रविवार, 26 अप्रैल 2015

रेलवे के स्वास्थ्य केन्द्र में सुविधाओं को टोटा


कर्मीयो को नही मिल रहा समुचित चिकित्सा और उपचार
रेलवे स्टेशन सिंगरौली में पदस्थ करीब 350 कर्मचारियो एवं उनके परिवार के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए स्थापित रेल स्वास्थ्य केन्द्र में अव्यवस्थाओ का आलम बना हुआ है। जानकारी के मुताबिक स्वास्थ्य केन्द्र में पदस्थ चिकित्सक आये दिन नदारत रहते है। स्वास्थ्य केन्द्र अपने निर्धारित समय पर नही खुलने से रेल कर्मियो में असंतोष व्याप्त है। स्वास्थ्य केन्द्र में पदस्थ चिकित्सक के नदारत रहने से रेल कर्मचारीयो को अपना एवं परिवार का उपचार कराने निजी चिकित्सालय या झोला छाप डाक्टरो के शरण में जाना पड़ता है। रेलवे स्टेशन पर यदि किसी यात्री की अचानक तबियत खराब हो जाती है तो उसका प्राथमिक उपचार भी नही हो पाता। उसे स्टेशन से तीन किमी दूर स्थित चिकित्सालयो में जाना पड़ता है। स्वास्थ्य केन्द्र में अव्यवस्था के कारण रेल कर्मी निजी चिकित्सको की शरण में जाने को मजबुर हो जाते है या उन्हे दूसरे स्टेशन के चिकित्सालय में जाकर उपचार करानी पड़ती है। बताया गया है कि जब अन्य स्टेशनो के स्वास्थ्य केन्द्र के चिकित्सक अवकाश पर रहते है तो उनके स्थान पर सिंगरौली के चिकित्सक की डियूटी लगा दी जाती है लेकिन जब सिंगरौली में पदस्थ चिकित्सक छुट्टी पर चले जाते है तो उनके स्थान पर किसी चिकित्सक की डियूटी नही लगायी जाती है। नतीजन हप्ते पखवाड़े तक स्वास्थ्य केन्द्र बिना चिकित्सक के चलते रहता है।

कम्पाउंडर के भरोसे चल रहा स्वास्थ्य केन्द्र
रेलवे स्टेशन सिंगरौली का स्वास्थ्य केन्द्र एक कम्पाउन्डर के भरोसे चल रहा है। रेल कर्मियो की स्वास्थ्य की देखभाल के लिए स्थापित स्वस्थ्य केन्द्र शोपिस बनकर रह गया है। चिकित्सक की गैर मौजूदगी में रेल कर्मियो के बीच कोई बड़ी घटना हो जाये या कोई बीमार पड़ जाये तो उनकी देखरेख के लिए कोई व्यवस्था नही की गयी है अंततः उन्हे कम्पाउंडर के भरोसे ही अपना उपचार कराना पड़ता है। सूत्रो की माने तो स्वास्थ्य केन्द्र निर्धारित समय पर खुलने की बजाय कम्पाउंडर के मनमाने ढ़ंग से खुलता है जहां पर उपचार कराना नामुमकिन हो रहा है।

स्वास्थ्य केन्द्र की व्यवस्था सुधारने की मांग
सिंगरौली रेलवे स्टेशन में पदस्थ करीब 350 कर्मचारीयो एवं उनके परिवार की देखभाल के लिए स्थापित स्वास्थ्य केन्द्र शोपिस बनकर रह गया। रेल कर्मियो के परिजनो को इस स्वास्थ्य केन्द्र का समुचित लाभ नही मिल रहा है। रेल कर्मियो ने रेलवे के उच्च प्रबंधन का ध्यान आकृष्ट कर विभागीय स्वास्थ्य केन्द्र में चिकित्सक व्यवस्था में सुधार लाने की मांग की है। जिससे रेल कर्मियो एवं परिवार को समय पर स्वास्थ्य केन्द्र का लाभ मिल सके।

एनटीपीसी परिसर में अपने हुए पराये गुलजार हुआ विरान

 तकनिकी सुविधाओं ने कर दिया दफ्तरों को खाली।
नवीनीकरण एवं आधुनिकिकरण के कारण कार्यालय, वर्कशाप, कर्मचारी विकास केन्द्र कान्फ्ररेन्स हाल में कर्मचारियों की संख्या कम हो जाने एवं ज्यादातर कार्य इन्टरनेट, वाई-फाई, व विडियों का कान्फ्रेन्सींग से होने के कारण आफिस विल्डिंग का ज्यादातर हिस्सा खाली हो गया है। जो आफिस कुछ वर्ष पहले कर्मचारियों, अधिकारियों, ठेकेदारों, सप्लायरों एवं विजिटरो के चहल कदमी से गुलजार हुआ करता था आज उसी विल्डिंग में एक पिन भी गिर जाए तो सुनाई पड़ती है।
एनटीपीसी की मदर प्लान्ट सिंगरौली सुपर थर्मल पावर स्टेशन में पिछले एक दशक से जारी गुणांक सेवा निवृन्ति से परियोजना परिसर वीराना होता जा रहा है। एनटीपीसी का वर्ष उन्तीस सौ पचहत्तर में स्थापना के ठीक बाद सिंगरौली विधुत गृह की नीव रखी गयी थी। दो हजार मेगावाट के इस पावर स्टेशन में कर्मचारियों अधिकारियों की संख्या तीन हजार दो सौ से भी ज्यादा पहुच गयी थी। उस समय की तकनिकि के कारण हजारों लोग अस्थायी तौर पर परियोजना निमार्ण में कार्यरत थे। विधुत विहार कालौनी ज्वालामुखी कालौनी, कोटा बस्ती कालौनी सहित एक दर्जन से ज्यादा अस्थायी कालौनियां गुलजार हुआ करती थी। पिछले एक दशक से पहले इक्का- दुक्का रिटायरमेंट हुया करता था लेकिन वर्ष दो हजार में रिटायरमेंट जो जोर पकड़ा तो एक महिने में एक अलग महिने में दो एवं फिर तीन, चार, पाॅच लोग हर महिनें रिटायर होने लगें। वर्तमान में बत्तीस सौ कर्मचारियों, अधिकारियों की जगह ग्यारह सौ लोग ही बचे है और जो है वह भी ज्यादातर नर्ह भर्ती से है। सेवानिवृत्ति कर्मचारी अपने कार्यकाल के दौरान एनटभ्पीसी के जितने करीब थे आज उतना ही दूर एवं बेगाने होते जा रहे है। इस बात का पता तब चल जाता है जब उनके रिटायर होने के छः महिने बाद हो उनके घर का बिजली पानी काट दिये जाते है या काट देने की चेतावनी मिलने ललती है। अपने युवा अवस्था से बुढ़ापे तक का सफर कर इन कर्मचारियों ने पैतिस साल से भी ज्यादा रह कर इन्होने क्वार्टर को घर बनाया एवं रिटायर होते ही एक झटके से उसी घर को छोड़ना यकीनन भारी पड़ता होगा। पैतीस वर्षो से गुलजार वही आवास उनके जाते ही वीरान, परिन्दो का वसेरा बन कर रह जाता है। सेवानिवृन्ति कर्मचारियों द्वारा उनके आवास खाली करा लेना कंपनी की जरूरत नही सिर्फ कंपनी की निति है बत्तीस सौ कर्मचारीयों के लिए अड़तीस परिसर विधुत विहार कालौनी में कराये गये है जबकि हजारों आवास कोटा बस्ती एवं ज्वालामुखी कालौनी में पहले से मौजूद है जिसमें ज्यादातर अवैध कब्जा हो चुका है। सेवानिवृन्त इन कर्मचारियों को भला क्या पता था कि अपनी कंपनी के जो अवैध कब्जा के लिए कल वे सक्रिय थे एक दिन उन्हे भी अवैध करार देकर वेदखल कर दिया जायेगा। वर्तमान में अड़तीस सौ आवास के सापेंक्ष मात्र ग्यारह सौ कर्मचारी ही रह गये है जबकि लगभग एक हजार आवासो को ठेकेदार, दुकानदार, पोस्ट आफिस, बैक इश्युरेन्स एवं कुछ विद्यालयों को आवंटित है वावजूद इसके एक हजार से भी ज्यादा आवास खाली किसी वीरान खंडहर होते जा रहे है। 

सिंगरौली के रेलवे वे-ब्रीज में सीबीआई का छापा

-शक्ति आनन्द कनौजिया
सिंगरौली रेलवे स्टेशन का वेब्रीज
सिंगरौली के रेलवे वे-ब्रीज (तौल ब्रिज) में गम्भीर अनियमितता की जाँच हेतु जबलपुर की सीबीआई टीम ने सिंगरौली स्टेशन के रेलवे वे ब्रीज पर छापा मारकर जांच की। जिसमें भारी अनियमिता मिलने पर ब्रिज में लगे कप्यूटर, पुराने प्रिंट आउट, एवं बैगन वजन के अन्य दस्तावेज जब्त कर अपने साथ ले गयी। सीबीआई के आकस्मिक कार्यवाही से रेलवे विभाग में हड़कम्प मच गया। जबलपुर की सीबीआई पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में नौ सदस्यी टीम में इंस्पेक्टर रेलवे के जबलपुर के साथ ब्लाक बी परियोजना के एजीएम संजय खरे, सेल्स मैनेजर एसपी मिश्रा एवं एक अन्य अधिकारी के साथ ही स्टेशन अधीक्षक बांकेलाल चोपन के एरिया मैनेजर युवराज पाटिल जांच के दौरान मौजूद रहे। रेलवे कांटा में अनियमिता को लेकर सीबीआई टीम ने वेब्रीज पर पदस्थ कर्मचारियो एवं स्टेशन अधीक्षक से गहन पूछताछ की। एनसीएल के विभिन्न परियोजनाओ से सिंगरौली रेलवे स्टेशन से रैक द्वारा कोयला परिवहन कराया जा रहा था। जिसमें पीएमआरजी हरियाणा, परीक्षा थर्मल पावर झांसी, कोटा राजस्थान, सूरत एवं उ.प्र. के पावर परियोजनाओ कोयला भेजा जा रहा था। वे-ब्रीज की अनियमितता के विषय में एनसीएल प्रबंधन द्वारा रेलवे विभाग के उच्च अधिकारियो को बार-बार पत्र लिखकर वे-ब्रीज में गड़बड़ी होने की जानकारी दी जा रही थी, इसके बावजूद भी रेलवे के कर्मचारियों द्वारा पुराने वे-ब्रीज से ही लोड कोयला रैक का वजन कराकर गोल-माल किया जा रहा था। जबकि एनसीएल के ब्लाक बी परियोजना द्वारा पुराने वे-ब्रीज के बगल में नया इलेक्ट्रानिक वे-ब्रीज लगाया गया है। पूर्व में नाप तौल विभाग के जांच के दौरान उक्त वे-ब्रीज खराब बताकर सर्वे आफ करने की बात कही गयी थी। फिर भी रेलवे के उच्च अधिकारियो द्वारा अपने निजी स्वार्थ के लिए नाप तौल विभाग के जांच को नजर अंदाज कर दिया गया और कोयले का गोरख धंधा कई वर्षो से चल रहा था। जिससे रेलवे एवं एनसीएल को करोड़ो रूप्ये की राजस्व छति होने का अनुमान है।
 रेलवे वे-ब्रीज का कांटा फिक्स मिला
सीबीआई टीम ने अपने जाँच के दौरान रेलवे वे ब्रीज की जांच की तो उसका कांटा फिक्स मिला। कांटा से एक बार निर्धारित वजन का लोड निकाला गया तो कांटा ने जितना वजन बताया उसके बाद उसमे अधिक लोडकर जब वजन किया गया तो उतना ही कांटा बता रहा था। फिर कम वजन का लोड निकाला गया तो उसमें भी कांटा ने उतना ही बताया। जिस पर सीबीआई टीम ने कांटा में लगे कम्पयूटर एवं अन्य दस्तावेज खंगालने के बाद उसे जब्त कर लिया। बताया गया है कि एक बैगन का वजन अधिकतम 22 टन होता है अन्डर लोड कोयला का वजन 94 टन आना चाहिए। प्रति बैगन वजन 72 टन कोयला होना चाहिए। लेकिन कांटे में गड़बड़ी होने की वजह से बैगन में कितना भी कोलया ओवर लोड कर दिया जाय तो उसका वजन 94 टन बता रहा था।

नए सिरे से अधिग्रहण, न्यायोचित जीविकोपार्जन की गारण्टी की मांग

निर्माणाधीन कनहर डैम के पास पागन नदी पर इस भीषण गर्मी में विस्थापित धरने पर बैठे हैं। उनसे वार्ता की जगह पुलिस की संगीनों के साये में प्रशासन डैम का निर्माण करा रहा है। हालत इतनी बुरी है कि कनहर विस्थापितों के पैकेज की बंदरबांट में एक लेखपाल ने आत्महत्या तक कर ली। उपरोक्त आरोप कनहर विस्थापित संघर्ष समिति और आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के पदाधिकारियें ने लगाई है। उनका कहना है कि वर्ष-2013 में देश की संसद में नया भूमि अधिग्रहण कानून बना था जिसकी धारा 24(2) और 101 में साफ लिखा है कि जिन जमीनों का अधिग्रहण 1894 के कानून के तहत हुआ है और सरकार पांच साल तक जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं हासिल करती है तो उसे पुनः अधिग्रहण करने के लिए शासनादेश जारी करना होगा। कनहर से विस्थापित हो रहे क्षेत्र का सच यह है कि डैम के शिलान्यास के बाद आज 40 साल में सरकार ने कब्जा हासिल नहीं किया। जहां आज भी विस्थापित अपने गांव में रहते रहंे और इन ग्रामों में सरकारी धन से विकास कार्य होते रहे और वनाधिकार कानून के तहत दावे भी लिए गये। अधिग्रहण के वक्त सरकार ने हर परिवार को नौकरी देने जैसे जो वायदें किए थे उन्हें भी पूरा नहीं किया गया। उन्होंने बताया कि कनहर डैम के जलमग्न क्षेत्र का सही सीमांकन आज तक नहीं हुआ है। तीन बार हुए सरकारी सर्वे में क्रमशः 2181, 2925 व 4143.5 हेक्टेयर डूब क्षेत्र के अलग-अलग आकड़े इस सच्चाई को खुद सामने लाते है, साथ ही शिलान्यास के वक्त जारी दस्तावेज में कहा गया कि डैम की प्रारम्भिक ऊचांई 39.90 मी. रखी जायेगी जिसे दूसरे चरण में बढोत्तरी करके 52.90 मी. किया जायेगा। लोग यह भी जाना चाहते है कि कनहर डैम को रिहंद डैम से जोड़ने के लिए डिजायन के अनुरूप यदि इसकी ऊचांई 52.90 मी0 कर दी गयी तो उत्तर प्रदेश के जनपद-सोनभद्र, छत्तीसगढ़ झारखण्ड के कितने गांव डूबेंगे। देखने वाली बात यह है कि कनहर बांध इस क्षेत्र के विकास के लिए जरूरी है लेकिन साथ ही इससे हो रहे विस्थापितों की न्यायोचित मांगों को पूरा करके ही इस विकास के सपने को साकार किया जा सकता है। इतिहास गवाह है कि किसान-आदिवासी विस्थापन का दंश झेल चुके हैं, रिहन्द विस्थापितों को आजतक न्याय नहीं मिला।

कनहर नदी बांध परियोजना पर श्वेत पत्र लाए सरकार-आइपीएफ

  • मुख्यमंत्री को किसानों व प्रभावितों ने भेजा पत्र।
आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट ने सोनभद्र जनपद में कनहर नदी पर बन रहे बांध से विस्थापित हो रहे परिवारों पर 14 अप्रैल को हुए गोली-काण्ड़ पर गहरी चिंता व्यक्त की है। आइपीएफ के जिला संयोजक शम्भूनाथ गौतम ने बताया कि आइपीएफ के प्रदेष संगठन प्रभारी दिनकर कपूर ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर सरकार से कनहर नदी पर सिचांई के लिए बन रहे बांध पर श्वेत पत्र लाने, इससे विस्थापित हो रहे परिवारों के सम्मानजनक पुर्नवास और मुआवजा के सवाल को हल करने और विस्थापितों पर की जा रही दमनात्मक कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की है। वर्ष-1976 में हुए अधिग्रहण के समय के सर्वे को आधार बना कर घोषित किये गये पुनर्वास पैकेज में प्रशासन द्वारा मौजूदा समय में बांध से प्रभावित व विस्थापित हो रहे परिवारों को शामिल न किये जाने व ऐसे विस्थापितों को पुनर्वास पैकेज से वंचित करने से मौजूदा संकट पैदा हुआ है। साथ ही सरकार द्वारा कनहर विस्थापितों को कई किस्तों में दिया जा रहा पुर्नवास पैकेज और पूरी पुर्नवास प्रक्रिया को बेहद जटिल बनाने व कई अन्य विसंगतियों से भी विस्थापितों में गहरा अविश्वास पैदा हुआ है। सरकार की इस तरह की कार्यवाही के विरुद्ध विस्थापित वहां 23 दिसम्बर 2014 से धरनारत है। लेकिन शासन प्रशासन ने नये सिरे से विस्थापितों की संख्या का सर्वे व सीमांकन कराने और विस्थापितों की जीविकोपार्जन की गारण्टी कराने की मांग पर वार्ता कर समस्याओं का निराकरण करने के प्रति बेहद संवेदनहीन रूख अपनाया हुआ है। स्थिति यह है कि राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्युनल नई दिल्ली द्वारा दिए स्थगनादेश पर पर भी सरकार ने आज तक अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है। उन्होंने कहा कि यदि शासन-प्रशासन सिंचाई के लिए निर्मित किये जा रहे इस बांध के निर्माण के लिए संजीदा होता तो वह दमन की नीति की जगह विस्थापितों से वार्ता कर उनकी न्यायोचित मांगों को हल करता ताकि बांध का निर्माण सुचारू तौर पर होता और इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से बचा जाता। पत्र में मुख्यमंत्री से अनुरोध किया कि सिचांई सुविधा व विकास के उद्देश्य से निर्मित हो रहे इस बांध को बनाने के लिए जरूरी है कि तत्काल परियोजना पर श्वेत पत्र लाया जाये और प्रशासन विस्थापितों पर दमन करने की नीति से बाज आये ।

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

हस्ताक्षर अभियान में उमड़ा जन समुदाय

अनपरा परिक्षेत्र को नगर पंचायत का दर्जा देने हेतु शुरू हुआ हस्ताक्षर अभियान
प्रथम दिन 500 से ज्यादे लोगों ने हस्ताक्षर कर जताया समर्थन
सप्ताह भर चलेगा संयुक्त हस्ताक्षर अभियान

नगर पंचायत का दर्जा देने हेतु हस्ताक्षर अभियान 
पूर्व घोषित कार्यक्रम के मद्देनजर आज दिनांक 15.04.2015 को अनपरा स्थित नेहरू चैक, औड़ी मोड़ से अनपरा परिक्षेत्र को नगर पंचायत का दर्जा देने हेतु संयुक्त हस्ताक्षर अभियान प्रारम्भ हुआ जिसमें पहले ही दिन 500 से ज्यादा लोगों ने हस्ताक्षर करके अपना समर्थन दिया। कार्यक्रम संयोजको का कहना है कि यह हस्ताक्षर अभियान सप्ताह भर अनपरा के परिक्षेत्र के चर्चित चैराहों पर चलेगा जिसमें हर तब के और हर गली के लोगों से हस्ताक्षर कराकर उनकी सहमति ली जायेगी। साथ ही कार्यक्रम के क्रम में बताया गया कि 500 पोस्टकार्ड के माध्यम से भी लोग अपनी बात रख रखते हैं। कार्यक्रम संयोज कों शक्ति आनंद, अनूप द्विवेदी, सतीश वर्मा, अब्दुल बारि खान ने बताया कि इस हस्ताक्षर अभियान में अनपरा परिक्षेत्र की आबादी का कम से कम 10 फीसदी आम लोगों से अनपरा नगर पंचायत के समर्थन हेतु हस्ताक्षर करवार मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव को भेजा जायेगा। हस्ताक्षर अभियान में हर अब तक हर तबके का समर्थन मिल रहा है। कहा कि आमजन ने अनपरा को नगर पंचायत बनाने हेतु कमर कस लिया है। इस अभियान में मुख्य रूप से शशि चन्द्र राकेश यादव, सतेन्द्र चन्द्रवंशी, ज्योति प्रकाश दूबे बीडीसी, मनोज कुमार, अनूप सिंह, पंकज गुप्ता, रिंकू सिंह, प्रिंस जायसवाल, विशाल दूबे, जसविंदर सिंह इत्यादि मौजूदरहें।