बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

शक्तिनगर से वाराणसी के लिए सीधे ट्रेन न मिलने से उर्जान्चलवासी निराष


साल भर से चल रहे आंदोलनों प्रयासों के बावजूद नतीजा रहा सिफर

रेल मंत्री पवन बंसल ने पूरे देश में 67 एक्सप्रेस ट्रेन, 27 पैसेंजर सहित कुल 93 नई ट्रेनें चलाई लेकिन ऊर्जांचल सहित पूरे जनपद के खाते में एक भी ट्रेन नहीं आई। शक्तिनगर से वाराणसी के लिए सीधे ट्रेन घोषणा का लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे थे लेकिन उनकी इस हसरत पर भी मौजूदा रेल बजट में पानी फिर गया। रेल बजट में अपने क्षेत्र का नाम देखने के लिए लोग दिन भर टीवी से चिपके रहे। लेकिन अपने क्षेत्र के लिए कुछ नया न होने पर काफी मायूस रहे। ऐसे में रेल सुविधाओं के लिए लगातार आंदोलनरत ऊर्जांचल के लोग काफी मायूस हैं।

पंकज मिश्रा
क्षेत्र के लोग पिछले एक साल से शक्तिनगर से वाराणसी तक सीधी ट्रेन के लिए कई बार आंदोलन किया। बावजूद बजट में कुछ नहीं मिला। ऊर्जांचलवासियों के लिए यह बजट पूरी तरह से फ्लाप रहा। पंकज मिश्रा, कांग्रेस नेता। 

हरदेव सिंह
ऊर्जांचल में रेलवे पटरियों का दोहरीकरण की बात कही जा रही थी लेकिन सिंगल पथ का भी विस्तार नहीं किया गया। ऐसे में यहां के लोगों में बजट को लेकर भारी हताशा है। हरदेव सिंह, ग्राम प्रधान-बेलवादह।

सुनील सिंह यादव
रेल मंत्री को मिर्चाधूरी रेलवे स्टेशन के फाटक को खोलने से लेकर भारी राजस्व देने वाले ऊर्जांचल क्षेत्र में रेलवे के विस्तार के लिए कई बार पत्र लिखा लेकिन बजट में नतीजा सिफर रहा। अब इसके लिए आंदोलन का सहारा लिया जाएगा। सुनील सिंह यादव, विधायक, ओबरा।

विजय कुमार सिंह
रेलवे मंत्री ने बड़ी चतुराई से फ्यूल सरचार्ज के नाम पर रेलवे टिकट और मालभाड़े का भार आम आदमी पर डाल दिया है। जो महंगाई में बढ़ोत्तरी करने में सहायक सिद्ध होगा।  विजय कुमार सिंह (मैनेजर, एलगी)।

अषोक यादव
रेल मंत्री ने किराया सीधे तौर पर नहीं बढ़ाया है लेकिन ईंधन के नाम पर माल भाड़ा आदि बढ़ने से सामनों की ढुलाई और महंगी होगी। जिसका खामियाजा आमजन को ही भुगतना पड़ेगा।  अषोक यादव (व्यापारी)

शक्ति आनन्द
ऊर्जांचल से देश रोशन होता है लेकिन रेल सुविधा का घोर अभाव सभी के लिए कष्टदायक है। बजट से लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। परियोजना होने के चलते यहां रेल पथ का और विस्तार होना जरूरी था, जिन बुनियादी सुविधाओं की दरकार थी उसमें से कुछ भी नहीं मिला। रेल मंत्री ने युवाओं को वाई-फाई का झुनझुना पकड़ा कर तसल्ली देने का काम किया है, ट्रेनों में वाई-फाई के जगह जरूरी सुविधाओं को दुरुस्त करने का काम किया जाना आवश्यक था। गंदे कोच और बदबूदार शौचालय भारतीय रेल की पहचान बनती जा रही है। शक्ति आनन्द, ग्राम पंचायत सदस्य-औड़ी। 

चुन्नू तिवारी
रेल बजट हर तबके को निराश करने वाली है। लोगों को मंत्री से बहुत अपेक्षाएं थी लेकिन वह खरे नहीं उतरे। नौकरी और कुछ ट्रेनों में वाई- फाई की सुविधा देकर युवाओं को लुभाने का प्रयास जरूर किया गया है। चुन्नू तिवारी, भाजपा नेता। 

अजय प्रकाष पाण्डेय
आशा के विपरीत बजट सबकुछ आशा के विपरीत हुआ है। लेकिन राहत इस बात की है कि आम लोगों और खासकर वरिष्ठ नागरिकों के लिए चार सौ स्टेशनों पर लिफ्ट की सुविधा दिए जाने की बात कही गई है। अजय प्रकाष पाण्डेय, ग्राम प्रधान-रणहोर।

जगदीष बैसवार
बुजुर्गों को बड़ी उम्मीद थी की उनके टिकटों में 30 से पचास प्रतिशत की रियायत मिलेगी लेकिन इस मामले में उनके हक में कुछ नहीं किया गया। बजट में बुजुर्गों की उपेक्षा की गई है। जगदीष बैसवार, पूर्व जिला पंचायत सदस्य-अनपरा। 

बालकेष्वर सिंह
इस बजट में कई प्रकार की निराशा जनक तथ्य है। पहला अनपरा सहित पूरे ऊर्जांचल में कोई नई सुविधा नहीं दी गई। दूसरा आम आदमी को कोई विशेष सहूलियत भी नहीं मिली है। बालकेष्वर सिंह, जिला पंचायत सदस्य-कुलडोमरी। 

अवधेष शुक्ला
रेल मंत्री से ऊर्जांचल में रेल सुविधा को बेहतर करने की बड़ी उम्मीद थी लेकिन बजट में इलाके को कोई तरजीह नहीं दी गई। इससे लोगों में नाराजगी है। थोड़ी उम्मीद इस बात से है कि डेढ़ लाख लोगों को नौकरी देने का ऐलान किया गया है। अवधेष शुक्ला, एडवोकेट। 

सुभाष चन्द्र
रेल मंत्री की बजट ने लोगों के सपने टूटे हैं। आम आदमी के लिए बजट में कुछ भी खास नहीं है। ई-टिकट का समय 23 घंटे करके थोड़ी सी राहत देने की कोशिश की गई है। सुभाष चन्द्र, क्षेत्र पंचायत सदस्य-औड़ी। 

रेल बजट-2013 पर उर्जान्चल की महिलाओं की ओर से प्रतिक्रया


रेल मंत्री पवन बंसल ने मंगलवार को जनता के सामने अपने पहले रेल बजट का पिटारा खोला। इस पिटारे से तमाम तरह की घोषणाएं भी की गयी। साथ ही बजट में महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रेल सुरक्षा बल महिला कर्मिकों की चार कंपनियों का गठन किया गया। परन्तु उर्जान्चल की महिलाएं रेल में इतनी सी सुरक्षा इन्तजाम से नाखुश नजर आयी। 

रेनु कुषवाहा
सरकार ने रेल में सफर तय करने वाली महिलाओं के प्रति चिंता नहीं जाहिर की है, अफसोस इस बात की है कि अक्सर ऐसा होता है कि मौके पर महिला पुलिस कर्मी होने के बाद भी घटना घट जाती है। इसलिए उन पर भी नजर रखने के लिए विशेष पुलिस की तैनाती की जानी चाहिए। - रेनु कुषवाहा, (जिला पंचायत सदस्य-कोटा)।

चन्द्रप्रभा पटेल
सिर्फ महिला सुरक्षा गार्ड की घोषणा की गयी है। जबकि सच तो यह है कि महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ महिला पुलिस के भरोसे नहीं की जा सकती। इसमें महिला-पुरुष दोनों होने चाहिए। - चन्द्रप्रभा पटेल (गृहिणी)।

करूणा
पुलिस प्रोटेक्सन में ही महिलाओं को सफर करना चाहिए। रेल बजट में घोषित चार कंपनी महिला सुरक्षा बल से काम नहीं चलने वाला है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए रेलवे स्टेशन के टिकट खिड़की से लेकर बोगी तक सुरक्षा इंतजाम होना चाहिए।- करूणा (गृहिणी)।

पूनम सिंह
इस बजट में महिलाओं के लिए सरकार का यह सार्थक कदम तारिफ के काबिल है। परन्तु इतने से काम नहीं चलेगा अभी सरकार को हर महिला बोगी के साथ अन्य बोगियों में भी विशेष सुरक्षा व्यवस्था करना चाहिए। -पूनम सिंह (प्रचार्या, अवद्युत भगवान राम पीजी कालेज)।

किरन देवी
ट्रेन में सफर करने वाली महिलाओं के लिए इतनी सुरक्षा कम है। सिर्फ महिला पुलिस के होने से सुरक्षा नहीं होती। रेल में सफर के दौरान ट्रेन में एक लेडिज डाक्टर के साथ महिलाओं की अन्य सुविधा की चीजें भी होनी चाहिए। - किरन देवी (ग्राम प्रधान, कुलडोमरी)

महिला सुरक्षा को लेकर सरकार काफी हायतौबा मचा रही थी लेकिन रेलवे में महिलाओं की यात्रा करने के लिए अलग से स्लीपर और एसी में महिला कोच का इंतजाम नहीं किया गया जिसके चलते महिलाओं को यात्रा में खतरे बने रहेंगे। -शषि उपाध्याय (नगर अध्यक्ष, महिला कांग्रेस, अनपरा)

रीता देवी
रेल बजट सभी तबके के लोगों को निराश करने वाली है महिलाओं के सुरक्षा और सुविधाजनक यात्रा के लिए कोई कारगर ऐलान नहीं किया गया है। यह बेहद निराशाजन रेल बजट है। महिलाओं के लिए सरकार को फिर से सोचने की जरूरत है।- रीता देवी (ग्राम प्रधान, औड़ी)

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

पुलिसिया कार्रवाई के आदि बन चुके हैं गरीब आदिवासी तबके के लोग


आबकारी अधीक्षक सोनभद्र के दिषा निर्देषन पर चलाये जा रहे अवैध मादक पदार्थों की बिक्री के रोकथाम के लिए एक सूत्रीय अभियान इस अवैध धंधे में लिप्त लोगों के लिए पुलिसिया कार्रवाई के आदि बन जाने का एक मिषाल खड़ा कर रहा है। प्रषासन द्वारा सारे हथकंडे अपनाये जाने के बावजूद भी आज तक इस जुर्म पर रोक नहीं लगाया जा सका। कार्रवाई तो होती है परन्तु दूसरे दिन से जमानत पर छूट कर आये अपराधियों द्वारा फिर उसी धन्धे में उतर जाना रोज की दिनचर्या बन चुकी है, क्या इस जुर्म को विभाग रोक पायी है, हर महीने छापेमारी के दौरान सैकड़ों कुंतल लहन और शराब नष्ट करने के बाद विभाग वापस चली जाती है परन्तु षाम होते-होते फिर से षराब की विक्री षुरू हो जाती है, विभाग कार्रवाई तो करती है लेकिन जिला प्रषासन द्वारा इनके निजी जिन्दगी के विषय में आज तक किसी ने झाकने की कोषिष नहीं की कि यह सब करने के पीछे क्या कारण है। 

अगर इनके बारे में जानकारी करना है तो इनके करीब जाकर देखिए सब कुछ लोगों के सामने होगा, इनमें से कुछ ऐसे हैं जो विस्थापितों घराने से ताल्लूकात रखते हैं, कोई धन्धा न होने के कारण एक मात्र यही इनके जीविकोपार्जन का प्रमुख स्रोत बना हुआ है। इनके निजी जिन्दगी में शासन द्वारा सुधार लाने की बजाय प्रषासन संविधान की धाराओं से अवगत कराकर एक बड़े अपराधी बनने का प्रमाण पत्र दे देती है, पुलिसिया कार्रवाई के आदि बन जाने के कारण परिवार को जीवित रखने के लिए इस गर्त में घुसते चले जाते हैं। देष को करोड़ों रूपये का राजस्व उपलब्ध कराने वाला यह परिक्षेत्र, जिसने रोषनी से लेकर खान सम्बंधित भारी मात्रा में राजस्व देष को उपलब्ध कराकर अपनेआप को गौर्ववान्वित महसूस कर रहा है एवं जिनके जमीन पर इतने बड़े उर्जा घर को खड़ा किया गया, आज वहीं मुजरिम बनकर या तो पुलिसिया कार्रवाई के आदि बन चुके हैं या फिर पेट की भूख से कैद होकर लोगों से मदद की गुहार लगा रहे हैं। विगत चार माह पूर्व आबकारी विभाग द्वारा इसी परिक्षेत्र में छापेमारी की गयी, छापेमारी के दौरान सूत्रों से पता लगा कि एक दलित महिला के घर में घुस कर तोड़-फोड़ कर कीमती सामानों को उठा ले गये। अभियुक्त राजकुमार के उपर धारा लगाकर पुलिस खोजबीन में जुटी थी, पुलिस के मुताबिक राजकुमार फरार चल रहा था, परन्तु घटना के वक्त राजकुमार अस्वस्थ्यता के कारण एक निजी अस्पताल में भर्ती चल रहा था। सदमें में आयी उसकी पत्नी विक्षिप्त होकर घुम रही है, लेकिन उसका सुध लेने वाला कोई नहीं है। यदि समय रहते इन गरीबों के उपर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले भविष्य में अभियुक्त राजकुमार के पत्नी की तरह हो सकता है अनगिनत भुक्तभोगी महिलायें विक्षिप्त होकर घुमती नजर आयेंगी।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

सोनभद्र


उत्तर प्रदेष के दक्षिण व पूर्वी सीमा क्षेत्र में स्थित सृजित जनपद सोनभद्र अपनी प्राकृतिक सम्पदाओं के विपुल भण्डारण, रिहन्द जलाषय व ऊर्जा के श्रोत केन्द्र के रूप में विष्व पटल पर अपना स्थान बना चुका हैं। जनपद की कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 664522 हेक्टेयर है जिसमें 3,69,973.3 है भूमि वन भूमि जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 61.2 प्रतिषत है। कुल वन क्षेत्रफल का 40 प्रतिषत भू-भाग वन क्षेत्र सर्वें प्राक्रियो के बाद वन क्षेत्र से अलग हो जाने की सम्भावना है। 

जनसंख्या की आधे से ज्यादा जनसंख्या वनों पर आधारित है तथा बढ़ती जनसंख्या के दबाव, क्षेत्र में हो रहे अनियमित, अनियमित विकाष कार्यो व सर्वे प्रक्रिया के नाम पर, एक बडे़ पैमाने पर वनों व वन क्षेत्र का विनाष हुआ है। इस विनाष से सबसे ज्यादा प्रभावित यहां के मूल निवासी हुए हैं जो रिहन्द जलाषय के निर्माण से पूर्व इस क्षेत्र में निवास करते थे, लेकिन रिहन्द जलाषय के निमार्ण के बाद यहां के निवासियों को पुनर्वास का दंष झेलना पड़ा, यह पुर्नवास एक बार ही नहीं वरन् दो से तीन बार झेलना पड़ा। यह पुनर्वास जितनी बार भी हुआ उनकी परेषानियाँ उतना ही बिकराल रूप धारण करती चली गयी। 

औद्योगिक संस्थानाओं के निमार्ण के साथ ही कुछ लोगों को नौकारियाँ दे दी गयी उनमें वे लोग थे जो उच्च जाति के या फिर अन्य पिछड़ी जाती के लोग थे, जबकि सबसे ज्यादा जनसंख्या अनसूचीत जाति या अनसूचित जनजाति की थी जो आज भी अपने पूराने वनवासी तरीके से अपना जीवन -यापन कर रहे हंै। ऊर्जांचल का भाट क्षेत्र जो अपने मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है यहां के निवासी अपना जीवन-यापन काफी कठिनाइयों से व्यतित कर रहे हैं। देष में कई बार चुनाव हुआ तथा कई बार देष के नेता बदले, लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। जब चुनाव नजदीक आता है तो बरसाती मेढ़क की तरह सभी नेता उनकी समस्याओं को जानने के नाम पर उनका मजाक उड़ते नजर आते हैं, कहने के लिए वे उनके नुमांइदे होते हैं जेा चुनाव बितने के बाद दिखाई तक नहीं देते। 

भाट क्षेत्र में निवास कर रहे लोगों की समस्याओं को देखे तो ऐसा लगता है कि ये लोग आज भी अपना जीवन आदिमानव की तरह व्यतित कर रहे हैं। विकास के नाम पर जो भी चीजें इनको मिलनी चाहिए थी वह आज तक नहीं मिली। यहां जाने के लिए आप को काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ेगा। बच्चों को पढ़ने के लिए यहां न तो स्कूल है और न ही पीने के लिए षुद्ध पानी की कितनी समस्या है, यहां इस बात से अंदाजा लागया जा सकता है कि लोगों को चुओं से पानी पीना पड़ता है तो सोचिए पषु का क्या हाल होता होगा, जबकि यहां के मूल निवासियांे का जीवन-यापन करने का मुख्य साधन पषुपाल एवं मक्के की खेती है। 

बरसात के समय में अच्छी बारीस न हो तो कृर्षि का मुख्य साधन भी बरबाद हो जाता है। जिससे इनके सामने बिकराल समस्या खड़ी हो जाती है। सरकारी महकमा इनका सुध न लिया है न लेने वाला है, पषु प्यास से मरते हैं और यहां की जनता भूख से। सरकार की तरफ से काफी योजनाएं आयी, लेकिन उन तक पहुची नहीं या फिर उसमें भी सरकारी महकमें द्वारा इतना लूट-खसोट की गयी कि जितनी मात्रा में उनको संसाधन प्राप्त होने चाहिए थे उन संसाधनों का आधा भाग भी उन तक नहीं पहुच पाता। कुछ ऐसी घटनाएं सामने आयी है जिसमें सरकारी महकमें द्वारा खुली लूट देखने को मिली। मनरेगा में कार्य कर चुके मजदूरों का बकाया आज तक पैसा उनकों नहीं मिला जिससे सरकारी कार्यों के तरफ से इनका मन उब गया है। पैसे के लिए मजदूरों ने हर सरकारी चैकठ पर दस्त दिया, लेकिन उनकी फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है। आज भी पैसों के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है ऐसी स्थिती यहां के दबे कुचले लोग नक्सली बनने के राह पर अग्रसर होने की स्थिती पैदाकर दी हैं। पानी के अभाव में यहां के लोग रिहन्द जलाषय का जल पीने के लिए बाध्य हैं जो पहले ही काफी प्रदूषित हो गया है।

रिहन्द जलाषय में पायी जाने वाली प्रदुषण कि मात्रा इसी बात से पता लगायी जा सकती है कि फ्लोराईड के कारण काफी मात्रा में लोग हड्डी सम्बन्धि रोगों से ग्रस्त हैं। पारा की मात्रा रिहन्द जलाषय में इस हद तक है कि जलाषय की मछलीयों तक मे पारा विद्यमान है जो यहां के निवासियों के पाचन तंत्र को विकृत करने में काफी सहायक है।

सूत्रों की माने तो सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान जो गरीबों को भोजन से लेकर रौषनी तक के साधन उपलब्ध कराती है वह भी भष्ट्राचार की भंेट चढ़ चुकी है। कोटेदारों द्वारा मनमाने तरीके से कोटा बांटने व दो से तीन महिनों में एक बार कोटे को खुलना और कोटे के सामनों का खुले बाजार में काला बाजारी से यहां के लोगों को मिलने वाले संसाधनों का कोई भी लाभ नहीं मिल रहा है। ऐसी स्थिती में यहां के आदिवासियों एवं वनवासियों के सामने अपने हक को पाने के लिए नक्सली बनने हेतु बाध्य कर रही हैं। अगर सरकार इनकी समस्याओं की तरफ ध्यान नहीं देती हैं तो ऐसे नक्सलियों की संख्या में भारी इजाफा होगा जो देष के लिए घातक साबित होगा तथा सरकार इनकों समाज के मुख्य धारा से जोड़ने में असमर्थ हो जायेगी। इसके साथ ही देष का भविष्य भी अधंकारमय हो जायेगा। 

भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला-सोनभद्र


जनपद-सोनभद्र भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला है। इस जिले का मुख्यालय राबर्ट्सगंज है। सोनभद्र जिला, मूल मिर्जापुर जिले से 4 मार्च 1989 को अलग किया गया था। 7,388 वर्ग किमी क्षेत्रफल के साथ यह उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है। यह 23.52 तथा 25.32 अंश उत्तरी अक्षांश तथा 82.72 एवं 93.33 अंश पूर्वी देशान्तर के बीच स्थित है। जिले की सीमा पश्चिम में मध्य प्रदेश, दक्षिण में छत्तीसगढ़, पूर्व में झारखण्ड तथा बिहार एवं उत्तर में उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जिला है। रार्बट्सगंज जिले का प्रमुख नगर तथा जिला मुख्यालय है। जिले की जनसंख्या 14,63,519 है तथा इसका जनसंख्या घनत्व उत्तर प्रदेश में सबसे कम 198 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। जनपद की कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 664522 हेक्टेयर है जिसमें 3,69,973.3 है भूमि वन भूमि जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 61.2ः है। कुल वन क्षेत्रफल का 40ः भू-भाग वन क्षेत्र सर्वें प्राक्रियो के बाद वन क्षेत्र से अलग हो जाने की सम्भावना है।

जिले में दो भौगोलिक क्षेत्र हैं जिनमें से क्षेत्रफल में हर एक लगभग 50 प्रतिशत है। पहला पठार है जो विंध्य पहाड़ियों से कैमूर पहाड़ियों तक होते हुए सोन नदी तक फैला हुआ है। यह क्षेत्र गंगा घाटी से 400 से 1,100 फिट ऊंचा है। दूसरा भाग सोन नदी के दक्षिण में सोन घाटी है जिसमें सिंगरौली तथा दुध्दी आते हैं। यह अपने प्राकृतिक संसाधनों एवं उपजाऊ भूमि के कारण विख्यात हैं। इस जनपद का अधिकाषः भाग विन्ध्यपर्वत श्रृखलाओं का एक भाग हैं। उत्तरी भारत में भूमि काली व कुछ गहरायी लिये है तथा अन्य भागों में भूमि छिछली स्तर की षेल्स व क्वार्टज युक्त है। मुख्य षैैल प्रकार सैण्ड स्टोन, डोलोमाइट एवं लाइम स्टोन है। यहाॅ की मुख्य भौगोलिक सरचना उत्तर में पोस्ट विन्ध्यम् तथा दक्षिण में गोडवाना संरचना युक्त है। जो स्वयं में कोयले का विपुल भण्डार अपने गर्भ स्थल में संजोये हुए है। 

जिले में बहने वाली सोन नदी जिले में पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। इसकी सहायक नदी रिहन्द जो छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश के पठार से निकलती है सोन में जिले के केन्द्र में मिल जाती है। रिहन्द नदी पर बना गोवन्दि वल्लभ पंत सागर आंशिक रूप से जिले में तथा आंशिक रूप से मध्य प्रदेश में आता है।

स्वतंत्रता मिलने के लगभग 10 वर्षों तक यह क्षेत्र (तब मिर्जापुर जिले का भाग) अलग-थलग था तथा यहां यातायात या संचार के कोई साधन नहीं थे। पहाड़ियों में चूना पत्थर तथा कोयला मिलने के साथ तथा क्षेत्र में पानी की बहुतायत होने के कारण यह औद्योगिक स्वर्ग बन गया। यहां पर देश की सबसे बड़ी सीमेन्ट फैक्ट्रियां, बिजली घर (थर्मल तथा हाइड्रो), एलुमिनियम एवं रासायनिक इकाइयां स्थित हैं। साथ ही कई सारी सहायक इकाइयां एवं असंगठित उत्पादन केन्द्र, विशेष रूप से स्टोन क्रशर इकाइयां, भी स्थापित हुई हैं। 

जनसंख्या की आधे से ज्यादा जनसंख्या वनों पर आधारित है। तथा बड़ती जनसंख्या के दबाव, क्षेत्र में हो रहे अनियमित, अनियमित विकाष कार्यो व सर्वे प्रक्रिया के नाम पर, एक बडे़ पैमाने पर वनों व वन क्षेत्र का विनाष हुआ है। तथा पर्यावरण प्रदुषण के रूप में जनपद एक गम्भीर चुनौती की त्रासदी से त्रस्त है।


नार्दल कोल्डफिल्ड लि. एन.सी.एल की खुले मँुह की नौ परियोजनाए चलता है। जिसमें से प्रमुख चार परियोजनाए जनपद की सीमा के अन्दर स्थित है। तथा 5 अन्य म.प्र. राज्य में जनपद सीमा पर स्थित है। इसके अतरिक्त पावर जनरेषन के रूप में नेषनल थर्मल पावर कापोरेषन (एन.टी.पी.सी.) उत्तर प्रदेष राज्य विद्युत परिषर तथा नीजि क्षेत्र को मिला 6 प्रमुख तापीय परियोजना विद्युत केन्द्रों मे इस समय लगभग 6800 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। इसके अतरिक्त अन्य प्रमुख औद्योगिक इकायों में हिन्डालकों इण्डस्ट्रीज लि., कनौरिया केमिकल्स, हाईटेक कार्बन, विकास गैसेज, जे.पी. सीमेन्ट डाला व चुर्क सीमेन्ट फैक्ट्रीया, कार्बन, चुना भट्ठा, क्रेसर अद्योग, बारूद के कारखाने गैस तथा रसायनों के उत्पादन हेतु स्थापित है।

इस क्षेत्र मेें विकास कर अन्य सम्भावनाओं के रूप में क्षेत्र में निहीत कोयला निवेष के अनुसार लगभग हजारों  मेगावाट विद्युत उत्पादन के अतिरिक्त उत्पादन विस्तार की कल्पना विद्युत क्षेत्र के लिए अनुमोदित योजनाओं के आधार पर कि जा सकती है। इसके अतिरिक्त क्षेत्र में सोना व यूरेनियम स्त्रोतों की जानकारी मिलने के उपरान्त क्षेत्र मेें वनों की सीमा के अतिरिक्त सिमटने व अन्य खनन की सम्भावनाए अतिरिक्त बलवती हुयी है। जो क्षेत्र के पर्यावरण के असंतुलन की प्रमुख स्त्रोत होगे। इस सम्पूर्ण क्षेत्र एक मात्र जल श्रोत गोविन्द बल्लभ पंत सागर ही है। जिसमे 458 वर्ग किमी का जल भराव क्षेत्र है तथा इस महत्वपूर्ण कोयला व विद्युत परियोजनाए इस भराव क्षेत्र के किनारों पर स्थित है। तथा इस सम्पूर्ण परियोजनाओं को जल आपूर्ति का एक मात्र साधन हैै। 

यद्यपि जनपद सोनभद्र देष ही नहीं अपितु विष्व के एक मूल्यवान तथा अपेक्षाकृत सस्ते श्रोत के रूप में निर्मित हुआ है। यद्यपि कोयला खनन, विद्युत उत्पादन और आधूतिक उद्योगों के परिणाम स्वरूप जीवन यापन के पारम्परिक तैर-तरीके में आये परिर्वतनों का क्षेत्र की अधिकाष जनसंख्या के लाभकारी नहीं रहे है तथा कथित विकास के नाम पर अनियमित विकास की आधी ने राजस्व बटोरने की बहुयामी श्रोत को जरूर उपलब्ध कराया है। परन्तु क्षेत्र की जनता के स्वास्थ व बड़ते पर्यावरण प्रदुषण की निष्चित उपेक्षा ही की है। 


समय-समय पर क्षेत्रीय नागरिकों एंव प्रबुध जनों द्वारा पर्यावरण परिस्थितियों के प्रति अनेक विरोध भी प्रगट किये गये है। जो कही भी सार्थक प्रयास तो नही कहे जा सकते हैं। जनपद सोनभद्र के पर्यावरण का प्रदुषण जनपद की सिमाओं तक ही सिमित तो नहीं है। अतः आवष्कता है कि इस क्षेत्र की पर्यावरण समस्यों का उच्चस्तरीय अध्ययन समिक्षा का सुझाव की तथा पर्यावरण जागरूकता की जिससे परियोजनाओं द्वारा किये जा रहे विकास को जनता के स्वास्थ की किमत पर आने देने से रोका जाय। जनपद के समस्त वायु जल व ध्वनी प्रदुषण एक चुनौती के रूप में सामने खड़ा है। तथा आवष्यक हो गया है यह कि विचार करना की इसी प्रकार एक स्वस्थ वातावरण बनाये रखा जाय तो हमारे जीवन की परम आवष्यकता है। 

इस विचार के पूर्व यदि जनपद के पर्यावर्णिय आवरण के संदर्भ में प्रदुषण की चर्चा की जाय। जनपद के बड़े भू-भाग में वन क्षेत्र थे तथा इन वन क्षेत्रों के विकास के नाम पर अंधा-धून कटाइ्र्र तथा सर्वें प्रक्रिया के दौरान एक बड़े भू-भाग को नियमितिकरण की समस्यों में जनपद सोनभद्र की प्राकृतिक धरोहर को विदीर्ण कर दिया है। सम्पूर्ण सोनभद्र वैसे तो पहले से ही अपने जल के प्रदुषण के लिए बदनाम था रही सही कसर औद्योगिक प्रतिष्ठानों के तेल मोबील कोयले की राख तथा चुपके से रातो के अंधेरे में छोड़े गये रसायन युक्त पानी ने तो सारे रिकार्ड ही तोड़ दिये है। जनपद के एक मात्र विषाल जल भण्डार रिहन्द जलासय तो अब अपने प्रदुषित जल के विभीषिता का प्रयाय बनता जा रहा है। 

वनों के क्षरण से अवनत वन भूमि के तल के सिधे सम्पर्क में आकर अपनी प्राकृतिक मृदा स्वरूप व उसकी उत्पादकता तो खोती ही जा रही है। साथ ही साथ जल में मृदा कड़ोे की प्रचुरता में रिहन्द जलाषय की धारक क्षमता पर ही प्रष्न चिन्ह लगा दिया है। बाकी रही-सही कसर विभिन्न परियोजनाओं से निकले कुड़ा-करकट प्रदुषित जल बड़ी मात्रा में प्रदुषण की गजर से ही स्थापित ऐस बन्धों की राख अपनी उत्पादक क्षमता बनाये रखने के लिए जलासय में बहा दी जाने वाली कारक को बेपनाह मात्रा में जलासय की धारक क्षमता के अतिरिक्त जल की प्राकृतिक कड़ों पर भी कफी असर पड़ा तथा अग्रहाय होता जा रहा है। जल में फ्लोराइड, वराकेडियम, अरगनी तथा पार्टिकुलेट आडिपरार्थी का भारी मात्रा में प्रदुषण हैं। फ्लोराईड के कारण काफी मात्रा में लोग हड्डी सम्बन्धि रोगों से ग्रस्त है । पारा की मात्रा रिहन्द जलाषय में इस हद तक है कि जलाषय की मछलीयों तक मे पारा विद्यमान है जो यहा के निवासीयों पाचन तंत्र को विकृत करने में काफी सहायक है क्यों की इसी जलाषय का जल यहा के बहुसंख्य लोगों को पीने के लिए प्रयोग करने हेतुु वितरित किया जाता है। वायु प्रदुषण के सम्बन्ध में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार वायु मण्डल में सल्फर डाई-आॅक्साईड की एक स्तर की मात्रा जमती जा रही है जो सूर्य की रोषनी अट्रावायलेट बिकीरण से स्वाभाविक है तथा वर्षां काल में राषानियक प्रतिक्रिया से गंधक व तेजाब की बारीस से इंनकार नहीं किया जा सकता। कारखानों से निकले धुए जहरीली गैसों से वायु प्रदुषण तेजी से फैलता जा रहा है कुछ डाॅक्टरों के अनुसार यहा निवासरत/कार्यरत श्रमिकेां व्यक्त्यिों में फालिस की बिमारी तरल कार्बन के कारण फेफड़े की बिमारीया हो रही है इसके अलावा इन कारखानांे से दमें, छय आदि रोगों से ग्रसीत हो चुके है।चारों ओर की फसल व पेड़ पैधों भी रोग ग्रस्त है तथा उनकी फल देने की क्षमता लुप्त प्रायः होती जा रही है।

कुल मिलाकर इस क्षेत्र में इंधन इतना जलाया जा रहा है कि वायु मण्डल में निष्क्रिय गैसों का मात्रा खास तौर से कार्बन-डाक्साईड की मात्रा इस कदर बढ़ती जा रही है कि आक्सीजन की कमी दिन प्रतिदिन होती जा रही है। सीमेन्ट कारखानों की धूल में उपस्थित सिलिका की मात्रा से फेफड़े चलनी होती जा रही है। पर्यावरण विज्ञानिक, पर्यावरण विभाग केन्द्र का भी विष्वविद्यालय के निदेषक डाॅ. वी.डी. त्रिपाठी के अनुसार ऊर्जांन्चज में लोग ष्ष्वांस, उच्च रक्तचाप, सीलीकोषिया, प्लम्बोसिस दातों के प्लोरोसिस एवं स्वेक्षण आंखों के रोषनी का कम होना, बच्चो की आई क्यू में कमी, अपराध पवृत्ति में वृद्धि तथा हृदय रोग व केंसर की षिकार मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है।

इस समय तक 1.5 लाख टन धूल, सीेमेन्ट, कोयला, राख प्रतिदिन पूरे ऊर्जांचल के वातावरण में छोड़ा जा रहा है। यहा परियोजनाओं में खदानों से धूल कड़ों के अलावा सल्फर-डाई-आक्साईड, नाईट्रोजन आक्साईड, कार्बन मोनों आक्साईड, हाइड्रोजन फ्लोराइड इत्यादि गैस रोजाना वातावरण में निकाली जा रही है। ध्वनि प्रदुषण की समस्या भी इस क्षेत्र में काफी बढ़ गई है। मषीनों की गड़गड़ाहट, विष्फोंटो वाहनों के षोरगुल ने व्यक्तियों की ध्वनि श्रव्य सीमा को इस कदर प्रभावित किया है कि बहराइन की समस्या, चिड़चिड़ापन तथा लोगों को बातचीत का लहजा भी ऊॅचा होता जा रहा है तथा स्वास्थ्य समस्याओं के अतिक्ति व्यक्ति की कर्मक्षमता तथा सामाजिक परिवार सम्बन्धों में निरन्तर हा्रस होता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार इस क्षेत्र में षोर का स्तर 75 से 92 डेसिबल तक बढ़ा है जो क्षेत्रीय जनता स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती ही है। इस प्रकार कुल मिलाकर क्षेत्र प्रदुषण की समस्या से बुरी तरह प्रभावित हो गया है यद्यपि इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के नाम काफी कुछ करने का प्रयास किया जा रहा है परन्तु यदि समय रहते इस समस्या के प्रति गंभीर उपायात्मक कदम नहीं उठाये गये तो इस क्षेत्र का विकास मानव जाति के लिए एक अभिषाप के अतिरिक्त कुछ और नहीं बन पायेगा।

भारतीय वन संरक्षण अधिनियम, 1980 यद्यपि पर्यावरण की इन्हीं समस्यों को दृष्टिगत रखकर बनाया गया तथा क्षेत्रीय वनों में विनाष को बचाते हुए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कुछ इस तरह से किया जाय की प्रदुषण की समस्या न्यूनतम हो तथा परियोजना की स्थापनाओं के साथ ही प्रदुषण के विरूद्ध कारगर कदम उठाये जाए परन्तु षासन स्तर की अनुमति प्राप्त होते ही विकास के नाम की जा रही प्रगति में लगातार पर्यावरण की उपेक्षा की जा रही है अतः आवष्यकता है इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के लिए एक स्थानिय प्रकोष्ठ की स्थापना की जो समय-समय पर परियोजनाओं के विकास के क्रम में प्रदुषण सम्बन्धी समस्यों का अध्ययन करते हुए सुझावात्मक उपाय कराता रहे तथा परियोजनाओं को प्रदुषण की समस्या एक मानक  स्तर तक कम करने हेतु विवष करे। दुर बैठा यह विभाग मात्र कोरम पूरा कर के कुछ नहीं कर पाता आवष्यकता हेै इस संगठन को और मजबूत करने की, साथ एक ऐसा  ढ़ाचा तैयार करने की जिसमें स्थानीय वन विभाग क्षेत्रीय स्वंयसेवी संगठनों, पर्यावरणविदों व पर्यावरण विभाग की मदद ली जाय तथा मासिक स्तर पर सुझाये गये उपायों की समीक्षा की कि किस स्तर तक परियोजनओं द्वारा न्यूनतम प्रदूषण किये जा रहे है। एक ऐसी सामाजिक चेतना की आवष्यकता है कि विकास-उत्पादन -प्रदूषण में सामंजस्य बनाने वाली दीर्घकालीन योजना के अनुसार ही कर्म किये जाय क्योकि प्रदूषण मुक्त समाज की कल्पना में ही किसी समाज के द्वारा किये जा रहे किसी विकास का महत्व उपयोग किया जा सकता है।

ट्रेनों में सिसकता बचपन सरकार लापरवाह


बचपन बचाओ अभियान में हाल में सुप्रीम कोर्ट ने यह कह कर उत्प्रेरक का काम किया है कि सरकार बच्चों को मजदूरी करने पर रोक लगाने के लिए आवश्यक कदम उठाये। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में सरकार कागजों पर बालश्रम रोकने के प्रयास में लग चुकी है। पर हकीकत ये है कि केन्द्र सरकार इसे अपने ही रेलवे के अंदर रोक पाने का कोई प्रयास करती नजर नहीं आ रही है। देश भर के ट्रेनों में आज भी बचपन सिसकता हुआ नजर आता है। ट्रेनों में झाड़ू लगाते बच्चे काम के एवज में खुशनामा मांगते ये बताने का प्रयास करते हैं कि हम शौक से ये काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि हमारी भी कुछ पारिवारिक मजबूरियां हैं। इन बच्चों का ये काम कई तरह से केन्द्र व राज्य सरकार की योजनाओं की पोल खोल रहा है। पहली बात तो ये भीख नहीं मांग रहे बल्कि दिखा रहे हैं कि हम गंदगी साफ कर आपको स्वच्छ जगह बैठा देखना चाहते हैं। बात साफ है रेल मंत्रालय ट्रेनों को हमेशा स्वच्छ रखने में सक्षम नहीं है। दूसरी कि अभी भी केन्द्र व राज्य की सरकारी योजनाएं इनके परिवार का पेट नहीं चला पा रही हैं। बचपन बचाने में पूरी तरह नाकामयाब सरकार के पास कोई ऐसा उपाय नहीं दीख पड़ता है जिसके द्वारा पढ़ने और खेलने की उम्र में इन बच्चों को ऐसे काम करने से रोका जा सके। एक तरफ जहाँ देश का अरबों रूपये काला धन विदेशों में जमा है वहीं एक-दो रूपये के लिए मुंहताज ये बच्चे सरकार के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है। 

खतरनाक साबित हो रहे ऊर्जांचल के कबाड़चोर


ऊर्जांचल में कबाड़चोरी एक संगठित अपराध का रूप लेता जा रहा है। कबाड़ चोरों का दहशत इतना अधिक है कि एनसीएल की सुरक्षा का बागडोर देख रहे पूर्व सैनिक भी उनके आतंक से भयभीत हो चले हैं। अभी कुछ माह पूर्व बीना और उसके बाद एनसीएल ककरी में कबाड़ चोरों ने सुरक्षा गार्डों को लहूलुहान करते हुए उनसे बंदूकें भी छीन ली थी। जिसका आज तक सुराग नहीं लग सका है। एक वर्ष पूर्व एनटीपीसी रिहंद में कबाड़ चोरों का पीछा कर रहे सीआईएसएफ के एक उपनिरीक्षक एसपी सिंह को चोरों ने अपनी गाड़ी से रौंद दिया था। यहीं नहीं दो वर्ष पूर्व खड़िया परियोजना में एक गनमैन को कबाड़ चोरों ने मौत के घाट उतार दिया था। कोयला से लेकर तमाम कीमती सामानों और डीजल को चट कर जाना इनके चुटकी का खेल है। स्थानीय लोग नक्सलियों के खौंफ से उतने भयाक्रांत नहीं है जितने कि कबाड़ चोरों के आतंक से। पत्थरबाजी करते हुए परियोजनाओं में घुसना तथा अपने मंसूबों में काययाब होकर वापिस लौटना इनकी आदत में शुमार हो गया है।

कबाड़चोरी से सबसे अधिक नुकसान एनसीएल परियोजना को हो रहा है। इसमें लगी अनेक कीमती समानों को दर्जनों की संख्या में हल्लाबोल कर कबाड़चोर बेच देते है। बाद में चोरी के इन सामानों को एनसीएल सहित तमाम परियोजनाओं में इनसे जुड़े सफेद पोश लोग घपाकर इसके एवज में बड़ी रकम प्राप्त कर लेते है। कहने का आशय है कि चोरी की सामानों का बाजार भी कबाड़ से जुड़े लोगों को यहीं मिल जाता है। परियोजना प्रबंधन इस बावत कुछ भी कहने से परहेज की स्थिति में खड़ा रहता है। ऊर्जांचल के लोगों ने सीबीआई सहित अन्य केन्द्रीय जांच एजेंसियों से यहां धड़ल्ले से चल रहे करोड़ों के अवैध करोबार को उजागर करने के लिए जांच की गुहार भी लगाई है।

वनाधिकार का लाभ नहीं मिल रहा


ऽ तहसील मुख्यालय पर प्रदर्शन की तैयारी
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वनाधिकार कानून के तहत धारा 20 पर काबिज लोगों को भौमिक अधिकार देने की मंशा पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। वनाधिकार समितियों के पास फिर से फाइल को पटक दिए जाने से लोगों की धुकधुकी बढ़ गई है। दावेदार इसके तहत आंदोलन की रणनीति पर भी विचार कर रहे हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर दावे की फाइलें आने से एक बार फिर दावेदार हैरान हो गए हैं। उपजिलाधिकारी ने दावों को पूर्ण कर पुनः भेजने की बात कही है। 

वन भूमि धारा 20 से आच्छादित जमीनों पर काबिज लोगों को औद्यौगिक अधिकार देने के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर वनाधिकार समितियों का गठन करके काबिज लोगों को अधिकार दिए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान काबिज लोगों के अलावा धारा 20 की ऐसी जमीनों पर भी लोगों ने दावा कर दिया, जो जंगल था। इसके अलावा बड़े पैमाने पर जंगलों का सफाया करके भी लोगों ने दावा कर दिया। इससे हट कर कई ऐसे लोगों ने भी दावा किया, जो धारा 20 पर काबिज है और उसका बाग, बगीचा, खेत आदि भी उसमें सम्मिलित हैं। समितियों ने लोगों के दावे को लेकर उपखंडीय समिति के सामने प्रस्तुत कर दिया। उपजिलाधिकारी ने कहा कि जो दावे ग्राम समितियों ने निरस्त कर दिए थे, उनको तहसील तक आने की जरूरत ही नहीं थी।

खोती जिंदगियों का पूछनहार कोई नहीं


जहरीले पानी से मौतें होने के बावजूद प्रशासन खामोश, अब तक डडिहरा तथा नेमना को मिलाकर तीन दर्जन ग्रामीण आदिवासियों की मौत हो चुकी है, अनपरा। देश की आधे से अधिक ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति करने वाले ऊर्जांचल के विकास खंड म्योरपुर में जीवन के लिए खतरा उत्पन्न होते जा रहा है। गोविंद बल्लभ पंत बांध का जहरीला हो रहा पानी हर साल सैकड़ों जिंदगियों को खामोश कर दे रहा है। कमरीड़ाह में दो वर्ष में हुई मौतों को लेकर मानवाधिकार आयोग के आलाधिकारी क्षेत्र का दौरा कर इस क्षेत्र को रहने के लिए खतरनाक बता चुके हैं। लेकिन रिहंद बांध के किनारे सदियों से रहने वाले आदिवासियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए जमीनी तौर पर कुछ नहीं किया जा सका। इस वर्ष अब तक डडिहरा तथा नेमना को मिलाकर तीन दर्जन ग्रामीण आदिवासियों की मौत हो चुकी है, मानवाधिकार आयोग जन संघर्ष मोर्चा तथा अन्य गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा दिए गए सूचना को गंभीरता से लेते हुए प्रदेश तथा जिला प्रशासन को इस क्षेत्र में विशेष सतर्कता बरतने तथा जन हानि रोकने का दो बार फरमान दे चुका है। लेकिन आदिवासियों की रोजाना स्वाहा हो रही जिंदगियों को बचाने के लिए विशेष ब्लू प्रिंट तैयार कर इस क्षेत्र के लोगोें के लिए कुछ नहीं किया जा सका। जानकार बताते हैं कि इस क्षेत्र में मौतें तो बहुत हुईं लेकिन अब तक प्रकाश में आधा-अधूरे की ही मामले सामने आ सके हैं। मानवाधिकार आयोग में इस क्षेत्र के लोगों की दुर्दशा को लेकर शिकायत दर्ज कराने वाले जन संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता दिनकर कपूर ने बताया कि शुद्ध पेय जल की पूर्ति सहित प्राथमिक स्वास्थ्य के लिए प्रशासन द्वारा कुछ नहीं किया गया जो कि घोर मानवीय अधिकारों का हनन है।

प्रदूषण नियंत्रण विभाग का परियोजनाओं से कैसा संबंध।


अधिकारी परियोजनाओं पर नकेल कसने में है असक्षम। 
चिमनियों से निकल रहा धुआं बीमारियों का बन रहा कारण। 
चिमनियों की उड़ती राख सेे जीना दुश्वार।
घर के बाहर कपड़े तथा गेहूं आदि सूखना भी हुआ मुश्किल।
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अनपरा में लगातार प्रदूषण से आजिज आम लोगों का कहना है कि चिमनियों से निकल रहे धुएं से लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। कोई ऐसा घर नहीं है जिसमें एक दो लोग दमा अथवा टीबी के रोगी न हो गए हो। कहा गया कि अगर शीघ्र प्रदूषण पर रोक नहीं लगाया जाता तो वह दिन दूर नहीं जब आम जनता सड़क पर उतर कर चिमनियों को ही बंद करने पर बाध्य होंगी। लोगों ने प्रश्न उठाया कि प्रदूषण नियंत्रण विभाग का आखिर परियोजनाओं से कौन सा संबंध है जिसकी एवज में अधिकारी इन परियोजनाओं पर नकेल नहीं कस रहे है। उनका कहना है कि प्रदूषण की वजह से उनकी दुकानें रसातल में मिलती जा रही है, प्रदूषण की वजह से अनपरा कालोनी से लेते हुए बाजार, गांव तथा दूरदराज के जंगल भी तबाह होते जा रहे है। लोगों ने मांग किया कि प्रदूषण से बीमार लोगों के चिकित्सा की व्यवस्था वातावरण को जहरीला बनाने वाली इन परियोजनाओं द्वारा किया जाना चाहिए। विस्थापितों ने देश के विकास के लिए अपनी संपत्ति देश को दे दिया लेकिन हम लोगों को विकास के नाम पर जहरीला वातावरण दिया जा रहा है जिसमें सांस लेने के लिए शुद्ध हवा, पीने के लिए शुद्ध पानी भी दुर्लभ हो गया है। 


पिछले दो दिसंबर, 2012 को अनपरा परियोजना के वीआईपी गेस्ट हाउस मेें विभिन्न परियोजनाओं के आलाधिकारियों तथा जिला प्रशासन तथा क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रक अधिकारी के साथ प्रदूषण को रोकने के लिए व्यापक स्तर पर बातचीत हुई थी। उसमें परियोजनाओें के अधिकारियों ने अपनी चिमनियों में लगी ईएसपी सिस्टम को अत्याधुनिक बताया था। लेकिन अनपरा में पिछले कुछ दिनों से आकाश से बरस रहे राख के बारीक कणों से लोगों का जीना दुश्वार हो गया है। सड़क के किनारे रहने वाले तो परेशान है ही कालोनीवासी भी अजिज आ गए है। गंदे कपड़े को साफ करने के बाद बाहर सूखाने पर वे चिमनियों से आ रहे राख से और गंदे हो जा रहे है। दिन भर घर की सफाई करने के बाद सुबह उठने के बाद घरों पर गंदगी का सैलाब उमड़ा हुआ दिखता है। 

महत्वपूर्ण है कि सभी परियोजनाएं अपने सिस्टम को प्रदूषण मुक्त होने की दावा कर रही है जबकि प्रदूषण रुकने का नाम नहीं ले रहा है। इसकी जांच कौन करेगा कि प्रदूषण किस परियोजना से फैल रही है। दो दिसंबर को प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी ने भी तमाम वायदे किए तथा परियोजनाओं से क्रमिक रूप से प्रदूषण नियंत्रण की बात कहीं लेकिन सब हवा-हवाई साबित हो रहा है। परियोजनाओं से लेकर प्रदूषण पर लगाम लगाने वाली संस्थाएं खामोश है। 

प्रदेश सरकार अपने गुड वर्क को दिखाने के लिए जिस तरीके से पिछले दिनों आनन-फानन में बिजली परियोजनाओं को बिना तैयार हुए ही लोकार्पण की है इससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा है। चिमनियों की राख से छत पर कपड़े तथा गेहूं सूखाना दुश्वार हो गया है। कोई भी घरेलू वस्तु बाहर रखी जाती है तो सुबह तक वह धुंए के गर्द की वजह से गन्दी व पुरानी नजर आने लगती है। प्रदूषण की वजह से लगातार ऊर्जांचल खतरनाक स्थिति में पहुंचता जा रहा है। प्रतिवर्ष देश में प्रदूषण की भयावहता वाले औद्योगिक परिक्षेत्र सही होते जा रहे है जबकि ऊर्जांचल अब तो नौंवे से आठवें स्थान पर पहुंच चुका है।