बुधवार, 31 अगस्त 2011

जीने का अधिकार !

पीढ़ियों से उत्तर-प्रदेश के एक मात्र आदिवासी-दलित बाहुल्य जनपद के लोगों को एक बार फिर नये बसेरे बनाने होंगे क्योंकि माया सरकार की निगाहें उन पर भारी पड़ रही हैं। ७० एवं ८० के दशक में तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा ३१३० मे.वा. की अनपरा तापीय परियोजना की स्थापना के लिए हजारों आदिवासियों-दलितों की कृषि योग्य एवं उनके कब्जे की भूमि उ.प्र. राज्य विद्युत परिषद द्वारा जनहित में सार्वजनिक प्रयोजन हेतु अधिग्रहित की गयी। आदिवासियों-दलितों के पुर्नवास एवं पुर्नबसाहट हेतु नियमों-अधिनियमों का हवाला देकर हजारों एकड़ भूमि पर परियोजना का निर्माण शुरू हुआ तथा आदिवासियों-दलितों को विश्वास दिलाया गया कि हम प्रत्येक परिवार के एक व्यक्ति को स्थायी रोजगार देंगे तथा विस्थापितों को अन्य सुविधाएं उपलब्ध करायी जायेगी। सन १९९४ तक प्रस्तावित ३१३० मे.वा. में से सिर्फ १६६० मे.वा. का उत्पादन शुरू हो पाया। अनपरा 'अ' एवं 'ब' के उत्पादन में आने के बाद १९९४ तक ३०४ विस्थापित परिवार के सदस्यों को स्थायी सेवायोजन दिया गया। वहां भी आदिवासी-दलित उपेक्षित रहा। उसकी भागेदारी स्थायी सेवायोजन में शून्य मात्र रही। सीधे-साधे निरीह आदिवासियों को परियोजनाओं के विस्तार होने पर सेवायोजन का भरोसा दिलाकर दिग्भ्रमित कर रखा गया। सन १९९४ से २००७ तक आदिवासियों-दलितों को अनपरा 'सी' एवं 'डी' परियोजना में स्थायी रोजगार देने के लिए बकायदे परियोजना द्वारा पत्र सौंपे गये। सीधे-साधे आदिवासियों-दलितों ने परियोजनाओं के झूठे पत्रों को अमूल्य धरोहर की तरह सजो कर रखा। उन्हे क्या मालूम था कि उत्तर-प्रदेश में कोई दलितों की देवी ऐसी भी आयेगी जो संगीनो के साये के नीचे उनके हक-हकूक छीनकर अपने को अपने को दलितों की देवी होने का दावा करेगी।

वर्ष २००७ में अनपरा 'सी' को माया सरकार ने निजी क्षेत्र को सौंप दिया तथा अनपरा 'डी' का निर्माण राज्य सरकार स्वयं कर रही है। परियोजनाओं के निर्माण शुरू होने से आदिवासियों-दलितों की बरसों पुरानी आस एक बार फिर जगी और बड़ी उम्मीद से आदिवासियों-दलितों ने सुश्री मायावती सरकार की परियोजनाओं के निर्माण शुरू कराये जाने की पहल से बड़ी आशाएं सजोएं रखी थी। आदिवासियों-दलितों का भ्रम माया सरकार ने ताश के पत्तों की तरह बिखेर दिया। संगीनों के साये में परियोजना का निर्माण करा रही माया सरकार ने विस्थापित आदिवासी-दलितों को पहली बार अपना असली दलित प्रेम दिखाया है तथा उनकी आखिरी उम्मीद को झकझोर कर रख दिया। माया सरकार ने २००७ में परियोजनाओं के निर्माण शुरू होने के बाद आदिवासियों-दलितों को सेवायोजन देने से इन्कार कर दिया। हक मांगने वाले आदिवासियों-दलितों की आवाज माया सरकार बन्दूक के बट तले दफन करना चाहती है। हक मांगने वाले आदिवासी-दलितों के लिए मौत या कालापानी का फरमान अघोषित रूप से जारी किया गया है।

लगभग २० हजार आदिवासी-दलित इस सरकारी गुण्डागर्दी का शिकार हुए हैं। आदिवासी-दलितों के पास कोई विकल्प न होने की स्थिति में कोई नक्सली बनने की बात करता है तो कोई आत्मदाह करने की बात करता है जबकि संवेदनहीन माया सरकार इन सबको अनसूना कर हक मांगने वालों को नक्सली कहने की बात कहती है। आखिर इन आदिवासियों@दलितों का गुनाह सिर्फ इतना है कि जब-जब जो सरकारें आयीं उन्हे छलती चली गयी। सीधा-साधा आदिवासी अपना सर्वस्य देश हित में देकर आज उसके बदले रिहन्द का विषैला पानी, कारपोरेट के कब्जे वाली जहर युक्त हवा तथा अपने हक-हकूक की बात कहने पर पुलिस का डण्डा-उत्पीड़न पा रहा है। केन्द्र एवं राज्य सरकार की नक्सल विरोधी मुहिम को एक बार फिर सोचना पड़ेगा कि क्या सरकारी उत्पीड़न-उपेक्षा ही तो इन भोले-भाले आदिवासियों-दलितों को नक्सली नहीं बना रहा है। क्योंकि एक बार फिर से माया सरकार सत्ता की हनक व पुलिस की बन्दूक के दम पर आदिवासियों-दलितों का आशियाना उजाड़ेगी जिसकी शुरूआत हो चुकी है और सभी की निगाहें उस अन्त पर टिकी हैं कि कितने आदिवासियों-दलितों की लाश पर इन परियोजनाओं का निर्माण पूरा होगा क्योंकि एक तरफ आधुनिक असलहों से लैस माया सरकार की हाईटेक पुलिस है तो दूसरी तरफ आदिवासी-दलित अपने हक-हकूक की आखिरी लड़ाई के लिए पारम्परिक हथियारों के साथ मोर्चा सम्भालने को तैयार है।

विस्थापितों का दर्द !

नक्सल समस्या आज राष्ट्रीय समस्या है और इससे निपटने का कार्य सिर्फ केन्द्र सरकार का ही नहीं बल्कि प्रभावित राज्य सरकारों का भी है। कुछ राज्यों ने सुरक्षा और अन्य प्रभावी योजनाओं के लिए तमाम कदम उठाये हैं लेकिन उ.प्र. सरकार अपने राज्य के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित जिले सोनभद्र में ऐसी कोई कवायद शुरू करने के मूड में नहीं है। 
१९५० के बाद रिहन्द बांध बनने के उपरान्त सोनभद्र को र्जान्चल के रूप में विकसित किया जाने लगा साथ ही औद्योगिक विकास को लेकर कदम भी उठाये गये। ओबरा, अनपरा ताप विद्युत परियोजना तथा एनटीपीसी हिण्डाल्को इण्डस्ट्रीज, जे.पी.सिमेण्ट, लेन्को पावर सहित तमाम औद्योगिक प्रतिष्ठान सोनभद्र में स्थापित हैं बावजूद इसके गरीब आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण करने के बाद भी उनसे किये गये वायदे के अनुसार कुछ भी नहीं मिला। लिहाजा विस्थापित-आदिवासी आज अपने हक के लिए किसी भी हद तक जाने की बात कर रहा है।

उ.प्र. सरकार नक्सल प्रभावित जिला सोनभद्र के आदिवासियों को लेकर कितना संजीदा है इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विद्युत इकाई 'सी' बनने के लिए जिन आदिवासियों ने अपनी भूमि दी उन्हे नौकरी नहीं मिली और उस जमीन को लेन्को पावर प्राइवेट लिमिटेड को स्थानान्तरित कर दी गयी। मीडिया द्वारा पूछे जाने पर उ.प्र.पावर कारपोरेशन के अधिकारी इसे शासनादेश बतातें हैं।

हालांकि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र की समस्या सुलझाने में जनप्रतिनिधियों की काफी जिम्मेदारी होती है और इस समस्या की बाबत क्षेत्रीय विधायक से पूछा गया तो उन्होने गैर बसपा सरकारों के Åपर आरोप लगाये और इस बात को सिरे से खारिज कर दिया गया। जिम्मेदारी लेना तो दूर इस समस्या को सुलझाने का उनके पास कोई विकल्प नहीं ।

कुल मिलाकर इस कहानी में कुछ ऐसे कटु आध्याय हैं जिसे देखकर देश के लोकतान्त्रिक स्वरूप को भी शर्म आयेगी। १९७८ में इस परियोजनाओं की शुरूआत के दौरान तत्कालिक कांग्रेस की सरकार ने आदिवासियों के पुर्नवास और नौकरी के लिये बड़े निर्णय लिये थे फिर बाद में गैर कांग्रेसी सरकारों ने इन परियोजनाओं को पैसा बनाने की मशीन बना लिया। बीते दो दशकों से इन आदिवासियों का भविष्य कागजों में दबा हुआ है और आदिवासियों के हित में आवाज उठाने वाले लोगों को सत्याग्रह के बावजूद जेल भी जाना पड़ा। तमाम सरकारी चक्रव्यू में फंसा यह मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है। हजारों आदिवासियों के भविष्य को लेकर लोकतान्त्रिक स्वरूप में मांग कर रही युवा कांग्रेस के लोगों के राज्य सरकार अपना जवाब लाठी और डण्डे से दे रही है। दशकों से चल रहे असन्तोष के बाद नक्सलवाद और पनपे तो उ.प्र. में राज कर रही गैर कांग्रेसी सरकार ही जिम्मेदार हैं।

भगवान श्री बंशीधर, नगर उटारी (गढ़वा), झारखण्ड।

भारत के धार्मिक वैशि’ठ में भगवान श्री कृष्ण को निष्काम भावना के प्रेम का सबसे बड़ा प्रवर्तक माना गया है। प्रेम की अनुभूमि को मन और मस्तिष्क से एकाकार करने के बाद नटवर नागर का स्वरूप कभी तो रहस्य और रोमांच को आकार देता है और दूसरी तरफ राधा और मीरा के एकल प्रेम के माध्यम से कृष्ण के महात्म को दर्शाता है। सात्विक, तान्त्रिक, मान्त्रिक, धार्मिक, सामाजिक सभी प्रकार की शैलियों में भगवान कृष्ण की मूर्तियों की निर्माण शैली अपने आप में महत्वपूर्ण होती है। उत्तर-प्रदेश और झारखण्ड के रास्ते में सघन जंगलों के अन्दर भगवान कृष्ण की २२ मन सोने की बनी मूर्ति मुगलकाल के समय की है जिसे माराठा शासकों ने मुगलिया सल्तनत के सोने को लूट कर बनवाया था। मूर्तियों और इसके निर्माण के पीछे का कारण गैर प्रान्तीय आक्रमणकारियों के पर हिन्दू धर्म के मानसिक विजय का प्रतीक है।


 उत्तर-प्रदेश की सीमा से सटे झारखण्ड राज्य के गढ़वा जिले में नगर उटारी नामक स्थान पर स्थापित भगवान बंशीधर की महिमा चारों दिशाओं में चहुओर फैली हुई है। जनश्रुति के अनुसार नगर उटारी की रानी शिवमानी कुवंर को कई दिनों तक निरन्तर स्वप्न दिखायी देता रहा। एक दिन जन्माष्टमी व्रत करके निराहार होते हुए भी निरन्तर कृष्ण नाम जप रही थी। बड़ी ही तनमय होकर आधी रात के पश्चात इन्हे कुछ प्रकाश तन्द्रा सी लगी। उसी में एक स्वर्णिम अदभूत प्रकाश दृष्टिगोचर हुआ उस प्रकाश में यही बंशीधर भगवान की मनमोहक प्रतिमा दिखायी दी जिसे राज्य परिवार ने पहाड़ से लाकर अपने किले के अन्दर स्थापित किया। २२ मन शुद्ध सोने से निर्मित भगवान कृ’ण की यह मूर्ति यहां के अलावा दुनिया में कहीं भी नहीं है।

बी.ओ.-२ कैसा अपूर्व आकर्षण है कैसी रूप माधूरी कितनी उच्च कोटी की कला है। मूर्ति से लालित्य झलक रहा है। १४४० किलोग्राम सोने से निर्मित यह प्रतिमा अपनी विशेषताओं के कारण पूरे विश्व में सर्वश्रेष्ठ एवं अद्धितीय है। इतनी उच्च कोटी की प्रतिमा पूरे संसार में कहीं भी नहीं है। श्री बंशीधर का विग्रह स्वर्णमयी प्राचीन काल का एक उत्कृष्ट नमूना हैं। इसमें सन्देह नहीं कि स्वर्ण धातु की इतनी सुन्दर आकर्षक तथा चमकती हुई अद्वितीय शोभविष्ठ प्रतिमा अन्यत्र कहीं नहीं है। दर्शक मुग्ध हो बंशीधर की प्रतिमा के सामने से हटना नहीं चाहता है विचित्र आकर्षण मोहनी मुस्कान ललीत कला की अद्वितीय प्रतिमा नागर भगवान श्री कृष्ण मनोहारी हैं। निरन्तर दर्शन से आंखे तृप्त नहीं होती। भगवान वंशीधर के दर्शन से सारी मनोकामनाएं सिद्ध होती है।

इनकी महिमा से प्रभावित हो दूर-दूर से भक्त अपनी मनोकामना लेकर भगवान बंशीधर के दरबार में आते हैं तथा भजन-पूजन एवं आरती करते हैं। श्री बंशीधर भगवान के प्रति भक्तों में ऐसी आस्था है कि इनके दर्शन से भक्त की सारी अभिलाशाएं पूर्ण हो जाती हैं।

अपनी संस्कृति को मरते हुए देख रहे हैं।


भारत के समृद्ध सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को और भी ज्यादा मात्रा में पल्लवित और पुष्पित करने में लोक कलाओं की एक महति भूमिका रही है। इसका कारण यहां की समृत संास्कृतिक विरासत और सैकड़ों की संख्या में जातियों और जनजातियों का यहां अवस्थित होना सबसे बड़ा कारण है। लेकिन आज सोनभद्र की घसिया जनजाति भारत के सामाजिक बटवारे और अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई का एक जीवन्त उदाहरण बन चुकी हैै। 

सोनभद्र और इसके आस-पासके क्षेत्रोंं में करीब ५० से ५५ हजार की संख्या में रहने वाली घसिया जनजाति  छोटे-छोटे कबिलों और गांवों में स्थायी-अस्थायी रूप से निवास करती है जिसकी लोक कला में करमा नृत्य एक विशेष स्थान रखता है यह नृत्य करम देवता को समर्पित है। इन्होने इस नृत्य का नजारा देश के महान विभूतियों के सामने पेश किया है लेकिन आज यह जनजाति हासिए की जिन्दगी जीने को मजबूर है और इनके पास फक्काकशी के अलावा कोई विकल्प नहीं है। 

ऐसी सामाजिक विडम्बना सिर्फ भारत वर्ष में ही सम्भावित है जहां लोक कलाकारों को सिर्फ मरने के लिए छोड़ दिया गया है आज घसिया जनजाति के लोग अपने हजारों नौनिहालों को अपनी आंखों के सामने मरते हुए देख चुके हैं जिसकी जीती-जागती तस्वीर यह शिलापटिटका है जिसे गैर सरकारी संस्था ने कुपोषण और भूख से मरे हुए बच्चों की याद में लगवाया है। यह शिला पटिटका जहां एक तरफ भूख से मरे हुए बच्चों को याद करके सामाज के लिए एक नजिर पेश कर रही है वहीं दूसरी तरफ सामाजिक र्दुव्यवस्थाओं को चिढ़ा भी रही है।

जहां प्रशासन और प्रशासन के स्तर की बात करें तो यह मानने को कत्तई तैयार नहीं है कि इनकी मौतें भूख से हुई है। बावजूद इसके यह बात जरूर कहते हैं कि सरकार इनके पुर्नवास के लिए विचार कर रही है और समय-समय पर कार्यक्रमों के द्वारा मंच भी दे रही है। इनकी यह उपलब्धि और प्रयास रेगिस्तान में एक लोटा पानी के बराबर है।
"वैद्य मरा, रोगी मरा, मरा सकल संसार"
"एक कबीरा न मरा जाके नाम आधार"
कुछ ऐसी ही तस्वीर सोनभद्र की घसिया जनजाति की है जो न सिर्फ अपनों की लाशें ढो रहे हैं और अपनी संस्कृति को मरते हुए देख रहे हैं। देखना होगा कि इन्हे बचाने कौन आगे आता है।

उत्तर-प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की अनपरा तापीय परियोजना की स्थापना के लिये किये गये भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों की समस्या

उत्तर-प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष वर्ष १९७८ में ३१३० मे.वा. की अनपरा तापीय परियोजना के निर्माण हेतु कुल ५०७६ एकड़ भूमि अधिग्रहित की गयी जिसमें सात ग्राम सभाओं की किसानों की ३१०६.४८७ एकड़ कृषि योग्य भूमि भी अधिग्रहित की गयी। भूमि अधिग्रहण से कुल १३०७ परिवार प्रभावित हुए जिसमें ८० प्रतिशत लोगों की शत-प्रतिशत कृषि योग्य भूमि अधिग्रहित कर ली गयी।

भूमि अधिग्रहण में ८९८ लोगों के मकान भी प्रभावित-अधिग्रहित की गयी। अधिग्रहण के पश्चात तत्कालीन सरकार द्वारा विस्थापित-प्रभावित परिवारों को परियोजना में स्थायी सेवायोजन एवं अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराये जाने की बाबत विनियमावली बनायी गयी तथा समझौते किये गये परन्तु अभी तक सरकार द्वारा बनायी गयी नियमावली एवं किये गये समझौतों का अनुपालन तीन दशक बाद भी सुनिश्चित नहीं किया जा सका है। परियोजना द्वारा पुर्नवास एवं पुर्नबसाहट की सुविधा से वंचित बचे विस्थापित परिवारों व उनके सदस्यों पर उत्तर-प्रदे’ा सरकार द्वारा वर्तमान में पुर्नवास एवं पुर्नबसाहट नीति २०१० का भी अनुपालन नहीं किया जा रहा है जिससे उत्तर-प्रदे’ा सरकार द्वारा घो”िात पुर्नवास एवं पुर्नबसाहट नीति २०१० की सार्थकता पर प्र’न चिन्ह खड़ा कर दिया है। पूर्व में विस्थापितों द्वारा किये गये आन्दोलन उपरान्त किये गये किसी भी समझौते का अनुपालन नहीं सुनि’िचत किया जा रहा है। निगम की इस तानाशाही एवं भेदभाव वाली नीति का सर्वाधिक असर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के परिवारों पर पड़ा है जिससे आज दसो हजार विस्थापित आदिवासी-दलित परिवार भूखों मरने के कगार पर खड़ा है और सरकारी उपेक्षा से उनमें आक्रोश दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। उत्तर-प्रदेश सरकार विस्थापित परिवारों से वायदा खिलाफी कर उनसे बन्दूक के बल पर सत्ता की हनक से उनके हक-हकूक को छीनना चाहती है जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। बार-बार विभिन्न संगठनों एवं राजनैतिक दलों के माध्यम से शासन एवं प्रशासन को अवगत कराया गया है परन्तु सारे प्रयास विस्थापितों को न्याय नहीं दिला पाये।
विसथापितों की प्रमुख मांगें:- 

उत्तर-प्रदेश राज्य विद्युत परिषद (भूमि अध्यापित से प्रभावित परिवार के सदस्य की नियुक्ति) विनियम १९८७ के तहत सभी शेष बचे विस्थापितों को अविलम्ब स्थायी सेवायोजन दिया जाये तथा वर्तमान में पुर्नवास एवं पुर्नबसाहट से वंचित विस्थापित परिवारों को उत्तर-प्रदे’ा सरकार द्वारा घो”िात पुर्नवास एवं पुर्नबसाहट नीति २०१० के तहत घो”िात उनके हितों@लाभ का अनुपालन सुनि’िचत कराया जाये। परियोजना द्वारा जिन आधारों पर पूर्व में मकान एवं ५० प्रतिशत से कम भूमि अधिग्रहण से प्रभावित होने वाले परिवार के सदस्यों को स्थायी सेवायोजन दिया गया है उन्ही आधारों पर शेष बचे भू-विस्थापित एवं मकानों के अधिग्रहण से प्रभावित परिवार के एक सदस्य को स्थायी सेवायोजन दिया जाये। परियोजना के शेष बचे विस्थापित जिन्हे दो दशक तक परियोजना द्वारा छला गया एवं स्थायी सेवायोजन से विमुख रखा गया उन्हे विस्थापन भत्ता एक मुश्त दिया जाये। परियोजना द्वारा कैजुवल एवं अन्य आधारों पर नियुक्त किये गये विस्थापित परिवार के सदस्यों को विस्थापित कोटे में दिये गये सेवायोजन की सूची में सम्मिलित न करते हुए उनके परिवार के सदस्यों को विस्थापनोपरान्त मिलने वाले सेवायोजन एवं लाभ दिये जाये। जनवरी २९, २००८ को अनपरा तापीय परियोजना के अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों तथा विस्थापित प्रतिनिधियों/जनप्रतिनिधियों के बीच हुई वार्ता के सम्बन्ध में लिये गये निर्णय के अनुसार स्थायी सेवायोजन के मुद्दे पर मुख्यालय के सक्षम अधिकारी/प्रमुख सचिव र्जा की उपस्थिति में त्रिपक्षीय वार्ता करायी जाये। उत्तर-प्रदेश राज्य विद्युत परिषद (भूमि अध्यापित) से प्रभावित परिवार के सदस्य की नियुक्ति (प्रथम संशोधन) विनियमावली-१९९४ जो कि अवैधानिक है उसे तत्काल वापस लिया जाये। अनपरा तापीय परियोजना के लिये भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों को नियमानुसार शेष बचा मुआवजा अविलम्ब ब्याज सहित दिया जाये। अनपरा तापीय परियोजना के जिन बचे विस्थापितों@मकान प्रभावित परिवारों को जिन्हे आवासीय प्लाट नहीं दिया गया है उन्हे आज की तिथि में बढ़े परिवार की संख्या के अनुसार प्लाण्ट दिया जाये। कैमूर सर्वे प्रक्रिया के अनुसार न्यायालय सहायक अभिलेख अधिकारी के आदेशानुसार सभी परिवारों कोे जिनकी भूमि परियोजना द्वारा अधिग्रहित कर ली गयी है उन्हे नियमानुसार प्रतिकर एवं स्थायी सेवायोजन दिया जाये। वनाधिकार अधिनियम २००६ के तहत ग्राम पिपरी एवं बेलवादह के आदिवासियों@अनुसूचित जनजाति के परिवारों को दी गयी जमीनों पर परियोजना को बल पूर्वक कार्य करने से रोका जाये तथा ऐसे परिवारों  की भूमि पर निर्माण कार्य कराने से पूर्व अनुसूचित जनजाति के भूमि अधिग्रहण के सन्दर्भ में केन्द्र सरकार द्वारा जारी दि’ाा-निर्दे’ाों एवं उत्तर-प्रदे’ा सरकार द्वारा घो”िात पुर्नवास एवं पुर्नबसाहट नीति २०१० का अनुपालन सुनि’िचत किया जाये। निर्माणाधीन अनपरा ‘सी’ एवं ‘डी’ परियोजना में सृजित होने वाले कुशल/अद्र्धकुशल/अकुशल श्रेणी के कार्य के लिए विस्थापित/परियोजना प्रभावित परिवारों के लिये ५० प्रतिशत आरक्षण दिया जाये तथा परियोजना द्वारा विस्थापित/प्रभावित परिवारों के सदस्यों को तकनीकी प्रशिक्षण देकर उन्हे योग्यतानुसार रोजगार उपलब्ध कराया जाये तथा १०.४.२०१० को अ.ता.वि.गृह अनपरा प्र’ाासन, लेन्को अनपरा पावर कम्पनी प्र’ाासन व विस्थापित प्रतिनिधियों के मध्य हुई वार्ता में बिन्दु संख्या १२,१४ में  लिये गये निर्णय का अनुपालन सुनि’िचत कराया जाये।निर्माणाधीन अनपरा ‘सी’ एवं ‘डी’ परियोजना में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार उपलब्ध कराया जाये। अनपरा तापीय परियोजना के विस्थापित प्रतिनिधियों, प्रबन्धन एवं प्रशासन की एक त्रिपक्षीय सेल बनायी जाये जो विस्थापितों के सेवायोजन@अस्थायी सेवायोजन एवं अन्य बिन्दुओं पर आवश्यक पहल करे। अनपरा परियोजना के निर्माणाधीन ‘डी’ परियोजना क्षेत्र में स्थायी रूप से निवास कर रहे विस्थापित परिवारों को बिना सेवायोजन एवं प्लाट उपलब्ध कराये उन्हे बल पूर्वक नहीं हटाया जाये। दिनांक १३ नवम्बर, २०१० को आदिवासी-विस्थापित श्रमिक नेता राम दुलारे पनिका के अपहरण एवं उसके हत्या के प्रयास में लिप्त निजी औद्योगिक घरानों के ‘ाीर्”ा अधिकारियों एवं सम्बन्धित ठेकेदारों के विरूद्ध कठोर कार्रवाई कर उन्हे जेल भेजा जाये तथा क्षेत्र में विस्थापितों एवं श्रमिकों का नेतृत्व करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की जानमाल की सुरक्षा सुनि’िचत की जाये। वर्षों से बार-बार विस्थापितों के आन्दोलन को बल पूर्वक दबाने का प्रयास किया गया तथा प्रशासनिक हस्तक्षेप से होने वाले समझौतों का अनुपालन नहीं सुनिश्चित किया गया जिससे हजारों आदिवासियों@दलित परिवारों के समक्ष भूखों मरने की समस्या खड़ी हो रही है ऐसे में अनपरा-सी एवं डी परियोजना में कार्यरत ठेकेदारी मजदूरों द्वारा स्वत: कार्य बहि”कार किया गया तथा विस्थापित एवं श्रमिक प्रतिनिधि के साथ घटित दुर्घटना का विरोध दर्ज कराया जा रहा है।

सोमवार, 29 अगस्त 2011

जनपद सोनभद्र स्थित म्योरपुर विकास खण्ड के भाठ क्षेत्र स्थित ग्राम सभा रणहोर, कुलडोमरी, पाटी, बेलहत्थी, सिन्दूर, औड़ी एवं चोपन विकास खण्ड की ग्राम सभा बैरपुर, कनहरा, परसोई, पनारी, जुगैर के ग्रामीणों की समस्याओं के सन्दर्भ में विस्तृत रिपोर्ट।


जनपद के दो विकास खण्डों में पड़ने वाले भाठ क्षेत्र की भौगलिक परिस्थतियां काफी दुरूह हैं। भौगोलिक परिस्थितियों को देखकर अनुभव होता है कि यहां रहने वाले ग्रामीण किसी दैवीय आपदा के कारण 18 वीं सदी का पशुवत जीवन जी रहे हैं भाठ क्षेत्र आजादी के छः दशक बाद भी सड़क, पानी, शिक्षा एवं चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। सड़क न हो पाने के कारण लगभग 80 हजार से एक लाख की आबादी जिसमें मूलतः खरवार, गोड़, अगरिया, पनिका, बैगा (अनुसूचित जनजाति) तथा चमार, बियार, बैसवार एवं कोल (अनुसूचित जाति) के लोग है वे विकास की मुख्यधारा से कटे हुए हैैं। नक्सल प्रभावित इस जनपद में अपनी उपेक्षा के कारण आदिवासियों/वनवासियों का रूख नक्सल गतिविधियों की ओर बढ़ रहा है। भाठ क्षेत्र में जो वर्तमान में कहीं--कहीं डब्ल्युबीएम सड़के हैं, सम्बन्धितों के भ्रष्टाचार के कारण स्थिति यह है कि पशु भी रास्तों पर नहीं चल सकता। बीमार ग्रामीणों को उनके परिजन खटिये पर लादकर 30 से 40 किमी पहाड़ो के दुर्गम रास्तों से पैदल यात्रा के बाद ही प्राथमिक इलाज करा पाते हैं। गम्भीर रूप से बीमार सकैड़ों ग्रामीणों की जान इस 30 से 40 किलोमीटर की यात्रा करने में ही निकल गयी। गर्भवती महिलाओं की स्थिति गम्भीर होने पर उन्हे उपरोक्त परिस्थितियों में ही चिकित्सा उपलब्ध करायी जा सकती है। ऐसी परिस्थितियों में गर्भवती महिलाओं एवं प्रसव के दौरान होने वाली मृत्यु दर गम्भीर चुनौती खड़ा करती है जबकि आदिवासी एवं अनुसूचित जाति के लोगों का विकास केन्द्र एवं सरकार के मुख्य एजेण्डे में शामिल हैं। ऐसे में लगभग 40 किलोमीटर के विस्तार में फैले इस क्षेत्र में सड़को का न होना जनपद सोनभद्र के इस दुरूह भाठ क्षेत्र के विकास के पहिए की गति को बयां करता है।

40 किमी विस्तार क्षेत्र में फैले पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण तथा विगत तीन-चार वर्षों में पर्याप्त वर्षा न होने के कारण भाठ क्षेत्र में जल स्तर दिन-प्रतिदिन नीचे जा रहा है। पर्याप्त पेयजल, सिंचाई के लिए जल एवं पशुओं के भरण पोषण हेतु जल उपलब्ध न हो पाने के कारण वर्ष 2009 के अप्रैल एवं मई माह में सैकड़ो पशुओं की पानी के अभाव में अकाल मौते हुयी हैं। सैकड़ों आदिवासियों एवं वनवासियों ने जल के अभाव में अपना पूरा कुनबा एवं मवेशी लेकर डिबुलगंज के आस-पास रिहन्द जलाशय के किनारे आसमान के नीचे बसेरा बना रखा है। स्वयं व मवेशियों को जिन्दा रखने के लिए आदिवासियों/वनवासियों का यह संघर्ष विकास की एक विपरीत तस्वीर बयां कर रहा है। पर्याप्त  जल के अभाव में पशुओं के लिए चारा नहीं उपलब्ध है। हजारों एकड़ भूमियां बन्जर पड़ी हैं, परिस्थितियां भयावह अकाल की चेतावनी दे रहा है। जिला प्रशासन को परिस्थितियों से अवगत कराने के बाद भी कोई गम्भीर प्रयास न किये जाने के कारण स्थितियां दुरूह-भयावह होती जा रही है।


40 किमी विस्तार क्षेत्र में फैले भाठ क्षेत्र में बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं है जबकि सोनभद्र के दक्षिणांचल में लगभग 10000 मे.वा. बिजली का उत्पादन किया जाता है। भाठ क्षेत्र में रहने वाले 50 प्रतिशत आदिवासियों/वनवासियों की पैत्रिक भूमि रिहन्द जलाशय के डूब क्षेत्र में आने के कारण उनकी पीढ़ियों को भूमि रिहन्द जलाशय के लिए अधिग्रहित कर ली गयी। मुआवजे स्वरूप उन्हे तत्कालीन सरकार द्वारा चन्द रूपयों में मुआवजा दिया गया एवं भाठ क्षेत्र के दुरूह भौगोलिक परिस्थितियों में बसने के लिए भूमि उपलब्ध करायी गयी। आज रिहन्द जलाशय के जल से दर्जनों तापीय विद्युत परियोजना एवं जल विद्युत परियोजनाएं हजारों मे.वा. बिजली उत्पादन कर रही है।  राष्ट्रहित में रिहन्द जलाशय के किनारे रिहन्द जलाशय के लिए जिनकी उपजाऊ भूमियों का अधिग्रहण कौड़ियों के भाव किया गया उन्हे बन्जर, पथरीली एवं पहाड़ों में स्थित भूमियों पर बया गया है जहां वो तिल-तिल कर मर रहे है।  भाठ क्षेत्र में बिजली लोगों के लिए सपने जैसी बात लगती है। आज भी भाठ क्षेत्र से गुजरने वाली दसों हजार मे.वा. की पारेषण टावर भाठ क्षेत्र के किसने से गुजरकर पूरे भारत को रोशन कर रही है तथा भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है। भाठ क्षेत्र के आदिवासी एवं वनवासी बिजली कैसे होती है ऐसी अनुभूति भी नहीं कर पा रहे हैं। लोक तान्त्रिक व्यवस्था में मानवीय अधिकारों का हनन की इससे बड़ी मिशाल और क्या हो सकती है जिनका सर्वस्य राष्ट्र निर्माण के लिए महत्वपूर्ण बिजली उत्पादन के लिए समर्पित हुआ हो उन्हे बिजली के दो जलते बल्ब भी देखना मयस्सर नहीं हो पा रहा है।

भाठ क्षेत्र में मूलतः आदिवासी एवं अनुसूचित जाति के लोग निवास करते हैं जिनमें हजारों बच्चे निकट स्कूल न हो पाने के कारण स्कूल का मुंह भी नहीं देख पा रहे है। पूर्व माध्यमिक विद्यालयों के बाद लकड़ियों एवं लड़कों की आगे की शिक्षा के लिए पूरे क्षेत्र में कोई विद्यालय नहीं है। क्षेत्र की भौगोलिक, आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के कारण बच्चे की आगे की शिक्षा नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं। दुरूह भौगोलिक परिस्थितियों के कारण शिक्षक उस क्षेत्र में पठन-पाठन का कार्य नहीं करा पाते जिस कारण सरकार की विभिन्न शिक्षा के प्रचार-प्रसार से सम्बन्धित योजनाएं परिस्थितियों के कारण ध्वस्त हो रही हैं।


भाठ क्षेत्र में चिकित्सा व्यवस्था शून्य है कोई भी प्राथमिक उपचार केन्द्र या अन्य अस्पताल भाठ क्षेत्र में नहीं कार्यरत है। ऐसी परिस्थिति में गम्भीर रूप से बीमार लोगों को उनके परिजन खटिया पर लादकर  30 से 40 किलोमीटर की यात्रा सात से आठ घण्टे में तय कर अनपरा, रेनुकूट एवं अनपरा, रेनुकूट, अनपरा जैसे स्थानों पर उन्हे इलाज मिल पाता है। अविलम्ब चिकित्सा सुविधा न उपलब्ध होने के कारण मातृ प्रसव मृत्यु, अकाल मौतों तथा चिकित्सा के अभाव में मृतकों की संख्या काफी अधिक है।

40 किलोमीटर विस्तार क्षेत्र में फैले भाठ क्षेत्र में रोजगार के साधन शून्य है। केन्द्र सरकार की महत्वकांक्षी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना इस क्षेत्र में जनप्रतिनिधियों एवं सम्बन्धित अधिकारियों के लिए भ्रष्टाचार का साधन मात्र बनकर रह गयी है। नरेगा की मूल भावनाओं के विपरीत मानव दिवस/मानव श्रम की अधिकता वाले कार्यों की जगह आपूर्ति आधारित कार्य ज्यादा किये जा रहे हैं। नरेगा के तहत बनाये जा रहे चेक डैम एवं अन्य कार्यों में निर्माण के आधार पर अवैध रूप से वन क्षेत्र से पत्थर, बोल्डर एवं सोलिंग की कागजों पर आपूर्ति प्राप्त कर करोड़ों रूपये का घोटाला किया जा रहा है। 

अनपरा, सोनभद्र 
7398337266

सोमवार, 8 अगस्त 2011

कनहर परियोजना की बदहाली का जिम्मेदार कौन ?


जिला सोनभद्र दुद्धी तहसील के उत्तर प्रदेश मसौदा प्रवण क्षेत्र है और इस क्षेत्र में निवासियों ज्यादातर जनजातियों अनुसूची हैं. इस क्षेत्र में एक 39.90 मीटर ऊंचे और 3.24 किलोमीटर लंबे बांध दुकान 0.15 MAF पानी नदी कनहर पर निर्माण किया जा रहा है सक्षम की सुविधा के लिए. यह 27,898 हेक्टेयर में सिंचाई प्रस्तावित है. रबी एवं खरीफ 26075Ha से बाहर में. 121.10 किलोमीटर की मदद के साथ सीसीए. मुख्य नहर और 150 किमी. लंबे distributaries और नाबालिगों. यह 122500 मीट्रिक टन का उत्पादन किया जाना प्रस्तावित है. जो अतिरिक्त अनाज के 108 गांवों के 15845 परिवारों के सत्तासी हज़ार की आबादी को लाभ होगा.

प्रारंभ में रुपये की एक परियोजना का अनुमान है. 27.75 करोड़ रुपए 1976 में फंसाया गया था और केन्द्रीय जल आयोग और उत्तर प्रदेश को भेजा गया था सरकार. वित्तीय मंजूरी उत्तर प्रदेश द्वारा दी गई सरकार ने अपने पत्र नहीं ख़बरदार. 258/79/23-C-4/1991AV/79 रुपये के लिए 29-04-1979 को. 27.75 करोड़ रुपए. हालांकि इस परियोजना के काम के निर्माण में वर्ष 1977 जो कुछ कारण कारण वर्ष 1985-86 में बंद कर दिया गया था शुरू कर दिया. इस परियोजना पर निर्माण कार्य वर्ष 2001-02 में जो फिर से परियोजना के गैर निकासी के कारण जून, 2003 के बाद से केन्द्रीय जल आयोग द्वारा बंद कर दिया था धन के आवंटन के बाद पुनरारंभ किया गया था.

रुपये के लिए एक विस्तृत परियोजना का अनुमान है. निदेशक, सिंचाई योजना के लिए 548.07 कोर भेज दिया गया है, केन्द्रीय जल आयोग, सेवा भवन, आर.के. पुरम, नई दिल्ली. यह शीघ्र ही कार्यसमिति द्वारा स्वीकृत होने की संभावना है. यह कार्यसमिति द्वारा इसकी मंजूरी के बाद पांच साल के भीतर परियोजना को पूरा करने का प्रस्ताव है. रुपये की राशि. 43.7902 करोड़ रुपए खर्च इस अवधि तक निष्पादित कार्यों के लिए किया गया है 03/2007 तक. रुपए का प्रावधान. इस साल जिनमें से रुपये की मंजूरी 2007-08 के लिए 5.00 करोड़ रुपए किया गया है. भूमि का decrital मूल्य के लिए 1.78 करोड़ दिया गया है.
- मुख्य अभियंता
Bansagar नहर परियोजना
इलाहाबाद 

दिग्विजय सिंह
  महासचिव  आखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी

" योजना को पुनरीक्षण किया जाये "




  






" कांग्रेस जनता से माफ़ी मांगे, जिस योजना का नाम लेकर वे ३० वर्षो तक  चुनाव लड़ते रहे, अब वे उसी का विरोध कर रहे है, मैं यह योजना पूर्ण कराकर ही दम लूँगा, चाहे मुझे कोई भी कीमत चुकानी पड़े."
  

 
सीएम प्रसाद
विधायक-दुद्धी, सोनभद्र


विजय सिंह गौड़
पूर्व विधायक-दुद्धी, सोनभद्र


"बूंद-बूंद तरसते दुद्धी के लिए कनहर परियोजना एक वरदान है यदि इसका निर्माण नहीं होता है तो यह एरिया मरुस्थल में बदल कर रह जायेगा" 






देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने सोनभद्र भ्रमण के दौरान कहा था की यह स्थान भारत का स्विट्जर्लैंड बनेगा, उन्होंने जिले में कई परियोजनाओ का शिलान्यास भी किया, अब कांग्रेस नेताओ को ही उसमे कमी नज़र आने लगी है

वर्तमान मुख्यमंत्री माननीय सुश्री मायावती जी  के द्वारा शिलापट्ट

तब  तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय नारायण दत्त तिवारी के द्वारा शिलापट्ट
आखिर किसके हाथो और कब
होगा कनहर का उद्धार ?

नोट:- कुछ टिप्पणियों एवं चित्रों के अंश KAIMOOR TIMES के मई २०११ के अंक से संकलित की गई है

महात्मा गाँधी रास्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम

 " यहाँ अफसर श्रमिक हित का कितना ख्याल रखते है इसका अंदाजा सिर्फ इस बार से लगाया जा सकता है की जनपद सोनभद्र में वर्ष २००८-२००९ की मजदूरी का भुगतान अभी तक बाकि है "


 केंद्रीय ग्रामीण राज्यमंत्री 
भारत सरकार


नरेगा योजना के तहत काम करने के इच्छुक मजदूरों का जाब कार्ड नहीं बनाया जा रहा है, नरेगा योजना के बारे में व्यापक प्रचार-प्रसार न होने के कारण मजदूरों का जमकर शोषण हो रहा है, काम करने वाले मजदूरों के जाब कार्ड नियमित रूप से भरे नहीं जा रहे हैं, नरेगा के तहत प्रदत्त सुविधाओं को कार्य स्थल पर मुहैया नहीं कराया जा रहा है, विगत दो-तीन वर्षों में नरेगा योजना के तहत काम करने वाले मजदूरों का लाखों रूपये बकाया, बैंकों में आदिवासियों/वनवासियों से खाता खुलवाने के नाम पर वसूली की जा रही है जिसमें तथा कथित जनप्रतिनिधियों के अलावा स्थानीय बैंक के कर्मचारियों की संलिप्तता है, मजदूरों को बैंको से सीधे भुगतान की जगह तथाकथित दलालों के माध्यम से बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से भुगतान किया जा रहा है जिससे मजदूरों की वाजिब मजदूरी का पैसा भी तथाकथित दलाल हड़प रहे हैैं। भाठ क्षेत्र के 40 किलोमीटर के विस्तार क्षेत्र में कोई बैंक न होने के कारण मजदूर चार से पांच घण्टे पैदल चलकर भुगतान लेने बैंको तक आते हैं, बैंक कर्मचारियों द्वारा जान बूझकर मजदूरों के साथ आमनवीय व्यवहार किया जाता है एवं उनके खाते में रूपये होते हुए भी उन्हे समय पर भुगतान नहीं किया जाता तथा मजदूर हफ्तों भुगतान के लिए बैंको का चक्कर लगाता रहता है एवं रोजगार से विमुख रहता है। बैंकों में नरेगा के मजदूरों का खाता खुलने से बैंको का कार्य प्रभावित हो रहा है कर्मचारियों की कमी के कारण बैंको द्वारा मजदूरों का भुगतान नियमित रूप से नहीं किया जा रहा है।



शक्ति आनंद 
अनपरा , सोनभद्र 
7398337266