शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला-सोनभद्र


जनपद-सोनभद्र भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक जिला है। इस जिले का मुख्यालय राबर्ट्सगंज है। सोनभद्र जिला, मूल मिर्जापुर जिले से 4 मार्च 1989 को अलग किया गया था। 7,388 वर्ग किमी क्षेत्रफल के साथ यह उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है। यह 23.52 तथा 25.32 अंश उत्तरी अक्षांश तथा 82.72 एवं 93.33 अंश पूर्वी देशान्तर के बीच स्थित है। जिले की सीमा पश्चिम में मध्य प्रदेश, दक्षिण में छत्तीसगढ़, पूर्व में झारखण्ड तथा बिहार एवं उत्तर में उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जिला है। रार्बट्सगंज जिले का प्रमुख नगर तथा जिला मुख्यालय है। जिले की जनसंख्या 14,63,519 है तथा इसका जनसंख्या घनत्व उत्तर प्रदेश में सबसे कम 198 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। जनपद की कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 664522 हेक्टेयर है जिसमें 3,69,973.3 है भूमि वन भूमि जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 61.2ः है। कुल वन क्षेत्रफल का 40ः भू-भाग वन क्षेत्र सर्वें प्राक्रियो के बाद वन क्षेत्र से अलग हो जाने की सम्भावना है।

जिले में दो भौगोलिक क्षेत्र हैं जिनमें से क्षेत्रफल में हर एक लगभग 50 प्रतिशत है। पहला पठार है जो विंध्य पहाड़ियों से कैमूर पहाड़ियों तक होते हुए सोन नदी तक फैला हुआ है। यह क्षेत्र गंगा घाटी से 400 से 1,100 फिट ऊंचा है। दूसरा भाग सोन नदी के दक्षिण में सोन घाटी है जिसमें सिंगरौली तथा दुध्दी आते हैं। यह अपने प्राकृतिक संसाधनों एवं उपजाऊ भूमि के कारण विख्यात हैं। इस जनपद का अधिकाषः भाग विन्ध्यपर्वत श्रृखलाओं का एक भाग हैं। उत्तरी भारत में भूमि काली व कुछ गहरायी लिये है तथा अन्य भागों में भूमि छिछली स्तर की षेल्स व क्वार्टज युक्त है। मुख्य षैैल प्रकार सैण्ड स्टोन, डोलोमाइट एवं लाइम स्टोन है। यहाॅ की मुख्य भौगोलिक सरचना उत्तर में पोस्ट विन्ध्यम् तथा दक्षिण में गोडवाना संरचना युक्त है। जो स्वयं में कोयले का विपुल भण्डार अपने गर्भ स्थल में संजोये हुए है। 

जिले में बहने वाली सोन नदी जिले में पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। इसकी सहायक नदी रिहन्द जो छत्तीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश के पठार से निकलती है सोन में जिले के केन्द्र में मिल जाती है। रिहन्द नदी पर बना गोवन्दि वल्लभ पंत सागर आंशिक रूप से जिले में तथा आंशिक रूप से मध्य प्रदेश में आता है।

स्वतंत्रता मिलने के लगभग 10 वर्षों तक यह क्षेत्र (तब मिर्जापुर जिले का भाग) अलग-थलग था तथा यहां यातायात या संचार के कोई साधन नहीं थे। पहाड़ियों में चूना पत्थर तथा कोयला मिलने के साथ तथा क्षेत्र में पानी की बहुतायत होने के कारण यह औद्योगिक स्वर्ग बन गया। यहां पर देश की सबसे बड़ी सीमेन्ट फैक्ट्रियां, बिजली घर (थर्मल तथा हाइड्रो), एलुमिनियम एवं रासायनिक इकाइयां स्थित हैं। साथ ही कई सारी सहायक इकाइयां एवं असंगठित उत्पादन केन्द्र, विशेष रूप से स्टोन क्रशर इकाइयां, भी स्थापित हुई हैं। 

जनसंख्या की आधे से ज्यादा जनसंख्या वनों पर आधारित है। तथा बड़ती जनसंख्या के दबाव, क्षेत्र में हो रहे अनियमित, अनियमित विकाष कार्यो व सर्वे प्रक्रिया के नाम पर, एक बडे़ पैमाने पर वनों व वन क्षेत्र का विनाष हुआ है। तथा पर्यावरण प्रदुषण के रूप में जनपद एक गम्भीर चुनौती की त्रासदी से त्रस्त है।


नार्दल कोल्डफिल्ड लि. एन.सी.एल की खुले मँुह की नौ परियोजनाए चलता है। जिसमें से प्रमुख चार परियोजनाए जनपद की सीमा के अन्दर स्थित है। तथा 5 अन्य म.प्र. राज्य में जनपद सीमा पर स्थित है। इसके अतरिक्त पावर जनरेषन के रूप में नेषनल थर्मल पावर कापोरेषन (एन.टी.पी.सी.) उत्तर प्रदेष राज्य विद्युत परिषर तथा नीजि क्षेत्र को मिला 6 प्रमुख तापीय परियोजना विद्युत केन्द्रों मे इस समय लगभग 6800 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। इसके अतरिक्त अन्य प्रमुख औद्योगिक इकायों में हिन्डालकों इण्डस्ट्रीज लि., कनौरिया केमिकल्स, हाईटेक कार्बन, विकास गैसेज, जे.पी. सीमेन्ट डाला व चुर्क सीमेन्ट फैक्ट्रीया, कार्बन, चुना भट्ठा, क्रेसर अद्योग, बारूद के कारखाने गैस तथा रसायनों के उत्पादन हेतु स्थापित है।

इस क्षेत्र मेें विकास कर अन्य सम्भावनाओं के रूप में क्षेत्र में निहीत कोयला निवेष के अनुसार लगभग हजारों  मेगावाट विद्युत उत्पादन के अतिरिक्त उत्पादन विस्तार की कल्पना विद्युत क्षेत्र के लिए अनुमोदित योजनाओं के आधार पर कि जा सकती है। इसके अतिरिक्त क्षेत्र में सोना व यूरेनियम स्त्रोतों की जानकारी मिलने के उपरान्त क्षेत्र मेें वनों की सीमा के अतिरिक्त सिमटने व अन्य खनन की सम्भावनाए अतिरिक्त बलवती हुयी है। जो क्षेत्र के पर्यावरण के असंतुलन की प्रमुख स्त्रोत होगे। इस सम्पूर्ण क्षेत्र एक मात्र जल श्रोत गोविन्द बल्लभ पंत सागर ही है। जिसमे 458 वर्ग किमी का जल भराव क्षेत्र है तथा इस महत्वपूर्ण कोयला व विद्युत परियोजनाए इस भराव क्षेत्र के किनारों पर स्थित है। तथा इस सम्पूर्ण परियोजनाओं को जल आपूर्ति का एक मात्र साधन हैै। 

यद्यपि जनपद सोनभद्र देष ही नहीं अपितु विष्व के एक मूल्यवान तथा अपेक्षाकृत सस्ते श्रोत के रूप में निर्मित हुआ है। यद्यपि कोयला खनन, विद्युत उत्पादन और आधूतिक उद्योगों के परिणाम स्वरूप जीवन यापन के पारम्परिक तैर-तरीके में आये परिर्वतनों का क्षेत्र की अधिकाष जनसंख्या के लाभकारी नहीं रहे है तथा कथित विकास के नाम पर अनियमित विकास की आधी ने राजस्व बटोरने की बहुयामी श्रोत को जरूर उपलब्ध कराया है। परन्तु क्षेत्र की जनता के स्वास्थ व बड़ते पर्यावरण प्रदुषण की निष्चित उपेक्षा ही की है। 


समय-समय पर क्षेत्रीय नागरिकों एंव प्रबुध जनों द्वारा पर्यावरण परिस्थितियों के प्रति अनेक विरोध भी प्रगट किये गये है। जो कही भी सार्थक प्रयास तो नही कहे जा सकते हैं। जनपद सोनभद्र के पर्यावरण का प्रदुषण जनपद की सिमाओं तक ही सिमित तो नहीं है। अतः आवष्कता है कि इस क्षेत्र की पर्यावरण समस्यों का उच्चस्तरीय अध्ययन समिक्षा का सुझाव की तथा पर्यावरण जागरूकता की जिससे परियोजनाओं द्वारा किये जा रहे विकास को जनता के स्वास्थ की किमत पर आने देने से रोका जाय। जनपद के समस्त वायु जल व ध्वनी प्रदुषण एक चुनौती के रूप में सामने खड़ा है। तथा आवष्यक हो गया है यह कि विचार करना की इसी प्रकार एक स्वस्थ वातावरण बनाये रखा जाय तो हमारे जीवन की परम आवष्यकता है। 

इस विचार के पूर्व यदि जनपद के पर्यावर्णिय आवरण के संदर्भ में प्रदुषण की चर्चा की जाय। जनपद के बड़े भू-भाग में वन क्षेत्र थे तथा इन वन क्षेत्रों के विकास के नाम पर अंधा-धून कटाइ्र्र तथा सर्वें प्रक्रिया के दौरान एक बड़े भू-भाग को नियमितिकरण की समस्यों में जनपद सोनभद्र की प्राकृतिक धरोहर को विदीर्ण कर दिया है। सम्पूर्ण सोनभद्र वैसे तो पहले से ही अपने जल के प्रदुषण के लिए बदनाम था रही सही कसर औद्योगिक प्रतिष्ठानों के तेल मोबील कोयले की राख तथा चुपके से रातो के अंधेरे में छोड़े गये रसायन युक्त पानी ने तो सारे रिकार्ड ही तोड़ दिये है। जनपद के एक मात्र विषाल जल भण्डार रिहन्द जलासय तो अब अपने प्रदुषित जल के विभीषिता का प्रयाय बनता जा रहा है। 

वनों के क्षरण से अवनत वन भूमि के तल के सिधे सम्पर्क में आकर अपनी प्राकृतिक मृदा स्वरूप व उसकी उत्पादकता तो खोती ही जा रही है। साथ ही साथ जल में मृदा कड़ोे की प्रचुरता में रिहन्द जलाषय की धारक क्षमता पर ही प्रष्न चिन्ह लगा दिया है। बाकी रही-सही कसर विभिन्न परियोजनाओं से निकले कुड़ा-करकट प्रदुषित जल बड़ी मात्रा में प्रदुषण की गजर से ही स्थापित ऐस बन्धों की राख अपनी उत्पादक क्षमता बनाये रखने के लिए जलासय में बहा दी जाने वाली कारक को बेपनाह मात्रा में जलासय की धारक क्षमता के अतिरिक्त जल की प्राकृतिक कड़ों पर भी कफी असर पड़ा तथा अग्रहाय होता जा रहा है। जल में फ्लोराइड, वराकेडियम, अरगनी तथा पार्टिकुलेट आडिपरार्थी का भारी मात्रा में प्रदुषण हैं। फ्लोराईड के कारण काफी मात्रा में लोग हड्डी सम्बन्धि रोगों से ग्रस्त है । पारा की मात्रा रिहन्द जलाषय में इस हद तक है कि जलाषय की मछलीयों तक मे पारा विद्यमान है जो यहा के निवासीयों पाचन तंत्र को विकृत करने में काफी सहायक है क्यों की इसी जलाषय का जल यहा के बहुसंख्य लोगों को पीने के लिए प्रयोग करने हेतुु वितरित किया जाता है। वायु प्रदुषण के सम्बन्ध में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार वायु मण्डल में सल्फर डाई-आॅक्साईड की एक स्तर की मात्रा जमती जा रही है जो सूर्य की रोषनी अट्रावायलेट बिकीरण से स्वाभाविक है तथा वर्षां काल में राषानियक प्रतिक्रिया से गंधक व तेजाब की बारीस से इंनकार नहीं किया जा सकता। कारखानों से निकले धुए जहरीली गैसों से वायु प्रदुषण तेजी से फैलता जा रहा है कुछ डाॅक्टरों के अनुसार यहा निवासरत/कार्यरत श्रमिकेां व्यक्त्यिों में फालिस की बिमारी तरल कार्बन के कारण फेफड़े की बिमारीया हो रही है इसके अलावा इन कारखानांे से दमें, छय आदि रोगों से ग्रसीत हो चुके है।चारों ओर की फसल व पेड़ पैधों भी रोग ग्रस्त है तथा उनकी फल देने की क्षमता लुप्त प्रायः होती जा रही है।

कुल मिलाकर इस क्षेत्र में इंधन इतना जलाया जा रहा है कि वायु मण्डल में निष्क्रिय गैसों का मात्रा खास तौर से कार्बन-डाक्साईड की मात्रा इस कदर बढ़ती जा रही है कि आक्सीजन की कमी दिन प्रतिदिन होती जा रही है। सीमेन्ट कारखानों की धूल में उपस्थित सिलिका की मात्रा से फेफड़े चलनी होती जा रही है। पर्यावरण विज्ञानिक, पर्यावरण विभाग केन्द्र का भी विष्वविद्यालय के निदेषक डाॅ. वी.डी. त्रिपाठी के अनुसार ऊर्जांन्चज में लोग ष्ष्वांस, उच्च रक्तचाप, सीलीकोषिया, प्लम्बोसिस दातों के प्लोरोसिस एवं स्वेक्षण आंखों के रोषनी का कम होना, बच्चो की आई क्यू में कमी, अपराध पवृत्ति में वृद्धि तथा हृदय रोग व केंसर की षिकार मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है।

इस समय तक 1.5 लाख टन धूल, सीेमेन्ट, कोयला, राख प्रतिदिन पूरे ऊर्जांचल के वातावरण में छोड़ा जा रहा है। यहा परियोजनाओं में खदानों से धूल कड़ों के अलावा सल्फर-डाई-आक्साईड, नाईट्रोजन आक्साईड, कार्बन मोनों आक्साईड, हाइड्रोजन फ्लोराइड इत्यादि गैस रोजाना वातावरण में निकाली जा रही है। ध्वनि प्रदुषण की समस्या भी इस क्षेत्र में काफी बढ़ गई है। मषीनों की गड़गड़ाहट, विष्फोंटो वाहनों के षोरगुल ने व्यक्तियों की ध्वनि श्रव्य सीमा को इस कदर प्रभावित किया है कि बहराइन की समस्या, चिड़चिड़ापन तथा लोगों को बातचीत का लहजा भी ऊॅचा होता जा रहा है तथा स्वास्थ्य समस्याओं के अतिक्ति व्यक्ति की कर्मक्षमता तथा सामाजिक परिवार सम्बन्धों में निरन्तर हा्रस होता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार इस क्षेत्र में षोर का स्तर 75 से 92 डेसिबल तक बढ़ा है जो क्षेत्रीय जनता स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती ही है। इस प्रकार कुल मिलाकर क्षेत्र प्रदुषण की समस्या से बुरी तरह प्रभावित हो गया है यद्यपि इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के नाम काफी कुछ करने का प्रयास किया जा रहा है परन्तु यदि समय रहते इस समस्या के प्रति गंभीर उपायात्मक कदम नहीं उठाये गये तो इस क्षेत्र का विकास मानव जाति के लिए एक अभिषाप के अतिरिक्त कुछ और नहीं बन पायेगा।

भारतीय वन संरक्षण अधिनियम, 1980 यद्यपि पर्यावरण की इन्हीं समस्यों को दृष्टिगत रखकर बनाया गया तथा क्षेत्रीय वनों में विनाष को बचाते हुए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कुछ इस तरह से किया जाय की प्रदुषण की समस्या न्यूनतम हो तथा परियोजना की स्थापनाओं के साथ ही प्रदुषण के विरूद्ध कारगर कदम उठाये जाए परन्तु षासन स्तर की अनुमति प्राप्त होते ही विकास के नाम की जा रही प्रगति में लगातार पर्यावरण की उपेक्षा की जा रही है अतः आवष्यकता है इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के लिए एक स्थानिय प्रकोष्ठ की स्थापना की जो समय-समय पर परियोजनाओं के विकास के क्रम में प्रदुषण सम्बन्धी समस्यों का अध्ययन करते हुए सुझावात्मक उपाय कराता रहे तथा परियोजनाओं को प्रदुषण की समस्या एक मानक  स्तर तक कम करने हेतु विवष करे। दुर बैठा यह विभाग मात्र कोरम पूरा कर के कुछ नहीं कर पाता आवष्यकता हेै इस संगठन को और मजबूत करने की, साथ एक ऐसा  ढ़ाचा तैयार करने की जिसमें स्थानीय वन विभाग क्षेत्रीय स्वंयसेवी संगठनों, पर्यावरणविदों व पर्यावरण विभाग की मदद ली जाय तथा मासिक स्तर पर सुझाये गये उपायों की समीक्षा की कि किस स्तर तक परियोजनओं द्वारा न्यूनतम प्रदूषण किये जा रहे है। एक ऐसी सामाजिक चेतना की आवष्यकता है कि विकास-उत्पादन -प्रदूषण में सामंजस्य बनाने वाली दीर्घकालीन योजना के अनुसार ही कर्म किये जाय क्योकि प्रदूषण मुक्त समाज की कल्पना में ही किसी समाज के द्वारा किये जा रहे किसी विकास का महत्व उपयोग किया जा सकता है।

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