर दिया और अपनी कारगुजारियों को अमलीजामा पहनाने के लिए उच्चतम न्यायालय में अपील भी दायर की है। उच्चतम न्यायालय में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय (मध्य क्षेत्र), लखनऊ के वन संरक्षक वाईके सिंह चौहान की ओर से दाखिल हलफनामे पर गौर करें तो इससे सरकार को एनपीवी (नेट प्रजेंट वैल्यू) और अन्य मदों के रूप में करीब चार सौ नौ करोड़ नौ लाख रुपये की हानि हुई है। अगर स्थानीय लोगों के लिखित आरोपों पर विश्वास करें तो उत्तर प्रदेश सरकार के नुमाइंदों ने जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के पक्ष में कोटा, पड़रछ, पनारी, मकरीबारी और मारकुंडी वन क्षेत्र की 24,000 हेक्टेयर भूमि निकाल दी है और वह इस पर गैरकानूनी ढंग से अवैध निर्माण और खनन कार्य कर रहा है। 

वास्तव में यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश राज्य सीमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीएससीसीएल) के अधीन चुर्क, डाला और चुनार सीमेंट फैक्ट्रियों की बिक्री और उसकी संपत्तियों के अधिग्रहण से जुड़ा हुआ है जो मिर्जापुर-सोनभद्र के जंगली और पहाड़ी इलाकों में स्थित हैं। नब्बे के दशक में कंपनी को करोड़ों रुपये का घाटा हुआ और मामला उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में पहुंच गया। उच्च न्यायालय के आदेश के आदेश पर 8 दिसंबर, 1999 को तीनों फैक्ट्रियों को बंद कर दिया गया और ऑफिसियल लिक्विडेटर की सहायता से इनकी संपत्तियों को वर्ष-2006 में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड को चार सौ उनसठ करोड़ रुपये में बेच दिया गया। यूपीएससीसीएल की संपत्तियों की वैश्विक निविदा में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड ने चार सौ उनसठ करोड़ रुपये की सबसे बड़ी बोली लगाई थी। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के वन संरक्षक (मध्य क्षेत्र) वाईके सिंह चौहान, सीईसी के सदस्य सचिव एमके जीवराजका, विंध्याचल मंडल के तत्कालीन आयुक्त सत्यजीत ठाकुर के उपरोक्त दावों और स्थानीय लोगों आरोपों को समझने के लिए मिर्जापुर (अब सोनभद्र) जिले की दुद्धी और राबर्ट्सगंज तहसीलों में स्थित वन क्षेत्रों के संबंध में भारतीय वन अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों की जारी अधिसूचना, उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी विभिन्न आदेशों और संपन्न वन बंदोबस्त प्रक्रिया के संक्षिप्त इतिहास को समझने की जरूरत है।..........जारी

(यह रिपोर्ट मासिक पत्रिका "ऑल राइट्स" के फरवरी 2013 अंक में प्रकाशित हो चुकी है)


लेख स्त्रोत:-
द पब्लिक लीडर मीडिया ग्रुप, 
राबर्ट्सगंजसोनभद्रउत्तर प्रदेश
ई-मेल:thepublicleader@gmail.com, 

मोबाइल-09910410365

जेपी समूह के हाथों की कठपुतली बना यूपी का पंचम तल

written by Shiv Das 

डाला में जेपी समूह के खिलाफ प्रदर्शन करते लोग।

वे जनता के सेवक हैं लेकिन हुक्म बजाते हैं उद्योग घरानों का। जेपी समूह के संबंध में उत्तर प्रदेश की खाकी, खादी और लालफीताशाही की कार्यशैलियों से तो यही पता चलता है। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में तत्कालीन वन बंदोबस्त अधिकारी वीके श्रीवास्तव (अब सहायक अभिलेख अधिकारी, मिर्जापुर) ने जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (जेएएल) नामक निजी कंपनी के पक्ष में वन विभाग की 1083 हेक्टेयर (करीब 2483 बीघा) से ज्यादा संरक्षित वन भूमि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के खिलाफ निकाल दी लेकिन उनके खिलाफ सत्ता में काबिज राजनीतिक पार्टी के नुमाइंदों ने कोई कार्रवाई नहीं की। इतना ही नहीं, उनके कारनामों को अमलीजामा पहनाने के लिए उत्तर प्रदेश की पूर्व बसपा सरकार ने अधिसूचना भी जारी कर दी। हालांकि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण उनके मंसूबे अभी भी कानूनी दांवपेच में उलझे पड़े हैं लेकिन संरक्षित वन भूमि पर कब्जा करने का जेपी समूह का सिलसिला रुका नहीं है। वह जिला प्रशासन के सहयोग से चोरी-छिपे अब भी जारी है। ऐसा हो भी क्यों नहीं? जब पंचम तल में विराजमान सूबे की सरकार के खास नुमाइंदे उसके इस मंसूबे को अंजाम देने में जुटे हैं। इनमें कई तो पूर्व की बसपा सरकार में जेपी समूह के कारनामों को संरक्षण देने वाले भी हैं। इनमें से एक हैं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के विशेष सचिव पनधारी यादव। यादव ने सोनभद्र जिले के जिलाधिकारी के रूप में जेपी समूह को संरक्षित वन भूमि और ग्राम सभा की विवादित जमीन पर जमकर कब्जा कराया। इस कार्य में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के दिशा-निर्देशों को भी नजर अंदाज कर दिया। 
केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति, देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान और विंध्याचल मंडलआयुक्त की अलग-अलग जांच रिपोर्टों में जब मामला सामने आया तो राज्य सरकार ने जेएएल के पक्ष में संरक्षित वन क्षेत्र से निष्कासित जमीन को कानूनीजामा पहनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी । साथ ही उसने हाई कोर्ट के आदेश के अनुपालन की आड़ में जेपी समूह को संरक्षित वन क्षेत्र और ग्राम सभा की हजारों एकड़ भूमि पर कब्जा करने की छूट दे दी। निजी कंपनी के इस कार्य में सोनभद्र और मिर्जापुर जिला प्रशासन के नुमाइंदों ने जमकर सहयोग किया। 

उन्होंने सोनभद्र के डाला स्थित मलिन बस्ती के बाशिंदों को बेघर करने के लिए केवल लाठियां ही नहीं भांजी बल्कि उन्हें कालकोठरी की हवा खिलाने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मिर्जापुर के चुनार में जेपी समूह के खिलाफ बोलने वाले को तो कई दिनों तक जेल की सलाखों के पीछे रहना प़ड़ा था। आदिवासी बहूल सोनभद्र और मिर्जापुर जिलों में जेपी के आतंक का खौफ इस कदर है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी अथवा राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक पार्टियों का नुमाइंदा उसके खिलाफ बोलने की कोशिश तक नहीं करता।

अगर सोनभद्र जिला प्रशासन के कुछ नुमाइंदों की कारगुजारियों पर गौर करें तो उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के निर्देशों पर अमल करना मुनासिब नहीं समझा और जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड की कारगुजारियों को ही सही ठहराते रहे। जबकि विंध्याचल के तत्कालीन मंडलायुक्त सत्यजीत ठाकुर, अतिरिक्त आयुक्त (प्रशासन) डॉ. डीआर त्रिपाठी, संयुक्त विकास आयुक्त एस.एस. मिश्रा और विंध्याचल डिविजन के वन संरक्षक आर.एन. पांडे ने अपनी संयुक्त जांच रिपोर्ट (अंतरिम) में जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड को हस्तांतरित की गई संरक्षित वन भूमि के लिए वन बंदोबस्त अधिकारी वीके श्रीवास्तव को दोषी ठहराया है। संयुक्त जांच टीम ने श्रीवास्तव के खिलाफ दंडनात्मक और आपराधिक कार्रवाई करने की संस्तुति भी की है। 

मामला उत्तर प्रदेश वन विभाग से संबंधित होने की वजह से विंध्याचल मंडल के तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्त (प्रशासन) जीडी आर्य ने 27 नवंबर, 2008 को विंध्याचल डिविजन के मुख्य वन संरक्षक को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने मामले में कार्रवाई करने की बात कही थी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के वन संरक्षक (मध्य क्षेत्र) वाई.के. सिंह चौहान की ओर से सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) के सदस्य सचिव एमके जीवराजका को प्रेषित पत्र पर गौर करें तो तत्कालीन वन बंदोबस्त अधिकारी वीके श्रीवास्तव ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के खिलाफ राजस्व अभिलेख में भारतीय वन अधिनियम-1927 की धारा-4 के तहत अधिसूचित संरक्षित वन क्षेत्र की भूमि के कानूनी स्वरूप को ही बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेएस वर्मा और बीएन कृपाल की पीठ ने 12 दिसंबर, 1996 को टीएन गोडावर्मन थिरुमुल्कपाद बनाम भारत सरकार के मामले में साफ कहा है कि स्वामित्व की परवाह किए बिना संरक्षित वन क्षेत्र का स्वरूप नहीं बदला जा सकता, 
"The Forest Conservation Act, 1980 was enacted with a view to check further deforestation which ultimately results in ecological imbalance; and therefore, the provisions made therein for the conservation of forests and fore matters connected therewith, must apply to all forests irrespective of the nature of ownership or classification thereof. The word "forest: must be understood according to its dictionary meaning. This description cover all statutorily recognised forests, whether designated as reserved, protected or otherwise for the purpose of Section 2(i) of the Forest Conservation Act. The term "forest land", occurring in Section 2, will not only include "forest" as understood in the dictionary sense, but also any area recorded as forest in the Government record irrespective of the ownership."
तरह गैर-वन भूमि में बदले जाने के बाद भी संरक्षित वन भूमि का कानूनी स्वरूप नहीं बदलेगा, लेकिन वीके श्रीवास्तव ने राजस्व अभिलेख में कोटा, पड़रछ और मकरीबारी गांवों में स्थित संरक्षित वन क्षेत्र की भूमि के कानूनी स्वरूप को परिवर्तित कर दिया है। राजस्व अभिलेख में वन भूमि के कानूनी स्वरूप का परिवर्तन केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के उस आदेश का भी उल्लंघन है जो उसने 17 फरवरी, 2005 को जारी किया था। इसमें साफ लिखा है, 'केंद्र सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना राजस्व अभिलेखों में जंगल, झाड़ के रूप में दर्ज भूमि के कानूनी स्वरूप में परिवर्तन गैर-कानूनी और वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन है। संबंधित विभाग को निर्देशित किया जाता है कि वे तुरंत जंगल,झा़ड़, वन भूमि के कानूनी स्वरूप को बहाल करें।' 

वाईके सिंह चौहान के पत्र पर गौर करें तो उस समय जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड कंपनी वन (संरक्षण) अधिनियम-1980 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए संरक्षित वन भूमि पर गैर-कानूनी ढंग से भवन और सड़क निर्माण कर रही थी। इसके अलावा वह खनन कार्यों को भी अंजाम दे रही थी। चौहान ने पत्र में विवादित भूमि के कानूनी स्वरूप को बहाल करने, वीके श्रीवास्तव की वन बंदोबस्त प्रक्रिया को निरस्त करने और उनके खिलाफ विभागीय अथवा आपराधिक कार्रवाई करने तथा संरक्षित वन क्षेत्र से निष्कासित 1480.06 हेक्टेयर भूमि के संबंध में उत्तर प्रदेश वन विभाग की ओर से भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तहत जारी अधिसूचना को निरस्त करने के लिए निर्देश देने का अनुरोध सीईसी से किया था। 

केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (मध्य क्षेत्र), लखनऊ के मुख्य वन संरक्षक आजम जैदी ने भी 27 मार्च, 2009 को उत्तर प्रदेश वन विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव परमेश्वर अय्यर को पत्र लिखकर इस मामले से अवगत कराया था। साथ ही उन्होंने संरक्षित वन भूमि पर जारी गैर-वानिकी कार्य को रोकने, वीके श्रीवास्तव की वन बंदोबस्त प्रक्रिया को निरस्त करने और विंध्याचल मंडल के आयुक्त की संस्तुतियों के अनुसार दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की थी। जैदी ने मामले पर राज्य सरकार की टिप्पणी और कार्रवाई की रिपोर्ट भी मांगी थी लेकिन राज्य सरकार की ओर से दोषी अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। 

उधर, जेएएल संरक्षित वन क्षेत्र और ग्राम सभा की जमीनों पर जबरदस्ती कब्जा कर रही थी। उसके इस कार्य में जिला प्रशासन जोर-शोर से मदद कर रहा था। जेपी समूह के गैरकानूनी कब्जे की शिकायत स्थानीय लोगों ने सोनभद्र के तत्कालीन जिलाधिकारी पनधारी यादव (अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के विशेष सचिव) और राबर्ट्सगंज (सदर) तहसील के तत्कालीन उपजिलाधिकारी अंजनी कुमार सिंह से की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। बल्कि, डाला स्थित मलीन बस्ती के बाशिंदों को पुलिस और जेपी समूह के कारिंदों की लाठियां खानी पड़ीं। इतना ही नहीं स्थानीय लोगों ने जेपी समूह और जिला प्रशासन की सांठगांठ के खिलाफ सौ से ज्यादा दिनों तक क्रमिक अनशन किया लेकिन जिला प्रशासन के नुमाइंदों की कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।

चंदौली जनपद के नौगढ़ विकासखंड अंतर्गत शमशेरपुर गांव निवासी बलराम सिंह उर्फ गोविंद सिंह ने 23 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक शिकायती पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने सोनभद्र और मिर्जापुर जिलों में संरक्षित वन भूमि पर जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड द्वारा किए जा रहे अवैध निर्माण कार्य की जांच कराने और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात तत्कालीन सेक्शन ऑफिसर आरके दास ने बलराम सिंह के पत्र को केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के सचिव के पास भेज दिया और मामले में जांच रिपोर्ट प्रेषित करने का निर्देश दिया। मंत्रालय के महानिदेशक (वन) ने मामले की जांच का आदेश देते हुए इसे लखनऊ स्थित क्षेत्रीय कार्यालय के मुख्य वन संरक्षक आजम जैदी के पास भेज दिया, जिन्होंने जांच की जिम्मेदारी वन संरक्षक वाईके सिंह चौहान को सौंपी। वाईके सिंह चौहान ने 26 मई, 2010 को प्रभागीय वनाधिकारी, ओबरा एसपी चौरसिया, वन क्षेत्राधिकारी बीडी सिंह, जेएएल के उपाध्यक्ष वीके शर्मा और प्रबंधक सुधीर मिश्रा, शिकायतकर्ता बलराम सिंह, चौधरी यशवंत सिंह और अशोक कुमार के साथ कोटा वन क्षेत्र का निरीक्षण किया। 

केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के वन संरक्षक वाईके सिंह चौहान ने 2010 में 1 जून को उत्तर प्रदेश वन विभाग के ओबरा डिविजन के तत्कालीन प्रभारी वनाधिकारी एसपी चौरसिया और जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के कार्यकारी अध्यक्ष अजय शर्मा को पत्र लिखकर कोटा गांव स्थित संरक्षित वन भूमि पर जेपी सुपर सीमेंट प्लांट के गैर-कानूनी निर्माण कार्य को रोकने का निर्देश दिया, लेकिन निर्माण कार्य नहीं रुका। वाईके सिंह चौहान ने 4 जून को निष्काषित वन भूमि के संबंध में ओबरा वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी एसपी चौरसिया, सोनभद्र वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी और जेएएल के उपाध्यक्ष वीके शर्मा को पत्र लिखकर कुछ दस्तावेज मांगे लेकिन उन्होंने दस्तावेज मुहैया नहीं कराए। बाद में मुख्य वन संरक्षक आजम जैदी को 10 जून को उत्तर प्रदेश वन विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव चंचल तिवारी को पत्र लिखकर कोटा गांव स्थित संरक्षित वन भूमि पर जेपी सुपर सीमेंट प्लांट के गैर-कानूनी निर्माण कार्य को तत्काल प्रभाव से रोकने का निर्देश देना पड़ा, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार के नुमाइंदों की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं आया और जेएएल का निर्माण कार्य जारी रहा। 

जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के कार्यकारी अध्यक्ष अजय शर्मा ने 23 जून को केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (मध्य क्षेत्र) के वन संरक्षक को पत्र लिखकर अपनी सफाई दी। उसमें उन्होंने दावा किया कि विवादित भूमि (प्लॉट संख्या-3200) यूपीएससीसीएल की फ्री होल्ड भूमि है और वह संरक्षित वन क्षेत्र के तहत नहीं आती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि विवादित जमीन पर कोई गैर-कानूनी निर्माण कार्य नहीं हो रहा है। 

अगर अजय शर्मा के दावों को केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने साफ खारिज कर दिया है। मंत्रालय ने इस संबंध में वन बंदोबस्त अधिकारी, ओबरा के 16 अप्रैल,1992 के आदेश का हवाला दिया है, जिससे साफ है कि प्लांट संख्या-3200 की वन बंदोबस्त प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत पूरी हो चुकी थी और वह भूमि संरक्षित वन भूमि घोषित हो चुकी है। उस भूमि के प्रस्ताव को भारतीय वन अधिनियम की धारा-20 के तहत अधिसूचित करने के लिए उत्तर प्रदेश वन विभाग के पास भेजा गया था। अजय शर्मा अपने पत्र में संरक्षित वन भूमि पर यूपीसीसीएल के खनन पट्टे को भी फ्री होल्ड भूमि होने का दावा करते हैं जबकि केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय का दावा है कि संरक्षित वन भूमि कंपनी को पट्टे पर दी गई थी, जिसकी अवधि करीब डेढ़ दशक पहले ही खत्म हो चुकी है। अब उस भूमि पर खनन कार्य के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेना पड़ेगा। यह साफ हो चुका है कि पट्टाधारक पट्टे वाली भूमि का स्वामी नहीं होता है। 

इस संबंध में सोनभद्र के अतिरिक्त जिलाधिकारी के. सिंह और ओबरा वन प्रभाग के प्रभारी वनाधिकारी एसपी चौरसिया ने 25 जुलाई को सोनभद्र के जिलाधिकारी पनधारी यादव को निरीक्षण रिपोर्ट सौंपी थी। उसी दिन उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के वन संरक्षक को भी पत्र लिखकर जेएएल के दावों के संबंध में जवाब भेजा था। अगर जिला प्रशासन के निरीक्षण रिपोर्ट और एसपी चौरसिया के पत्र पर गौर करें तो वे जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के दावों की ही पुष्टि करते नजर आते हैं। दोनों अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश तहत संपन्न हुई वन बंदोबस्त प्रक्रिया को ऩजर अंदाज करते हुए जेएएल के पक्ष में तत्कालीन वन बंदोबस्त अधिकारी वीके श्रीवास्तव के फैसले को तवज्जो दी है। उन्होंने जेएएल के कार्यकारी अध्यक्ष अजय शर्मा के दावों को सही ठहराया है। 

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक सोची-समझी योजना के तहत सोनभद्र जिला प्रशासन, ओबरा प्रभागीय वनाधिकारी एसपी चौरसिया और जेएएल के कार्यकारी अध्यक्ष अजय शर्मा ने केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को जवाब भेजा है। वाईके सिंह चौहान ने 12 जुलाई को ओबरा वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी एसपी चौरसिया को एक बार फिर पत्र लिखा और उनके जवाब से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया लेकिन उन्होंने दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए। चौहान ने 18 अगस्त को उत्तर प्रदेश वन विभाग के मिर्जापुर डिविजन के मुख्य वन संरक्षक एसके शर्मा को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने उनसे अनुरोध किया कि वे प्रभागीय वनाधिकारी, ओबरा और राबर्ट्सगंज को संबंधित अभिलेख उपलब्ध कराने के लिए निर्देश दें ताकि उनके उनके दावों की पुष्टि की जा सके लेकिन मामला जस का तस बना रहा। 

इतना ही नहीं चौहान ने 20 दिसंबर को उत्तर प्रदेश वन विभाग के प्रमुख मुख्य वन संरक्षक को भी पत्र लिखा और राबर्ट्सगंज के तत्कालीन सहायक अभिलेख अधिकारी वीके श्रीवास्तव को वन बंदोबस्त अधिकारी नियुक्त करने के संबंध में जारी अधिसूचना और अन्य संबंधित दस्तावेजों की मांग की। साथ ही उन्होंने वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करने के दोषी वीके श्रीवास्तव के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा। हालांकि राज्य सरकार के नुमाइंदों पर इन पत्रों का कोई असर नहीं हुआ। वर्ष 2011 में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के वन संरक्षक वाई के सिंह चौहान ने 18 जनवरी और 24 मार्च को उत्तर प्रदेश सरकार के सचिव (वन) पवन कुमार को पत्र लिखकर मामले पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी लेकिन कोई जवाब नहीं आया। जबकि सोनभद्र में संरक्षित वन भूमि पर जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड का अवैध निर्माण कार्य जारी रहा। जेएएल के अवैध निर्माण से चिंतित चौहान ने 24 मार्च को ही उत्तर प्रदेश वन विभाग के मुख्य वन संरक्षक डीएनएस सुमन को भी पत्र लिखा और मामले पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी लेकिन जवाब ढाक के तीन पात वाला ही रहा।

केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की ओर से बार-बार पत्र लिखने के बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार के नुमाइंदों ने जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड की ओर से किए जा रहे अवैध निर्माण को रोकने के लिए कोई पहल नहीं की और ना ही वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की। यहां तक कि जंगल से लकड़ी चुनकर पेट पालने वाले गरीबों पर जुल्म ढाने वाले उत्तर प्रदेश वन विभाग के नुमाइंदे संरक्षित वन क्षेत्र और कैमूर वन्यजीव विहार की हजारों एकड़ भूमि पर जेएएल के अवैध कब्जे और निर्माण कार्य को रोकने के लिए आगे नहीं आए। 

उत्तर प्रदेश सरकार ने भी मामले को सुप्रीम कोर्ट में भेजकर जेपी समूह को राहत दी। अब मामला सुप्रीम कोर्ट की पीठ के पास लंबित है लेकिन विवादित भूमि पर जेएएल का निर्माण कार्य अभी भी जारी है। इसका अंदाजा पिछले दिनों चुर्क में पत्रकार वार्ता के दौरान जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड की ओर किए गए दावों से लगाया जा सकता है। इसमें जेएएल के अधिकारियों ने कहा था कि चुर्क की प्रस्तावित कैप्टीव थर्मल पॉवर प्लांट की तीन ईकाइयां इस साल जून में चालू हो जाएंगी। जबकि केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्डलाइफ की स्थाई समिति ने जेएएल की कैप्टीव थर्मल पॉवर प्लांट की चारों ईकाइयों को अनापत्ति प्रमाण-पत्र देने के योग्य नहीं पाया था। 

समिति की सदस्य सचिव प्रेरणा बिंद्रा ने जेएएल के पॉवर प्लांट के प्रस्ताव को वन संरक्षण अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन बताया है। पॉवर प्लांट की ईकाइयों के निर्माण और संचालन के लिए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने अभी तक अनापत्ति प्रमाण-पत्र भी जारी नहीं किया है। इसके बावजूद जय प्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड निर्माण कार्यों को जारी रखे हुए है और जिला प्रशासन मूक दर्शक की भूमिका निभा रहा है। इन हालात में उत्तर प्रदेश के नौकरशाहों के हाथ में जनता की संपत्ति कितनी सुरक्षित है, इसका अदाजा आप बखूबी लगा सकते हैं। आदिवासी बहुल सोनभद्र और मिर्जापुर के आदिवासियों और वननिवासियों को उनका संवैधानिक अधिकार मिल पाएगा? यह दिखाई नहीं देता। (अगली पोस्ट में पढ़िए...जेपी समूह की कारगुजारियों की राजनीतिक और सामाजिक विवेचना)

(यह रिपोर्ट लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक 'कैनविज टाइम्स' में 29 मई, 2013 को और दिल्ली से प्रकाशित मासिक पत्रिका 'ऑल राइट्स' के मार्च, 2013 अंक में भी प्रकाशित हो चुकी है।)

मूल लेख स्त्रोत:-
द पब्लिक लीडर मीडिया ग्रुप, 
राबर्ट्सगंजसोनभद्रउत्तर प्रदेश
ई-मेल:thepublicleader@gmail.com, 

मोबाइल-09910410365

ठगा महसूस कर रहे विस्थापित

तीन दशक से मुआवजे की बाट जो रहे अनपरा परियोजना के विस्थापित आज भी अपने को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। परियोजना के निर्माण के लिए अपना सब कुछ गंवा देने वाले विस्थापित परिवारों की दशा मुआवजा न मिलने से अत्यंत दयनीय हो गई है। इनके परिवार के लोगों का भी बुरा हाल हो गया है। ऐसा ही एक परिवार जो मुआवजे की आस में आज भी दफ्तरों का चक्कर लगा रहा है। जागरण से सोमवार को बातचीत में डिबुलगंज निवासी स्व. चतुर्गन पनिका के पुत्र विनोद पनिका ने बताया कि तीन दशक बाद जब मुआवजा मिलने की आस जगी तो मैंने भी अपने पिता के नाम की जमीन का पट्टा निकलवाकर मुआवजे के लिए निर्धारित फार्म भरकर कंपनी में जमा कर दिया लेकिन एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उन्हें मुआवजा नहीं मिला।

विनोद के अनुसार उनके पिता के राममिलन, तारा, सुमित्रा देवी, मीना देवी सहित पांच पुत्र-पुत्रियां हैं, जो आज किसी तरह मजदूरी कर अपना व अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। उनके पिता के नाम से सवा तीन बीघा जमीन थी जो परियोजना निर्माण के लिए अधिग्रहीत कर ली गई थी। उन्हें जमीन के बदले सिर्फ प्लाट ही मिल पाया है, जिसमें वह सभी भाई- बहनों के साथ गुजर बसर कर रहे हैं। विनोद ने कहा कि जो भी जमीन थी वह परियोजना में चली गई, अब तो जीविकोपार्जन का भी सहारा नहीं रहा। आलम यह है कि विस्थापित के नाम से परियोजनाओं में कहीं संविदा पर भी नौकरी नहीं मिल रही है, जिससे स्थिति दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि कई लोगों को मुआवजा मिलने से एक बार फिर आस जगी है। इसके लिए वे प्रयास कर रहे हैं। मिला तो ठीक, नहीं तो जीवन में व्याप्त कठिनाइयों की अपेक्षा मौत ही अच्छी है।

रविवार, 31 अगस्त 2014

अवैध खननः इस हमाम में सभी नंगे हैं...


by Shiv Das Prajapati


सोनभद्र के खनिज विभाग की ओर से सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के तहत मुहैया कराई गई जानकारी पर गौर करें तो यहां डोलो स्टोन, सैंड स्टोन, बालू और मोरम के खनन और स्टोन क्रशर प्लांटों के संचालन ( हालांकि केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, उच्चतम न्यायालय, उत्तर प्रदेश वन विभाग, उत्तर प्रदेश शासन, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन की विभिन्न जांच रिपोर्टों में अवैध खनन, अवैध परिवहन और स्टोन क्रशर प्लांटों के अवैध संचालन की कई बार पुष्टि हो चुकी है ) के गोरखधंधे में राज्य की सत्ता में काबिज समाजवादी पार्टी (सपा), मुख्य विपक्षी पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बसपा), अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी (कांग्रेस), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कई वर्तमान विधायकों और सांसदों के साथ-साथ अनेक राजनेता और आपराधिक छवि के लोग शामिल हैं।

तत्कालीन जिला खान अधिकारी एस.के. सिंह द्वारा 8 अक्टूबर, 2013 को इस संवाददाता को उपलब्ध कराई गई जानकारी पर विश्वास करें तो उत्तर सरकार को खनन से हर साल 27,198 करोड़ रुपये का राजस्व देने वाले सोनभद्र में कुल डोलो स्टोन के 101, सैंड स्टोन के 86 और बालू/मोरम के 13 खनन पट्टे स्वीकृत हैं। हालांकि भौतिक स्तर पर इन खनन पट्टों की संख्या एक हजार के करीब है। शासन द्वारा स्वीकृत खनन पट्टों में कई पट्टे राजनेताओं, पत्रकारों और उनके रिश्तेदारों के हैं।

घोरावल विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से विधायक और सपा नेता रमेश चंद्र दूबे की कंपनी श्री रमेश चंद्र एण्ड कंपनी के नाम से बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में अराजी संख्या-7573 की 1.5 एकड़ भूमि पर डोलो स्टोन का खनन पट्टा है। वह इस भूमि पर 19 सितंबर, 2006 से खनन कर रहे हैं। शासन ने उन्हें 17 सितंबर, 2016 तक इस भूमि पर खनन करने की छूट दे रखी है। हालांकि उन्होंने इस भूमि पर अबतक कितना खनन किया है और वह निर्धारित मानक से ज्यादा है या कम, यह जिला प्रशासन को पता नहीं है। इसके अलावा सपा विधायक रमेश चंद्र दूबे की पत्नी श्रीमती अंजना दूबे के नाम से सुकृत खनन क्षेत्र में अराजी संख्या-310/4 की 6.20 एकड़ भूमि पर सैंड स्टोन का खनन पट्टा है। इसकी वैधता 30 अगस्त, 2008 से 29 अगस्त, 2018 तक है। वहीं घोरावल विधायक रमेश चंद्र दूबे के भाई श्री राजन दूबे की पत्नी करुणा दूबे के नाम से सुकृत खनन क्षेत्र में ही अराजी संख्या-312मि. की 3.72 एकड़ भूमि पर सैंड स्टोन का खनन पट्टा है। इसकी वैधता भी अंजना दूबे के खनन पट्टे की अवधि के बराबर है।

सपा नेता और उत्तर प्रदेश समाजवादी व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश सचिव रमेश चंद्र वैश्य के फर्म मे. रबिशा स्टोन प्रोडक्ट के नाम से बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में अराजी संख्या-4920, 4921, 4922 और 4924 की कुल भूमि 1.75 एकड़ पर डोलो स्टोन का खनन पट्टा आबंटित है। श्री वैश्य की कंपनी इस भूमि पर 4 जनवरी, 2007 से खनन का काम कर रही है जो 3 जनवरी, 2017 तक करती रहेगी। हालांकि इस कंपनी ने जमीनी स्तर पर कितना खनन और परिवहन किया है, इसकी जानकारी विभाग के पास मौजूद नहीं है। इसके अलावा श्री वैश्य की पत्नी श्रीमती बिन्दो देवी के नाम से रजिस्टर्ड फर्म मे. शिवम स्टोन प्रोडक्ट बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में अराजी संख्या-4949ख की 2.0 एकड़ भूमि पर 13 दिसंबर, 2010 से डोलो स्टोन का खनन एवं परिवहन कर रही है। शासन की ओर से उसे 12 दिसंबर, 2020 तक खनन करने का लाइसेंस मिला हुआ है। अगर जमीनी स्तर पर उक्त भूमि पर हुए डोलो स्टोन के खनन और उसके परिवहन के लिए जारी एमएम-11 परमिट पर हुए निकासी के मामलों की जांच की जाए तो इनमें भारी अनियमितताएं मिलेंगी।

सपा नेता और चोपन नगर पंचायत के अध्यक्ष इम्तियाज अहमद के नाम से बर्दिया खनन क्षेत्र में अराजी संख्या-902, 903 और 941क की कुल 1.58 एकड़ भूमि पर मीरजापुर जनपद के चौकिया गांव निवासी अलगू सिंह के पुत्र अवधेश सिंह और वाराणसी जनपद के पांडेयपुर निवासी श्रीमती केशमनी देवी के साथ 13 दिसंबर, 2010 से डोलो स्टोन का खनन और परिवहन कर रहे हैं। इन सभी लोगों को 12 दिसंबर, 2020 तक उक्त भूमि पर खनन करने का अधिकार है। इसके अलावा सपा नेता इम्तियाज अहमद के भाई उष्मान अली के नाम से बर्दिया खनन क्षेत्र में ही अराजी संख्या-878क की 1.30 भूमि पर डोलो स्टोन के खनन पट्टा आबंटित है। उन्हें यह खनन पट्टा भी उक्त खनन पट्टे की अवधि के बराबर की अवधि तक के लिए मिला है। वहीं बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में ही अराजी संख्या-7364ख, 7365 और 7366 की 3 एकड़ भूमि पर चोपन नगर पंचायत अध्यक्ष अन्य लोगों के साथ मिलकर खनन कर रहे हैं। इसकी अवधि भी उपरोक्त अवधि के बराबर ही है। 

बलिया के रसड़ा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से विधायक और बसपा नेता उमाशंकर सिंह की कंपनी सी.एस. इंफ्राकंस्ट्रक्शन लिमिटेड (छात्र शक्ति इंफ्राकंस्ट्रक्शन लिमिटेड) बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र के अराजी संख्या-6229ख की 1.50 एकड़ भूमि पर 13 मार्च, 2010 से डोलो स्टोन का खनन कर रही है। उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने रसड़ा विधायक की कंपनी को 12 मार्च, 2020 तक डोलो स्टोन के खनन और उसके परिवहन का अधिकार दे रखा है। इसके अलावा बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में ही अराजी संख्या-4478छ की 2.50 एकड़ भूमि पर विधायक उमाशंकर सिंह के नाम से डोलो स्टोन का एक अन्य खनन पट्टा है। इस खनन पट्टे की अवधि भी उक्त खनन पट्टे की अवधि के बराबर है। गौर करने वाली बात यह है कि बसपा विधायक उमाशंकर सिंह की कंपनी छात्र शक्ति इंफ्राकंस्ट्रक्शन लिमिटेड कंपनी ने बहुजन समाज पार्टी की पिछली सरकार में सोनभद्र में लोक निर्माण विभाग से होने वाले अधिकतर सड़क निर्माण के कार्य को अंजाम दिया है लेकिन वे सभी सड़क मार्ग बनने के दौरान ही उखड़ने लगे थे। ये बातें जिला प्रशासन की जांच रिपोर्ट में भी सामने आ चुकी हैं।

बसपा नेता और राबर्ट्सगंज विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के पूर्व विधायक सत्यनारायण जैसल की पत्नी श्रीमती मीरा जैसल सुकृत खनन क्षेत्र में अराजी संख्या-282मि. की 4.00 एकड़ भूमि पर 6 अगस्त, 2010 से सैंड स्टोन का खनन करवा रही हैं। बहुजन समाज पार्टी की पिछली सरकार ने उन्हें 5 अगस्त, 2020 तक इस भूमि पर खनन करने का अधिकार दे रखा है। हालांकि वहां खनन के दौरान सुरक्षा मानकों की जमकर अनदेखी की जा रही है। इतना ही नहीं एमएम-11 परमिट जारी करने की तुलना में खनन का दायरा बहुत ही कम है। हालांकि इसकी सही जानकारी जिला प्रशासन के पास भी नहीं है।

बसपा नेता और मिर्जापुर-भदोही लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के पूर्व सांसद नरेंद्र कुशवाहा की पत्नी श्रीमती मालती देवी कोटा खनन क्षेत्र में सोन नदी से लगे अराजी संख्या-3984ग और 3984घ की 1.50 एकड़ भूमि पर बालू का खनन 23 जुलाई, 2011 से खनन करवा रही हैं। बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने उन्हें 22 जुलाई, 2014 तक बालू खनन और उसके परिवहन का लाइसेंस दे रखा है लेकिन सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर कोई ध्यान नहीं दिया। वर्तमान समाजवादी पार्टी की सरकार भी वैसा ही कर रही है। बता दें कि नरेंद्र कुशवाहा वेबसाइट ‘कोबरा पोस्ट.कॉम’ और हिंदी न्यूज चैनल ‘आज तक’ के संयुक्त स्टिंग ऑपरेशन ‘कैश फॉर क्वैरी’ में आरोपी हैं, जिसमें सांसदों द्वारा नोट लेकर प्रश्न पूछने का मामला सामने आया था।

इनके अलावा बसपा नेता और राजगढ़ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के पूर्व विधायक अनिल मौर्या के भतीजे संजीव कुमार मौर्या के नाम से सिंदुरिया खनन क्षेत्र में अराजी संख्या-240 के 1.30 हेक्टेयर भूमि पर बिल्ली-मारकुंडी निवासी श्रीमती बरमावती देवी के साथ डोलो स्टोन का खनन पट्टा है। वे इस पर 31 अक्टूबर, 2011 से खनन और उसके अवयवों का परिवहन कर रहे हैं। इस भूमि पर खनन की स्वीकृति 24 अक्टूबर, 2021 तक है।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य राहुल श्रीवास्तव की पत्नी श्रीमती निरंजना श्रीवास्तव बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में अराजी संख्या-4478छ की 1.78 एकड़ भूमि पर 4 अक्टूबर, 2011 से डोलो स्टोन का खनन और उसके अवयवों का परिवहन करवा रही हैं। राज्य सरकार की ओर से उन्हें 3 अक्टूबर, 2021 तक ऐसा करने का अधिकार मिला हुआ है। श्रीमती श्रीवास्तव पूर्व में हिंदी दैनिक ‘स्वतंत्र भारत’ से मान्यता प्राप्त पत्रकार रह चुकी हैं। उनके पति राहुल श्रीवास्तव भी हिंदी दैनिक ‘हिंदुस्तान’ से मान्यता प्राप्त पत्रकार रह चुके हैं। वर्तमान में वह हिंदी दैनिक ‘जन संदेश टाइम्स’ के सोनभद्र ब्यूरो प्रमुख हैं। बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में श्रीवास्तव परिवार का स्टोन क्रशर प्लांट भी संचालित होता है।

खनन के क्षेत्र में लिप्त अन्य पत्रकारों की बात करें तो इस सूची में कई प्रतिष्ठित अखबारों के प्रतिनिधि शामिल हैं। ‘दैनिक जागरण’ समाचार-पत्र के पूर्व ओबरा प्रतिनिधि बशीर बेग ( अब देहांत हो चुका है) के नाम से बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में साबिक अराजी संख्या-1966 और हाल अराजी संख्या-4478छ की कुल 7.55 एकड़ भूमि पर डोलो स्टोन का खनन पट्टा 17 फरवरी, 2011 से 16 फरवरी, 2021 तक आबंटित है। स्व. बशीर बेग के बेटे दारा शिकोह का गैर-सरकारी संगठन मे. दारा सेवा समिति बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में ही अराजी संख्या-7577क की 1.70 एकड़ भूमि पर 17 मई, 2007 से डोलो स्टोन का खनन कर रहा है। यह संगठन 16 मई, 2017 तक उक्त भूमि पर खनन के कार्य को अंजाम दे सकता है। इसके अलावा स्व. बशीर बेग के भाई जावेद बेग का फर्म ‘दारा स्टोन वर्क्स’ बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में अराजी संख्या-1950 की 0.31 एकड़ भूमि पर डोलो स्टोन का खनन और परिवहन कर रहा है। इस खनन पट्टे का विस्तार 29 अक्टूबर, 2008 को हुआ जो इस साल की 5 नवंबर तक मान्य है। अगर इस खनन पट्टे के नाम पर जारी एमएम-11 परमिट के आयतन की गणना की जाए तो वह आबंटित खनन पट्टे के रकबे से कहीं ज्यादा होगी जो गैर-कानूनी है। इनके अलावा अन्य कई खनन पट्टा धारक हैं जो प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि बनकर इलाके में खनन के धंधे को अवैध रूप से अंजाम देते हैं।

मूल लेख स्त्रोत:-
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अवैध खनन के सियासी दांव में दुर्गा से पहले भी पीस चुके हैं कई आईएएस अधिकारी

by Shiv Das Prajapati
गौतमबुद्धनगर की उप जिलाधिकारी (सदर) दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन के पीछे राज्य की अखिलेश सरकार निर्माणाधीन मस्जिद की दीवार को ढहाने और उससे सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ने का तर्क भले ही दे रही हो लेकिन सूबे में धड़ल्ले से संचालित हो रहे अवैध खनन के मामले में उसकी पिछली कारगुजारियों को देखकर ऐसा नहीं लगता। विधायकों, राजनीतिक पार्टियों के पदाधिकारियों और पत्रकारों सरीखे सफेदपोशों के खनन पट्टों और इसकी आड़ में अवैध खनन को अंजाम दे रहे खनन माफियाओं के दबाव में सूबे की सरकार पूर्व में कई ईमानदार अधिकारियों का तबादला और निलंबन कर चुकी है। उन अधिकारियों की गलति केवल इतनी थी कि वे सूबे के विभिन्न खनन-क्षेत्रों में धड़ल्ले से चल रहे अवैध खनन पर अंकुश लगाने और इसके लिए जिम्मेदार सफेदपोशों एवं खनन माफियाओं को कानून के कटघरे में लाने की कोशिश कर रहे थे। ऐसे ही ईमानदार अधिकारियों की सूची में शामिल हैं आईएएस अधिकारी सुहाष एल. वाई और उनकी पत्नी ऋतु सुहाष जो सूबे के सफेदपोश खनन माफियाओं और सत्ता के गलियारे में काबिज नुमाइंदों की सांठगांठ का शिकार पिछले साल हुए। 

ये दोनों अधिकारी उस समय सूबे के राजकोष में हर साल 10 अरब से ज्यादा का राजस्व देने वाले सोनभद्र जनपद में तैनात थे। उस समय सुहाष एल वाई वहां जिलाधिकारी के पद पर और उनकी पत्नी ऋतु सुहाष डिप्टी कलेक्टर के पद पर तैनात थे। उन्होंने अपनी तैनाती के साथ ही डोलो स्टोन, सैंड स्टोन, बालू, मोरम, बजरी और लाइम स्टोन आदि खनिज पदार्थों का अवैध खनन कर बिल्ली-मारकुंडी और सुकृत खनन क्षेत्र में मौत का कुआं (पत्थर की खदानों) तैयार करने वाले खनन माफियाओं और सफेदपोशों के खिलाफ कड़ा अभियान छेड़ दिया। इससे खनन माफियाओं और सफेदपोशों से लेकर सत्ता के गलियारे में बैठे उनके आकाओं में हड़कंप मच गया और वे अपनी गर्दन फंसता देख सूबे की अखिलेश सरकार पर दबाव बनाने लगे। उनके इस डर के पीछे एक वाजिब वजह भी थी जो उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा सकती थी। उसी साल 27 फरवरी को बिल्ली-मारकुंडी खनन क्षेत्र में शारदा मंदिर के पीछे स्थित अराजी संख्या-4452 और वन विभाग की जमीन पर हुए अवैध खनन की वजह से एक पहाड़ी धंस गई थी और 10 मजदूरों की मौत हो गई थी। राजस्व अभिलेखों में अराजी संख्या-4452 बिल्ली निवासी इंद्रजीत मल्होत्रा और हंसराज सिंह आदि के नाम से दर्ज है। खनन माफियाओं ने इसके पास के अराजी संख्या-4471 की 10 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर भी अवैध खनन किया था जिसमें 6 हेक्टेयर सुरक्षित वन भूमि भी शामिल थी। 

इस हादसे को लेकर स्थानीय नागरिकों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन के दबाव में आकर तत्कालीन जिलाधिकारी विजय विश्वास पंत ने मुख्य विकास अधिकारी, सोनभद्र की अध्यक्षता में मजिस्ट्रीयल जांच गठित कर दी। साथ ही शासन स्तर पर सोनभद्र में खनन पर रोक लगा दी गई और जिले में अवैध खनन की जांच शुरू हो गई। इन दोनों कदमों ने सफेदपोश खनन माफियाओं और उनके आकाओं को सकते में ला दिया। उन्होंने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर दबाव बनाकर 30 मार्च को विजय विश्वास पंत का तबालदला करा दिया। उनके तबादले के 52 दिनों बाद सोनभद्र के जिलाधिकारी पद पर आईएएस अधिकारी सुहाष एल वाई और डिप्टी कलेक्टर के पद पर उनकी पत्नी ऋतु सुहाष की तैनाती हुई। दोनों अधिकारियों ने अपनी नियुक्ति के साथ जिले में छापेमारी अभियान शुरू कर दिया। इससे अवैध खनन माफियाओं और लकड़ी तस्करों के साथ-साथ उनके सफेदपोश आकाओं और नौकरशाहों की नींदे उड़ गईं। 

अवैध खनन और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर तत्कालीन जिलाधिकारी सुहाष एल. वाई. द्वारा 31 अगस्त, 2013 को ओबरा वन प्रभाग के प्रभारी वनाधिकारी, कैमूर वन्यजीव वन प्रभाग, मिर्जापुर के प्रभागीय वनाधिकारी, जिला खान अधिकारी और अपर जिलाधिकारी को दिए गए लिखित दिशा-निर्देश से राजनेताओं, खनन माफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों में हड़कंप मच गया। जिलाधिकारी सुहाष एल वाई ने अराजी संख्या-4471 में सुरक्षित वन भूमि पर हुए अवैध खनन के मामले में एफआईआर दर्ज कराने, इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ दंडनात्मक कार्रवाई करने और इससे हुई राजस्व क्षति को वसूलने का आदेश दिया। 

तत्कालीन जिलाधिकारी के इस कदम ने सफेदपोश खनन माफियाओं के होश उड़ा दिए। उन्होंने सुहाष एल वाई का तबादला कराने के लिए विपक्षी नेताओं के साथ गोलबंदी शुरू की और पंचम तल में विराजमान सोनभद्र के पूर्व जिलाधिकारी और मुख्यमंत्री के विशेष सचिव पनधारी यादव की मदद से चार महीने बाद उन्हें मुख्यालय से संबद्ध करा दिया। हालांकि बाद में उन्हें जौनपुर के जिलाधिकारी का पद मिल गया। 100 दिनों (तीन महीने से ज्यादा) तक सोनभद्र के जिलाधिकारी पद पर पूर्णकालिक जिलाधिकारी की नियुक्ति नहीं हुई। बाद में ऋतु सुहाष का भी तबादला हो गया। इसका नतीजा यह रहा कि वहां एक बार फिर अवैध खनन का कारोबार शुरू हो गया और पिछले साल की 27 फरवरी को हुए हादसे के लिए जिम्मेदार सफेदपोश खनन माफियाओं का चेहरा आजतक उजागर नहीं हो पाया। मुख्य विकास अधिकारी की अध्यक्षता में गठित मजिस्ट्रीयल जांच भी अभी पूरी नहीं हो पाई है और ना ही हादसे में मरने वाले 10 मजदूरों के परिजनों को मुआवजा और न्याय मिल पाया है।

इलाहाबाद के आयुक्त हिमांशु कुमार का दबादला दो दिनों के अंदर किया जाना भी राज्य की अखिलेश सरकार पर सवाल खड़े करती है। हिमांशु कुमार ने अपनी तैनाती के साथ ही क्षेत्र में अवैध खनन माफियाओं के खिलाफ कठोर कार्रवाई का अभियान छेड़ दिया। इससे भयभीत राजनेताओं के दबाव ने सपा सरकार ने दो दिनों के अंदर ही उनका तबादला अन्यत्र कर दिया था।

अवैध खनन और इस धंधे में लिप्त सफेदपोशों और राजनेताओं का दबदबा सूबे की अखिलेश सरकार में भी वैसे है, जैसे पूर्ववर्ती बहुजन समाज पार्टी की सरकार में देखने को मिली थी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि चुनाव के समय जनता के हितों की रक्षा की दुहाई देने वाली विभिन्न राजनीतिक पार्टियां, खासकर, भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की रक्षा के लिए किस कदर तक पूंजीपतियों के दबाव का सामना कर सकती हैं।

मूल लेख स्त्रोत:-

द पब्लिक लीडर मीडिया ग्रुप, राबर्ट्सगंज, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश
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