सोमवार, 7 मई 2012

अवैध गिट्टी और रेत से हो रहे है सरकारी निर्माण


जिले में खनिज का अवैद्य उत्खनन एवं तस्करी बदस्तूर जारी है। जिले के लुंज-पुंज प्रशासनिक व्यवस्था के चलते कई वषों से हो रही बहुमूल्य खनिज की तस्करी चल रही है। जिसमें चूना पत्थर, के्रसर गिट्टी बोल्डर जैसे कीमती खनिज हैं। काफी दिनों से नेशनल हाईवे से अवैद्य खनिज बड़े पैमाने से परिवहन हो रहे हैं। इस पर प्रशासन द्वारा पकडने अथवा रोक लगाने की कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। अवैद्य परिवहन के अलावा जिले में खनिज के अवैद्य उत्खनन एवं चोरी बड़े पैमाने पर की जा रही है। जिला मुख्यालय से लगभग 20 कि.मी. दूर बिल्ली-मुारकुण्डी में नेशनल हाईवे के किनारे पर गिट्टी एवं बोल्डर का अवैद्य उत्खनन हो रहा है।  काफी तादाद में यहां से गिट्टी एवं बोल्डर अन्यत्र सप्लाई की जा रही है।  काफी दिनों से उत्खनन जारी है, परंतु सम्बंधित विभाग  बिलकुल मौन है। प्राप्त जानकारी के अनुसार यंहा से निकली जा रही गिट्टी स्थानीय परियोजनाओं एवं पंचायत में ही निर्माण कार्यों में खपाया जा रहा है। वहीं जिले में हो रही इस मनमानी पर प्रशासन की चुप्पी से अवैद्य उत्खनन को प्रोत्साहन मिल रहा है। इसके अलावा जिले के चोपन, डाला एवं चुर्क क्षेत्र में भी पत्थर, गिट्टी, मुरूम आदि खनिजों के उत्खनन एवं परिवहन हो रहे हैं। ज्ञात हुआ है कि जिले में करोड़ों रूपयों के लागत पर हो रहे विभिन्न निर्माणों में ये खनिज उपयोग में लाये जा रहे हैं। जहां मनमाफिक दर पर निर्माणों के टेंडर होने के बावजूद भी ठेकेदारों द्वारा खनिज की चोरी कर रायल्टी राशि की बचत कर सरकार के लाखों रूपये की राजस्व की हानि हो रही है। खनिज विभाग एवं प्रशासन द्वारा खनिज के अवैद्य उत्खनन एवं चोरी पर कार्रवाई नहीं किये जाने के परिणाम स्वरूप तस्करों के हौसले और बुलंद होते जा रहे हैं।    

चैथी बार विस्थापन का भय


डाला स्थित सीमेंट बनाने वाली कंपनी द्वारा स्थानीय भलुआ टोला में मलिन बस्ती के लगभग दो दर्जन मकानों में रहने वाले लोगों को बेदखल करने के उद्देश्य से बाउंड्री का निर्माण कराया जा रहा है, जिसका स्थानीय लोगों ने जम कर विरोध किया। रहवासियों ने बताया कि सीमेंट कंपनी का कहना है कि उक्त क्षेत्र भलुआ माइंस के परिधि में आती है इसलिए उक्त स्थान पर बाउंड्री का निर्माण कराया जा रहा है। विगत 40 वर्षों से निवास कर रहे दलितों को अपने आशियाना उजड़ जाने की खौफ सताए जा रहा है। रहवासियों की मांग है कि उक्त कंपनी व प्रशासन द्वारा आवास व पीने के लिए पानी की व्यवस्था कराई जाए तब जाकर बाउंड्री का कार्य कंपनी द्वारा कराया जाय अन्यथा बड़े पैमाने पर आंदोलन होगा। जिले में दलितों का उत्पीड़न हो रहा है। कहा कि जेपी समूह द्वारा बाउंड्रीवाल कार्य को रोकते हुए सर्वप्रथम इनके रहने के लिए घर व पीने के लिए पानी की व्यवस्था करे। इसके पूर्व भी जेपी समूह द्वारा यह बस्ती उजड़वाने का प्रयास किया जा चुका था लेकिन जन आक्रोश को देखते हुए जेपी समूह पीछे हट गया। भलुआ टोला में लगभग चालीस वर्षों से तीसरी बार विस्थापित होकर रह रहे दलित आदिवासियों को फिर एक बार उजाड़ कर उन्हें बेघर कर दिया गया। ओबरा विद्युत नगरी से सटे भलुआ टोला क्षेत्र में लगभग एक हजार से भी अधिक दलित आदिवासियों को अपना आशियाना उजाड़े जाने का भय खाए जा रहा है। वर्तमान स्थिति में भलुआ माइंस के अस्तित्व में आने के पहले ही यह बस्ती आबाद हो चुकी थी। उधर जेपी समूह के सीनियर मैनेजर सुधीर मिश्रा ने बताया कि जिन लोगों को बाउंड्री से तकलीफ है वे हमसे मिले हम मामले को समझ कर मैनेजमेंट को बताएगें। रही बात पानी और अन्य जन कल्याण कार्यक्रमों की तो इसके लिए जेपी समूह हर समय तैयार है।

मरने के कगार पर खड़ा है ऊर्जांचल का संयुक्त चिकित्सालय


ऊर्जांचल मंे अच्छे अस्पताल के अभाव में यहां के निवासी कुछ नामी डाॅक्टरों व छोलाछाप डाॅक्टरों के हाथों  हमेषा से लूटे जा रहे है। जबकि ऊर्जांचल औद्योगिक क्षेत्र के रूप में सम्पूर्ण भारत में विख्यात है। इन औद्योगिक संस्थानों से देष के लगभग सभी राज्यों में ऊर्जां के संसाधनों का निर्यात किया जाता है। चाहे वह बिजली के रूप में हो या फिर कोयले के रूप में। क्षेत्रफल को देखे तो ऐसा प्रतित होता कि परियोजनाओं के अतरिक्त यहां कुछ भी नहीं है। देष को अरबों रूपये का राजस्व देने वाला यह क्षेत्र आज भी एक अच्छे अस्पताल के अभाव मंे निरन्तर जूझ रहा है।  

जब अनपरा परियोजना के निमार्ण कराया गया था तब अनपरा परिक्षेत्र के डिबुलगंज में सरकार द्वारा यहा के लोगों को चिकित्सकिय सुविधा प्रदान करने के लिये एक उच्च तकनिकी सुविधाओं से लैस अस्पताल के निमार्ण का कार्य प्रारम्भ कर दिया गया। कार्य सम्पन्न होने मंे ज्यादा समय नहीं लगा जैसे अस्पताल की आवष्यकता यहां के निवासियों को थी, वह उनके सामने बनकर खड़ा था लेकिन आज भी इसकी जर्जर हालत को देख कर लगता है मानों यह बस खड़ा ही है। जिसका सबसे मूल कारण राज्य सरकार एवं परियोजना की उदासिनता भरा रवैया है। इस अस्पताल का उद्घाटत बड़े-बड़े नेताआंे के द्वारा दो बार किया गया। लेकिन आज तक यह अस्पताल अपने आवष्यक चिजों के लिए तरस रहा है। उपकरणों के अभाव मंे यह अस्पताल दम तोड़ रहा है, कुछ सरकारी दुवाआंे एवं गिने चुने डाॅक्टरों के अलावा यहां कुछ भी नहीं है। कहने के लिए तो यहां हर इमर्जेंसी से निबटने के लिए सारे कक्ष उपलब्ध है लेकिन उपकरणों एवं डाक्टरों का टोटा है। जिससे यहां के निवासी या परियोजनाओं में कार्य करने वाले लोग एक छोटी सी बीमारी के इलाज के लिए भी नीजि अस्पताल के डाॅक्टरों द्वारा लूटे जा रहे है। गम्भीर दुर्घटना की स्थिति में यहां के लोगों की मौत भी लगातार कई वर्ष हो रही है इसका प्रमुख कारण यहां एक अच्छे अस्पताल का अभाव रहा है। इस सरकारी अस्पताल की उपेक्षा ने इसमें घी का काम किया। जिससे यहां के रहवासी काल के गाल में लगातार प्रवेष कर रहे है। ज्यादतर दुर्घटनाएं रोड पर चलने वाले बड़े वाहनों से होता है जो परियोजनाओं के कार्यों में संलग्न है। मौत का दूसरा प्रमुख कारण यहां बढ़ती प्रदूषण की समस्या है। ऊर्जांचल के इस क्षेत्र में इतना प्रदूषण है कि यह भारत का साँतवा सबसे प्रदूषित स्थान बन चुका है जिससे यहां निवास करने वाले लोग किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त है। जिसमें कैंसर से लेकर बल्डपे्रसर, बल्डकैंसर, टीवी, तथा मलेरियाँ यहां के प्रमुख बीमारियों में एक है यहाँ निवास करने वाले लोग लगभग 40 प्रतिषत गैंस की बीमारी से प्रभावित है। 

कुछ यही हाल यहा पर बने चीरघर (पोस्टमार्टम हाऊस) का है। जिसे उर्जान्चल परिक्षेत्र में दो पुलिस चैकियों एवं दो थानों को मद्देनज़र रखते हुए शवों के अन्त्यपरिक्षण करने के उद्देष्य से बनवाया गया था। अस्पताल के साथ-साथ चीरघर के निमार्ण मंे भी परियोजना एवं सरकार द्वारा करोड़ों रूपये खर्च की गये परन्तु सुविधाओं, उपकरणों एवं चिकित्सकों की अभाव में इस चीरघर में आज तक किसी शव का अन्त्यपरिक्षण नहीं किया जा सका है। जिससे पुलिस को शवों के अन्त्यपरिक्षण करने के लिये उर्जान्चल से लगभग 100 किमी दूर दुद्धी जाना पड़ता है। जिससे शवों को लाने-ले जाने में काफी असुविधा उत्पन्न होती है। 

परियोजना के इस अस्पताल के निमार्ण मंे परियोजना एवं सरकार द्वारा करोड़ों रूपये खर्च की गये लेकिन अस्पताल चलाने के लिए जिसकी आवष्यकता सबसे ज्यादा होती उनकों उपलब्ध कराने में राज्य सरकार एवं परियोजना दोनों ही कतराती रही। जिसका परिणाम यह हुआ कि यहां के वासिंदे लगातार बीमारियों की गिरफ्त में फसते जा रहे है।